मालदीव में मोहम्मद मुइज़्ज़ू के ख़िलाफ़ तीन महीने में ही महाभियोग, क्या भारत है वजह

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मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू की मुश्किलें बढ़ती नज़र आ रही हैं.
मुइज़्ज़ू सरकार के ख़िलाफ़ देश का मुख्य विपक्षी दल 'मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी' यानी एमडीपी महाभियोग लाने की तैयारी में है.
एमडीपी के संसदीय दल के उपनेता अंधुन हुसैन ने द हिंदू अख़बार से कहा कि संख्या बल उनके पक्ष में है.
28 जनवरी को देश की संसद में विपक्षी दल मुइज़्ज़ू कैबिनेट में चार नए सदस्यों को शामिल किए जाने का विरोध कर रहे थे.
ये विरोध इतना बढ़ा कि सत्ता और विपक्ष के सांसदों के बीच हाथापाई तक हुई.
मुइज़्ज़ू के ख़िलाफ़ महाभियोग लाने का वक़्त कई मायनों में अहम है. मालदीव और भारत के बीच बीता कुछ वक़्त तनाव भरा रहा है. मोहम्मद मुइज़्ज़ू के हाथ में मालदीव की कमान आने के बाद से भारत से दूरी बढ़ी है.
भारत को लेकर मोहम्मद मुइज़्ज़ू सरकार के रवैये की आलोचना मालदीव के विपक्षी दल भी करते रहे हैं.
मोहम्मद मुइज़्ज़ू 'इंडिया आउट' नारे के चुनावी अभियान के साथ राष्ट्रपति चुनाव जीते थे. कुछ दिन पहले ही मालदीव सरकार ने भारतीय सैनिकों को 15 मार्च तक देश छोड़ने की डेडलाइन दी थी.
वहीं भारत में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लक्ष्यद्वीप जाने के बाद सोशल मीडिया पर बायकॉट लक्षद्वीप कैंपेन चला था.

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महाभियोग लाने के कारण
मोहम्मद मुइज़्ज़ू के राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के तीन महीने के भीतर महाभियोग प्रस्ताव लाने की मुख्य तौर पर दो वजहें देखी जा रही हैं.
एमडीपी के संसदीय दल के उपनेता हुसैन ने द हिंदू से कहा, ''राष्ट्रपति हिंद महासागर क्षेत्र को अपनी नीतियों के कारण ख़तरे में डाल रहे हैं. वो सेना की मदद और पैसे का इस्तेमाल कर देश की संसद को सही से चलने नहीं दे रहे हैं.''
80 सदस्यों वाली मालदीव की पीपल्स मजलिस यानी संसद में एमडीपी के पास 42 सीटें हैं.
एमडीपी को 13 सीटों वाले डेमोक्रेट्स भी समर्थन दे रहे हैं.
ये मिलन ऐसे दो नेताओं के दलों के बीच हो रहा है, जो एक-दूसरे के राजनीतिक विरोधी हैं.
मगर दो विरोधी एक लक्ष्य को पाने के लिए साथ हो गए हैं. ये लक्ष्य है मोहम्मद मुइज़्ज़ू के ख़िलाफ़ महाभियोग.
एमडीपी और डेमोक्रेट्स ने एक साझा बयान जारी कर मालदीव के सबसे पुराने सहयोगी को अलग-थलग करने को लेकर मोहम्मद मुइज़्ज़ू की आलोचना की.
इन दलों का इशारा भारत की ओर था. अतीत में जब इन दलों की मालदीव में सरकार थी तो ये 'इंडिया फर्स्ट' नीति को अपनाते थे.
मुइज़्ज़ू को चीन परस्त माना जाता है. हालांकि मुइज़्ज़ू इंडिया फर्स्ट, चीन फर्स्ट की बजाय मालदीव फर्स्ट की बात कहते रहे हैं.

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मालदीव का विपक्ष भारत के साथ
इस साल की शुरुआत में जब मुइज़्ज़ू सरकार में मंत्रियों ने पीएम मोदी की लक्षद्वीप की तस्वीरों पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, तब भी मालदीव के विपक्षी नेताओं ने भारत का साथ दिया था.
इन नेताओं ने तब कहा था कि आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले मंत्रियों को सस्पेंड करना काफ़ी नहीं होगा. सरकार को भारत से औपचारिक तौर पर माफ़ी मांगनी चाहिए.
इस बीच एमडीपी के कम से कम 12 सांसद सत्तारूढ़ पीपल्स नेशनल कांग्रेस में शामिल हो गए हैं, जिससे विधायिका में इनकी संख्या बढ़ गई है.
अब 17 मार्च को संसदीय चुनाव होने हैं.
इस दिन मुइज़्ज़ू के लिए एक मुश्किल परीक्षा होगी. नीतियों को लागू करने के लिए क़ानून को पास करवाना होगा और इसके लिए संसद का समर्थन ज़रूरी होगा.
एमडीपी के संसदीय उपचुनाव तीन फरवरी को होने हैं.
हुसैन ने द हिंदू अखबार से कहा, ''महाभियोग कब पेश करना है, इसे लेकर हम चुनाव के बाद फ़ैसला करेंगे. हम भूगोल को नहीं बदल सकते. हम चीन को क़रीब नहीं ला सकते. भारत हमारा सबसे पड़ोसी देश, दोस्त, परिवार है. फिर चाहे दवा हो या ख़ाना. हम भारत के बिना नहीं कर सकते. हम शांति से इसलिए रह पाते हैं क्योंकि भारत पड़ोसियों को पहले रखने की नीति पर चलता है.''
मोहम्मद मुइज़्ज़ू चीन के प्रति नरम रुख़ बरतते दिखते हैं.
मुइज़्ज़ू ने बतौर राष्ट्रपति अपना पहला आधिकारिक दौरा चीन का किया था. इससे पहले पारंपरिक तौर पर मालदीव में राष्ट्रपति सत्ता में आते ही पहले भारत के दौरे पर आते रहे हैं.

