टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ में पीएचडी स्कॉलर को क्यों किया गया निलंबित

रामदास

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    • Author, भाग्यश्री राऊत
    • पदनाम, बीबीसी मराठी के लिए

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ ने पीएचडी छात्र रामदास प्रिंसी शिवानंदन को दो साल के लिए निलंबित कर दिया है.

उन पर संस्थान में बार-बार दुर्व्यवहार और देशविरोधी क्रिया-कलापों में शामिल होने का आरोप लगाया गया है. इसके साथ ही उनके संस्थान-परिसर में प्रवेश पर भी पाबंदी लगाई गई है.

निलंबित छात्र रामदास ने 'बीबीसी मराठी' से कहा, "संविधान ने छात्र संगठनों के साथ काम करने और छात्रों के अधिकारों के लिए संस्थान का विरोध करने का अधिकार दिया है. देश के नागरिक के रूप में, मुझे भाजपा सरकार की नीतियों का विरोध करने का पूरा अधिकार है. बिना सोचे समझे मुझे केवल बीजेपी की आलोचना करने के लिए निलंबित कर दिया गया है."

हालांकि अहम सवाल यह है कि टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ ने अपने इस छात्र को निलंबित क्यों किया है?

संस्थान के छात्र संगठनों का आरोप है कि बीजेपी सरकार के ख़िलाफ़ स्टैंड लेने के कारण रामदास को गैरक़ानूनी तरीक़े से निलंबित किया गया है.

छात्र संगठनों के मुताबिक़ 'राम के नाम' डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग और राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा की आलोचना करने के चलते रामदास पर कार्रवाई की गई है.

संस्थान ने किस आधार पर कार्रवाई की?

संस्थान की ओर से जारी निलंबन आदेश

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टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ ने सात मार्च 2024 को रामदास को कारण बताओ नोटिस जारी किया था. संस्थान ने रामदास के कुछ आंदोलनों को राष्ट्र-विरोधी क्रिया-कलाप माना था.

इस नोटिस में कहा गया था, ''रामदास ने 12 जनवरी 2024 को नई दिल्ली में संसद के बाहर प्रोग्रेसिव स्टूडेंट फोरम और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के संयुक्त बैनर तले विरोध प्रदर्शन किया था. संस्थान के मुताबिक यह संस्थान के नाम का दुरुपयोग जैसा मामला था, ये भी कहा गया कि प्रोग्रेसिव स्टूडेंट फोरम का इंस्टीट्यूट से कोई लेना-देना नहीं है."

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एपिसोड

समाप्त

रामदास ने 24 जनवरी 2024 को चर्चित डॉक्यूमेंट्री 'राम के नाम' की स्क्रीनिंग को लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था. संंस्थान ने उनकी पोस्ट को अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा आयोजन की आलोचना के तौर पर देखा.

इतना ही नहीं रामदास ने 28 जनवरी, 2023 को संस्थान परिसर में देश में प्रतिबंधित बीबीसी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग भी की थी.

बीबीसी ने दो एपिसोड की एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी. उसका नाम है- इंडिया: द मोदी क्वेश्चन. इसका पहला एपिसोड 17 जनवरी, 2023 को ब्रिटेन में प्रसारित हुआ था. दूसरा एपिसोड 24 जनवरी, 2024 को प्रसारित हुआ.

पहले एपिसोड में नरेंद्र मोदी के शुरुआती राजनीतिक करियर को दिखाया गया था, जिसमें वे भारतीय जनता पार्टी में आगे बढ़ते हुए, गुजरात के मुख्यमंत्री के पद पर पहुंचते हैं.

ये डॉक्यूमेंट्री एक अप्रकाशित रिपोर्ट पर आधारित थी, जिसे बीबीसी ने ब्रिटिश फ़ॉरेन ऑफ़िस से हासिल किया है. इस डॉक्यूमेंट्री में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात में 2002 में हुए दंगे में कम से कम 2000 लोगों की मौत पर सवाल उठाए गए थे.

संस्थान के मुताबिक भगत सिंह मेमोरियल लेक्चर के लिए विवादास्पद वक्ताओं को आमंत्रित करने और और संस्थान के निदेशक के घर के बाहर नारे लगाने जैसी शिकायतों के लिए उन्हें पहले भी बार-बार लिखित नोटिस दिया जा चुका था.

संस्थान ने नोटिस का जवाब नहीं देने पर उन पर कार्रवाई की बात भी कही थी. हालांकि रामदास पर कार्रवाई के बाद संस्थान की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी है.

रामदास ने 27 अप्रैल, 2023 को इनमें से एक नोटिस का जवाब दिया और स्वीकार किया कि इन सब गतिविधियों में वे शामिल थे. लेकिन, संस्थान का कहना है कि उनका स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं था.

संस्थान की ओर से कहा गया है कि रामदास की गतिविधियों से संस्थान की बदनामी हो रही है. उन्हें अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए. 14 जून 2023 को संस्थान ने आदेश जारी किया कि किसी भी मीडिया प्लेटफ़ॉर्म में रामदास अपने विचारों को संस्थान के विचार के रूप में प्रस्तुत न करें.

