आईआईटी में लड़कियों की संख्या कम क्यों

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- देश की आबादी में महिलाओं की भागीदारी 48.5 फ़ीसदी है.
- बारहवीं पास करने वाली लड़कियां तकरीबन 45 फ़ीसदी के आसपास रहती है.
- देश के अलग-अलग कॉलेजों में इंजीनियरिंग करने वाली लड़कियां 28 फ़ीसदी हैं.
- लेकिन आईआईटी से बीटेक करने वाली लड़कियां केवल 8-10 फ़ीसदी ही होती हैं.
20 जुलाई को देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आईआईटी खड़गपुर में एक समारोह में शिरकत करते हुए कहा, "एक बात मेरे लिए अब तक पहेली बनी हुई है. बारहवीं में लड़कियां लड़कों से बेहतर प्रदर्शन करती हैं, लेकिन आईआईटी में उनकी संख्या चिंताजनक रूप से कम है. हमें इस बारे में कुछ करना चाहिए."
ऊपर जो आंकड़े दिए गए हैं वो राष्ट्रपति कोविंद के मन की पहेली को साफ़ कर देते हैं. आख़िर आईआईटी में लड़कियां इतनी कम क्यों हैं? राष्ट्रपति की इस पहेली को सुलझाने की कोशिश करते हैं.
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आंकड़े क्या कहते हैं?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ 2017 में देश के 23 आईआईटी में कुल 10,878 छात्रों ने अंडर ग्रेजुएट कोर्स में दाखिला लिया, जिनमें केवल 995 लड़कियां थी.
इन लड़कियों में से आईआईटी मद्रास में पढ़ने वाली नित्या सेतुगणपति भी एक हैं. उन्होंने केमिकल इंजीनियरिंग ब्रांच चुनी है.
नित्या ने बीबीसी को बताया, "वैसे तो मेरे घर पर मेरे इंजीनियर बनने को लेकर कभी दो राय नहीं थी. सबने मेरे फ़ैसले का हमेशा समर्थन किया. लेकिन जब मैंने काउंसिलिंग के बाद केमिकल इंजीनियरिंग ब्रांच चुनी तो मेरी मां ने इस पर आपत्ति जताई."
नित्या कहती हैं, "मेरी मां का कहना था कि लड़कियों के लिए ये ब्रांच नहीं है. मुझे आईटी या कंप्यूटर साइंस जैसी कोई ब्रांच लेनी चाहिए थी."
नित्या ने अपने टीचर और दूसरे सीनियर छात्रों (जिसमें लड़कियां भी थीं) के साथ अपनी मम्मी की बात करवाई, तब जा कर वो उनकी च्वाइस की ब्रांच पर सहमत हुईं. यही बात सबसे अहम है.


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आईआईटी में कम लड़कियां क्यों?
ये सवाल केंद्र सरकार के लिए भी चिंता का विषय बना हुआ है. इसी के अध्यन के लिए केंद्र सरकार ने आईआईटी मंडी के डायरेक्टर प्रोफेसर तिमोथी ए गोंज़ालविस की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था. इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट भी मानव संसाधन मंत्रालय को सौंप दी है.
रिपोर्ट पर बीबीसी से बात करते हुए आईआईटी मंडी क डॉयरेक्टर प्रोफेसर गोंजालविस ने कहा, "आईआईटी में लड़कियों के कम आने के पीछे दो अहम वजहें हैं. पहला है लड़कियों को लेकर समाज में मौजूद पूर्वाग्रह और दूसरा है रोल मॉडल की कमी."
श्रेया आईआईटी गांधीनगर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही हैं. उनकी क्लास में 170 लड़कों में केवल 15 ही लड़कियां है. उनसे जब इस बारे में बीबीसी ने पूछा तो उनका भी जवाब मिलता जुलता था.
श्रेया ने कोटा से इंजीनियरिंग की कोचिंग ली, यहां भी उनके साथ कोचिंग में बहुत कम लड़कियां थीं. वो बताती हैं कि उनके कई दोस्तों के मम्मी-पापा ने इंजीनियरिंग में रुचि होने के बावजूद कोचिंग करने के लिए उन्हें बाहर नहीं भेजा.

