फिनलैंड और स्वीडन के नेटो में शामिल होने से कितने बदलेंगे समीकरण, क्या होगा रूस का अगला कदम?

फेलन चटर्जी

बीबीसी न्यूज़

स्वीडन ने अपने पड़ोसी फिनलैंड के रास्ते पर चलते हुए नेटो की सदस्यता लेने की ओर कदम बढ़ा दिए हैं.

तुर्की पिछले कुछ वक़्त से इन दोनों देशों की नेटो सदस्यता के रास्ते में रोड़ा बना हुआ था. लेकिन अब तुर्की ने अपना विरोध वापस ले लिया है.

फिनलैंड ने बीते अप्रैल में अमेरिका और यूरोपीय देशों के सैन्य संगठन नेटो की सदस्यता ली थी जिसके बाद नेटो के सदस्य देशों की संख्या बढ़कर 31 तक पहुंच गई.

इन दोनों नॉर्डिक देशों ने एक लंबे समय तक सैन्य तटस्थता का रुख अपनाया हुआ था लेकिन पिछले साल फरवरी में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद इनके रुख में परिवर्तन आया है.

नेटो में शामिल क्यों हो रहे हैं ये देश

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के यूक्रेन पर हमले की वजह से उत्तरी यूरोप में दीर्घकालिक शांति और स्थिरता को जोरदार झटका लगा है.

इस युद्ध की वजह से ही स्वीडन और फिनलैंड ने भी अपने आपको जोखिमपूर्ण स्थिति में पाया है.

फिनलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री अलेक्ज़ेंडर स्टब ने कहा है कि यूक्रेन पर रूसी आक्रमण ने उनके देश के लिए नेटो की सदस्यता को अहम बना दिया है.

यूक्रेन युद्ध ने फिनलैंड में रहने वाले कई लोगों की पुरानी यादें ताज़ा कर दी हैं.

साल 1939 के आख़िरी महीनों में तत्कालीन सोवियत संघ ने फिनलैंड पर हमला किया था. फिनलैंड की सेना सोवियत सेना के मुक़ाबले काफ़ी कम थी. इसके बावजूद फिनलैंड ने बेहद बहादुरी के साथ विरोधी सेना का सामना किया.

ये संघर्ष साल 1940 के मार्च महीने तक जारी रहा जिसमें फिनलैंड को अपना उत्तरी प्रांत कारेलिया खोना पड़ा.

इस संघर्ष में फिनलैंड ने सोवियत संघ को अपने ऊपर कब्जा करने से रोक लिया लेकिन उसे अपनी दस फीसद ज़मीन खोनी पड़ी.

हेलसिंकी यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र की प्रोफेसर इरो सरक्का कहती हैं कि यूक्रेन में जारी युद्ध ने इतिहास की यादों को ताज़ा कर दिया है.

वह बताती हैं कि फिनलैंड के लोग रूस के साथ लगने वाली 1,340 किलोमीटर की सीमा देखकर सोच रहे थे, “क्या ये हमारे साथ भी हो सकता है?”

स्वीडन ने भी हालिया सालों में खुद को जोख़िम भरी स्थिति में पाया है.

स्वीडन की सैन्य कमजोरी साल 2013 में उभरकर सामने आई जब रूस के बमवर्षक विमानों ने स्टॉकहोम पर हमला करने का अभ्यास किया. स्वीडन को इस मामले में नेटो की मदद लेनी पड़ी थी.

इसके बाद साल 2014 में स्वीडन उन ख़बरों से परेशान था जिनमें कहा गया था कि रूसी पनडुब्बियां स्टॉकहोम के पास उथले पानी में घूम रही हैं.

फिर साल 2018 में स्वीडन के घर-घर तक कुछ पर्चे पहुंचे जिनका शीर्षक था – ‘अगर युद्ध या संघर्ष होता है तो’…

स्वीडन में 1991 के बाद पहली बार इस तरह के पर्चे जारी किए गए थे.

कितनी बड़ी हैं इन देशों की सेनाएं?

फिनलैंड की आबादी सिर्फ 55 लाख है जिसके हिसाब से उसकी कॉन्सक्रिप्ट सेना काफ़ी प्रशिक्षित और विशाल है.

फिनलैंड हर साल कम से कम 21,000 लोगों को सैन्य प्रशिक्षण देता है और इसके पास नौ लाख लोगों की आरक्षित सेना है. वहीं, युद्धकाल में इसकी सैन्य क्षमता 2,80,000 है.

इसकी तुलना में स्वीडन की सैन्य क्षमता काफ़ी कम है. स्वीडन ने साल 2010 में अपने नागरिकों को सैन्य प्रशिक्षण देना बंद कर दिया था. लेकिन 2018 में इसे एक बार फिर शुरू कर दिया गया.

फिलहाल स्वीडन हर साल 6,000 लोगों को प्रशिक्षित कर रहा है. साल 2025 तक ये संख्या बढ़कर 8,000 तक पहुंच जाएगी.

