नज़रिया: 'कला के साहस का सेंसर बोर्ड से टकराव...होता रहेगा'

फ़िल्म पद्मावती

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, अविनाश दास
    • पदनाम, फ़िल्म निर्देशक

मुझ जैसे लोगों को जो एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में यक़ीन रखते हैं, सरकार की ओर से फ़िल्मों को श्रेणीबद्ध करने के लिए गठित केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड पर ग़ुस्सा क्यों आना चाहिए?

लेकिन ग़ुस्सा आता है, जब समाज में ग़लत संदेश प्रसारित होने और अव्यवस्था फैलने की दलील देकर कई ज़रूरी फ़िल्मों को समाज तक पहुंचने में अड़चन डाली जाती है.

तब लगता है कि हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में कोई बुनियादी गड़बड़ी है और इसी गड़बड़ी की वजह से एफ़टीआईआई जैसे ज़रूरी शिक्षण संस्थान का नेतृत्व गजेंद्र चौहान जैसे अयोग्य व्यक्ति को सौंप दिया जाता है और सेंसर बोर्ड जैसी नाज़ुक संस्था की कमान पहलाज निहलानी जैसे नासमझ और दोहरे चरित्र वाले फ़िल्मकार को सौंप दी जाती है.

प्रसून जोशी

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, प्रसून जोशी

अभिव्यक्ति की आज़ादी

जो सेंसर बोर्ड में आने से पहले अश्लील फ़िल्में बनाने के लिए मशहूर रहे और वहां से निकलते ही जूली के बकवास सीक्वल को प्रोमोट करने में लग गए. ग़नीमत है कि न गजेंद्र चौहान अब एफ़टीआईआई में हैं, न पहलाज निहलानी सेंसर बोर्ड में हैं.

जब निहलानी को हटाकर गीतकार और विज्ञापन निर्माता प्रसून जोशी को सेंसर बोर्ड का चीफ़ बनाया गया, तो सरकार का यह एक स्मार्ट मूव था. प्रसून जोशी की कमीज़ निहलानी के मुक़ाबले ज़्यादा उजली थी हालांकि मोदी की प्रशस्ति में लिखा गया उनका यह गीत मशहूर हो गया था, 'मैं देश नहीं झुकने दूंगा'.

इस गीत के ठीक उलट सेंसर बोर्ड में उनके कार्यकाल के अब तक के ज़्यादातर फ़ैसले अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समुदाय के बीच अभिव्यक्ति की आज़ादी के मामले में भारत की पहले से संदिग्ध रही लोकतांत्रिक छवि को और संदिग्ध बनाते हैं जबकि उन्हें आये हुए अभी चार महीने भी नहीं हुए हैं.

अगर सचमुच उन्हें सिनेमा की परवाह होती तो इन चार महीनों में वे उन शब्दों की सूची वापस ले चुके होते, जिन पर निहलानी ने आते ही पाबंदी लगा दी थी कि ये शब्द सिनेमा में इस्तेमाल नहीं किये जा सकते.

फ़िल्म पद्मावती

इमेज स्रोत, Getty Images

यह हास्यास्पद ही है...

पद्मावती विवाद ने तो प्रसून जोशी की नीयत को पूरी तरह बेनक़ाब कर दिया, लेकिन थोड़े बेपर्दा तो वह 'सेक्सी दुर्गा' के मामले में हो ही चुके थे, जिस देश में 'कामसूत्र' लिखा गया हो, खजुराहो के विशाल और सुरक्षित कामकला-मंदिर हों और जिस देश में ईश्वर के शारीरिक सौंदर्य के वर्णन की उदार परंपरा हो, वहां दुर्गा के नाम से पहले सेक्सी शब्द से सेंसर बोर्ड घबरा जाए यह हास्यास्पद ही है.

लेकिन सेंसर बोर्ड की आपत्ति के बाद सेक्सी दुर्गा का नाम एस दुर्गा रख दिया गया, इसके बावजूद न्यूड के साथ यह फ़िल्म गोवा के अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल से बाहर कर दी गई जबकि जूरी ने इन दोनों फ़िल्मों को अपनी चयनित सूची में शामिल किया था. न्यूड को तो फ़ेस्टिवल का उद्घाटन फ़िल्म बनाने की सिफ़ारिश की गई थी.

यह सब रायते चलेंगे, क्योंकि चेहरा बदलने से कैंची की फ़ितरत नहीं बदलती है. महत्वपूर्ण है वो विचार, जिससे सेंसर बोर्ड निर्देशित होता है. सरकार किसी भी क़ीमत पर सिनेमा जैसे महत्वपूर्ण माध्यम से अपना नियंत्रण खोना नहीं चाहती, इसलिए सेंसर बोर्ड किसी भी संवेदनशील फ़िल्म के मामले में सूचना-प्रसारण मंत्रालय की ओर देखने के लिए मजबूर है.

किस्सा कुर्सी का

इमेज स्रोत, KISSA KURSI KA

सेंसर बोर्ड का हाल इमरजेंसी जैसा

भारतीय लोकतंत्र के मोदीकाल में जैसा हाल सेंसर बोर्ड का दिख रहा है, कुछ ऐसा ही हाल इमरजेंसी के आसपास भी देखने को मिला था, जब दो महत्वपूर्ण फ़िल्मों पर पाबंदी लगा दी गयी थी. गुलज़ार की फ़िल्म आंधी को सेंसर बोर्ड ने प्रदर्शन के लिए हरी झंडी नहीं दी थी.

