अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध से किसे ज़्यादा नुक़सान हो रहा है?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जो बाइडन को अमेरिका का राष्ट्रपति बने तीन महीने से अधिक हो गए हैं लेकिन चीन के साथ तीन साल से जारी 'ट्रेड वॉर' अब भी जारी है.
राष्ट्रपति बाइडन ने अब तक ये संकेत दिए हैं कि इस तकरार को समाप्त करने के लिए जनवरी 2020 में दोनों देशों के बीच पहले चरण का जो समझौता हुआ था उस पर दोबारा से नज़र डाली जा रही है.
इसके अलावा, इस बात की भी समीक्षा की जा रही है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के ख़िलाफ़ 355 अरब डॉलर के आयात पर जो शुल्क लगाया गया है उसमें कौन-सी चीज़ें हटाई जा सकती हैं और कितनी तेज़ी से.
इस ट्रेड वार ने भारत के लिए एक बड़ा अवसर पैदा किया था, चीन में जमी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और फ़ैक्ट्रियों को अपने यहाँ व्यपार और उद्यम लगाने का न्योता देने का. इसमें भारत विफल रहा.
क्यों? इसके अलावा, इस व्यापार युद्ध में जीत अमेरिका की हो रही है या चीन की?

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चीन-अमेरिका तकरार लगातार जारी
2018 में डोनाल्ड ट्रंप का चीनी माल पर शुल्क बढ़ाने का ख़ास उद्देश्य ये था कि द्विपक्षीय व्यापार में असंतुलन को कम किया जा सके. उस समय ये असंतुलन लगभग 350 अरब डॉलर तक का था.
आसान शब्दों में अमेरिका में चीन से बहुत अधिक सामान मँगा रहा है लेकिन चीन अमेरिका से उसकी तुलना में बहुत कम चीज़ें आयात कर रहा है.
इसके अलावा ट्रंप चाहते थे कि चीन अमेरिका की कंपनियों को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए मजबूर न करे. उन्हें लगा था कि उनकी इन कार्रवाईयों से चीन से ऑपरेट कर रहीं 70 हज़ार अमेरिकी कंपनियों में से कई चीन से स्वदेश लौटेंगी या फिर भारत जैसे देशों का रुख़ करेंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
कई साल पहले ज़ोर-शोर से 'मेक इन इंडिया' का नारा देने वाले भारत में चीन से पलायन करके वो कंपनियां क्यों नहीं आईं, जबकि भारत ने चीन में उत्पादन कर रहीं लगभग 250 कंपनियों से संपर्क भी किया था और भारत में आकर अपना कारोबार और कारखाना लगाने का न्योता भी दिया था.
अमेरिका के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री स्टीव एच हैंकी जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी में एप्लाइड इकोनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर हैं और राष्ट्रपति रेगन की अर्थशास्त्रियों की काउंसिल में एक सलाहकार के रूप में काम कर चुके हैं. भारत की अर्थव्यवस्था पर उनकी गहरी निगाह है.
बीबीसी हिंदी को दिए एक ईमेल इंटरव्यू में उन्होंने लिखा, "चीन और भारत के बीच तनाव को देखते हुए मुझे कोई आश्चर्य नहीं है कि चीनी कनेक्शन वाली चीन में स्थित कंपनियां भारत नहीं गई हैं, बल्कि वियतनाम जैसी जगहों को चुना है.".
दिल्ली में फ़ोर स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट में चीनी मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर फ़ैसल अहमद कहते हैं कि चीन में कुछ ही ऐसी अमेरिकी कंपनियां हैं जिन्होंने चीन से वियतनाम जैसे देशों में पलायन किया है. उनके अनुसार इन कंपनियों के भारत न आने की खास वजह ये है कि चीन की तरह भारत में सप्लाई और वैल्यू चेन की कमी है.
भारत और कुछ दूसरे देशों को लगा था कि 'चीन + 1' आइडिया के तहत कंपनियां अपनी फैक्ट्रियों को चीन के अलावा उनके देश में भी लगाएंगी, 'चीन+1' का मतलब ये हुआ कि चीन स्थित कंपनियां अपने व्यापार या उद्योग का एक हिस्सा किसी दूसरे देश में ले जाएँ और बड़ा हिस्सा चीन में ही रखें.

