शाहरुख़-ऋतिक पर भारी कामसूत्र 3 डी?

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हाल ही में शर्लिन चोपड़ा की नई फ़िल्म 'कामसूत्र 3 डी' का ट्रेलर लॉन्च किया गया.
हालांकि इस मौके पर खुद शर्लिन नहीं नज़र आईं. मीडिया के हर सवाल का जवाब देते नज़र आए फ़िल्म के निर्देशक रूपेश पॉल और निर्माता सोहन रॉय.
इस मौके पर रूपेश और सोहन ये कहने से भी नहीं चूके कि कैसे उनकी फ़िल्म को अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म बाज़ार में कृष 3 और चेन्नई एक्सप्रेस से बेहतर दामों में खरीदा गया है.
रूपेश कहते हैं, ''यूके, जापान, थाईलैंड, ताइवान, इंडोनेशिया, फिजी, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और जर्मनी जैसे देशों में कामसूत्र को कृष 3 और चेन्नई एक्सप्रेस की तुलना में 70 से 80 प्रतिशत अधिक दाम में ख़रीदा गया है.''
रूपेश की ही बात को आगे बढ़ाते हुए निर्माता सोहन राय ने कहा, ''सिंगापुर जैसे एक छोटे से देश में अमूमन एक भारतीय फ़िल्म को 40 हज़ार सिंगापुर डॉलर में खरीदा जाता है. कामसूत्र 3 डी को सिंगापुर में 75 हज़ार सिंगापुर डॉलर में खरीदा गया.''
अब अगर फ़िल्म को हर ओर से इतनी वाहवाही मिल रही है तो फ़िल्म में कोई न कोई बात तो होगी ही. तो क्या ख़ास है कामसूत्र 3 डी में? इस सवाल का जवाब देते हुए रूपेश कहते हैं, ''जिस तरह से हमने फ़िल्म की कहानी कही है वो ख़ास है. फ़िल्म में जिस तरह के ऐक्शन सीन है वो भी ख़ास हैं.''
सेंसर बोर्ड का डर

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फ़िल्म में ऐक्शन सीन तो हैं ही साथ ही शर्लिन चोपड़ा के कई अंतरंग दृश्य भी हैं और इस वजह से रूपेश थोड़ा घबराए हुए भी हैं.
वो कहते हैं, ''मुझे भारतीय सेंसर बोर्ड का डर है. बोर्ड को कला की समझ नहीं है. मेरी फ़िल्म को विदेश में हाथों-हाथ लिया गया है ये तो अच्छी बात है लेकिन मैं चाहता हूं कि मेरी फ़िल्म को मेरे देशवासी भी देखें.''
अपनी बात को पूरा करते हुए रूपेश कहते हैं, ''अगर इटली में किसी दर्शक को मेरी फ़िल्म पसंद आती है और वो मेरी तारीफ भी करता है तो उसका क्या फ़ायदा, वो तो अपनी ही भाषा में मेरी तारीफ़ करेगा जो मेरी समझ भी नहीं आएगी. मैं चाहता हूं कि भारत में लोग ये फ़िल्म देखें और इसकी तारीफ करें.''
मीडिया से बात करते हुए रूपेश ने ये भी बताया कि फ़िल्म के लिए उनकी पहली पसंद शर्लिन चोपड़ा कभी भी नहीं थी.
वो कहते हैं, ''मैं चाहता था कि करीना कपूर ये फ़िल्म करें, उन्हें फ़िल्म की कहानी भी पसंद आई थी लेकिन फ़िल्म के शीर्षक से उन्हें समस्या थी.
इतना ही नहीं मैं चाहता था कि फ़िल्म के गाने गुलज़ार साहब लिखें लेकिन उन्हें भी फ़िल्म के शीर्षक से ही ऐतराज़ था.''
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