आईआईटी खड़गपुर में प्रशासन और प्रोफ़ेसर आमने-सामने क्यों आ गए?

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- Author, अंशुल सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर में प्रशासन और प्रोफ़ेसर आमने-सामने आ गए हैं.
संस्थान के कुछ प्रोफ़ेसरों ने आईआईटी खड़गपुर के निदेशक प्रोफेसर वीरेंद्र कुमार तिवारी पर 'परिवारवाद' करते हुए मनमाने ढंग से नियुक्तियां करने समेत कई आरोप लगाए हैं.
प्रशासन और प्रोफ़ेसरों के बीच मतभेद और गहरा गया जब मामले में संस्थान के 80 से ज्यादा फैकल्टी मेंबर्स को नोटिस थमाया गया.
संस्थान की तरफ से तीन विभागाध्यक्षों को हटाने का आदेश जारी किया गया है, जिन्होंने एक सामूहिक याचिका पर हस्ताक्षर किए थे.
बीबीसी ने मामले पर संस्थान का पक्ष जानने के लिए निदेशक वीरेंद्र कुमार तिवारी से संपर्क किया है, लेकिन उनकी तरफ से अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है.

क्या है पूरा मामला?
मामले की शुरुआत इस साल के सितंबर महीने में हुई थी.
तब आईआईटी टीचर्स एसोसिएशन (आईआईटीटीए) ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पत्र लिखा था. इस पत्र में पांच प्रमुख आरोप लगाए गए थे.
- पिछले पांच सालों में संस्थान के अहम पदों पर भर्तियों में भाई-भतीजावाद (नेपोटिज्म).
- चयन में शैक्षणिक योगदान के आधार पर शॉर्ट-लिस्टिंग और मूल्यांकन मानदंड के नियम को नियमित रूप से नज़रअंदाज़ करना.
- मल्टी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल शुरू करने और कैंपस का विस्तार करने में असफलता.
- फैकल्टी को किए गए अतिरिक्त भुगतान की गैर-कानूनी वसूली.
- परिसर और पड़ोस में रहने वाले लोगों के बीच सौहार्द को बिगाड़ना.
इस पत्र में यह भी दावा किया गया कि डीन, विभागाध्यक्ष और विभिन्न समितियों के अध्यक्ष जैसे प्रमुख प्रशासनिक पदों का चयन संस्थान के सभी नियमों की अवहेलना करते हुए मनमाने ढंग से किया गया है.
वीके तिवारी का कार्यकाल जनवरी 2025 में खत्म हो रहा है. प्रोफेसरों की मांग थी कि इसके बाद एक नया निदेशक नियुक्त किया जाए.
इस पत्र पर कुल चार लोगों के हस्ताक्षर थे. इनके नाम हैं- आईआईटीटीए अध्यक्ष अमिताभ भट्टाचार्य, महासचिव अमाल दास, उपाध्यक्ष पार्थ प्रतिम बंदोपाध्याय और कोषाध्यक्ष ऋतोब्रत गोस्वामी.

12 नवंबर को इस मामले में संस्थान ने चारों पदाधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया. इस नोटिस में आरोपों पर सबूत के साथ लिखित स्पष्टीकरण की मांग की गई थी.
साथ ही संस्थान ने सात दिन के भीतर जवाब दाखिल करने के लिए कहा था. इसमें कहा गया था संतोषजनक जवाब और तय सीमा के भीतर जवाब न देने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है.
नाम न छापने की शर्त पर आईआईटी खड़गपुर से जुड़े रहे एक सीनियर प्रोफ़ेसर ने बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से बातचीत की.
उन्होंने बताया, "आईआईटी खड़गपुर टीचर्स एसोसिएशन ने संस्थान में घोर भाई-भतीजावाद जैसी अपनी चिंताओं को बताते हुए निदेशक को कई बार पत्र लिखे. पिछले करीब पांच सालों में प्रशासन एक बार भी बातचीत के लिए भी तैयार नहीं हुआ."
"अंत में टीचर्स एसोसिएशन ने हमारे सम्मानित शिक्षा मंत्री को अपनी चिंताएं बताते हुए एक पत्र लिखा और इसे तुरंत मंत्री के कार्यालय ने स्वीकार कर लिया, क्योंकि हमारे मंत्री एक बहुत ही निष्पक्ष व्यक्ति हैं."
"लेकिन, निदेशक को यह पसंद नहीं आया और उन्होंने अकादमिक समुदाय की आवाज़ को दबाने के लिए हर तरह के उपाय शुरू कर दिए."
बीबीसी ने इन आरोपों पर संस्थान का पक्ष जानने के लिए निदेशक वीके तिवारी को कई बार फ़ोन किया और दो बार ईमेल भी किया है.
रिपोर्ट प्रकाशित किए जाने तक उनका जवाब नहीं आया है. जैसे ही उनका जवाब आएगा उसे रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा.

