रूस के राष्ट्रपति पुतिन सऊदी अरब और यूएई के दौरे पर अचानक क्यों गए?

पुतिन-एमबीएस

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रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बुधवार को सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के आधिकारिक दौरे पर रहेंगे.

इस दौरे को इसलिए भी अहम माना जा रहा है कि यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद व्लादिमीर पुतिन इक्का-दुक्का देशों के दौरे पर ही गए हैं.

पुतिन का ये दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बीच रूस मध्यस्थ की भूमिका निभाने की मंशा के संकेत भी दे चुका है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने ये भी बताया कि इस दौरे से लौटते ही पुतिन रूस में ईरान के राष्ट्रपति से भी वार्ता करेंगे.

पुतिन पहले यूएई जाएंगे और फिर सऊदी अरब पहुंचेंगे.

रूसी राष्ट्रपति के इस दौरे को तेल उत्पादक देशों के साथ अहम रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने की कोशिशों के तौर पर देखा जा रहा है.

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में क्रेमलिन के हवाले से बताया गया है कि पुतिन अपनी इस यात्रा में कारोबार और निवेश के साथ ही इसराइल-फ़लस्तीन युद्ध पर भी चर्चा करेंगे.

इसके बाद गुरुवार को पुतिन ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मेज़बानी करेंगे. रईसी पुतिन के न्योते पर ही अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ मॉस्को पहुंच रहे हैं.

रूस के राष्ट्रपति ने इसी साल मार्च महीने में इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (आईसीसी) की ओर से गिरफ़्तारी वॉरंट जारी किए जाने के बाद से कोई विदेश दौरा नहीं किया है.

यूएई और सऊदी अरब दोनों ही आईसीसी की संधि का हिस्सा नहीं है. इसका सीधा मतलब है कि इन दोनों देशों में पुतिन को गिरफ़्तारी का ख़तरा नहीं है.

इसी साल 9-10 सितंबर को जब भारत की अध्यक्षता में नई दिल्ली में जी-20 देशों का शिखर सम्मेलन हुआ तो पुतिन उसका हिस्सा भी नहीं बने थे. भारत भी आईसीसी का सदस्य नहीं है.

पुतिन के एजेंडे पर सऊदी-यूएई क्यों ज़रूरी?

व्लादिमीर पुतिन

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रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार पुतिन पहले यूएई और फिर सऊदी अरब जाएंगे. यहां वह मुख्य तौर पर क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बातचीत करेंगे.

पिछले कुछ समय में पुतिन और मोहम्मद बिन सलमान के बीच रिश्ते गहरे होते गए हैं. दोनों की साल 2016 में तेल उत्पादक देशों के समूह को गठित करने में अहम भूमिका रही. इस समूह को अब ओपेक प्लस के नाम से जाना जाता है. तेल दोनों देशों की अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है.

वहीं यूएई रूसी तेल कंपनियों के लिए कारोबार का बड़ा बाज़ार बन गए हैं. जब यूरोप ने मॉस्को पर प्रतिबंध लगाए तो रूस की दूसरी सबसे बड़ी तेल उत्पादक कंपनी लुकऑयल ने यूएई में ही अपना आधा कारोबार शिफ़्ट कर लिया.

रूसी राष्ट्रपति अबु धाबी जाएंगे लेकिन वह पड़ोस में (दुबई) हो रहे जलवायु सम्मेलन (सीओपी28) में हिस्सा लेने नहीं जाएंगे.

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार पुतिन के इस दौरे के मायने ये निकाले जा रहे हैं कि वह यूक्रेन युद्ध के बाद उन्हें अलग-थलग करने की पश्चिमी देशों की कोशिशों के बावजूद और ताकतवर बनकर उभर रहे हैं.

सात अक्टूबर को इसराइल पर हमास के हमले के बाद से जारी युद्ध को भी पुतिन ने अमेरिकी कूटनीति की विफलता बताया था.

