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'इंडियन टाइगरों' का उदय और बढ़त | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वर्ष 2001 में जब श्रीनि राजम ने अपने दोस्तों से कहा था कि वह टैक्सस इंस्ट्रूमेंट इंडिया के प्रबंध निदेशक की अपनी नौकरी छोड़ रहे हैं तो उनके दोस्तों ने बड़ी चिंता जताई थी. दोस्तों की चिंता ये थी कि राजम आख़िर इतना अच्छे वेतन और बढ़िया पेंशन की सुविधा वाली नौकरी क्यों छोड़ रहे हैं. लेकिन श्रीनि राजम की आँखों में कुछ और ही मिशन जगमगा रहा था. राजम साबित करना चाहते थे कि भारतीय कंपनियाँ भी अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबले में जगह बना सकती हैं और यह स्थान और पहचान सिर्फ़ आईटी क्षेत्र में ही नहीं बल्कि उपभोक्ता उपकरणों के लिए सॉफ़्टवेयर भी बना सकते हैं. हालाँकि 2001 के समय में भारत या किसी अन्य स्थान पर कोई आईटी कंपनी शुरू करना कोई सही समय नहीं कहा जा सकता था लेकिन राजम ने यह जोखिम उठाया. वर्ष 2001 का समय ऐसा था जब डॉट कॉम की दुनिया में उबाल आ रहा था और इस क्षेत्र में कोई कंपनी शुरू करने के लिए धन जुटाना ख़ासा मुश्किल काम था ख़ासतौर से भारत जैसे सतर्क बाज़ार में. राजम ने अपनी नई कंपनी का नाम रखा "आई थिंक, देयरफ़ोर आई एम" यानी मैं सोचता हूँ इसीलिए मैं हूँ. इसका अंग्रेज़ी में संक्षिप्त रूप बना - इट्टियम. यह उक्ति राजम ने एक फ्रांसीसी दार्शनिक दीस्कार्तेस से ली थी. और करिश्मा ये देखिए कि राजम की कंपनी इट्टियम कुछ ही वर्षों में इस ऊँचाई पर पहुँच गई जिसकी उन्होंने उम्मीद भी नहीं की थी. श्रीनि राजम ने बीबीसी से कहा, "हम सौभाग्यशाली थे कि डॉट कॉम की ज़मीन तैयार करने में हमें भी भूमिका निभाने का मौक़ा मिला. हमारे पास ऊँचाई पर चढ़ने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं था और लोगों को आसान शर्तों पर भर्ती भी कर सके." आज राजम की कंपनी इट्टियम का दरवाज़ा सोनी और तोशीबा जैसी बड़ी कंपनियाँ खटखटाती हैं और बहुत उम्दा डिजिटल सिगनल प्रोद्योगिकी ख़रीदने के लिए भरपूर कोशिश कर रही हैं ताकि अपने पोर्टेबल मीडिया प्लेयर, कैमकॉर्डर्स और वीडियो फ़ोन में उसका इस्तेमाल कर सकें. राजम और उनके इंजीनियरों के पास अब दुनिया भर में लगभग 100 ग्राहक हैं जिनके पास 31 उत्पादों के पेटेंट हैं. राजम की कंपनी इट्टियम भारत, अमरीका, ब्रिटेन और ताईवान में 200 लोगों को रोज़गार देती है. उद्यमी भावना श्रीनि राजम भारतीयों की उस उद्यमी भावना का एक सटीक उदाहरण हैं जो अमरीका की सिलिकॉन वेली से पिछले दशक में भारत आ गए थे और बंगलौर में अपना ठिकाना बनाया. और सिर्फ़ उनकी इट्टियम ही एकमात्र कंपनी नहीं है जो अपने हुनर से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में हलचल मचा रहे हैं.
