बॉलीवुड में सितारों को इशारों की भाषा सिखाने वाली संगीता गाला

संगीता गाला, संजय लीला भंसाली

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इमेज कैप्शन, संजय लीला भंसाली के साथ संगीता गाला
    • Author, मधु पाल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, मुंबई से

जाने-माने निर्देशक संजय लीला भंसाली की फ़िल्में ख़ामोशी, ब्लैक, देवदास, गुज़ारिश, सांवरिया, राम लीला; अनुराग बासु की फ़िल्म बर्फ़ी और अनुराग कश्यप की मुक्काबाज़ - ये कुछ फ़िल्में ऐसी हैं जिनके किरदार साइन लैंग्वेज यानी संकेत भाषा का इस्तेमाल करते हैं.

इन फ़िल्मों के कलाकारों को उनके किरदारों में ढलने में मदद की है संगीता गाला ने. गाला ने न केवल इन्हें सांकेतिक भाषा सिखाने में मदद की बल्कि उन्हें अपने किरदार के लिए तैयार भी किया.

मूक प्रशिक्षक संगीता गाला ख़ुद सुन नहीं पाती और न ही ठीक से बोल पाती हैं, लेकिन आज बॉलीवुड इंडस्ट्री में उनका काम बोलता है.

उन्हें न केवल बॉलीवुड फ़िल्मों के लिए, बल्कि कई बड़े-बड़े ऐड फ़िल्म्स और डॉक्यूमेंट्री बनाने के लिए अवार्ड्स भी मिल चुके हैं.

sangeeta gala, संगीता गाला

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लोगों को लगता था बॉलीवुड फ़िल्में मेरे लिए नहीं

साल 1996 में आई निर्देशक संजय लीला भंसाली की फ़िल्म 'ख़ामोशी' सभी को अब भी याद होगी. इस फ़िल्म में नाना पाटेकर और सीमा बिस्वास न तो बोल सकते थे और न ही सुन सकते थे.

लेकिन इस फ़िल्म के दोनों ही किरदारों ने बड़ी सरलता से अपने सभी जज़्बातों को कहानी के ज़रिए ख़ूबसूरती से पेश किया.

साल 2005 में आई फ़िल्म 'ब्लैक' में अभिनेत्री रानी मुखर्जी मिशेल मैकनैली की भूमिका में नज़र आई थी, जो बोल-सुन नहीं सकती थी. इस फ़िल्म में अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी साइन लैंग्वेज में बात करते हुए नज़र आए थे.

संजय लीला भंसाली की ही एक और फ़िल्म 'गुज़ारिश' में मुख्य भूमिका में ऋतिक रोशन ने एथन मासकरेनास की भूमिका निभाई थी जो एक हादसे के बाद पैराप्लेजिया से ग्रसित हो जाते हैं.

इसी तरह अनुराग बासु की फ़िल्म 'बर्फ़ी' का किरदार भी बोल सुन नहीं सकता था. इस किरदार को रणबीर कपूर ने निभाया था.

संगीता गाला ने इन सभी कलाकारों को अपने किरदार के लिए तैयार करने में निर्देशकों की मदद की थी.

वे कहती हैं, "बचपन में जब बॉलीवुड फ़िल्मों में गाना, डांस या फाइटिंग सीन आते थे तब लोगों को लगता था कि मैं ज़िन्दगी में कभी इन बॉलीवुड फ़िल्मों का हिस्सा नहीं हो सकूंगी क्योंकि ये मेरी समझ से परे होगा. लेकिन मुझे ख़ुशी है कि मैं आज बॉलीवुड फ़िल्मों का हिस्सा हूँ."

संगीता गाला, SANGEETA GALA

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'बच्चा बहरा है, इसे बोलने में भी परेशानी आएगी'

अपने बचपन की बातों को याद करते हुए संगीता ने बीबीसी को बताया कि, "मेरे माता-पिता गुजरात के रहने वाले थे और पेशे से किसान थे. वो कभी स्कूल नहीं गए. जब मेरे पिता 14 साल के थे वो नौकरी की तलाश में मुंबई आ गए थे."

"मुंबई में वो फुटपाथ पर चाय बेचा करते थे. उन्होंने यहां एक छोटी दुकान और फिर अपना रेस्तरां खोला. धीरे-धीरे घर के हालात भी सुधरे."

"मेरे बड़े भाई के पैदा होने के 10 साल बाद मैं पैदा हुई. जब दो साल की हुई तो मेरी माँ ने महसूस किया की मेरी आवाज़ दूसरे बच्चों के मुक़ाबले काफी धीमी थी.