80 से ज़्यादा फ़ैकल्टी मेंबर्स को नोटिस
टीचर्स एसोसिएशन के मुताबिक़, संस्थान से नोटिस मिलने के बाद 14 नवंबर को उनकी मीटिंग हुई.
मीटिंग में तय हुआ कि संस्थान को कारण बताओ नोटिस की तारीख़ को बढ़ाकर 26 दिसंबर तक करनी चाहिए.
एसोसिएशन का कहना था कि अभी छात्रों का परिणाम तैयार किया जा रहा है और पीएचडी के इंटरव्यू भी चल रहे हैं. ऐसे में नोटिस का जवाब देने में ये प्रक्रियाएं बाधित होंगी.
नोटिस मिलने के दो हफ़्ते से अधिक समय के बाद 28 नवंबर को टीचर्स एसोसिएशन के अधिकारियों ने एक सामूहिक याचिका लिखी, जिसमें चार पदाधिकारियों को जो कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, उसे वापस लेने की मांग की गई.
इस पर संस्थान के 80 से ज़्यादा फ़ैकल्टी मेंबर्स और आईआईटीटीए के सदस्यों ने हस्ताक्षर किए थे.
29 नवंबर को आईआईटी ने इस सामूहिक याचिका पर हस्ताक्षर करने वाले फै़कल्टी मेंबर्स को कारण बताओ नोटिस जारी किया.
नोटिस में लिखा गया, "आपके इस काम ने संस्थान के आचरण नियमावली का उल्लंघन किया है."
"कोई भी कर्मचारी किसी भी शिकायत या किसी अन्य मामले के निवारण के लिए अधिकारियों को संबोधित किसी भी संयुक्त प्रतिनिधित्व पर हस्ताक्षर नहीं करेगा".
"इस चीज़ को ध्यान में रखते हुए आपको इस नोटिस के मिलने के सात दिनों के भीतर यह बताने की ज़रूरत है कि आपके ख़िलाफ़ कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए."

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तीन विभागाध्यक्षों को हटाया
मामले में अब तीन विभागाध्यक्षों को उनके पद से हटा दिया गया. ये तीन विभागाध्यक्ष हैं- अद्रितजी गोस्वामी, निलॉय गांगुली और निहार रंजन जना.
बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने प्रोफे़सर निलॉय गांगुली से बात की, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विभाग के अध्यक्ष थे.
प्रोफ़ेसर गांगुली ने सलमान रावी को बताया, "आचरण के नियम मुझे मीडिया में अपनी राय व्यक्त करने की अनुमति नहीं देते हैं. मैं दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य हूं."
बुधवार को टीचर्स एसोसिएशन के बैनर तले लगभग 100 फै़कल्टी मेंबर्स ने कैंपस में मार्च निकालकर विभागाध्यक्षों को हटाने वाले फ़ैसले की निंदा की है.
ताज़ा बयान में आईआईटी खड़गपुर प्रशासन ने कहा है,"पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले 85 सदस्यों में से कई फ़ैकल्टी मेंबर पहले ही प्रबंधन को अपना माफ़ीनामा भेज चुके हैं. वे अपने रुख़ से पीछे हट गये हैं."
"कुछ फ़ैकल्टी मेंबर इस बारे में आईआईटी खड़गपुर प्रशासन के संपर्क में हैं."
आईआईटी प्रशासन का दावा है कि कई फै़कल्टी मेंबर्स को पत्र की सामग्री और आचरण के नियमों के बारे में जानकारी नहीं थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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