बंगलौर ने दो ऐसी कंपनियों को जन्म दिया और उन्हें विकसित किया है जिन्होंने आउटसोर्सिंग में भारत की अग्रणी भूमिका स्थापित की है और वे हैं विप्रो और इन्फ़ोसिस. इन कंपनियों को 11 सितंबर 2001 को अमरीका पर हुए हमलों के बाद से ख़ासा कारोबार मिला जब बहुत सी कंपनियों ने सोचा कि महत्वपूर्ण डाटा को अमरीका से बाहर कहीं और सुरक्षित रखा जाए. विप्रो और इन्फ़ोसिस कंपनियों की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि विश्व स्तर के मॉडल तैयार करते हैं और ये उपकरण किफ़ायती होने के साथ-साथ इसलिए भी लोकप्रिय हो रहे हैं कि आईटी जैसे जटिल बाज़ार में उनकी सर्विस भी आसानी से उपलब्ध होती है. वर्जिन, ब्रिटिश टेलीकॉम (बीटी) और एचएसबीसी जैसे बड़े नाम अपने आईटी नेटवर्क बंगलौर से चलाते हैं. वर्जिन अपनी विमान सेवा की ऑनलाइन बुकिंग सर्विस, बीटी अपनी टेलीफ़ोन नेटवर्क और हाँगकाँग एंड शंघाई बैंक (एचएसबीसी) अपने खातों की देखभाल का काम भारतीय आईटी कंपनियों से कराती है. इन कंपनियों की तेज़ रफ़्तार प्रगति और फैलाव को देखते हुए इन्हें आईटी यानी इंडियन टाइगर्स भी कहा जाने लगा है और इस ग्रुप में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ यानी टीसीएस भी शामिल है जिसका मुख्य कार्यालय मुंबई में है. पिछले चार वर्षों में इन कंपनियों ने आउटसोर्सिंग में अपना हिस्सा 0.5% से बढ़ाकर 7% कर लिया है जबकि छह बड़ी पश्चिमी कंपनियों का हिस्सा 71 प्रतिशत से गिरकर 46 प्रतिशत पर आ गया है. ये कंपनियाँ हैं - एक्सेंटर, एसीएस, सीएससी, ईडीएस, एचपी और आईबीएम. भारतीय कंपनियों का कारोबार और मुनाफ़ा हर दो साल में दोगुना हो रहा है और इसे देखते हुए भारी संख्या में निवेशक आकर्षित हो रहे हैं. इसीलिए शेयर बाज़ार में सिर्फ़ आईबीएम के अलावा ये कंपनिया बाक़ी सभी से बहुत बेहतर हालत में हैं. ये कंपनियाँ हर साल क़रीब 25 हज़ार लोगों को नौकरी पर रखती हैं और जिस तरह से अच्छा वेतन और सुविधाएँ देती हैं उससे बंगलौर का कायाकल्प हो गया है. इन्फ़ोसिस तीन बंगलौर टाइगरों में से इन्फ़ोसिस ऐसी कंपनी है जो ग्लोबलाइज़ेशन के मॉडल को तेज़ी से अपना रही है और यह पहली ऐसी भारतीय आईटी कंपनी है जो न्यूयॉर्क शेयर बाज़ार में भी दर्ज हो चुकी है. इन्फ़ोसिस के आउटसोर्सिंग सेवाओं का कोई भारतीय ग्राहक नहीं है यानी यह सिर्फ़ विदेशी कंपनियों को आउटसोर्सिंग सेवाएँ मुहैया कराती है. बंगलौर में इन्फ़ोसिस ने लगभग 40 एकड़ में अपना दफ़्तर बनाया हुआ है जो अपनी वास्तुकला, बॉस्केटबॉल, गोल्फ़ो कोर्स के लिए अलग पहचान लिए हुए है.
इन्फ़ोसिस के इस दफ़्तर में पहुँचकर ऐसा अहसास होता है जैसेकि आप कैलीफ़ोर्निया के पालो ऑल्टो में खड़े हों. इन्फ़ोसिस का कारोबार 32 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है और इसके बहुत से बड़े कर्मचारी करोड़पति हैं. इन कर्मचारियों को कंपनी के शेयर ख़रीदने का विकल्प भी दिया जाता है. इन्फ़ोसिस 52 हज़ार लोगों को रोज़गार देती है. इन्फ़ोसिस के मुख्य कार्यकारी नंदन निलेकनी अनेक अंतरराष्ट्रीय ग्लोबनाइज़ेशन मंचों पर सक्रिय हैं, मसलन - वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम जिसकी बैठक हाल ही में स्विट्ज़रलैंड के डावोस में हुई है. निलेकनी का कहना है कि लंबी अवधि में ग्लोबलाइज़ेशन से हर किसी को फ़ायदा होने वाला है. वनस्पति तेल से उच्च तकनीक तक बंगलौर के दूसरी आईटी महारथी कंपनी विप्रो की कुछ अलग कहानी है. विप्रो की शुरूआत खाद्य पदार्थ का कारोबार कंपनी के रूप में हुई थी. यह कंपनी वनस्पति तेल बेचती थी. इसके चेयरमैन अज़ीम प्रेमजी अमरीका के स्टेनफ़र्ड में बिज़नेस की पढ़ाई कर रहे थे लेकिन उन्हें अपने पिता के देहांत के बाद पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और कारोबार संभालना पड़ा.