स्वीडन ने साल 1990 के बाद अपनी सेना में कटौती करना शुरू किया था.

स्वीडन ने अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव लाते हुए क्षेत्रीय सुरक्षा से ध्यान हटाकर अंतरराष्ट्रीय शांति सेना में योगदान देना शुरू किया था.

लेकिन साल 2014 में क्राइमिया पर रूसी आक्रमण और बाल्टिक क्षेत्र में रूस का ख़तरा बढ़ने के साथ ही प्राथमिकताओं में एक बार फिर बदलाव दर्ज किया जाने लगा है.

अब क्या बदल जाएगा?

स्वीडन और फिनलैंड के नेटो सदस्य बनने से कुछ मामलों में स्थितियां बदलेंगी तो कुछ मामलों में ज़्यादा बदलाव नहीं आएगा.

स्वीडन और फिनलैंड औपचारिक रूप से साल 1994 में नेटो के सदस्य बने थे. दोनों देशों ने इस गठबंधन में अहम योगदान भी दिया है.

इन देशों ने शीत युद्ध के दौर से कई नेटो अभियानों में भी हिस्सा लिया है.

लेकिन ये पहला मौका होगा जब इन देशों को नेटो के आर्टिकल पांच के तहत सुरक्षा की गारंटी मिलेगी.

इस आर्टिकल के तहत नेटो के किसी भी सदस्य देश पर हमला होने का मतलब सभी नेटो देशों पर हमला माना जाना है. इस स्थिति में सभी देश उस देश के बचाव में उतरते हैं जो हमले का शिकार होता है.

इतिहासकार हेनरिक मेंनडेर कहते हैं कि सोवियत संघ के विघटन के बाद से फिनलैंड के लोगों का नेटो की ओर झुकाव बढ़ना शुरू हो गया था जिस वजह से वे इस सदस्यता के लिए मानसिक रूप से तैयार थे.

साल 1992 में फिनलैंड ने 64 अमेरिकी लड़ाकू विमान ख़रीदे थे.

इसके तीन साल बाद ही उसने स्वीडन के साथ यूरोपीय संघ की सदस्यता ली. और इसके बाद फिनलैंड की हर सरकार ने तथाकथित नेटो विकल्प पर विचार किया है.

फिनलैंड पहले ही नेटो की ओर से डिफेंस पर ख़र्च करने के लिए तय लक्ष्य, जो कि जीडीपी का दो फीसद है, हासिल कर चुका है. और स्वीडन साल 2026 तक इस लक्ष्य को हासिल करने की योजना बना रहा है.

स्वीडन शीत युद्ध के दौरान तटस्थ रहा था लेकिन उस दौरान भी उसने बाल्टिक द्वीप गोटलैंड पर कम से कम 15,000 सैनिक तैनात करके रखे थे.

अब एक बार फिर इसने यहां अपने सैनिकों की मौजूदगी बढ़ानी शुरू कर दी है.

स्वीडन आने वाले सालों में अपनी पूर्णकालिक सेना और कॉन्स्क्रिप्ट फोर्स तैयार करने की ओर बढ़ रहा है.

क्या हैं इस कदम के जोखिम

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन मानते हैं कि नेटो के क्षेत्र में विस्तार उनके देश की सुरक्षा के लिए सीधा ख़तरा है.

उन्होंने दावा किया था कि साल 2022 में यूक्रेन पर हमला करने की वजह यही थी.

लेकिन यूक्रेन पर उनके आक्रमण ने नेटो का विस्तार बढ़ाने में ही योगदान दिया.

फिनलैंड का नेटो में शामिल होना उनके लिए सबसे अहम झटका है क्योंकि इससे नेटो का प्रभाव बाल्टिक सागर तक हो गया है.

इस पर रूस की ओर से भी चेतावनी आई है जिसमें उसने सैन्य-तकनीकी कदम उठाने की बात कही है.

रूसी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि अगर स्वीडन और फिनलैंड ने नेटो में शामिल होने का फ़ैसला किया तो उसके लिए चेतावनी दी जा चुकी है.

स्वीडन को तुर्की से नेटो में शामिल होने के लिए हरी झंडी मिलने पर रूस ने कहा है कि वह इस मामले में भी फिनलैंड जैसी प्रतिक्रिया ही देगा.

रूस इस पर क्या कदम उठाएगा, ये अभी स्पष्ट नहीं है.

लेकिन रूस ने कहा है कि उसने बेलारूस में अपने टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार पहुंचा दिए हैं.

इससे फिनलैंड और स्वीडन इन हथियारों की रेंज में आ गए हैं.

लेकिन फिनलैंड के पूर्व पीएम अलेक्ज़ेंडर स्टब ने चेतावनी दी है कि इसके बाद रूसी सायबर हमले, दुष्प्रचार अभियान और कभी-कभार हवाई क्षेत्र के उल्लंघन की संभावनाएं हैं.