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डॉक्टर फ़ैसल अहमद कहते हैं, " चीन +1 की सफलता की प्रतीक्षा करने के बजाय भारत जैसे देशों को सप्लाई चेन और निवेशों को आकर्षित करने और ग्लोबल वैल्यू चेन में अपनी भागीदारी बढ़ाने के लिए अपनी खुद की उत्पादक क्षमताओं को विकसित करना होगा."
वो आगे कहते हैं, "सप्लाई चेन और मैन्युफ़ैक्चरिंग सुविधाएं बहुत कम संख्या में चीन से बाहर जा रही हैं और ट्रांसफ़र हो रही हैं, ये सुविधाएं वियतनाम, मलेशिया, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे देशों में जा रही हैं, और ये सभी देश चीन के साथ पहले से ही क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी यानी आरसीईपी का हिस्सा हैं. यही वजह है कि आरसीईपी भीतर चीन से किसी भी देश में सप्लाई चेन को शिफ्ट करने से चीन पर कोई शुल्क नहीं लगता है, न ही यह चीन+1 रणनीति की सफलता की माप है."
चीन में इस पर क्या सोच है? हुआंग यूंगसॉन्ग सिचुआन विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में प्रोफ़ेसर हैं. बीबीसी के ईमेल के सवालों के जवाब में चीन के चेंग्दू शहर से उन्होंने लिखा, "उत्पादन, आपूर्ति और वैल्यू चेन के मामले में भारत चीन की जगह लेना चाहे तो इसके लिए उसे कुछ संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है. चीन की औद्योगिक क्षमता और निवेश को टक्कर देने के लिए चीन-अमेरिका के बीच जारी व्यापार युद्ध काफ़ी नहीं है."
प्रोफ़ेसर हुआंग कहते हैं, "चीन ने अपने आपको औद्योगिक चेन में इतनी गहराई से जमा लिया है कि आसियान देशों में जाने वाले उद्योग अभी भी किसी न किसी तरीके से चीन के समर्थन पर निर्भर हैं, भारत को ट्रेड वार के अलावा अपनी समस्याओं का समाधान खुद ही ढूँढ़ना होगा."

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व्यापार युद्ध क्यों शुरू हुआ
दुनिया की सबसे बड़ी और दशकों से स्थापित शक्ति और एक तेज़ी से उभरती शक्ति आमने-सामने हों तो क्या होता है? 'टकराव', ऐसा विशेषज्ञ मानते हैं.
अमेरिका और चीन, दुनिया की दो सबसे बड़ी ताक़तों के बीच, कुछ ऐसा ही हो रहा है. इस टकराव ने तीन साल पहले पूरे पैमाने पर एक व्यापार युद्ध का रूप धारण कर लिया और ये व्यापार युद्ध जो बाइडन के राष्ट्रपति पद पर आने के तीन महीने से अधिक समय गुज़रने के बाद भी अब तक जारी है.
चीन से निर्यात किए जाने वाले कई सामानों पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जो शुल्क लगाए थे उन्हें अब तक नहीं हटाया गया है. शुल्क 355 अरब डॉलर के सामानों पर लगाए गए हैं. इससे अमेरिका के उपभोक्ताओं को 57 अरब डॉलर अधिक ख़र्च करने पड़ रहे हैं. चीन ने भी अमेरिका से निर्यात होने वाले सामानों पर 110 अरब डॉलर का टैरिफ लगाया है.
ज़ाहिर है, चीन के उत्पादक और उपभोक्ता दोनों अमेरिका के इन क़दमों से इससे परेशान हैं जबकि अमेरिकी उपभोक्ताओं को भी शुल्क की वजह से सामान की अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है.
चीन केवल अमेरिका के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के लिए कितनी बड़ी चुनौती बनकर उभरा है, इसका पता अमेरिकी विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकेन के मार्च में दिए गए एक बयान से पता चलता है. इस बयान में उन्होंने कहा, "चीन एकमात्र ऐसा देश है जिसके पास स्थिर और खुले अंतरराष्ट्रीय सिस्टम को गंभीर चुनौती देने के लिए आर्थिक, राजनयिक, सैन्य और तकनीकी शक्ति है."
दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अमेरिका ये स्वीकार करता है कि उसके नेतृत्व वाले मौजूदा वर्ल्ड ऑर्डर को केवल चीन से चुनौती का सामना है.
उन्होंने चीन से निपटने का अमरीकी नुस्ख़ा भी बताया, "चीन के साथ हमारा संबंध प्रतियोगी वाला होगा, सहयोगात्मक होगा, और जब संभव और ज़रूरी होगा तो ये रिश्ता विरोधात्मक भी हो सकता है."
दरअसल, साल 2009 में ही अमेरिका ने पहली बार उस समय उभर रहे चीन को अपना एक प्रतियोगी मान लिया था. उस समय बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति थे. तब से व्हाइट हाउस की कोशिश उसी रास्ते पर चलने की रही है जिसका हवाला ब्लिंकेन ने दिया है.
लेकिन इस नीति में रुकावट उस समय आई जब डोनाल्ड ट्रंप 2016 में राष्ट्रपति चुने गए. राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में, उन्होंने न्यू हैम्पशायर की एक रैली में कहा था, "हम चीन को अपने देश के लगातार बलात्कार की अनुमति नहीं दे सकते."
और 6 जुलाई 2018 को उन्होंने चीन के ख़िलाफ़ पहले बड़े क़दम के तौर पर चीनी से मंगाए गए सामानों पर 25 प्रतिशत के हिसाब से शुल्क लगा दिया था. चीन ने भी बदले की कार्रवाई के तौर पर अमेरिकी आयात पर टैरिफ लगाना शुरू कर दिया और इस तरह से दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध छिड़ गया.
उस समय एक अमेरिकी बुद्धिजीवी ने कहा, ''सालों तक ये दोनों एक दूसरे को मेज़ के नीचे पैर मारते रहे, अब खुले में एक दूसरे को किक कर रहे हैं."

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व्यापार युद्ध से किसका नुक़सान अधिक हो रहा है?
चीनी प्रोफ़ेसर हुआंग यूंगसॉन्ग कहते हैं, "नुकसान किसका अधिक हो रहा है, ये इसे देखने का एक तंग और ग़ैर-मुनासिब नज़रिया है. लेकिन अगर इस प्रश्न का उत्तर देना ही पड़े, तो चीन व्यापार युद्ध से उतना ही पीड़ित हो रहा है जितना अमेरिका पीड़ित है. इसके अलावा, बिना लगाम के चल रहे इस व्यापार युद्ध के नतीजे में वैश्विक व्यापार आर्डर का पतन हो सकता है, इसकी क़ीमत दुनिया भर को चुकानी पड़ सकती है. वास्तव में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन व्यापार युद्ध से अधिक पीड़ित है, क्योंकि अंततः व्यापार युद्ध में हम सभी हारेंगे."
प्रोफ़सर हुआंग चीन को उसके "समग्र विकास से वंचित करने और चीन की प्रगति को रोकने के लिए" बाइडन प्रशासन को ज़िम्मेदार ठहराते हैं, जो "इस युद्ध को तूल दे रहा है". हालाँकि उनके अनुसार, व्यापारिक तकरार और साथ ही कोविड-19 की महामारी द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ने से रोक नहीं पाई है.
अमेरिकी अर्थशास्त्री स्टीव एच हैंकी चीनी प्रोफ़ेसर चीनी प्रोफ़सर हुआंग से सहमत नज़र आते हैं, "व्यापार युद्ध में जीत किसी की नहीं होती, इस मायने में सभी की हार होती है कि युद्ध से पहले उनकी हालत जितनी बेहतर होती है, युद्ध के बाद उतनी ही बुरी हो जाती है". ट्रेड वार का अंत हमेशा एक ही होता है और वो है कि इसमें सभी की हार होती है."
डॉक्टर फ़ैसल अहमद भी मानते हैं हैं कि ट्रेड वार में जीत किसी की नहीं होती लेकिन वो मौजूदा ज़मीनी हालात का जायज़ा लेते हुए कहते हैं कि अमेरिका को फ़िलहाल नुक़सान ज़्यादा हो रहा है.
