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मंगलवार, 27 जनवरी, 2009 को 07:24 GMT तक के समाचार
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'सरकार आम आदमी की क्रय शक्ति बढ़ाए'

आम आदमी
'हम वैश्विक अर्थव्यवस्था से उतने जुड़े हुए नहीं हैं जितने कि दूसरे देश'
भारत के अब तक वैश्विक वित्तीय संकट से कुछ हद तक बचे रहने का एक मुख्य कारण है कि हम वैश्विक अर्थव्यवस्था से उतने जुड़े हुए नहीं हैं जितने दूसरे देश जुड़े हैं.

उदाहरण के तौर पर हमारा विदेश व्यापार हमारी आर्थिक विकास दर (जीडीपी) का 16 से 17 फ़ीसदी है जबकि चीन का लगभग 35 फ़ीसदी और अमरीका का 100 फ़ीसदी के करीब है.

इसलिए अगर दूसरे देशों में मंदी आई, तो हमारे यहाँ के 16 फ़ीसदी अर्थव्यवस्था पर ही उसका असर पड़ा है लेकिन वो भी काफ़ी ख़तरनाक हो सकता है.

ऐसे में यह कहना कि भारत वैश्विक आर्थिक मंदी से बचा हुआ है, आंशिक रूप से सही है क्योंकि हमारी विकास दर अभी भी सकारात्मक है. लेकिन इसका मुख्य कारण यही है कि हम वैश्विक अर्थव्यवस्था से उतने जुड़े हुए नहीं हैं.

'आम आदमी पर ध्यान दे सरकार'

मेरा मानना है कि ऐसी स्थिति में सरकार को आम आदमी, विशेष तौर पर अत्यंत गरीब वर्ग पर ध्यान देना चाहिए, न कि भर पेट वेतन पाने वाले सरकारी कर्मचारी की ओर.

सरकार इसके लिए रोज़ग़ार गारंटी योजना पर ध्यान दे, शिक्षा, स्वास्थ्य के कूपन बाँटें, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करे.

 आने वाले समय में अगर भारत सरकार अपने आम आदमी के प्रति कुछ सार्थक नीति रखती है तो यह विदेशी निवेश फिर आएगा और आप यह पाएंगे कि दूसरे देश चाहे डूब रहे हों, भारतीय अर्थव्यवस्था में उछाल आ रहा है
डॉक्टर भरत झुनझनवाला

जो खपत कर सकता है उसकी क्रय शक्ति बढ़ानी चाहिए, तभी देश की अर्थव्यवस्था पर अच्छा असर होगा. लेकिन सरकार पेट भरे सरकारी कर्मचारियों को जनता के नाम पर पोषित कर रही है.

आने वाले समय में भी आर्थिक मंदी से भारत बचा रहेगा या नहीं बचा रहेगा, वह दो तीन बातों पर निर्भर करेगा.

आयात-निर्यात और पूँजी निवेश

अगर आम आदमी में क्रय शक्ति होगी तभी भारत के बाज़ार में माँग बढ़ेगी. उसकी पूर्ति के लिए भारत के उद्योग भी बढ़ेंगे.

ऐसे में विदेशी कंपनियों के नकारात्मक पक्ष से भारत पर कोई विशेष असर नहीं पड़ेगा.

इस समस्या का दूसरा पक्ष यह है कि जो विदेशों में आर्थिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं उसका प्रसार हमारे आयात निर्यात के माध्यम से होता है और आयात-निर्यात हमारी अर्थव्यवस्था में सिर्फ़ 16 फ़ीसदी है.

लेकिन यह तात्कालिक पक्ष है क्योंकि अगर 16 फ़ीसद पर भी इसका असर पड़ता है तो वह काफ़ी भयानक होता है.

इसका तीसरा पक्ष विदेशी निवेश का है. सत्यम घोटाले से पहले भारत में यहाँ विदेशी पूँजी निवेश शुरू हो गया था.

मेरा अनुमान है कि आने वाले समय में अगर भारत सरकार अपने आम आदमी के प्रति कुछ सार्थक नीति रखती है तो यह विदेशी निवेश फिर आएगा और आप यह पाएंगे कि दूसरे देश चाहे डूब रहे हों, भारतीय अर्थव्यवस्था में उछाल आ रहा है. यह पूरी तरह संभव है.

(बीबीसी संवाददाता अनुराधा प्रीतम से बातचीत पर आधारित)

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