राही मासूम रज़ा: 'मेरा नाम मुसलमानों जैसा है'

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बात ग़ालिबन 1976 की है. राही मासूम रज़ा लखनऊ आए हुए थे. उन्हें 'मिली' फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखक का पुरस्कार मिला था.
वो किसी होटल में न ठहर कर अपने भांजे नदीम हसनैन के घर पर रुके हुए थे.
इमर्जेंसी के दौरान कुछ पत्रकारों और लेखकों को छोड़कर सारे लोग उस समय की सरकार की जी हज़ूरी में लगे हुए थे.
'फ़िल्म राइटर्स असोसिएशन' ने भी इंदिरा गांधी और इमर्जेंसी के समर्थन में एक प्रस्ताव पास करवाने की कोशिश की. राही मासूम रज़ा अकेले लेखक थे जिन्होंने इसका विरोध किया.
नदीम हसनैन बताते हैं, "लेखकों की कोशिश थी कि इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास किया जाए. कई लोग जो उससे सहमत नहीं थे या तो ख़ामोश रहे या ग़ैर-हाज़िर हो गए लेकिन राही वाहिद शख़्स थे, जिन्होंने उसे मानने से साफ़ इनकार कर दिया."
"उनके कई दोस्तों ने उन्हें सलाह दी कि आप 'वॉक आउट' कर जाइए लेकिन उन्होंने ज़ोर दिया कि उनके विरोध को बाक़ायदा दर्ज किया जाए.
जब वो घर लौटे तो रात भर उनकी इस अंदेशे में कटी कि कब पुलिस आ कर उन्हें गिरफ़्तार कर लेगी.' लेकिन ऐसा हुआ नहीं. पर ये बताता है कि वो किस हद तक व्यवस्था के ख़िलाफ़ बुलंद आवाज़ में बोल सकते थे."

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सफ़ेद शेरवानी और काला चश्मा
राही मासूम रज़ा का जन्म एक अगस्त, 1927 को ग़ाज़ीपुर में हुआ था. 11 साल की उम्र में उन्हें टीबी हो गई. उस ज़माने में टीबी का कोई इलाज नहीं था.
बीमारी के बीच उन्होंने घर में रखी सारी किताबें पढ़ डालीं. उनका दिल बहलाने और उन्हें कहानी सुनाने के लिए कल्लू काका को मुलाज़िम रखा गया.
राही ने ख़ुद माना है कि अगर कल्लू काका नहीं होते तो वो कई कोई कहानी नहीं लिख पाते.
नदीम हसनैन बताते हैं, "हम लोग गर्मियों की छुट्टियों में अपने ननिहाल जाया करते थे ग़ाज़ीपुर. मेरी राही की सबसे पहली यादें वहीं की हैं. वहाँ मैंने राही को घर में तो कुर्ता पायजामा पहने देखा. वो हल्का सा लंगड़ा कर चलते थे क्योंकि उनके पैर में पोलियो था. वो बहुत नफ़ीस उर्दू बोलते थे और बहुत अच्छी भोजपुरी भी बोलते थे."
"जब वो बाहर जाते थे तो हमेशा शेरवानी और अलीगढ़ी पाजामा पहनते थे. उनकी शेरवानी कभी रंगीन नहीं होती थी. हमेशा वो क्रीम कलर की शेरवानी पहना करते थे. चश्मा हमेशा वो काला पहनते थे, हाँलाकि उनकी आँखों में कोई समस्या नहीं थी. मैंने उन्हें मोहर्रम में मजलिस पढ़ते हुए भी देखा है, जो बहुत कम लोगों ने देखा होगा."
"वो कभी तख़्त या चटाई पर नहीं बैठते थे, बल्कि खड़े हो कर तक़रीर के अंदाज़ में मजलिस पढ़ा करते थे. वैसे उनको धर्म से कोई ख़ास लगाव नहीं था."