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भारत मालदीव विवाद की टाइमलाइन
- नवंबर 2023 में मालदीव में मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने राष्ट्रपति चुनाव जीतकर सरकार बनाई
- मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने कामकाज के पहले दिन भारतीय सैनिकों को लौटाने की बात भारत से कही
- नवंबर के आख़िर में मोहम्मद मुइज़्ज़ू तुर्की और सऊदी अरब के दौरे पर गए
- एक दिसंबर 2023 को दुबई में मुइज़्ज़ू ने पीएम मोदी से मुलाक़ात की
- जनवरी 2024 की पहले हफ्ते में पीएम मोदी लक्षद्वीप के दौरे पर गए, मुइज़्ज़ू के मंत्रियों ने पीएम मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी की
- भारतीय कंपनियों और सोशल मीडिया पर मालदीव के बॉयकॉट की मांग उठी
- मुइज़्ज़ू सरकार ने मंत्रियों को सस्पेंड किया, विपक्षी दल बोले- इतना काफी नहीं
- आठ जनवरी मोहम्मद मुइज़्ज़ू चीन के दौरे पर निकले, लौटकर बोले- हम छोटे देश हैं तो किसी को धौंस दिखाने का हक़ नहीं
- 14 जनवरी को मालदीव ने भारत को दी डेडलाइन- 15 मार्च तक भारतीय सैनिक मालदीव छोड़ें
- 28 जनवरी को मालदीव की संसद में मोहम्मद मुइज़्ज़ू समर्थक सांसदों और विपक्षी सांसदों की हाथापाई

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मालदीव की संसद में हंगामा क्यों हो रहा है?
मालदीव में प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव और पीपल्स नेशनल कांग्रेस यानी पीपीएम और पीएनसी में गठबंधन है. इसी गठबंधन की सरकार है.
ये गठबंधन कैबिनेट में चार नए सदस्यों को लाना चाहता है. मगर विपक्षी दल ऐसा नहीं चाहते.
मालदीव के मुख्य विपक्षी दल मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी यानी एमडीपी ने कैबिनेट पर मतदान से पहले मंत्रिमंडल के चार सदस्यों की संसदीय मंज़ूरी रोकने का फ़ैसला किया.
जिन चार सदस्यों को मंज़ूरी दिए जाने का विरोध हुआ, वो हैं-
- अटॉर्नी जनरल अहमद उशम
- हाउसिंग, लैंड एंड अर्बन डेवलपमेंट मंत्री डॉ अली हैदर
- इस्लामिक मामलों के मंत्री मोहम्मद शहीम अली सईद
- आर्थिक, व्यापार विकास मामलों के मंत्री मोहम्मद सईद
हालांकि जब वोटिंग हुई तो मोहम्मद सईद के पक्ष में 37 वोट डाले गए. संसद की मंज़ूरी के लिए 35 वोट की ज़रूरत होती है.
जनरल अहमद उशम के पक्ष में 24 और विरोध में 44 वोट पड़े.
डॉ अली हैदर के पक्ष में 23 और विरोध में 46 वोट डाले गए.
शहीम के पक्ष में 30 और विरोध में 31 वोट डाले गए. मालदीव की संसद में जब हाथापाई हुई थी, तब शहीम के चोट लगी थी.
रक्षा मंत्री मोहम्मद घासैन और विदेश मंत्री मूसा ज़मीर को अज्ञात वोटों के ज़रिए मंज़ूरी मिली.
मोहम्मद मुइज़्ज़ू की कैबिनेट के 22 सदस्यों में से 19 को मंज़ूरी मिल चुकी है.

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अगर संसद की मंज़ूरी नहीं मिली तो क्या होगा?
मालदीव के मीडिया संस्थान द एडिशन की रिपोर्ट के मुताबिक़, देश के संविधान में आर्टिकल 129 में इस बात का ज़िक्र है कि कैबिनेट को नियुक्त किए जाने के सात दिनों के भीतर संसद के पास मंज़ूरी के लिए भेजना होता है.
हालांकि संविधान और किसी क़ानून में इस बात का ज़िक्र नहीं मिलता है कि मंज़ूरी नहीं मिली तो फिर क्या होगा.
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में कहा था कि अगर संसद की मंज़ूरी किसी मंत्री को नहीं मिलती है तो उन्हें पद से नहीं हटाया जा सकता.
कोर्ट ने कहा था कि ऐसे किसी मंत्री को पद से सिर्फ़ तब हटाया जा सकता है, तब राष्ट्रपति इस बारे में फ़ैसला करे या फिर वो ख़ुद अपना इस्तीफ़ा सौंप दे.
पीपुल्स नेशनल कांग्रेस के प्रमुख और राष्ट्रपति के विशेष सलाहकार अब्दुल रहीम अब्दुल्ला ने कहा था कि अगर किसी मंत्री को संसद की मंज़ूरी नहीं मिलती है तो ये क़ानूनी बाध्यता नहीं है कि उस व्यक्ति को दोबारा पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता.
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