डॉक्टर ने बताया कि संगीता बहरी हैं और उन्हें बाद में बोलने में भी परेशानी आएगी.

संगीता कहती हैं, "उन्होंने मेरी मां को ये भी बताया कि आपके बच्चे को डिस्लेक्सिया है जिसके कारण पढ़ने-लिखने में कठिनाई होती है."

ये सुन उनकी मां की चिंता बढ़ गई लेकिन उनके पिता ने हिम्मत नहीं हारी और डॉक्टर की मदद से उनका दाखिला अंग्रेज़ी स्कूल में करवाया.

वो बताती हैं, "मुझे मेरे माता-पिता ने हमेशा एक राजकुमारी की तरह रखा, जबकि मेरे चचेरे भाई-बहन गुजराती स्कूल में पढ़ने जाते थे. मेरी माँ स्कूल में अक्सर मेरी आवाज़ बन जाती थीं. वे अपना आराम छोड़ मेरे साथ जाती थीं."

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'फ़िल्में पसंद थीं, लेकिन सब-टाइटल के बिना समझ नहीं आती थीं'

संगीता कहती हैं, "मेरे माता पिता ने मेरी कमज़ोरियों को मुझ पर हावी नहीं होने दिया. स्कूल के दिनों में मैंने डांस, म्यूजिक, ड्रामा और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं के कई अवार्ड जीते. खेल-कूद में भी मैंने अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी मैंने कई अवार्ड जीते."

"मैं पहली बधिर भारतीय महिला एथलीट थी जिसने 1985 में लॉस एंजेलेस में हुए डेफ़ ओलिंपिक में हिस्सा लिया था. मुझे भारत सरकार की तरफ से छत्रपति शिवाजी अवार्ड से भी नवाज़ा गया."

"स्कूल के दिनों से ही बॉलीवुड मेरा सपना होता था. उस वक्त फ़िल्में बिना सब-टाइटल के ही आया करती थी. मैं समझ नहीं पाती थी कि कौन किरदार क्या बोल रहा है, सीन में क्या हो रहा है. लेकिन फ़िल्में मुझे बहुत आकर्षित करती थीं और फ़िल्मों को समझने के इसी जुनून ने मुझे फ़िल्मों से जोड़े रखा."

फ़िल्म ख़ामोशी का एक दृष्य

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इमेज कैप्शन, संगीता गाला ने फ़िल्म ख़ामोशी के लिए नाना पाटेकर को साइन लैंग्वेज सिखाई

नाना पाटेकर की मदद से मिली 'ख़ामोशी'

संगीता गाला की पहली बॉलीवुड फ़िल्म थी 'ख़ामोशी'. फ़िल्म का ज़िक्र करते हुए संगीता कहती हैं कि, "मैं जब ख़ामोशी फ़िल्म के लिए गई तो एनआईएचएच (नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ हियरिंग हैंडीकैप्ड) के विभाग प्रमुख ने मुझे मना कर दिया था. लेकिन अभिनेता नाना पाटेकर को मेरा मुखर अंदाज़ पसंद आया."

"मैंने फिर नाना पाटेकर, सीमा बिस्वास और मनीषा कोइराला को संकेत भाषा (साइन लैंग्वेज) सिखानी शुरू की. संजय ने मुझे कुछ क्रिएटिव सुझाव भी दिए. उन्हें मेरा काम पसंद आया. मेरे साथ मेरा बेटा भी सेट पर आया करता था. उस समय संजय लीला भंसाली को एक लड़के की तलाश थी जो नाना पाटेकर और सीमा बिस्वास के बेटे का किरदार निभाए. उन्होंने मेरे बेटे को ही चुन लिया. इस तरह काम का सिलसिला शुरू हुआ."

संगीता गाला देवदास के सेट पर

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'देवदास के सेट पर कइयों ने मेरा मज़ाक उड़ाया'

संगीता कहती हैं कि फ़िल्म 'हम दिल दे चुके सनम' के हिट होने के बाद संजय लीला भंसाली ने कई लोगों को अपने घर दावत पर बुलाया था. संगीता और उनके बेटे को भी आमंत्रित किया गया था.

संगीता बताती हैं, "वहां गए तो उन्होंने हमारा हालचाल पूछा. मैंने उन्हें बताया कि घर की हालत ठीक नहीं चल रही और कुछ काम भी नहीं है. मेरे पति अपना सब कुछ खो चुके थे. तब संजय लीला भंसाली ने बताया कि वो देवदास बना रहे हैं. उन्होंने पूछा कि क्या मेरे साथ काम करोगी?"

