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शेख हसीना: बांग्लादेश के नए हालात का भारत पर क्या होगा असर?
बांग्लादेश में लाखों लोग सड़कों पर हैं. शेख हसीना ने ना सिर्फ प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया है, बल्कि उन्होंने अपनी बहन के साथ देश भी छोड़ दिया है.
प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री आवास को अपने कब्जे में ले लिया है और उनकी जश्न मनाते तस्वीरें हर तरफ सोशल मीडिया पर दिखाई दे रही हैं.
शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद सेना प्रमुख जनरल वकार ने देश को संबोधित करते हुए कहा कि जल्द अंतरिम सरकार का गठन किया जाएगा. इसके लिए उन्होंने अलग-अलग पक्षों से बात की है.
ऊंचे सरकारी पदों में आरक्षण के खिलाफ पिछले महीने से जारी छात्रों के प्रदर्शन ने देश को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जिससे देश के भविष्य पर फिलहाल गहरे बादल छाए हुए हैं.
सवाल है कि शेख हसीना के बाद बांग्लादेश की सत्ता किसके हाथ में होगी? और बांग्लादेश के इस पूरे घटनाक्रम का भारत पर क्या असर होगा?
भारत को कितना बड़ा झटका?
भारत और बांग्लादेश के बीच पिछले 53 सालों से द्विपक्षीय संबंध हैं. पिछले साल नई दिल्ली में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन में भारत ने बांग्लादेश को विशेष अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया था.
बांग्लादेश एकमात्र ऐसा पड़ोसी देश था जिसे भारत ने जी-20 में इतनी तवज्जो दी थी, लेकिन अब शेख हसीना का प्रधानमंत्री ना रहना भारत के लिए कई मुश्किलें पैदा कर सकता है.
बांग्लादेश की राजनीति के दो बड़े और प्रमुख चेहरे हैं- बांग्लादेश अवामी लीग की शेख़ हसीना और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की खालिदा ज़िया.
पिछले 15 सालों से बांग्लादेश में शेख़ हसीना की पार्टी अवामी लीग की सरकार थी और वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज थीं.
विदेशी मामलों के जानकार कमर आगा कहते हैं कि भारत, बांग्लादेश में शेख़ हसीना की सरकार को देखना चाहता है. शुरू से ही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का झुकाव इस्लामिक कट्टरपंथियों की तरफ़ रहा है. वे हमेशा से पाकिस्तान की वकालत करते आए हैं, जिसका फ़ायदा चीन को मिलता है, क्योंकि चीन और पाकिस्तान दोस्त हैं.
वहीं दूसरी तरफ अवामी लीग लिबरल, सेक्युलर, डेमोक्रेटिक फैब्रिक में विश्वास करती है. यही वजह है कि भारत उसे वरीयता देता है.
बीबीसी हिंदी के संपादक नितिन श्रीवास्तव के साथ बातचीत में बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीना सीकरी ने कहा कि भारत स्थिर पड़ोसी चाहता है.
उन्होंने कहा, “भारत हमेशा चाहता है कि बांग्लादेश समेत उसके पड़ोसी स्थिर हों और वहां पर लोकतंत्र बना रहे. यह चाहत भारत की अब भी है…भारत की कोशिश स्थिरता लाने की होगी.”
क़मर आग़ा कहते हैं, “बीएनपी न सिर्फ़ पाकिस्तान बल्कि चीन समर्थित भी है. वह इस्लामिक राजनीति की बात करता है और शेख हसीना के ना रहने पर वह भारत की बजाय पाकिस्तान और चीन की तरफ जाता हुआ दिखाई देगा.”
कमर आगा कहते हैं, “शेख हसीना, चीन और भारत के बीच में संतुलन बनाकर रखती थीं, लेकिन अब इस संतुलन को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं.”
व्यापार पर कितना असर?
दक्षिण एशिया में बांग्लादेश, भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है. कोविड-19 के बावजूद दोनों देशों के बीच साल 2020-21 में 10.78 बिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार रहा. वहीं साल 2021-22 में यह व्यापार 44 प्रतिशत के दर से बढ़कर 18.14 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया था.
साल 2022-23 के बीच भारत-बांग्लादेश का कुल व्यापार 15.93 बिलियन अमेरिकी डॉलर रहा.
बिजली और ऊर्जा के क्षेत्र में दोनों देश मिलकर कई बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं. बांग्लादेश वर्तमान में 1160 मेगावाट बिजली भारत से आयात कर रहा है.