प्रोग्रेसिव स्टूडेंट फोरम ने संस्थान पर क्या आरोप लगाया?

रामदास को दिया गया नोटिस

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प्रोग्रेसिव स्टूडेंट फोरम ने संस्थान की कार्रवाई को मौजूदा सरकार के ख़िलाफ़ छात्रों की आवाज़ को दबाने की कोशिश कहा है.

फोरम ने कहा है कि आनंद पटवर्धन की डॉक्यूमेंट्री 'राम के नाम' ने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता और इसे संस्थान के परिसर में कई बार आधिकारिक तौर पर रिलीज़ किया गया है. यह डॉक्यूमेंट्री यूट्यूब पर भी है और दूरदर्शन पर भी प्रसारित हो चुकी है, लिहाज़ा इसकी स्क्रीनिंग को इतना बड़ा मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है?

फ़ोरम ने बयान जारी कर आरोप लगाया है, "टाटा इंस्टीट्यूज़ ऑफ़ सोशल साइंसेज़ छात्रों की आवाज़ को दबाने की कोशिश कर रहा है कि सोशल मीडिया पर क्या साझा करें और क्या नहीं. यह कार्रवाई दलित छात्रों के शिक्षा के अधिकार पर हमला है."

प्रोग्रेसिव स्टूडेंट फोरम ने रामदास के निलंबन के ख़िलाफ़ सभी छात्र संगठनों से सड़कों पर उतरने की अपील की है.

क्या कहते हैं छात्र संगठन?

रामदास

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छात्र संगठनों ने रामदास के खिलाफ की गई कार्रवाई की निंदा की है. स्टूडेंट फोरम ऑफ इंडिया ने भी कहा है कि यह कार्रवाई राजनीति से प्रेरित है.

एसएफआई महाराष्ट्र राज्य समिति ने रामदास के निलंबन को वापस लेने की मांग करते हुए कहा, "यह कार्रवाई जानबूझकर एक दलित शोधार्थी को निशाना बनाकर की गई थी. छात्र अधिकारों की मांग करना या सत्तारूढ़ भाजपा के बारे में सवाल उठाना राष्ट्र विरोधी कार्य नहीं है."

रामदास इसी संस्था के महाराष्ट्र संयुक्त सचिव हैं.

रामदास ने बीजेपी सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के ख़िलाफ़ दिल्ली में विरोध प्रदर्शन किया था. वहां 16 छात्र संघों के हजारों छात्र मौजूद थे.

दिल्ली पुलिस ने उन्हें जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए जगह दी थी. इस मौके पर रामदास ने उन सभी छात्रों को संबोधित भी किया. लेकिन, संस्थान ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हुए इस आंदोलन का भी ज़िक्र किया है.

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ ने रामदास को इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ अपील करने का 30 दिन का समय दिया है. रामदास जल्द ही संस्था को आवेदन देकर कार्रवाई वापस लेने का अनुरोध करेंगे. उनका मानना है कि कार्रवाई वापस ले ली जाएगी क्योंकि उन्होंने जो भी किया वो उनका संवैधानिक अधिकार है.

हालांकि रामदास ने यह भी कहा है कि अगर निलंबन वापस नहीं लिया गया तो वे इस मामले को कोर्ट में ले जाएंगे.

बीबीसी मराठी से रामदास ने कहा, ''मुझ पर भगत सिंह मेमोरियल लेक्चर के लिए विवादास्पद वक्ताओं को आमंत्रित करने का आरोप लगाया गया है. लेकिन, उनकी अनुमति के बिना संस्थान परिसर में किसी भी वक्ता को बुलाने की अनुमति नहीं है. मैं किसी भी वक्ता को उनकी अनुमति से ही आमंत्रित करता हूं. लेकिन, बीजेपी की राजनीतिक बदले की भावना से ये कार्रवाई की गई है. एक सामाजिक विज्ञान का छात्र होने के नाते, मैं शिक्षा के अपने अधिकार को छीनने नहीं दूंगा."

रामदास कौन हैं?

रामदास प्रिंसी शिवानंदन मूल रूप से केरल के रहने वाले हैं. वे प्रोग्रेसिव स्टूडेंट फोरम के पूर्व महासचिव हैं. वर्तमान में वह स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की केंद्रीय कार्यकारी समिति के सदस्य हैं. वह यूनाइटेड स्टूडेंट्स ऑफ इंडिया के प्रतिनिधि भी हैं.

रामदास अपने परिवार में एकमात्र उच्च शिक्षित युवा हैं. उन्होंने पीएचडी के लिए मार्च 2022 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ में दाख़िला लिया था. 2020 में उन्होंने केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति का विरोध किया था.

उस वक्त देश के 16 छात्र संगठनों ने संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन किया था. इसमें 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति हटाओ, शिक्षा बचाओ' और 'भाजपा हटाओ, देश बचाओ' जैसे नारे दिए गए थे.

उस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के चार साल बाद रामदास पर कार्रवाई की गई है.

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