ट्रंप ने भारत, चीन समेत ब्रिक्स देशों को क्यों दी धमकी

डोनाल्ड ट्रंप

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अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को ब्रिक्स देशों को डॉलर का विकल्प तलाशने के बारे में कड़ी चेतावनी दी है.

ट्रंप ने डॉलर का विकल्प तलाशने की कोशिश कर रहे ब्रिक्स देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ़ (आयात शुल्क) लगाने की धमकी दी है.

ब्रिक्स में दुनिया की दो सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं चीन और भारत भी शामिल हैं.

ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान जो वादे किए थे उनमें से चीन के उत्पादों पर 60% तक भारी टैरिफ़ लगाना भी शामिल था. ट्रंप के इस एलान के बाद दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच ट्रेड वॉर तेज़ होने की आशंका जताई जाने लगी थी.

ट्रंप बीते कई सालों में अमेरिकी कंपनी हार्ले डेविडसन को लेकर भी भारत पर निशाना साध चुके हैं.

ब्रिक्स के प्रमुख सदस्य देशों में भारत और चीन दोनों ही शामिल हैं. ट्रंप पीएम नरेंद्र मोदी को कई बार अपना दोस्त बताते रहे हैं. मगर व्यापार से जुड़े मसलों पर ट्रंप भारत को घेरते भी रहे हैं.

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ट्रंप

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इमेज कैप्शन, अमेरिका को डॉलर के दबदबे में कमी आने का डर सता रहा है.

ट्रंप ने क्या कहा?

ट्रंप ने शनिवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स के अपने हैंडल पर लिखा, “डॉलर से दूर होने की ब्रिक्स देशों की कोशिश में हम मूकदर्शक बने रहें, यह दौर अब ख़त्म हो गया है."

"हमें इन देशों से प्रतिबद्धता की ज़रूरत है कि वे न तो कोई नई ब्रिक्स मुद्रा बनाएंगे, न ही ताक़तवर अमेरिकी डॉलर की जगह लेने के लिए किसी दूसरी मुद्रा का समर्थन करेंगे, वरना उन्हें 100 प्रतिशत टैरिफ़ का सामना करना पड़ेगा.”

उन्होंने लिखा, “अगर ब्रिक्स देश ऐसा करते हैं तो उन्हें शानदार अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अपने उत्पाद बेचने को विदा कहना होगा. वे किसी दूसरी जगह तलाश सकते हैं. इसकी कोई संभावना नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में ब्रिक्स अमेरिकी डॉलर की जगह ले पाएगा और ऐसा करने वाले किसी भी देश को अमेरिका को गुडबॉय कह देना चाहिए.”

बीते अक्तूबर में रूस के शहर कज़ान में ब्रिक्स की बैठक हुई थी और उस दौरान भी इस ब्लॉक की ओर से अपनी मुद्रा बनाने से जुड़े कयास लगाए जा रहे थे.

ब्रिक्स सम्मेलन

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इमेज कैप्शन, रूस के कज़ान में बीते अक्टूबर में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन हुआ था.

ब्रिक्स करेंसी की सुगबुगाहट

इस साल बिक्स शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता रूस के पास थी और इसमें ब्रिक्स करेंसी लाने को लेकर कोई फ़ैसला नहीं हुआ.

रूस ने ही 2022 में ब्रिक्स करेंसी लाने का विचार आगे बढ़ाया था, जिसका ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा ने समर्थन किया था.

कज़ान बैठक में ब्रिक्स की साझा करेंसी लाने पर कोई फ़ैसला तो नहीं हो पाया लेकिन इन देशों के बीच सीमा पार भुगतान के नए तंत्र बनाए जाने पर बात हुई, जो पश्चिमी भुगतान प्रणाली ‘स्विफ़्ट नेटवर्क’ के साथ काम करेगा.

ब्रिक्स देश आपस में अधिक से अधिक स्थानीय मुद्रा का इस्तेमाल करना चाहते हैं जिससे डॉलर के मुकाबले उनकी मुद्राओं के उतार चढ़ाव के ख़तरे को कम किया जा सके.

कज़ान सम्मेलन के दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा था, “द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल राजनीति मुक्त आर्थिक विकास में मददगार होगा.”

पुतिन

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इमेज कैप्शन, यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस पर पश्चिमी देशों ने कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं.

पुतिन ने ब्रिक्स सम्मेलन में क्या कहा था

कज़ान सम्मेलन के दौरान रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने कहा था, “वैश्विक वित्तीय तंत्र में डॉलर एक प्रमुख मुद्रा बना रहेगा और इसे राजनीतिक मक़सद हासिल करने के लिए इस्तेमाल करना इस मुद्रा में भरोसे को कम करता है और इसकी क्षमता को भी कम करता है.”

उन्होंने कहा था कि रूस डॉलर को छोड़ना या उसे हराना नहीं चाहता है बल्कि उसे डॉलर के साथ काम करने से रोका जा रहा है.

पुतिन बोले थे, “इसलिए हमें दूसरे विकल्प की ओर देखने पर मजबूर होना पड़ा.”

यूक्रेन पर हमले के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं.

ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और जापान सहित कई देशों ने रूस पर 16,500 से ज़्यादा प्रतिबंध लगाए हैं.

इन प्रतिबंधों के तहत रूस के विदेशी मुद्रा भंडार का करीब आधा हिस्सा फ्रीज कर दिया गया है, जो क़रीब 276 अरब डॉलर का है.

इसके अलावा यूरोपीय संघ ने रूसी बैंकों की करीब 70 प्रतिशत परिसंपत्तियां फ्रीज कर दी हैं और उन्हें स्विफ्ट बैंकिंग प्रणाली से भी बाहर कर दिया है.