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मौलवी साहब को रिश्वत
जब राही बीमारी से ठीक हुए तो उनको पढ़ाने के लिए मौलवी मुनव्वर को रखा गया. लेकिन उनसे उनकी कभी नहीं बनी.
राही मासूम रज़ा के सबसे करीबी दोस्त कुंवरपाल सिंह उनकी जीवनी में लिखते हैं, "मौलवी साहब राही को कभी पसंद नहीं थे क्योंकि उन्हें पढ़ाई से ज़्यादा पिटाई करने में मज़ा आता था. राही ने एक बार मुझे बताया था, हम पिटाई से बचने के लिए अपना जेबख़र्च मौलवी मुनव्वर को दे देते थे."
"इसलिए हम लोगों का बचपन बड़ी ग़रीबी में गुज़रा और शायद यही वजह है कि ख़रीद-फ़रोख़्त की कला न मुझमें आई और न ही भाई साहब मूनिस रज़ा में. हम दोनों झट से पैसा ख़र्च करने के आदी हैं. शायद इसलिए कि मौलवी मुनव्वर का डर अभी तक नहीं निकला है. हम डरते हैं कि पैसा ख़र्च नहीं किया गया तो पैसा मौलवी साहब झपट लेंगें."

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बाप के ख़िलाफ़ चुनाव प्रचार
अपनी जवानी के दिनों में राही पढ़ने के साथ-साथ कम्यूनिस्ट पार्टी का काम भी किया करते थे.
एक बार कम्यूनिस्ट पार्टी ने तय किया कि गाज़ीपुर नगरपालिका के अध्यक्ष पद के लिए कामरेड पब्बर राम को खड़ा किया जाए. पब्बर राम एक भूमिहीन मज़दूर थे.
राही और उनके बड़े भाई मूनिस रज़ा दोनों कॉमरेड पब्बर का चुनाव प्रचार करने लगे.
उसी समय कांग्रेस ने राही के पिता बशीर हसन आबिदी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया. अब दोनों भाइयों के सामने एक बड़ा धर्मसंकट पैदा हो गया.
दोनों ने अपने पिता को समझाया कि वो चुनाव में न खड़े हों.
बशीर साहब ने कहा, "मैं 1930 से कांग्रेसी हूँ. पार्टी की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर पाऊंगा."
राही ने जवाब दिया, "हमारी भी मजबूरी है कि हम आपके ख़िलाफ़ पब्बर राम को चुनाव लड़वाएंगे."
राही घर से सामान उठा कर पार्टी ऑफ़िस चले गए. जब चुनाव के नतीजे आए तो सब ये जान कर स्तब्ध रह गए कि एक भूमिहीन मज़दूर ने ज़िले के सबसे मशहूर वकील को भारी बहुमत से हरा दिया था.

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एक साथ कई स्क्रिप्ट्स पर काम
राही मासूम रज़ा के बारे में मशहूर था कि वो एक साथ कई स्क्रिप्ट्स पर काम करते थे. शुरू-शुरू में वो नाम बदल कर भी उपन्यास लिखा करते थे.
नदीम हसनैन बताते हैं, "एक बार मैंने देखा कि उनके सामने दो-तीन क्लिप बोर्ड रखे हुए हैं. वो थोड़ी देर एक बोर्ड पर लिखते हैं, फिर दूसरे बोर्ड के सामने चले जाते हैं. पूछने पर पता चला कि वो एक तो रूमानी दुनिया का उपन्यास लिख रहे थे."
"दूसरा एक जासूसी दुनिया का नॉवेल लिख रहे हैं और साथ ही साथ वो एक अख़बार के लिए एक लेख भी लिख रहे हैं. यह उस समय का दौर था जब उनका काफ़ी वक्त इलाहाबाद और ग़ाज़ीपुर के बीच ग़ुज़रता था. उस वक्त इलाहाबाद से निकहत पब्लिकेशन एक 'रूमानी दुनिया' और एक 'जासूसी दुनिया' हर माह निकाला करते थे."
"जासूसी दुनिया इब्ने सफ़ी लिखा करते थे जो बहुत लोकप्रिय हो गई थी. राही शाहिद अख़्तर के नाम से हर महीने एक नॉवेल लिखा करते थे. बहुत से नॉवेल उन्होंने आफ़ाक़ हैदर के नाम से भी लिखे. जब इब्ने सफ़ी पाकिस्तान चले गए और उन्हें एक गंभीर मानसिक बीमारी हो गई. तब ये समस्या आई कि कौन नॉवेल लिखे?"
"तब राही साहब से पूछा गया कि क्या आप जासूसी नॉवेल भी लिख सकते हैं, क्योंकि किसी महीने नाग़ा नहीं होना चाहिए. तब उन्होंने आफ़ताब नासिरी को नाम से जासूसी नॉवेल भी लिखे. उनकी ये जो 'मल्टी-टास्किंग' थी, वो मेरे लिए बहुत हैरत-अंगेज़ बात थी."

