ब्रिक्स समिट से पहले दक्षिण अफ़्रीका ने क्यों ली भारत वाली लाइन

पीएम मोदी ब्रिक्स सम्मेलन में

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 22 से 24 अगस्त के बीच जोहानिसबर्ग में होने जा रहे ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए दक्षिण अफ़्रीका के दौरे पर जाएंगे.

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पहले ही इस बैठक में शामिल होने में असमर्थता दिखा दी थी लेकिन चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस बैठक में होंगे. ये भी माना जा रहा है कि पीएम मोदी और जिनपिंग के बीच बैठक से इतर भी द्विपक्षीय वार्ता हो सकती है.

दक्षिण अफ़्रीका में 17 साल पुराने समूह ब्रिक्स की बैठक होगी और इसके केंद्र में होगा समूह का विस्तार. चीन ये चाहता है कि ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका के इस संगठन में नए देश शामिल हों.

एक रिपोर्ट के अनुसार, क़रीब 40 देशों ने ब्रिक्स से जुड़ने की इच्छा ज़ाहिर की है. इनमें ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब, संयुक्त राज्य अमीरात जैसे अहम देश भी शामिल हैं.

ऐसा माना जा रहा है कि चीन इस संगठन के विस्तार से पश्चिमी देशों के दबदबे को टक्कर देना चाहता है. चीन की इस पुरज़ोर कोशिश में उसे रूस का साथ मिला हुआ है.

इस गुट में भारत भी शामिल है लेकिन भारत की नीति सभी गुटों के साथ या फिर किसी गुट में नहीं शामिल रहने की रही है.

बैठक से ठीक पहले मेज़बान देश दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने जो कहा है, वह भारत के लाइन से मेल खाता है.

दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति की यह टिप्पणी चीन की उस कोशिश के लिए झटका हो सकता है, जिसके तहत वह ब्रिक्स को पश्चिम विरोधी या जी-7 के समानांतर खड़ा करने की बात कर रहा है.

दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति ने ब्रिक्स समिट से पहले कहा है कि उनका देश किसी गुट में शामिल नहीं होना चाहता है और गुटनिरपेक्षता की नीति के साथ है. यह भारत की विदेश नीति की लाइन रही है और दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति ने इसी नीति के साथ अपनी प्रतिबद्धता जताई है.

ब्रिक्स

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दक्षिण अफ़्रीका ने क्या कहा?

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दक्षिण अफ़्रीकी राष्ट्रपति ने रामाफोसा ने कहा है, "हमारा देश गुट-निरपेक्षता की नीति को लेकर प्रतिबद्ध है. हमने ख़ुद को किसी भी वैश्विक शक्ति या कुछ देशों के प्रभावशाली गुटों का हिस्सा बनाने वाले दबाव में आने से बचाया है. शीतयुद्ध के वक़्त बहुत से अफ़्रीकी देशों की स्थिरता और संप्रभुता कमज़ोर हुई क्योंकि इन्होंने ख़ुद को किसी एक बड़ी शक्ति के साथ जोड़ा.''

राष्ट्रपति रामाफोसा ने कहा, "इस अनुभव ने हमें ये सिखाया कि कोई देश हम पर हावी हो, इसकी बजाय हम रणनीतिक ज़रूरतों के हिसाब से साझेदारी करें. हमारे कुछ आलोचक चाहते हैं कि हम उनके राजनीति और वैचारिक पसंदों का खुला समर्थन करें लेकिन हम इन वैश्विक शक्तियों के बीच प्रतियोगिता में नहीं फंसेंगे. हमारा देश वैश्विक शांति और विकास के लिए सारे देशों के साथ मिलकर काम करना चाहता है. दक्षिण अफ़्रीका 120 देशों के फ़ोरम नॉन अलाइंड मूवमेंट (नाम) का हिस्सा है. ये देश औपचारिक तौर पर किसी महाशक्ति या गुट का हिस्सा नहीं हैं.''

रामाफोसा ने हालांकि ये भी स्पष्ट किया कि उनका किसी एक गुट में शामिल न होने के फ़ैसले का ये मतलब नहीं है कि वो सिद्धांतों और राष्ट्रीय हितों से जुड़े मामलों पर तटस्थ रहेंगे.