क्या बढ़ेगी स्वीडन और फिनलैंड की सुरक्षा

नेटो के आर्टिकल पांच के तहत फिनलैंड और स्वीडन को जल्द ही नेटो की ओर से आश्वासन मिल जाएगा कि उन पर हमला होते ही सभी नेटो देश उनकी मदद के लिए आएंगे.

इन देशों का नेटो में शामिल होना नॉर्डिक और बाल्टिक क्षेत्र की रक्षा को ज़्यादा व्यापक बनाता है.

लेकिन स्वीडन में कुछ तत्व हैं जो मानते हैं कि नेटो की सदस्यता का असर नकारात्मक होगा.

स्वीडिश पीस एंड आर्बिट्रेशन सोसाइटी से जुड़ीं डेबोरा सोलोमन कहती हैं कि नेटो के न्यूक्लियर डिटेरेंस ने तनाव बढ़ा दिया है और रूस के साथ हथियारों की दौड़ शुरू होने का ख़तरा पैदा कर दिया है.

इसने शांति प्रयासों को जटिल बना दिया जिससे स्वीडन अपेक्षाकृत रूप से कम सुरक्षित स्थान बन गया है.

एक डर यह भी है कि नेटो में शामिल होने से स्वीडन दुनिया भर में परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में किए जा रहे प्रयासों में अपनी अग्रणी भूमिका खो देगा.

स्वीडन में नेटो के प्रति संशय की नज़र से देखने वाले 60 से 80 के दशक की ओर देखते हैं जब स्वीडन ने अपनी तटस्थता से खुद को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया था.

सोलोमन कहती हैं कि नेटो में शामिल होना उस सपने को छोड़ देने जैसा है.

हालांकि, फिनलैंड की तटस्थता का स्वरूप कुछ अलग था. साल 1948 में सोवियत संघ ने फिनलैंड के साथ तटस्थता की शर्त पर ‘मित्रता समझौता’ किया था.

इसे देश की स्वतंत्रता बनाए रखने के व्यावहारिक तरीके के रूप में देखा गया था.

हेनरिक मेंनडेंर कहती हैं, ‘ऐसे में अगर स्वीडन की तटस्थता पहचान और विचारधारा का मामला था, तो फिनलैंड के लिए यह अस्तित्व का सवाल था.’

उन्होंने कहा, ‘स्वीडन नेटो की सदस्यता के बारे में बहस करने का जोखिम भी उठा सकता है क्योंकि उसने फिनलैंड और बाल्टिक को "बफर जोन" के रूप में इस्तेमाल किया है.’

फिनलैंड ने सोवियत संघ के पतन के साथ ही अपनी तटस्थता छोड़ दी थी.

इसने पश्चिमी देशों का रुख करते हुए खुद को सोवियत प्रभाव क्षेत्र से बाहर निकालने की दिशा में कदम उठाने शुरू किए थे.

तुर्की क्यों कर रहा था विरोध

तुर्की और कुछ हद तक हंगरी ने दोनों देशों की ओर से नेटो में शामिल होने की दिशा में की जा रही शुरुआती कोशिशों का विरोध किया था.

तुर्की ने नॉर्डिक देशों पर उन तत्वों का समर्थन करने का आरोप लगाया था जिन्हें वह आतंकी संगठन कहता था.

इनमें कुर्दिश चरमपंथी संगठन पीकेके और गुलेन मूवमेंट शामिल हैं जिसे तुर्की 2016 के तख़्तापलट प्रयासों के लिए ज़िम्मेदार ठहराता है.

तुर्की की आबादी में कुर्द समुदाय लगभग 15-20 फीसद है जो एक लंबे समय से तुर्की की सरकारों की ओर से प्रताड़ित किया जाता रहा है.

लेकिन स्वीडन के प्रति तुर्की की नाराज़गी बढ़ने की वजह स्वीडन में रहने वाला कुर्दिश समुदाय है जो पिछले कुछ दशकों में स्वीडन की राजनीति में एक जगह बनाने में सफल रहा है.

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने सवाल किया था, “एक देश जिसकी सड़कों पर आतंकी घूमते हों...वो नेटो में योगदान कैसे दे सकता है.”

उनकी मुख्य मांग चरमपंथियों को राजनीतिक, आर्थिक और हथियारों का समर्थन देना बंद करना थी.

इसके बाद स्वीडन ने इसी साल जून महीने में आतंकवाद से जुड़े अपने क़ानून में बदलाव लाते हुए चरमपंथी संगठनों का सदस्य बनने को ग़ैरक़ानूनी बना दिया है.

इसके कुछ हफ़्ते बाद एक कुर्दिश शख़्स को आतंकी गतिविधियों के लिए आर्थिक मदद देने के मामले में जेल भेजा गया है.

हालांकि, माना जाता है कि तुर्की की ओर से स्वीडन के रास्ते में रोड़ा बनने की दूसरी कई वजहें भी थीं.

इनमें से एक वजह तुर्की की ओर से अमेरिकी लड़ाकू विमान F-16 का इंतज़ार करना है.

हालांकि, तुर्की ने इसे वजह मानने से इनकार किया है.

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