मुग़ल-ए-आज़म में तब अनारकली मधुबाला नहीं शहनाज़ होतीं

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- Author, वंदना
- पदनाम, भारतीय भाषाओं की टीवी एडिटर
इश्क़ कहिए, मोहब्बत कहिए या प्यार- अगर इस ख़ूबसूरत एहसास में डूबे दो लोगों की कोई तस्वीर या छवि बनानी हो तो कुछ-कुछ उसी तस्वीर के जैसी होगी, जहाँ फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' में दुनिया से अंजान सलीम और अनारकली एक दूसरे में गुम हैं.
और सलीम बहुत ही नज़ाकत से एक पंख से अनारकली के चेहरे और होठों को सहलाता है, न छूकर भी छू जाने का एहसास.
ये क्लासिक सीन लोगों के दिलो-दिमाग़ में बरसों बाद भी दर्ज है.
पाँच अगस्त के दिन 1960 में रिलीज़ हुई 'मुग़ल-ए-आज़म' में अनारकली का ये रोल बाद में मधुबाला ने किया पर इस रोल के लिए दरअसल, के. आसिफ़ को कई अनारकलियों से होकर गुज़रना पड़ा.
मधुबाला से भी पहले के. आसिफ़ ने इस किरदार के लिए शहनाज़ नाम की एक महिला को चुना था.

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शहनाज़ की दोहरी ज़िंदगी
अगर किस्मत साथ देती तो 'मुगल़-ए-आज़म' में मधुबाला नहीं अनारकली के तौर पर शहनाज़ होतीं.
ये कहानी उसी शनहाज़ की है जो भोपाल के नवाब परिवार में जन्मीं और कम उम्र में एक रसूख़दार राजनीतिक परिवार में निकाह उन्हें बॉम्बे (अब मुंबई) ले आया, जहाँ शुरू हुई उनकी दोहरी ज़िंदगी.
एक बाहरी ज़िंदगी जो पति के साथ हाई सोसाइटी, ग्लैमर, नेहरू और दिलीप कुमार जैसी हस्तियों और पार्टियों से भरी हुई थी और एक निजी ज़िंदगी, जिसे उनकी बेटी ज़िल्लत, पति की शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से भरा जहन्नुम बताती हैं.
शहनाज़ तो अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी बेटी सोफ़ी नाज़ ने 'मुग़ल-ए-आज़म' से लेकर निजी ज़िंदगी के क़िस्सों को अपनी किताब 'शहनाज़ ए ट्रैजिक ट्रू स्टोरी ऑफ़ रॉयल्टी, ग्लैमर एंड हार्टब्रेक' में पिरोया है.

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के. आसिफ़ के सामने ऑडिशन
इसी दौरान शहनाज़ ने शौकिया तौर पर थिएटर में काम किया और उन्हें नाटक में अनारकली का रोल करने के लिए मिला.
सोफ़िया बताती हैं, "निर्देशक आसिफ़ उस प्ले को देखने गए थे. बस के. आसिफ़ को लगा कि उन्हें अपनी फ़िल्म के लिए इसी अनारकली की खोज थी. ख़ूबसूरती, सुरीली आवाज़, सटीक लहजा, उर्दू पर कमांड. वो माँ को सेट पर ले गए."
"माँ के पास अपना भोपाली जोड़ा था, अपने ज़ेवर थे, वही पहन के उन्होंने ऑडिशन दिया. कोई 200 तस्वीरें खींची गई थीं स्क्रीन टेस्ट के दौरान. पंख के साथ तस्वीर ली गई थी. दिलीप कुमार थे."
लेकिन ये सुंदर सपना बस यहीं तक था. शहनाज़ शाही परिवार से थीं और जब उनके भाई को पता चला कि वो फ़िल्म में काम करने वाली हैं तो उन्होंने के. आसिफ़ से फोटो लेकर फाड़ डालीं.