उन्होंने कहा, ''दुनिया भर में उत्पीड़ित और हाशिये पर मौजूद लोगों के संघर्षों में समर्थन देना उनका मक़सद है. उन्होंने कहा कि इसलिए दक्षिण अफ़्रीका फ़लस्तीन और पश्चिमी सहारा में संघर्ष कर रहे लोगों को अपना समर्थन जारी रखेगा.''

ब्रिक्स

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भारत वाली लाइन क्या है?

भारत की विदेश नीति की बुनियाद पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्षता में रखी थी. यानी भारत किसी भी गुट में शामिल नहीं होगा. भारत के विदेश मंत्री अब इसी नॉन अलाइनमेंट यानी गुटनिरपेक्षता को को मल्टीअलाइनमेंट यानी बहुध्रुवीय कह रहे हैं. यानी भारत किसी एक गुट के साथ नहीं रहेगा बल्कि अपने हितों के हिसाब से सभी गुटों के साथ रहेगा.

यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद भारत की विदेश नीति के लिए परीक्षा की घड़ी थी. लेकिन भारत ने मुश्किल वक़्त में नेहरू की गुटनिरपेक्षता की नीति में ही समाधान देखा. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विदेश नीति की बुनियाद गुटनिरपेक्षता में रखी थी. उसके बाद की जितनी सरकारें आईं सबने इस नीति का पालन अपने-अपने हिसाब से किया है.

हंगरी में सोवियत यूनियन के हस्तक्षेप के एक साल बाद 1957 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में बताया था कि भारत ने क्यों इस मामले में यूएसएसआर की निंदा नहीं की.

नेहरू ने कहा था, ''दुनिया में साल दर साल और दिन ब दिन कई चीज़ें घटित होती रहती हैं, जिन्हें हम व्यापक रूप से नापसंद करते हैं. लेकिन हमने इनकी निंदा नहीं की है क्योंकि जब कोई समस्या का समाधान खोज रहा होता है तो उसमें निंदा से कोई मदद नहीं मिलती है.''

शीत युद्ध में भारत न सोवियत संघ के साथ था और न ही अमेरिकी खेमे में. संकट की स्थिति में दुनिया के कई देशों को यह नीति अब रास आ रही है. दक्षिण अफ्रीका से पहले सऊदी अरब ने ऐसा ही बयान दिया था.

बैठक से पहले सदस्य देशों के ब्रिक्स के विस्तार पर अलग-अलग रुख़ को देखते हुए ये कहा जा रहा है कि सम्मेलन के दौरान इस बात पर तनातनी बढ़ सकती है कि क्या ब्रिक्स को विकासशील देशों के आर्थिक हितों के लिए एक गुटनिरपेक्ष क्लब के तौर पर ही काम करना चाहिए या इसे एक ऐसी राजनीतिक ताक़त के तौर पर उभरना चाहिए जो पश्चिम को खुले तौर पर चुनौती देती हो.

ब्रिक्स क्या है?

ब्रिक्स दुनिया की पाँच सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है.

ब्रिक्स अंग्रेज़ी के अक्षर 'B R I C S' से बना वो शब्द है, जिसमें हर अक्षर एक देश का प्रतिनिधित्व करता है.

ये देश हैं ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका.

ये वो देश हैं जिनके बारे में कुछ जानकारों का मानना है कि साल 2050 तक वे विनिर्माण उद्योग, सेवाओं और कच्चे माल के प्रमुख सप्लायर यानी आपूर्तिकर्ता हो जाएंगे.

उनका मानना है कि चीन और भारत विनिर्माण उद्योग और सेवाओं के मामले में पूरी दुनिया के प्रमुख सप्लायर हो जाएंगे जबकि रूस और ब्राज़ील कच्चे माल के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता हो जाएंगे.

ब्रिक्स देशों की जनसंख्या दुनिया की आबादी का लगभग 40% है और इसका वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सा लगभग 30% है.

