जी20 सम्मेलन स्थल के बाहर लगी विशाल नटराज मूर्ति की क्यों हो रही है चर्चा?

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- Author, शारदा वी
- पदनाम, बीबीसी तमिल
भारत की राजधानी दिल्ली में हुए जी20 शिखर सम्मेलन में दुनिया की 20 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के शीर्ष नेताओं ने हिस्सा लिया .
दिल्ली के प्रगति मैदान में सम्मेलन का आयोजन हुआ. प्रगति मैदान को भव्य तरीके से सजाया गया. सम्मेलन स्थल के कई किलोमीटर दूर तक कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई.
सम्मेलन स्थल भारत मंडपम को भी विशेष रूप से सजाया गया और इसके प्रवेश द्वार के बाहर लगाई गई नटराज की एक विशालकाय मूर्ति ने सबका ध्यान खींचा.
27 फ़ुट ऊंची नटराज की इस मूर्ति को तमिलनाडु के मूर्तिकारों ने बनाया है.
इस मूर्ति की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसे अष्ट धातु (सोना, चांदी, तांबा, जस्ता, टिन, लोहा, पारा और सीसा) और कावेरी नदी से निकाली गई मिट्टी से बनाया गया है.
दूसरी ख़ास बात है कि इसे उसी परिवार के वंशजों ने बनाया है जिस परिवार ने मध्ययुग में चोल राजवंश के दौरान तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर में विश्वप्रसिद्ध नटराज मूर्ति बनाई थी.
नृत्य करते नटराज की मूर्ति को तंजावुर ज़िले के स्वामीमलाई से आने वाले तीन भाईयों ने बनाया है.

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चोल कालीन पैतृक परिवार की कलाकृति
देवसेना स्थापति के परिवार में चोल राजवंश के काल से ही मूर्ति बनाने की परम्परा रही है.
उनके तीन बेटे राधाकृष्ण स्थापति, श्रीकंध स्थापति और स्वामिनाथ स्थापति ने इस नटराज मूर्ति को बनाया है.
उनके पूर्वजों ने तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर के निर्माण में सहयोग किया था. बाद में मूर्ति स्थापित करने के लिए यह परिवार दारासुरम और स्वामीमलाई गया और स्वामीमलाई में ही बस गया.
तबसे ये परिवार मूर्ति बनाने के काम में लग गया. यह परिवार पिछली 34 पीढ़ियों से मूर्ति गढ़ने के काम में लगा हुआ है.
नटराज मूर्ति बनाने वाले तीन भाईयों के पिता देवसेना स्थापति को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है.
उन्होंने ब्रिटेन, अमेरिका, मलेशिया, मॉरिशस, फ़्रांस और कनाडा समेत कई देशों में हिंदू मंदिरों में असंख्य मूर्तियां बनाई हैं.
यह परिवार मूर्ति बनाने में रुचि रखने वाले मूर्तिकारों को स्वामीमलाई में ट्रेनिंग भी देती है. स्वामीमलाई में 600 मूर्तिकार हैं और यहां क़रीब 100 गैलरी हैं.

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कावेरी नदी की मिट्टी से बनाई गई मूर्ति
स्वामीमलाई की मूर्तियों की एक ख़ासियत है इनके निर्माण में कावेरी नदी की ख़ास सिल्ट मिट्टी का इस्तेमाल.
यही कारण है कि यहां कि पांचलोहा कांस्य मूर्तियों को जियोग्राफ़िकल इंडिकेशन मिल चुका है.
तीन मूर्तिकार भाईयों में से दूसरे, श्रीकंध स्थापति कहते हैं, “कावेरी नदी जब तंजावुर की ओर मुड़ती है तो एक ख़ास जगह ये सिल्ट मिलती है, जो मूर्तियां बनाने के लिए सबसे अच्छी होती है. स्वामीमलाई में बनने वाली अधिकांश मूर्तियों में इसका इस्तेमाल होता है. जी20 सम्मेलन स्थल पर लगी नटराज मूर्ति में इसी का इस्तेमाल हुआ है.”
वो कहते हैं कि उस जगह से दो किलोमीटर के अंदर भी मिट्टी की प्रकृति बदल जाती है और इसे बनाने के लिए केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता है.
लेकिन इस विशाल नटराज मूर्ति को बनाने का मौका बहुत आसानी से उन्हें नहीं मिला.
उन्होंने बताया कि केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के तहत आने वाले इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फ़ॉर आर्ट्स ने इसके लिए आवेदन आमंत्रित किया था, जिसमें ये शर्त भी थी कि वे ही आवेदन कर सकते हैं जिन्होंने पांच सालों में 300 मूर्तियां बनाई हैं और जीएसटी की रसीद भी संलग्न करनी थी. इसके अलावा शर्त ये थी कि कांट्रैक्टर ने 10 फ़ुट से ऊंची कम से कम 10 मूर्तियां बनाई हों.
इस कांट्रैक्ट को पाने के लिए इन भाईयों को कड़े मुक़ाबले का सामना करना पड़ा. जब तक उन्हें ये अनुबंध मिल नहीं गया, उन्हें भरोसा नहीं था कि ये मौका उनके हाथ लगेगा.
आख़िरकार ये अनुबंध उनकी मूर्तिकला गैलरी ‘स्वामीमलाई देवसेना स्थापति संस एंड श्री जयाम इंडस्ट्रीज़’ को मिला.

