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शेयर बाज़ारों में हाहाकार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विश्वव्यापी आर्थिक मंदी की आशंका को देखते हुए एक बार फिर दुनियाभर के शेयर बाज़ार मुँह के बल गिरे हैं. निवेशकों में डर है और वित्तीय संकट से उबारने की सारी कोशिशें विफल हो रही हैं. एशिया और यूरोप के बाद अमरीकी शेयर बाज़ार की स्थिति भी ख़राब है. डाउ जोंस में शुरुआती गिरावट दर्ज की गई है जबकि नैसडैक का सूचकांक दो फ़ीसदी से ज़्यादा गिरा है. भारतीय शेयर बाज़ार का तो बहुत बुरा हाल रहा. मुंबई शेयर बाज़ार का सूचकांक 1000 से ज़्यादा अंक गिरकर 8701.07 पर बंद हुआ. जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ़्टी 359.15 अंक गिरकर 2585 अंकों पर बंद हुआ. भारतीय शेयर बाज़ारों में ऐसा उस समय हुआ जब शुक्रवार को रिज़र्व बैंक ने अपनी मुद्रा और कर्ज़ नीति की घोषणा की. जानकारों का मानना है कि बाज़ार के पक्ष में कोई घोषणा न होने के कारण निवेशकों का उत्साह गिर गया और इस कारण भारी बिकवाली का दौर चला. अन्य बाज़ार दुनियाभर के बाज़ारों में शुक्रवार की शुरुआत काफ़ी ख़राब रही. जापान का निकेई 9.6 प्रतिशत नीचे गिरा. दक्षिण कोरिया में शेयर बाज़ार 10 प्रतिशत से भी ज़्यादा गिरा. जबकि हाँगकाँग में आठ प्रतिशत से ज़्यादा की गिरावट दर्ज की गई. भारतीय बाज़ारों की स्थिति ख़राब रही ही. एशियाई बाज़ारों के बाद यूरोपीय बाज़ारों का भी बुरा हाल रहा. लंदन शेयर बाज़ार पाँच फ़ीसदी गिरा, तो फ़्रैंकफ़र्ट में गिरावट पाँच प्रतिशत से ज़्यादा रही. जबकि पेरिस बाज़ार तीन फ़ीसदी नीचे गिरकर बंद हुआ. तेल उत्पादक देशों की कोशिशों के बावजूद तेल की क़ीमतों में गिरावट का भी दौर जारी रहा. ओपेक की बैठक में यह फ़ैसला हुआ कि प्रतिदिन 15 लाख बैरल कम तेल का उत्पादन किया जाएगा. चिंता ब्रिटेन में भी मंदी की आशंका और बढ़ी है. जुलाई और सितंबर महीने के बीच अर्थव्यवस्था 16 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गई.
वर्ष 1992 के बाद पहली बार डॉलर के मुक़ाबले पाउंड की क़ीमत में बड़ी गिरावट देखी गई. यूरो की क़ीमतों में भी गिरावट का ही रुख़ रहा. मॉस्को शेयर बाज़ार में गिरावट का ऐसा आलम रहा कि शेयरों की ख़रीद-बिक्री 28 अक्तूबर तक के लिए निलंबित कर दी गई है. दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों की कोशिशों और अरबों डॉलर के वित्तीय पैकेज के बावजूद शेयर बाज़ार संभल नहीं पा रहे हैं. निवेशकों में शेयरों की घटती क़ीमत के कारण चिंता है. उनमें इस बात की भी चिंता है कि कंपनियाँ कहीं दिवालिया न हो जाए. इस कारण दुनिया भर के बाज़ारों में बिकवाली का दौर चल रहा है. |
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