वो कहते हैं, "पहले दौर के समझौते के अंतर्गत (इस पर जनवरी 2020 हस्ताक्षर किये गए) चीन अमेरिका से 2020 और 2021 में 200 अरब डॉलर का अतिरिक्त माल खरीदने के लिए बाध्य हुआ. लेकिन ऐसा लगता है कि चीन इसका 50 प्रतिशत से थोड़ा अधिक ही माल ख़रीद पाया. इसकी एक वजह महामारी हो सकती है लेकिन ये समझौता ही इसके लिए ज़िम्मेदार है क्योंकि ये समझौता अमेरिका के व्यापार घाटे को कम करने का कोई उचित उपाय नहीं था, इस पर अमल करना मुश्किल था. ये केवल चुनाव को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिष्ठा को बचाने का एक तरीका था."
क्या ये व्यापार युद्ध जल्द समाप्त होगा?
डॉ. अलेक्ज़ेंडर लैंबर्ट, स्विट्जरलैंड में जिनेवा इंस्टीट्यूट ऑफ जियोपॉलिटिकल स्टडीज़ के अकादमिक निदेशक हैं. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहते हैं कि ये "ट्रेड वार जल्द ख़त्म नहीं होगा बल्कि और गंभीर रूप लेगा".
वो कहते हैं, "अमेरिका को चाहिए कि वो अपने पुराने शीत युद्ध की मानसिकता से बाहर निकले और चीन की पूर्व सोवियत संघ से तुलना करने की मूर्खता ख़त्म करे." इस व्यापार युद्ध को समाप्त करने के लिए वो दोनों को भारत और रूस के साथ मिलकर जी-4 ग्रुप की स्थापना की सलाह देते हैं.
वो कहते हैं, "21वीं शताब्दी की चार सबसे बड़ी शक्तियों -- अमेरिका, रूस, चीन और भारत-- को एक साथ आना चाहिए और मिलकर जी-4 फोरम की स्थापना करनी चाहिए जिसके माध्यम से चारों देश अपने आपसी मतभेद ख़त्म करने की कोशिश करें. अमेरिका अपनी किक बॉक्सिंग, अपने कुंग फ़ु और नकारात्मक हरकतें बंद करे."
प्रोफ़ हुआंग के अनुसार उनका देश चीन अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों समेत कई दूसरे मुद्दों पर सहमति हासिल करने की कोशिश कर रहा है, वो कहते हैं, "व्यापार युद्ध हमेशा के लिए जारी नहीं रह सकता, ये या तो अधिक हिंसक प्रकृति के अन्य टकरावों में बढ़ जाता है, या दोनों देशों के बीच धीरे-धीरे समझौता हो जाता है. समझौता होने की सूरत में चीन और अमेरिका दोनों व्यापार युद्ध की जीत का दावा कर सकते हैं.

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पहले चरण का समझौता
विशेषज्ञ कहते हैं कि तबाही से बचने के लिए, दोनों पक्षों को उन सच्चाइयों को स्वीकार करना होगा जो अब तक वो नहीं कर रहे हैं. अमेरिका को ये स्वीकार करना चाहिए कि चीन अब एक वैश्विक शक्ति है. "हम बनाम वो" के बजाय "हम और वो" की नीति अपनाने की ज़रुरत है.
ट्रेड वार जारी है, नुक़सान भी दोनों तरफ़ जारी है. लेकिन दोनों देशों के निर्यात और आयात एक दूसरे पर इतने निर्भर हैं कि इस रिश्ते को तोड़ना मुश्किल है जिसकी नाकाम कोशिश राष्ट्रपति ट्रंप ने की थी. इस व्यापार युद्ध के बावजूद साल 2020 में अमेरिका और चीन के बीच सामानों का द्विपक्षीय व्यापार 560 अरब डॉलर था, जो 2019 की तुलना में थोड़ा अधिक था.
इसी तरह, अमेरिका का चीनी आयात 438.4 अरब डॉलर था जो 2019 के मुक़ाबले लगभग 18 अरब डॉलर कम था. दोनों देशों के विशेषज्ञ कहते हैं कि अब तक के इतिहास में सबसे बड़े व्यापारिक रिश्ते को तोड़ा नहीं जा सकता.
जैसा कि चीन के लोग अमेरिकियों से कहते हैं, "थोड़े से आप मुझ में हैं और थोड़ा सा मैं आप में हूँ".
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