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लड़कियों के बीच बेहद लोकप्रिय
राही ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ाई की और वहीं उन्होंने अपनी पीएचडी की थीसिस भी लिखी.
नदीम हसनैन याद करते हैं, "लोगों का मानना है कि मजाज़ के बाद राही अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के सबसे लोकप्रिय शख़्सियत थे, ख़ासकर ख़्वातीनों के बीच. उनकी जो हल्की सी लंगड़ाहट थी, उसमें भी बहुत सी लड़कियाँ हुस्न तलाश कर लिया करती थीं."
"वहीं पर उनकी मुलाक़ात नय्यरा से हुई जिनसे उन्होंने शादी की. राही साहब कुछ मामलों में बहुत 'नॉन-कंप्रोमाइज़िंग' थे. उर्दू विभाग में उनके कुछ लोगों के साथ मतभेद थे, जिसकी वजह से उन्हें अलीगढ़ छोड़ना पड़ा."

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राही का सबसे मशहूर उपन्यास था 'आधा गाँव'
राही का रुझान शुरू में शायरी की तरफ़ अधिक था. उपन्यास लेखन की तरफ़ उनका ध्यान बाद में गया.
मशहूर उर्दू साहित्यकार अली सरदार जाफ़री ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में राही मासूम रज़ा को याद करते हुए कहा था, "जब 1953 में पहली बार मैंने राही को कश्मीर की हसीनो-जबील वादी में देखा था तो वो फूल की तरह ख़ूबसूरत था."
"आज़ादी के आते-आते उसने शेरो-सुख़न की दुनिया में अपना एक मुक़ाम बना लिया था. उसकी शायरी में उसके अपने लहजे की खनक थी. वहाँ कामयाबी के बावजूद राही ने यकायक शायरी छोड़ दी और नॉवेल का पैकर अख़्तियार किया. उसने हिंदी में कई नॉवेल लिखे जिसमें सबसे मशहूर 'आधा गाँव' था."

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धर्मवीर भारती और कमलेश्वर ने निभाई दोस्ती
'आधा गाँव' के माध्यम से राही ने उस मुस्लिम दृष्टिकोण और मुस्लिम राष्ट्रीयता को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जो न सिर्फ़ भारतीय होने की अधिकारी है, बल्कि उसके साथ किसा धर्म को जोड़ना शायद उचित नहीं है.
राही 1967 के आरंभ में बंबई चले आए जहाँ शुरू में उन्हें काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. हिंदी के सिर्फ़ दो साहित्यकारों ने राही की बहुत मदद की.
नदीम हसनैन बताते हैं, "फ़िल्मों से उन्हें शुरू से प्यार था. अलीगढ़ में भी जब वो पढ़ा रहे थे, वो लगातार लाइन से फ़िल्में देख रहे थे. वो एक फ़िल्म को लगातार दो-तीन-चार शोज़ में देखते थे. उनके पास एक कलम और नोटबुक रहती थी जिसमें वो नोट्स लिया करते थे."
"ज़ाहिर है उनके ज़हन में ये विचार ज़रूर रहा होगा कि एक दिन उन्हें फ़िल्मों में जाना है. उन्हें बंबई में ख़ासा 'स्ट्रगल' करना पड़ा. उनका कहना था कि वहाँ दो साहित्यकारों ने उनकी बहुत मदद की. एक थे 'धर्मयुग' के संपादक धर्मवीर भारती और दूसरे 'सारिका' के संपादक कमलेश्वर."
"इन दोनों ने इनको बहुत सहारा दिया. जिस वक्त उनकी आमदनी का कोई ज़रिया नहीं था, ये दोनों उनको कहानी लिखने का 'अडवांस' 'पेमेंट' कर दिया करते थे, ताकि उनकी रोज़ी-रोटी चल सके. इन लोगों ने ही उन्हें फ़िल्मों के कई निर्माता और निर्देशकों से 'इंट्रोड्यूज' भी किया."
"बाद में उनकी बीआर चोपड़ा और राज खोसला जैसे फ़िल्मकारों से दोस्ती हो गई और वो उनसे फ़िल्में लिखवाने लगे."