कंपनी ने हालाँकि कई क्षेत्रों में अपना कारोबार करने की कोशिश की जिनमें साबुन और कंप्यूटर भी शामिल हैं लेकिन आख़िर में आईटी सेवाओं से ही उसकी पहचान बनी. विप्रो ने कुछ अन्य कंपनियों को भी ख़रीदा है जिसके ज़रिए इसका कारोबार बढ़ा है और हाल में इसने यूरोप और अमरीका में भी कुछ कंपनियाँ ख़रीदी हैं. विप्रो भारत में 61 हज़ार और विदेशों में 11 हज़ार लोगों को रोज़गार देती है. इसका बाज़ार क़ीमत के साथ कारोबार 25 अरब डॉलर का है. अनेक भारतीय कंपनियों की ही तरह इसका मालिकाना हक़ भी एक परिवार के पास है, हालाँकि इसने अपने शेयर बाज़ार में भी उतारे हैं, लेकिन इसके मालिक अब भी अज़ीम प्रेमजी ही हैं और इस रूप में वह भारत के सबसे धनी व्यक्तियों में गिने जाते हैं. मृदुभाषी अज़ीम प्रेमजी ने बीबीसी को बताया कि वह जानते और समझते हैं कि यूरोप में इस बात को लेकर ख़ासी चिंता है कि क्या भारत में आउटसोर्सिंग सेवाएँ बढ़ने की वजह से यूरोप में नौकरियों पर असर पड़ सकता है. अज़ीम प्रेमजी कहते हैं, "पश्चिमी देशों के लोग आर्थिक उदारीकरण को पसंद करते हैं, बशर्ति कि उससे उन पर असर ना पड़े. ऐसी ही सोच सारी दुनिया में है. लेकिन अगर यह आपको प्रभावित करे तो उदारीकरण बहुत बड़ा शब्द बन जाता है." टाटा कंसल्टेंसी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ यानी टीसीएस सबसे पुरानी आईटी सॉफ़्टवेयर की भारतीय कंपनी है और यह अब भी सबसे बड़ी बनी हुई है. इसे भारत के सबसे बड़े औद्योगिक संस्थानों में गिना जाता है. टाटा होल्डिंग्स में स्टील कंपनियाँ, कार फ़ैक्टरी और जहाज़ निर्माण जैसी औद्योगिक इकाइयाँ शामिल हैं.
टीसीएस सिर्फ़ एकमात्र ऐसी आईटी कंपनी है जिसका मुख्यालय बंगलौर में ना होकर मुंबई में है. टाटा कंसल्टेंसी निर्माण उद्योग और आउटसोर्सिंग जैसे घरेलू कारोबार के लिए आईटी तकनीक और सॉफ़्टवेयर मुहैया कराने में काफ़ी मज़बूत स्थिति में है. टाटा कंसल्टेंसी पश्चिमी कंपनियों को भी अनुसंधान और विकास की सेवाएँ मुहैया कराने की उम्मीद लगाए हुए है. टाटा कंसल्टेंसी को हुए मुनाफ़े ने टाटा उद्योग समूह के खाते को मज़बूत करने में ख़ासी अहम भूमिका निभाई है और इसी की बदौलत टाटा उद्योग समूह ने ब्रिटेन की कोरस स्टील कंपनी को ख़रीदने की बोली लगाई है. विदेशों की तरफ़ बंगलौर स्थित ये कंपनियाँ अपने ग्राहकों की रुप और आकार बढ़ाने के इरादे से विदेशों में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं और उन क्षेत्रों में अब भी ख़ासतौर से अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा है. लेकिन भारतीय कंपनियाँ यूरोप में अपना कारोबार फैलानी की कोशिश कर रही हैं और ख़ासतौर से उन्हें उम्मीद है कि ब्रिटेन जैसे देशों में उनकी सेवाएँ आकर्षक साबित होंगी. विप्रो ने अवीवा इंश्योरेंस जैसी अनेक कंपनियों के दफ़्तरी कार्यों का प्रबंधन अपने हाथों में ले लिया है. अवीवा वही कंपनी है जिसकी नॉरिच यूनियन बीमा कंपनी ब्रिटेन में बहुत लोकप्रिय है. भारत की आईटी कंपनियाँ चीन जैसे देशों में भी अपने सेवा केंद्र बना रही हैं क्योंकि चीन को भविष्य में भारत का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी देश समझा जा रहा है. हालाँकि भारत के एक वरिष्ठ विशेषज्ञ दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर एनडी सिद्धारथन का कहना है कि भारत कम से कम सॉफ़्टवेयर क्षेत्र में तो दुनिया में अग्रणी स्थान पर रहेगा. उनका कहना था, "भारतीय लोग स्वभाव से ही तार्किक होते हैं और उनका यही स्वभाव सॉफ़्टवेयर जैसी तकनीक में ज़्यादा रचनात्मक उद्यमी बनाता है." | इससे जुड़ी ख़बरें विप्रो का मुनाफा उम्मीद से ज़्यादा17 जनवरी, 2007 | कारोबार इन्फ़ोसिस के मुनाफ़े में भारी वृद्धि11 जनवरी, 2007 | कारोबार अमरीका को संवारने में भारतीय सबसे आगे05 जनवरी, 2007 | कारोबार नए ग्राहकों से बढ़ा इन्फ़ोसिस का मुनाफ़ा 11 अक्तूबर, 2006 | कारोबार तिमाही नतीजे में विप्रो का मुनाफ़ा बढ़ा19 अप्रैल, 2006 | कारोबार इन्फ़ोसिस के लाभ में भारी वृद्धि 14 अप्रैल, 2006 | कारोबार इन्फ़ोसिस का लाभ 649 करोड़ रुपए बढ़ा11 जनवरी, 2006 | कारोबार इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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