यह एक औरत की राजनीतिक यात्रा पर आधारित फ़िल्म थी और कहते हैं कि इसकी नायिका में इंदिरा गांधी का अक्स डाला गया था, बाद में जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई, तब इस फ़िल्म के गाने बहुत मक़बूल हुए, इसकी पटकथा मशहूर लेखक कमलेश्वर ने लिखी थी.

सबसे अनोखा वाक़या क़िस्सा कुर्सी का है, आपातकाल के उसी दौर में इंदिरा गांधी को लेकर सांसद अमृत नाहटा ने एक फिल्म बनायी थी, 'क़िस्सा कुर्सी का', तब विद्याचरण शुक्ल सूचना-प्रसारण मंत्री थे. इस फिल्‍म का प्रिंट ग़ायब करने के मामले में इमरजेंसी के बाद बनी सरकार में सूचना-प्रसारण मंत्री लालकृष्‍ण आडवाणी ने सीबीआई जांच के आदेश दिेए थे.

सीबीआई की रिपोर्ट के बाद संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया, सत्र न्यायालय ने दोनों को जुर्माना और सज़ा सुनाई. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा लेकिन तब तक मोरारजी देसाई पीएम पद को अलविदा कह चुके थे और चौधरी चरण सिंह कांग्रेस के समर्थन से पीएम के पद पर काबिज थे.

दृश्य बदल चुका था और बदले हुए दृश्य में अमृत नाहटा सुप्रीम कोर्ट में अपने आरोपों से ही पलट गये. जाहिर है, संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल दोनों को बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया.

उड़ता पंजाब

इमेज स्रोत, Getty Images

फ़िल्मों पर अंकुश लगते रहे हैं

ऐसी फ़िल्मों की लंबी-चौड़ी फ़ेहरिस्त है, जिनको सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट लेने के लिए न्यायालय की हद तक जूझना पड़ा, केरल हाईकोर्ट का ताज़ा आदेश तो अलग संदर्भ है कि गोवा फ़िल्म फ़ेस्टिवल में एस दुर्गा दिखाई जाए लेकिन अरविंद केजरीवाल और उनकी राजनीति पर बनी फ़िल्म "एन इनसिग्निफिकेंट मैन" को भी कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही रिलीज़ किया गया.

इससे पहले उड़ता पंजाब पर भारी आफ़त आयी थी, जब सेंसर बोर्ड ने फ़िल्म का नाम बदलने के साथ ही 89 कट लगाने के लिए निर्माताओं को कहा.

मामला अदालत पहुंचा और अदालत के आदेश के बाद इस फ़िल्म को रिलीज़ के लिए प्रमाणपत्र जारी किया गया लेकिन प्रमाणपत्र पर सेंसर बोर्ड ने यह लिख दिया कि इसे माननीय मुंबई हाईकोर्ट ने रिलीज़ की अनुमति दी है.

इन फ़िल्मों के अलावा हमें उस दौर की बात भी करनी चाहिए, जब कांग्रेस की सरकार थी. इमरजेंसी की नज़ीर हम दे चुके हैं, लेकिन बाद में भी फ़िल्मों पर अंकुश लगाये जाते रहे हैं.

फ़िल्म पद्मावती

इमेज स्रोत, Getty Images

कला के साहस और सेंसर बोर्ड के बीच टकराव

शेखर कपूर की "बैंडिट क्वीन", दीपा मेहता की "फ़ायर" और "वाटर", मीरा नायर की "कामसूत्र", अनुराग कश्यप की "पांच" और "ब्लैक फ्राइडे", विनोद पांडे की "सिंस", श्रीधर रंगायन की "द पिंक मिरर", नंदिता दास की "फिराक", पंकज आडवाणी की "उर्फ प्रोफ़ेसर", अश्विन कुमार की "इंशाअल्लाह फ़ुटबॉल" और "डेज्ड इन दून"... कितनी कितनी फ़िल्मों के नाम लिये जाएं!

दरअसल, कला के साहस और सेंसर बोर्ड में यह टकराव होता ही रहेगा, हमें इस बात के लिए दबाव बनाना होगा कि सेंसर बोर्ड अपना असली काम करे. केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीएफसीबी) का काम फिल्मों में काट-छांट करना नहीं, बल्कि उसे वर्गीकृत करना है.

आपको ताज्जुब होगा कि सेंसर बोर्ड का सदस्य बनने के लिए कोई तकनीकी शर्त नहीं होती. सिवाय इसके कि आप सत्ता में शामिल लोगों के कितने क़रीब हैं. एक समय सेंसर बोर्ड की सदस्य रहीं प्रोफेसर नंदिनी सरदेसाई ने कहा था कि पैनल सदस्यों में बार का मालिक, ड्राइवर, नेता के पीए जैसे लोग भी होते हैं.

पद्मावती विवाद

इमेज स्रोत, PTI

ये बयान यह समझने के लिए काफ़ी है कि हमारी सरकार सेंसर बोर्ड को कितना महत्वपूर्ण मानती है. बड़ा चालू लेकिन कमाल का शेर है कि बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी है, हर शाख़ पे उल्लू बैठा हो अंजामे गुलिस्तां क्या होगा.

अभी देश के लगभग हर सार्वजनिक संस्थानों का हाल लगभग यही है, ऐसे में हम फ़िल्मकार ही अपना रोना लेकर क्यों बैठें? हमें तो उस भीषण हालात का इंतज़ार करना चाहिए, जब बाग़ी सिनेमा के अलावा किसी को कोई विकल्प नहीं दिखेगा.

(अविनाश दास 'अनारकली ऑफ़ आरा' के निर्देशक हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)