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मूर्ति में अष्टधातु का इस्तेमाल
आम तौर पर प्रदर्शनी में लगाई जाने वाली मूर्तियां तीन धातुओं- तांबे, पीतल और टीन की बनी होती हैं. इनकी आंखें खुली नहीं होतीं.
लेकिन पूजा के लिए इस्तेमाल होने वाली मूर्तियों में दो और धातु- सोने और चांदी का इस्तेमाल किया जाता है. इन पंचलोहा मूर्तियों में आंखें खुली होती हैं.
जी20 सम्मेलन स्थल पर लगी नटराज की मूर्ति में आठ धातुएं इस्तेमाल की गई हैं.
श्रीकंध स्थापति कहते हैं कि अष्टधातु मूर्तियां सदियों तक चलती हैं लेकिन उन्हें बनाना मुश्किल होता है. 18 टन की नटराज मूर्ति को बनाने के लिए 21 टन धातुओं को गलाया गया.
वो कहते हैं, “नटराज मूर्ति को पारा, लोहा और जस्ता के अलावा पांच धातुओं वाले पंचलोहा के साथ मिलाकर बनाया गया है. हमने 15 साल पहले पश्चिम बंगाल के मायापुर में इस्कान मंदिर में अष्ट धातु की मूर्ति बनाई थी. उसके बाद अष्टधातु की मूर्ति बनाने का अब मौका मिला है.”

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बनाने में कितना समय लगा?
27 फ़ुट की नटराज मूर्ति को बनाने में सात महीने लगे, जिनमें तीन महीने मोम के सैंपल बनाने में लग गए. मशहूर शास्त्रीय नर्तक पद्मा सुब्रमण्यम और सोनल मानसिंह ने इस मोम के सौंपल की जांच की और कुछ सुधारों के सुझाव दिए, इसके बाद मूर्ति ने अंतिम आकार लिया.
तीन मंदिरों में नटराज की मूर्तियों की विशेषताओं पर इस मूर्ति को डिज़ाइन किया गया. ये मंदिर हैं- तंजावुर बृहदेश्वर मंदिर, चिदम्बरम नटराज मंदिर और कोनेरिराजापुरम मंदिर.
राधाकृष्णा स्थापति ने अपने पिता देवसेना स्थापति और कन्याकुमारी के तट पर 133 फ़ुट ऊंची तिरुवलुवर मूर्ति को बनाने वाले गानापथि स्थापति से मूर्तिकला सीखी.
वो इसे एक बड़ा मौका मानते हैं, “इतने कम समय में इस मूर्ति का काम पूरा करना ऐसा लगा जैसे कोई सपना सच हो गया. इस मूर्ति की कुल ऊंचाई 27 फ़ुट है. जबकि सिर से पांव तक इसकी ऊंचाई 14 फ़ुट 3 इंच है. हम लोगों के अलावा हमारी गैलरी के 32 मूर्तिकारों ने इसके निर्माण में योगदान दिया है.”
10 करोड़ रुपये की लागत से बनी इस मूर्ति को जी20 शिखर सम्मेलन से 10 दिन पहले ही स्वामीमलाई से दिल्ली लाया गया.
इसे 36 टायरों वाले विशाल कंटेनर ट्रक में रख कर लाया गया और इन तीन भाईयों के सीधे देख रेख में इस मूर्ति को स्थापित किया गया.
श्रीकंध स्थापति ने कहते हैं, “ऐसी जगह नटराज मूर्ति का होना, जहां दुनिया के शीर्ष नेता आए हैं, यह परिवार से अधिक स्वामीमलाई और तमिलनाडु के लिए गर्व की बात है.”
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