ब्रिक्स देश आर्थिक मुद्दों पर एक साथ काम करना चाहते हैं लेकिन इनमें से कुछ के बीच भारी राजनीतिक विवाद भी है. इन विवादों में भारत और चीन के बीच सीमा विवाद सबसे अहम है.

इस साल दक्षिण अफ़्रीका ब्रिक्स का अध्यक्ष है और वहां इस संगठन का 15वां शिखर सम्मेलन आयोजित हो रहा है.

ब्रिक्स से क्यों जुड़ना चाहते हैं देश?

साल 2019 में जी-20 बैठक के दौरान पीएम मोदी, व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग

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इमेज कैप्शन, साल 2019 में जी-20 बैठक के दौरान पीएम मोदी, व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग

इस संगठन का सदस्य बनने के लिए कोई औपचारिक तरीक़ा नहीं है. सदस्य देश आपसी सहमति से ये फ़ैसला लेते हैं.

ब्रिक्स का मुख्यालय चीन के शंघाई में है. ब्रिक्स के सम्मेलन हर साल आयोजित होते हैं और इसमें सभी पांच सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल होते हैं.

2020 तक नए सदस्यों को इस समूह से जोड़ने के प्रस्ताव पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था लेकिन इसके बाद इस समूह को विस्तार देने पर चर्चा शुरू हुई.

फिलहाल अल्जीरिया, अर्जेंटीना, बहरीन, मिस्र, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने इस समूह से जुड़ने के लिए अपने आवेदन दिए हैं.

वहीं अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, बेलारूस, कज़ाख़स्तान, मेक्सिको, निकारागुआ, नाइजीरिया, पाकिस्तान, सेनेगल, सूडान, सीरिया, थाइलैंड, ट्यूनीशिया, तुर्की, उरुग्वे, वेनेजुएला और ज़िम्बाब्वे ने भी इसकी सदस्यता में अपनी रुचि दिखाई है.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के लिए एक ब्लॉग में विदेशी मामलों के जानकार ज़ोरावर दौलत सिंह ने लिखा है कि दर्जनों देशों का ब्रिक्स गुट से जुड़ने में रुचि दिखाना इस बात का सबूत है कि अभी तक पश्चिमी देश जिस अर्थव्यवस्था के मॉडल को चला रहे हैं वो अब पसंद नहीं किया जा रहा है.

उन्होंने लिखा है, "पूरे विश्व में ऐसे संगठनों की मांग स्पष्ट तौर पर है जो किसी एक प्रमुख शक्ति या बड़े गुट के ग़ुलाम न हों."

ज़ोरावर दौलत सिंह ब्रिक्स में बढ़ती रुचि के पीछे तीन वजह गिनाते हैं. उनके अनुसार, "दुनिया की अधिकांश अर्थव्यवस्थाएं वैश्वीकरण को बढ़ावा देना चाहती हैं, लेकिन इस प्रक्रिया के लिए वो अपने राजनीतिक प्रणाली, संस्कृति, घरेलू नीतियों, विदेशी नीति से समझौता नहीं करना चाहते. ब्रिक्स ऐसे समावेशी वैश्वीकरण मॉडल को वैध बनाता है. ब्रिक्स संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में आज़ादी को बल देने की कोशिश करता है."

"आर्थिक मोर्चे पर ब्रिक्स की दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि साल 2014 में नेशनल डिवेलेपमेंट बैंक की स्थापना है. इसके स्थापना के बाद से एनडीबी ने अब तक 34 अरब डॉलर की क़रीब 100 परियोजनाओं में पैसे लगाए हैं. इनमें से अधिकांश परियोजनाएं पानी, परिवहन, स्वच्छ ऊर्जा, डिजिटल क्षेत्र से जुड़ी हैं. ऐसे में बैंक की सदस्यता और उसके पूंजी आधार का विस्तार समय के साथ ब्रिक्स की वित्तीय मामलों में भूमिका को बड़ा बनाएगा."

ज़ोरावर दौलत सिंह ब्रिक्स की तीसरी सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर इसके सदस्य देशों की ओर से किसी एक मुद्रा में व्यापार के ख़िलाफ़ खुलकर बोलने को भी बताते हैं.