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'मुग़ल-ए-आज़म' के लिए अनारकली की तलाश
सोफ़ी बताती हैं, "माँ के भाई ने कहा कि पूरे ख़ानदान में ऐसा किसी ने नहीं किया आज तक- कहाँ नवाबी ख़ानदान और कहाँ फ़िल्मी दुनिया. वहाँ से के. आसिफ़ को भगा दिया गया. बेचारे के. आसिफ़."
'मुग़ल-ए-आज़म' की अनारकली जहाँ शंहशाह अकबर और उनके फ़रमानों को चुनौती दे डालती है, वहीं असल ज़िंदगी की शहनाज़ मर्दों के बनाये कायदों और उनके फ़रमानों में घुटी अनारकली बनते-बनते रह गईं.
ख़ैर अनारकली की ये दास्तां यहीं ख़त्म नहीं होती. के. आसिफ़ को अपनी अज़ीमो-शान शाहकार 'मुग़ल-ए-आज़म' के लिए अपनी अनारकली की तलाश में बरसों लग गए थे.
दरअसल, 'मुग़ल-ए-आज़म' बनाने का ख़्वाब के. आसिफ़ को तब आया जब 1944 में उन्होंने ड्रामानिगार इम्तियाज़ अली ताज का नाटक अनारकली पढ़ा और उन पर इसे बड़े पर्दे में क़ैद करने का जुनून सवार हो गया.

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मुल्क का बंटवारा
12 अगस्त 1945 को बॉम्बे टॉकीज़ में फ़िल्म का महूर्त हुआ, जिसमें अनारकली थी उस समय की उभरती नायिका नरगिस. अनारकली के लिबास में नरगिस की कई तस्वीरें भी उपलब्ध हैं.
फ़िल्म की शूटिंग अपनी रफ़्तार से चल रही थी कि मुल्क का बँटवारा हो गया, हालात बहुत नाज़ुक थे और फ़िल्म के निर्देशक ने पाकिस्तान जाने का फ़ैसला कर लिया.
नतीजा ये हुआ कि के. आसिफ़ को फ़िल्म रोक देनी पड़ी. बँटवारे के बाद सब कुछ बदल गया पर नहीं बदला तो अनारकली की कहानी कहने का के. आसिफ़ का जुनून.
साल 1951 में जाकर जब दोबारा फ़िल्म शुरू हुई तो फ़िल्म की कहानी बहुत तब्दील हो चुकी थी. क़िस्से कहानियाँ कई हैं लेकिन निचोड़ यही है कि नरगिस अब अनारकली नहीं बनना चाहती थीं.
जो दूसरे नाम सामने आए उनमें के. आसिफ़ अपनी अनारकली नहीं देख पा रहे थे. तब अनारकली के लिए के. आसिफ़ ने नूतन को चुना.

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अख़बारों में इश्तिहार
राजकुमार केसवानी अपनी किताब 'दास्तन-ए-मुग़ल-ए-आज़म' में लिखते हैं, "नूतन के साथ सारी बातचीत तय हो गई लेकिन अचानक नूतन ने मना कर दिया. हर मुमकिन समझाइश के बावजूद नूतन का इनकार, इक़रार में न बदला."
"हालत ये हो गई कि के. आसिफ़ ने देशभर के अख़बारों में इश्तिहार छपवाकर नई लड़कियों को किस्मत आज़माने और अनारकली का रोल करने की दावत दी. स्क्रीन मैगज़ीन और फ़िल्म इंडिया में भी इश्तिहार छपा."
लंबे शोध के बाद लिखी इस किताब में राजकुमार केसवानी के. आसिफ़ की कशमकश कुछ यूँ बताते हैं, "नूतन टस से मस न हुईं पर उन्होंने सलाह दी कि उनसे बेहतर नरगिस और मधुबाला रहेंगी."
"के. आसिफ़ के पास अनारकली का बस एक ख्याली चेहरा था जो एक जाने-पहचाने चेहरे मधुबाला से मेल खाता था और उसी में उन्हें अनारकली का अक़्स दिखता था. पर किसी दूसरी फ़िल्म के सिलसिले में मधुबाला के पिता के साथ उनका तजुर्बा अच्छा नहीं था, जो मुधबाला का काम देखते थे."