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राही के घर का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता था
कुछ ही दिनों में राही की गिनती बंबई के चोटी के पटकथा लेखकों में होने लगी.
राही के बेटे, जो कि खुद एक बड़े सिनेमा फ़ोटोग्राफ़र हैं, बताते हैं, "जहाँ वो रहते थे, वहाँ हमारा छोटा भाई अब रहता है बैंड-स्टैंड में. वो ढाई कमरे का फ़्लैट था. उनकी एक ख़ास बात थी कि उसका दरवाज़ा 24 घंटे खुला रहता था. दोपहर में दस्तर-ख़्वान बिछता था. जो आए 10 हों या 15 लोग, उन्हें हमेशा खाना खिलाया जाता था."
"बरकत इतनी होती थी कि खाना कभी कम नहीं पड़ता था. पुणे फ़िल्म इंस्टिट्यूट के मेरे बहुत से क्लास-मेट जैसे नसीरउद्दीन शाह और ओम पुरी का जब भी अच्छा खाना खाने का जी चाहता था, वो बहाना बना कर मेरे घर आ जाते थे. राही बहुत जल्दी उठने वालों में से थे. वो दिन में कई प्याले चाय पीते थे- बिना दूध और शक्कर की."
"कमाल की बात थी कि उन्होंने कभी होटल जा कर नहीं लिखा. दूसरे लेखकों के लिए हमेशा लिखने के लिए होटल का कमरा बुक कराया जाता था और शराब वगैरह का इंतेज़ाम रहता था. लेकिन उन्होंने हमेशा अपने घर में ही लिखा. वो हॉल में तकिए पर लेट कर लिखते थे और एक साथ चार-पांच स्क्रिप्ट्स पर काम किया करते थे."
"लोग आ रहे हैं, जा रहे हैं, उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था. हमारी अम्मा को कव्वालियाँ सुनने का बहुत शौक था. वो भी चलती रहती थीं. लेकिन इससे राही साहब का ध्यान कभी भंग नहीं होता था."

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राही की कमज़ोर नस
भारत के लोगों ने महाभारत की कहानी सुनी ज़रूर थी, लेकिन राही मासूम रज़ा ने उसे हर घर में पहुंचा दिया.
शुरू में जब बीआर चोपड़ा ने उन्हें महाभारत लिखने का प्रस्ताव दिया तो उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया. लेकिन बात किसी तरह समाचार पत्रों में छप गई.
कुंवरपाल सिंह राही की जीवनी में लिखते हैं, "जब बीआर चोपड़ा ने घोषणा की कि राही मासूम रज़ा महाभारत के संवाद लिखेंगे, तो उनके पास पत्रों की झड़ी लग गई, जिनका लब्बोलबाब था कि सारे हिंदू मर गए हैं जो आप एक मुसलमान से महाभारत लिखवा रहे हैं. चोपड़ा साहब ने सभी पत्र राही के पास भेज दिए. राही की ये कमज़ोर नस थी."
"वो भारतीय संस्कृति और सभ्यता के बहुत बड़े अध्येता थे. अगले दिन उन्होंने चोपड़ा साहब को फ़ोन किया, 'चोपड़ा साहब! महाभारत अब मैं ही लिखूंगा. मैं गंगा का बेटा हूँ. मुझसे ज़्यादा हिंदुस्तान की संस्कृति और सभ्यता को कौन जानता है?'"