अमेरिकी डॉलर

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इमेज कैप्शन, दुनिया में अधिकांश देश व्यापार डॉलर में ही करते हैं.

अगर ब्रिक्स करेंसी आई तो क्या डॉलर की जगह लेगी?

पूरी दुनिया में देश आपसी व्यापार में भुगतान के लिए डॉलर का इस्तेमाल करते हैं.

ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा और रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने डॉलर के दबदबे को कम करने के लिए ब्रिक्स करेंसी बनाए जाने का सुझाव दिया था.

हालांकि इस बारे में ब्रिक्स के 2023 सम्मेलन में कोई बातचीत नहीं हुई.

ट्रिनिटी कॉलेज डबलिन के प्रोफ़ेसर पैड्रेग कार्मोडी ने बीती जनवरी में बीबीसी से कहा था, “ब्रिक्स देशों के लिए एक साझी मुद्रा बनाना अव्यावहारिक होगा क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्थाएं बहुत अलग हैं.”

हालांकि उन्होंने कहा था कि यह संभव है कि वे भविष्य में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक भुगतानों के लिए कोई नई मुद्रा बनाने पर विचार करें या अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए क्रिप्टो करेंसी का विकल्प चुनें.

ट्रंप

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इमेज कैप्शन, ट्रंप ने अपने चुनावी अभियान में चीन पर भारी आयात शुल्क लगाने की चेतावनी दे चुके हैं.

अभी दुनिया में डॉलर की क्या हैसियत है

दुनियाभर में होने वाले व्यापारिक लेनदेन, अंतरराष्ट्रीय भुगतान, कर्ज़ और आयात निर्यात अमेरिकी डॉलर में होता है.

वॉशिंगटन के एक थिंकटैंक ब्रुकिंग्स के मुताबिक, वैश्विक मुद्रा भंडार के रूप में डॉलर का हिस्सा 59% है, जबकि दुनिया के कुल कर्ज़ में 64% का लेनदेन डॉलर में होता है.

अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में भी डॉलर की एक बड़ी हिस्सेदारी 58% प्रतिशत है.

यूरो बनने के बाद से डॉलर के दबदबे में थोड़ी कमी आई है लेकिन अभी भी यह दुनिया का सबसे अधिक चलन वाली मुद्रा बना हुआ है.

ब्रुकिंग्स के आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी भुगतानों में डॉलर का दबदबा क़ायम है और इसकी हिस्सेदारी 88% प्रतिशत है.

हालांकि पिछले ढाई दशक में डॉलर के दबदबे में कमी आई है.

वैश्विक रिज़र्व के रूप में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी में 12% की कमी आई है. साल 2000 में वैश्विक रिज़र्व में इसकी हिस्सेदारी 71% थी, जो 2024 में आते आते 59% हो गई.

ब्रिक्स

ब्रिक्स संगठन क्या है?

ब्रिक्स विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का एक आर्थिक संगठन है जिसमें शुरू में ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन थे और 2010 में इसमें साउथ अफ़्रीका भी शामिल हो गया.

इस आर्थिक अलायंस में हाल के वर्षों में कई विस्तार हुए हैं. इसी जाल जनवरी में ब्रिक्स में मिस्र, ईरान, इथोपिया और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) भी शामिल हो गए.

ब्रिक्स का गठन उत्तरी अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के अमीर देशों की राजनीतिक और आर्थिक शक्ति को चुनौती देने के लिए, दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण विकासशील देशों को एकजुट करने के मकसद से हुआ था.

सऊदी अरब ने भी इस समूह में शामिल होने की इच्छा ज़ाहिर की है जबकि अज़रबैजान और तुर्की ने ब्रिक्स में शामिल होने की अर्ज़ी दी है.

ब्रिक्स में शामिल होने के लिए क़रीब 30 अन्य देशों ने इच्छा ज़ाहिर की है.

ब्रिक्स देशों की कुल आबादी क़रीब 3.5 अरब यानी दुनिया की 45% है.

जबकि सदस्य देशों की कुल अर्थव्यवस्था 25.5 ट्रिलियन से अधिक है जो वैश्विक अर्थ्व्यवस्था का 28% है.

एस जयशंकर

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इमेज कैप्शन, भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर से जेनेवा में ब्रिक्स की ज़रूरत पर सवाल किए गए थे.

ब्रिक्स को लेकर जयशंकर ने क्या कहा?

ब्रिक्स के बढ़ते प्रभाव को लेकर पश्चिमी विकसित देश असहज हैं.

इसी साल 12 सितम्बर को स्विट्ज़रलैंड के जेनेवा में ग्लोबल सेंटर फॉर सिक्योरिटी पॉलिसी कार्यक्रम में शामिल हुए भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर से भी ब्रिक्स की ज़रूरत पर सवाल किए गए थे.

जवाब में जयशंकर ने कहा, “ब्रिक्स क्लब इसलिए बना क्योंकि पहले से मौजूद जी-7 क्लब में किसी को घुसने नहीं दिया था.”

उन्होंने कहा, “मैं ये समझ नहीं पाता हूं कि जब आप ब्रिक्स के बारे में बात करते हैं तो इतने असुरक्षित क्यों हो जाते हैं. जी-20 बना तो क्या जी-7 बंद हो गया? जी-20 के साथ जी-7 का भी अस्तित्व है. तो जी-20 के साथ ब्रिक्स भी क्यों नहीं रह सकता.”

उन्होंने कहा कि ब्रिक्स की ख़ासियत ये है कि बड़े देश अब वैश्विक अर्थव्यवस्था में ऊपर उठ रहे हैं.

हाल के सालों में ब्रिक्स ने न्यू डेवलपमेंट बैंक बनाया है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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