इतना ही नहीं हाई स्पीड डीजल ले जाने के लिए दोनों देशों के बीच भारत-बांग्लादेश मैत्री पाइपलाइन बहुत अहम है.
भारत ने पिछले एक दशक में बांग्लादेश को सड़क, रेलवे, बंदरगाहों के निर्माण के लिए हजारों करोड़ रुपये दिए हैं.
विदेशी मामलों के जानकार कमर आगा कहते हैं कि जो स्थिति फिलहाल बांग्लादेश में बन रही है, उसका असर भारत से साथ व्यापार पर भी पड़ेगा और ऐसे में चीन चटगांव पोर्ट को इस्तेमाल करने की अपनी मांग को आगे बढ़ाने का काम करेगा.
भारत अपनी 'एक्ट ईस्ट' पॉलिसी के लिए बांग्लादेश को बहुत अहम मानता है. भारत के पूर्वी राज्य और बांग्लादेश एक दूसरे से घिरे हुए हैं. वहां विकास और कनेक्टिविटी के लिए बांग्लादेश का साथ ज़रूरी है और यही बात उस पर भी लागू होती है.
शेख़ हसीना सरकार से पहले जब भारत ने कनेक्टिविटी के लिए उनके चटगांव पोर्ट को इस्तेमाल करने की बात कही थी तो भारत को मना कर दिया गया था.
पहले भारत को अगरतला से सामान को कोलकाता पोर्ट पर लाने के लिए 1500 किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय करना पड़ता था लेकिन आज की तारीख में यह दूरी 200 किलोमीटर से भी कम की रह गई है.
सामान को चटगांव पोर्ट पर लाकर दुनिया में कहीं भी आसानी से भेजा सकता है.
सुरक्षा के लिहाज से कितना नुकसान?
बांग्लादेश के साथ भारत की लगभग चार हज़ार किलोमीटर की सीमा लगती है. लिहाजा चीन और पाकिस्तान जैसे देशों की चुनौतियों को देखते हुए भारत के लिए इस इलाक़े में ऐसी सरकार की ज़रूरत है, जो उसका दोस्त हो.
क़मर आग़ा कहते हैं कि शेख़ हसीना से पहले की सरकार ने उत्तर पूर्वी भारत में अलगाववादियों को पनाह देने में अहम भूमिका निभाई थी.
बांग्लादेश के कैंपों से पूर्वोत्तर भारत में अलगाववादी आंदोलन को जिस तरह से समर्थन मिल रहा था उसे कुचलने में भी शेख़ हसीना सरकार ने अहम भूमिका निभाई है.
वहाँ रह रहे अलगाववादी आंदोलन के बड़े नेताओं को बांग्लादेश सरकार ने भारत को सौंप दिया, जिसमें उल्फा नेता अरविंद राजखोवा समेत कई दूसरे अलगाववादी नेता शामिल हैं. अब वे भारत से शांति वार्ता कर रहे हैं.
ऐसे में अगर शेख हसीना बांग्लादेश में नहीं रहती हैं तो यह भारत के लिए सहज स्थिति नहीं साबित होगी.
क्या होगा बांग्लादेश का भविष्य
बांग्लादेश के सेना प्रमुख ने देश में जल्द अंतरिम सरकार का गठन करवाने की बात कही है. हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि इस सरकार की शक्ल क्या होगी?
क्या ये यूनिटी सरकार होगी? जिसमें कुछ हिस्सा शेख हसीना का पार्टी आवामी लीग का भी होगा?
वीणा सीकरी का कहना है, “आवामी लीग के पास तीस से चालीस प्रतिशत वोट तो हैं ही. मिलकर एक यूनिटी सरकार बनानी चाहिए, जो बांग्लादेश के लोगों की इच्छा के अनुसार हो.”
वे कहती हैं, “बांग्लादेश में सेना राजनीतिक सत्ता को अपने हाथ में नहीं लेना चाहती. 2007-08 में सेना समर्थित सरकार बनी थी, वो दो साल तक चली. उस समय यह भी पता चला था कि अगर सेना सत्ता में रहेगी तो यूएन पीसकीपिंग ऑपरेशन में हिस्सा नहीं लेने देंगे. इसके बाद सेना बहुत सजग हुई है. आज भी वो इसलिए आए हैं, क्योंकि वो अकेले ऐसे हैं जो स्थिति को नियंत्रित कर सकते हैं.”
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