क्रेमलिन को सुझाव देने वाले काउंसिल ऑन फॉरन एंड डिफ़ेंस पॉलिसी के प्रमुख फ़्योदोर लुकयानोव कहते हैं कि पुतिन का दो अहम खाड़ी देशों का दौरा 'स्पष्ट संकेत' है कि रूस अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग नहीं है. उन्होंने ये भी कहा कि इस दौरे से मध्य पूर्व देशों में रूस के प्रभाव को बढ़ाने में मदद मिलेगी. ये दौरा इस बात का भी संकेत है कि अमेरिका के अहम सहयोगी यूएई और सऊदी अरब अब अपनी विदेश नीति को संतुलित बनाने के इच्छुक हैं.

सऊदी अरब, यूएई और रूस तीनों ही तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक प्लस का हिस्सा हैं. इस समूह में रूस का दबदबा माना जाता है. बीते सप्ताह ही इन देशों के बीच तेल उत्पादन में कटौती जारी रखने पर सहमति बनी थी.

ओपेक प्लस ने 2024 की पहली तिमाही में तेल उत्पादन घटाकर 2.2 अरब बैरल तक लाने पर हामी भरी है. ओपेक प्लस देशों में दुनिया भर का 40 फ़ीसदी तेल उत्पादन होता है.

क्रेमलिन समर्थक विशलेषक सर्गेई मारकोव का मानना है कि सऊदी अरब और यूएई रूस के लिए अहम सहयोगी रहे हैं. उन्होंने तेल की ऊंची कीमतों का ज़िक्र करते हुए मॉस्को को इससे हुए फ़ायदे की बात की. उनका मानना है कि यूएई के साथ करीबी रिश्तों की वजह से मॉस्को की कई कंपनियां पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से बचने में सफल हुईं.

सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलाज़िज़ बिन सलमान ने ब्लूमबर्ग को सोमवार को दिए एक इंटरव्यू में रूस और रियाद के बीच तेल नीति पर भरोसे और सहयोग पर ज़ोर दिया. इन दोनों देशों के रिश्ते को ओपेक प्लस समूह का आधार भी कहा जाता है.

इसराइल-हमास संघर्ष पर भी होगी बात

एक दिन में दो देशों के इस दौरे पर पुतिन के एजेंडे में इसराइल और हमास के बीच जारी युद्ध भी रहेगा.

क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने मीडिया से ये भी कहा कि दोनों देशों के प्रमुखों के साथ वार्ता द्विपक्षीय रिश्ते, इसराइल और हमास के बीच युद्ध और अन्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर केंद्रित होगी.

इसराइल और हमास के बीच सात अक्टूबर से जंग जारी है. फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास ने इसराइली बस्तियों और गांवों पर हज़ारों रॉकेट दागे, जिनमें सैकड़ों की जान गई. इसके जवाब में इसराइल ने ग़ज़ा में हवाई हमले शुरू कर दिए. इन हमलों में अभी तक 16 हज़ार से अधिक फ़लस्तीनियों की जान जा चुकी है.

रूस के इसराइल और फ़लस्तीन दोनों से मैत्रीपूर्ण संबंध है. पिछले माह पुतिन ने ये कहा था कि अगर वह युद्धविराम की कोशिश करते हैं तो इसराइल और फ़लस्तीन दोनों से उनके मैत्रीपूर्ण संबंधों की वजह से उनपर किसी एक पक्ष का साथ देने का शक नहीं किया जाएगा.

व्लादिमीर पुतिन

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पुतिन के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वॉरंट

पुतिन ने हालिया वर्षों में बहुत कम विदेश यात्राएं की हैं.

वे अधिकतर उन्हीं देशों में गए हैं, जो सोवियत संघ का हिस्सा रह चुके हैं. इन देशों के अलावा आख़िरी बार अक्टूबर में उन्होंने चीन का दौरा किया था.

अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) ने यूक्रेन युद्ध में कथित युद्ध अपराधों को लेकर गिरफ़्तारी वॉरंट जारी किया था.

इसी वजह से रूसी राष्ट्रपति अगस्त में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने दक्षिण अफ़्रीका नहीं गए थे. इसके अगले ही महीने भारत में हुए जी-20 सम्मेलन में भी पुतिन नहीं आए थे.

हालांकि, सऊदी और यूएई की तरह ही भारत भी आईसीसी का सदस्य नहीं है.

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