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अनारकली की दास्तां
बरसों पहले के. आसिफ़ ने माधुरी पत्रिका में दिए इंटरव्यू में कहा था, "मधुबाला मुझसे मिलने आईं और कहा कि मुझे 'मुग़ल-ए-आज़म' में काम करना है. वालिद साहब की जो शर्तें हैं वो मान लें. करनी तो मुझे है. वे शर्तें आप पर लागू नहीं होंगी."
अब इस तरह शहनाज़, नूतन, नरगिस और कुछ और नामों से होती हुई अनारकली की दास्तां मधुबाला पर आकर रुकी और जैसा कहते हैं रेस्ट इज़ हिस्ट्री.
बेहद बीमार होने के बावजूद जिस ख़ुलूस, मोहब्बत, नज़ाकत और दृढ़ता से मुधबाला ने ख़ुद को अनारकली के अक़्स में ढाला उसके क़िस्से आज भी सुनाए जाते हैं. वैसे मधुबाला फ़िल्मी पर्दे की पहली अनारकली नहीं थीं.
साल 1922 में आए नाटक के बाद 1928 में 'द लव्ज़ ऑफ़ ए मुग़ल प्रिंस' नाम से एक फ़िल्म आई थी जिसमें अनारकली का किरदार अभिनेत्री सीता देवी ने निभाया था. ये एक साइलेंट फ़िल्म थी और अनारकली के सफ़र की शुरुआत भर थी.
के. आसिफ़ की बेपनाह मोहब्बत
लेकिन 1928 में ही निर्देशक आर्देशिर ईरानी ने भी अनारकली नाम से फ़िल्म बनाई जिसमें किरदार निभाया था सुलोचना ने जो रूबी मार्यस के नाम से भी जानी जाती हैं.
अनारकली का रोल करने वाली रूबी मार्यस बग़दादी यहूदी समुदाय से आती थीं और अपने समय की नंबर वन अभिनेत्री थीं जिन्हें बाद में दादा साहेब फ़ाल्के पुरस्कार भी मिला.
अपनी ही साइलेंट फ़िल्म को ईरानी ने 1935 के आसपास टॉकी फ़िल्म के तौर पर भी रिलीज़ किया. और फिर 40 के दशक तक आते-आते तो अनारकली की कहानी से बेपनाह मोहब्बत कर बैठे के. आसिफ़ की जद्दोजहद शुरू हो चुकी थी.
हुस्न, इश्क़, हिम्मत, ग़ुरूर, हुनर, नफ़ासत, अदा, अंदाज़, आवाज़, लहजा- ये सब और बहुत कुछ चाहिए था के. आसिफ़ को अपनी अनारकली में.
शहनाज़ की कहानी गुमनाम रही
बात शुरू हुई थी शहनाज़ से जिनमें के. आसिफ़ को ये सारी ख़ूबियाँ नज़र आई थीं, मधुबाला से भी पहले, पर शहनाज़ चाहते हुए भी अनारकली न बन पाईं.
चाहे वो 'मुग़ल-ए-आज़म' में अनारकली बनने का मौका हो या फिर शादी के बाद प्रताड़ना भरी उनकी असल ज़िंदगी, शहनाज़ की ये कहानी गुमनाम ही रही जब तक कि उनकी बेटी ने किताब की शक्ल में इसे अलफ़ाज़ नहीं दिए.
आज शहनाज़ दुनिया को अलविदा कह चुकी हैं पर उनकी बेटी उनकी ज़िंदगी कुछ यूँ समेटती हैं, "मैं माँ से कहना चाहती हूँ कि मैंने तुम्हारी उस घुटन को दूर कर दिया जो तुमने ताउम्र सही. आपकी वो अधूरी कहानी आज मैंने दुनिया से कह दी है."
पर्दे के पीछे की ऐसी कितनी ही दास्तानें हर अनारकली के साथ शायद दफ़्न हैं.
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