यूक्रेन युद्ध और उसके बाद पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया को देखते हुए अब कई देशों का मानना है कि इससे केवल एक मुद्रा में वित्तीय लेनदेन के लिए प्रतिकूल माहौल बना. वहीं आर्थिक आत्मनिर्भरता ब्रिक्स देशों का साझा रणनीतिक मक़सद है.

चीन क्यों चाहता है ब्रिक्स का विस्तार?

शी जिनपिंग

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ब्रिक्स के विस्तार में चीन को सबसे मुख्य देश के तौर पर देखा जा रहा है.

दरअसल, चीन चाहता है कि ब्रिक्स को पश्चिमी प्रभुत्व को टक्कर देने वाले गुट के तौर पर देखा जाए.

इन प्रयासों में चीन को रूस का समर्थन भी मिला है, जो फ़िलहाल यूक्रेन युद्ध की वजह से कूटनीतिक मोर्चे पर ख़ुद को अलग-थलग महसूस कर रहा है.

फ़ाइनेंशियल टाइम्स ने एक रिपोर्ट में बताया है कि चीन ब्रिक्स को दुनिया की सात सबसे बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समूह जी-7 के प्रतिद्वंद्वी के तौर पर खड़ा करना चाहता है.

ख़बर के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने 60 से अधिक देशों के नेताओं को जोहानिसबर्ग में हो रहे शिखर सम्मेलन का न्योता दिया है.

एक चीनी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर फ़ाइनेंशियल टाइम्स को बताया, "अगर हम ब्रिक्स में इतने देश शामिल करें, जिनकी कुल जीडीपी जी-7 देशों जितनी हो, तो इससे दुनिया में ब्रिक्स की सामूहिक आवाज़ और मज़बूत होगी."

दक्षिण अफ़्रीका की विदेश मंत्री नलेदी पेंडोर ने इसी महीने कहा था कि ब्रिक्स के संभावित विस्तार को पश्चिम विरोधी क़दम के तौर पर देखना 'बहुत ग़लत' है.

साल 2010 में दक्षिण अफ़्रीका इस संगठन में शामिल होने वाला आख़िरी देश था. अब अर्जेंटीना, सऊदी अरब और इंडोनेशिया ब्रिक्स संगठन में शामिल होने के लिए इच्छुक हैं.

कथित युद्ध अपराधों के आरोपों को लेकर अंतरराष्ट्रीय वॉरंट जारी होने की वजह रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस बैठक में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए हिस्सा लेंगे. वहीं, चीन के राष्ट्रपति खुद इस बैठक के लिए सोमवार को दक्षिण अफ़्रीका पहुँचेंगे.

भारत को इस बात का डर?

ऐसा कहा जा रहा है कि भारत ब्रिक्स के सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने के ख़िलाफ़ है.

इसके पीछे ये वजह बताई जा रही है कि भारत ये नहीं चाहता कि ब्रिक्स चीन केंद्रित गुट में बदल जाए और इसकी पहचान एक अमेरिका विरोधी संगठन के तौर पर हो.

हालांकि, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने इस तरह की सभी ख़बरों को निराधार बताते हुए खारिज किया.

उन्होंने कहा, "हमने इस कुछ निराधार कयासबाज़ी देखी हैं कि भारत को विस्तार (ब्रिक्स के) से दिक़्क़त है. ये सच नहीं है."

"हमने विस्तार पर भारत की स्थिति को लेकर बात की है और हमने पहले भी अपना रुख स्पष्ट किया है. जैसा कि बीते साल सदस्य देशों के नेताओं ने कहा था, ब्रिक्स सदस्य पूरी तरह से परामर्श करने और सर्वसम्मित से ब्रिक्स विस्तार की प्रक्रिया के लिए मार्गदर्शन सिद्धांतों, मानकों, मानदंडों पर आंतरिक रूप से चर्चा कर रहे हैं."

बागची ने कहा, "हमारा मानना है कि विस्तार इस संगठन के विकास और मज़बूती देने में ही काम आएगा."

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