"मैंने पूछा कि क्या संकेत भाषा के लिए फ़िल्म के किरदारों को ट्रेनिंग देनी है? उन्होंने कहा नहीं. मैंने पूछा कि मैं इसके अलावा मैं क्या काम कर सकती हूँ. उन्होंने कहा तुम क्रिएटिव हो, मेरी असिस्टेंट बन कर फ़िल्म के लिए सुझाव देना. मैंने वैसा ही किया लेकिन देवदास के सेट पर काम करने वाले कई लोगों ने मेरे साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया."

"कई लोग मेरा मज़ाक उड़ाया करते थे. ये देख मैंने काम छोड़ने का मन बना लिया था. मैं रोते हुए उनके पास गई और मैंने कहा कि कुछ लोग मेरे साथ अच्छा बर्ताव नहीं करते हैं. उस वक्त उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा कि ये दुनिया हमेशा ख़ूबसूरत नहीं हो सकती. उन्होंने समझाया कि इस फ़िल्म के लिए तुम्हें इसलिए नहीं चुना गया कि तुम बोल नहीं सकती, बल्कि इसलिए चुना क्योंकि तुम क्रिएटिव हो. तुम्हें हार नहीं माननी चाहिए."

वीडियो कैप्शन, शेफ़ जो अपना बनाया टेस्ट भी नहीं कर सकती
संगीता गाला

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कई कलाकारों को सीखा चुकी हैं संकेत भाषा

मणिरत्नम की फ़िल्म 'रावण' में अभिनेत्री ऐश्वर्या से लेकर साउथ इंडियन फ़िल्मों के कलाकार विक्रम के साथ काम कर चुकी संगीता कहती हैं कि उन्होंने अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन, रानी मुखर्जी, रणवीर सिंह, दीपिका पादुकोण, सोनम कपूर, रणबीर कपूर, श्रिया पिलगांवकर, अनुराग कश्यप की फ़िल्म 'मुक्केबाज़' में अभिनेत्री ज़ोया के साथ काम किया है.

वो कहती हैं "इन सभी की सबसे अच्छी बात ये थी कि ये संकेत भाषा जल्दी सीख गए. देवदास में काम करते वक़्त शाहरूख़ ख़ान और ऐश्वर्या ने बहुत आदर दिया. अभिनेता जैकी श्रॉफ़ ने तो मेरे बेटे के स्कूल की फ़ीस तक भरी."

रणबीर कपूर से ख़ास रिश्ता

संगीता कहती हैं, "अभिनेता रणबीर कपूर के साथ मेरा ख़ास रिश्ता रहा है. मेरी पहली मुलाक़ात उनसे फ़िल्म ब्लैक के सेट पर हुई थी. वो अमेरिकन साइन लेंग्वेज के पूरे अक्षर जानते थे."

"ये भाषा उन्होंने अमेरिका के कॉलेज में सीखी थी. इसलिए वो मुझसे बहुत अच्छे से बात कर पाते थे. इसके बाद मैंने उनकी पहली फ़िल्म 'सांवरिया' और 'बर्फ़ी' में भी काम किया. काम के दौरान हम दोनों के लिए एक दूसरे की बात को समझना बहुत आसान होता था."

रानी मुखर्जी के साथ संगीता गाला

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बधिरों को इंडस्ट्री में दिलाना चाहती हैं समान अवसर

आज संगीता बॉलीवुड फ़िल्मों से तो जुड़ी ही हैं लेकिन वे अपने जैसे कई और लोगों के लिए रास्ता भी बना रही हैं. संगीता बधिर समुदाय के अन्य लोगों की मदद करने के लिए भी काम कर रही है.

वे कहती हैं, "यह उचित समय है जब इंडस्ट्री विकलांग लोगों के लिए अपने दरवाज़े खोले. इस इंडस्ट्री में हज़ारों लोगों को रोज़गार देने की क्षमता है. इस उद्देश्य के लिए मैं विभिन्न फ़िल्म संघों से बात कर रही हूँ ताकि बधिरों के लिए जूनियर कलाकारों के रूप में विशेष भूमिकाएं या वर्क परमिट प्राप्त किए जा सकें. मैं ऑपरेटिंग मॉडल शूट के लिए (एक दुभाषिया के साथ) भी एक समूह से बात कर रही हूँ."

"फिलहाल मैं उन लोगों का एक डेटाबेस बनाने पर काम कर रही हूँ जो फ़िल्मों में काम करना चाहते हैं. अगर मेरी कोशिशों से बधिर समुदाय के लोगों को फ़िल्म उद्योग में समान अवसर मिले तो दोनों ही वर्गों के लिए ये अहम मोड़ साबित होगा."

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