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यही बात प्रोफेसर गोंज़ालविस ने भी अपनी रिपोर्ट में कही है. उन्होंने रिपोर्ट में लिखा है कि पहले तो लड़कियों को कोचिंग लेने की इजाज़त नहीं मिलती. कभी मिल भी जाती है तो काउंसिलिंग में दिक्कत आती है. घरवाले चाहते हैं कि घर के पास के आईआईटी में मन मुताबिक़ ब्रांच मिल जाए, लेकिन अक़्सर ऐसा हो नहीं पाता.
आईआईटी में लड़कियों की कम संख्या पर राज्यसभा में भी बहस हो चुकी है. जवाब में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की तरफ से कहा गया कि 2015 में 26.73 फ़ीसदी लड़कियों ने जेईई मेन्स की परीक्षा पास की और 17 फ़ीसदी ने जेईई अडवांस पास किया. लेकिन अंत में दाखिला लेने वालों की संख्या की मात्र 8.8 फ़ीसदी थी.
इससे यह साबित होता है कि लड़कियां आईआईटी में दाखिले के लिए फॉर्म भरती हैं, कई बार चुनी भी जाती हैं लेकिन मन मुताबिक ब्रांच न मिलने की वजह से पास होने पर भी लड़कियां आईआईटी में दाखिला नहीं ले पाती हैं.


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समाधान क्या है?
आईआईटी मंडी की रिपोर्ट में इस समस्या के समाधान पर भी बात की गई है.
रिपोर्ट में समाधान के तौर पर लड़कियों के लिए सीट बढ़ाने की बात कही गई है ताकि 2020 तक आईआईटी में लड़कियों का आंकड़ा 20 फ़ीसदी से ऊपर पहुंच सके. इसलिए इस साल देश के कुल 23 आईआईटी मिला कर 800 सीटें बढ़ाई गई हैं.
इसका उद्देश्य बस इतना है कि लड़कों की सीट को कम न करते हुए लड़कियों की संख्या आईआईटी में बढ़ाई जा सके.

आईआईटी काउंसिल ने ये फ़ैसला 2018-19 के सत्र के लिए किया है. इसका नतीजा है कि इस साल आईआईटी में पहुंचने वाली लड़कियों की संख्या 15 फ़ीसदी के पास पहुंच गई हैं. ये पिछले पांच सालों में सबसे ज़्यादा है.
दूसरे समाधान के तरीकों में रिपोर्ट में कहा गया है कि आईआईटी रोल मॉडल तैयार करें, छात्राओं के लिए अलग स्कीम निकाले जिससे उन्हें प्रोत्साहन मिले, छात्रवृति देना और ट्यूशन फीस में छूट की बात भी इसमें कही गई है.
आईआईटी मंडी ने इस पर काम भी शुरू कर दिया है और नतीजे सकारात्मक सामने आ रहे हैं.
रिपोर्ट में भविष्य में ऐसी योजनाओं पर काम करने को कहा गया है जिससे कि आठवीं कक्षा से छात्राओं को आईआईटी की परीक्षा की तैयारी कराई जा सके.


विदेशों में क्या है आंकड़े?
ऐसा नहीं कि भारत में इंजीनियरिंग पढ़ने वाली लड़कियों की कमी है. 2016 में 3 लाख लड़कियों ने बीटेक के अलग-अलग ब्रांच में एडमिशन लिया, लेकिन आईआईटी में ये आंकड़ा कम हो जाता है.
इसलिए ये कहना कि लड़कियों का दिमाग़ इंजीनियरिंग जैसे विषयों में कम चलता है, यह ग़लत धारणा है.
अमरीका की (एमआईटी) के 2016 के आंकड़े बताते हैं कि उनके यहां इंजीनियरिंग में अंडरग्रेजुएट में दाखिला लेने वालों में 50 फीसदी लड़कियां शामिल थीं.
अमरीका के ही शीर्ष संस्थानों में से एक कारनगी में भी 2016 में इंजीनियरिंग में अंडरग्रेजुएट में दाखिला लेने वालों की संख्या 50 फीसदी लड़कियां थीं.
आईआईटी में सरकार ने जो मिशन बेटी पढ़ाओ शुरू किया है अब इससे ही उम्मीद बढ़ी है. लक्ष्य 2020 तक आईआईटी में 20 फीसदी लड़कियों के दाखिले का है.
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