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पैसे की कोई क़ीमत नहीं थी राही के लिए
राही ने मुंबई में फ़िल्म लेखन की सारी बुलंदियों को छुआ, लेकिन बहुत अधिक पैसा नहीं कमा पाए.
नदीम ख़ाँ बताते हैं, "आज तक उन्हें पैसा मांगना नहीं आया. हमारी अम्मा कहती थी कि तुम अजीब बेवकूफ़ इंसान हो. वो कहते थे कि हूँ तो हूँ. फ़िल्म इंस्टिट्यूट का कोई बंदा उनसे फ़िल्म लिखवाने जाता था तो वो उससे कोई पैसा नहीं लेते थे, क्योंकि मैं उस इंस्टिट्यूट में पढ़ता था. उनको मिठाई का बहुत शौक था."
"कोई उनके लिए एक किलो कलाकंद ले आया तो उसके लिए पूरी की पूरी फ़िल्म लिख दी. कोई पान का बीड़ा लाया तो उसके लिए भी फ़िल्म लिख दी."

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रेड मार्लबोरो सिगरेट के शौकीन
राही मासूम के जीवन को रंगमंच पर चरितार्थ किया है मशहूर रंगकर्मी विनय वर्मा ने अपने नाटक 'मैं राही मासूम' के ज़रिए. काफ़ी शोध के बाद उन्होंने राही के चरित्र को मंच पर उकेरने की कोशिश की है.
विनय वर्मा बताते हैं, "वो हमेशा ख़िमाम का पान खाते थे. वो चेन-स्मोकर थे. उनके हाथ में हमेशा 'रेड मार्लबोरो' सिगरेट होती थी. उनके सामने हमेशा चांदी का एक पानदान होता था. उनके ड्राइंग रूम में गाव तकिया बिछी होती थी. कव्वालियाँ बज रही होती थीं और वो लोगों से बात करते हुए लिखते थे."

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कट्टरपंथियों से छत्तीस का आँकड़ा
राही का धर्म को संकीर्ण ढंग से देखने वालों से हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा.
उन्होंने ख़ुद एक बार लिखा था, "मैंने ये कहा था और अब भी कहता हूँ कि बाबरी मस्जिद और रामजन्मभूमि मंदिर दोनों को गिरा कर उसकी जगह एक राम-बाबरी पार्क बना देना चाहिए."
उनकी एक मशहूर नज़्म है -
'मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
क़त्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
लेकिन मेरी रग-रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है
मेरे लहू से चुल्लू भर महादेव के मुंह पर फेंको
और उस योगी से कह दो—महादेव
अब इस गंगा को वापस ले लो
यह ज़लील तुर्कों के बदन में गाढ़ा गरम
लहू बन कर दौड़ रही है.'
राही की वसीयत
राही के लिए धर्मनिर्पेक्षता का बहुत व्यापक अर्थ है. उनके लिए गंगा सबकी है, किसी एक धर्म की क़ैद में नहीं. उन्होंने एक नज़्म लिखी थी 'वसीयत' -
'मैं तीन माओं का बेटा हूँ. नफ़ीसा बेगम, अलीगढ़ युनिवर्सिटी और गंगा. नफ़ीसा बेगम मर चुकी हैं. अब साफ़ याद नहीं आतीं. बाकी दोनों माएं ज़िदा हैं और याद भी हैं
मेरा फ़न तो मर गया यारों
मैं नीला पड़ गया यारों
मुझे ले जा के ग़ाज़ीपुर की गंगा की गोदी में सुला देना
अगर शायद वतन से दूर मौत आए
तो मेरी ये वसीयत है
अगर उस शहर में छोटी सी एक नद्दी भी बहती हो
तो मुझको
उसकी गोद में सुला कर
उससे कह देना
कि गंगा का बेटा आज से तेरे हवाले है.'
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