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बांग्लादेश: सरकारी नौकरियों में आरक्षण के ख़िलाफ़ प्रदर्शनकारी छात्रों ने शुरू की 'बांग्ला नाकाबंदी'
- Author, एनाबेल लियांग
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था में तार्किक सुधारों की मांग को लेकर छात्र पिछले कुछ दिनों से आंदोलन कर रहे हैं.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है लेकिन इसके बावजूद आंदोलनकारियों ने विरोध प्रदर्शन जारी रखने का एलान किया है.
छात्रों का कहना है कि ज़्यादा सैलरी वाली सरकारी नौकरियों में युद्ध के हीरो रहे लोगों के बच्चों और कुछ ख़ास तबकों के बच्चों को तरजीह दी जाती है.
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि यह भेदभावपूर्ण है. वे योग्यता के आधार पर नौकरी देने की मांग कर रहे है.
बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में एक तिहाई पद उन लोगों के बच्चों के लिए आरक्षित रखे गए हैं, जिन्होंने देश के मुक्ति संग्राम यानी साल 1971 के युद्ध में भाग लिया था.
आज़ादी के नायकों के बच्चों को मिलता है आरक्षण
भारत की आज़ादी से पहले बांग्लादेश बंगाल प्रांत का पूर्वी हिस्सा था.
लेकिन 1947 में भारत के विभाजन के बाद ये इलाका पाकिस्तान के हिस्से में चला गया और बांग्लादेश के उदय से पहले तक इसे 'पूर्वी पाकिस्तान' के रूप में जाना जाता था.
बाद में साल 1971 में बांग्ला भाषी पूर्वी पाकिस्तान की आज़ादी के लिए पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मुक्ति संग्राम छेड़ दिया था.
इस संघर्ष के बाद बांग्लादेश एक आज़ाद मुल्क के तौर पर अस्तित्व में आया था.
बांग्लादेश की सरकारी नौकरियों में कुछ पद महिलाओं, जातीय अल्पसंख्यकों और विकलांगों के लिए भी आरक्षित रखे गए हैं.
आलोचकों का कहना है कि यह व्यवस्था प्रधानमंत्री शेख़ हसीना का समर्थन करने वाले सरकार समर्थक समूहों के बच्चों को अनुचित तौर पर लाभ पहुँचाने वाली है.
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शेख़ हसीना पर समर्थकों को लाभ पहुँचाने का आरोप
शेख़ हसीना ने जनवरी महीने में लगातार चौथे चुनाव में जीत हासिल की थी. वो बांग्लादेश के संस्थापक नेता शेख़ मुजीबुर्रहमान की बेटी हैं.
बांग्लादेश में इसी सप्ताह की शुरुआत में छात्रों ने राजधानी ढाका और अन्य प्रमुख शहरों की सड़कों और राजमार्गों को अवरूद्ध कर दिया.
इससे शहरों में यातायात ठप्प हो गया है. प्रदर्शनकारियों ने अपने विरोध को 'बांग्ला नाकाबंदी' का नाम दिया है.
कुछ लोगों ने राजधानी में रेलवे ट्रैक पर लकड़ियाँ बिछा दी हैं जिससे देश के उत्तरी इलाक़ों में जाने वाली ट्रेनों पर भी ब्रेक लग गया है.
बांग्लादेश की शीर्ष अदालत ने बुधवार को नौकरी में आरक्षण की इस व्यवस्था को अस्थायी तौर पर निलंबित कर दिया है.
लेकिन जब तक इसे स्थायी रूप से नहीं हटा दिया जाता, तब तक विरोध प्रदर्शन जारी रहने की संभावना है.
पिछले महीने ही एक अन्य अदालत ने इस व्यवस्था को दोबारा बहाल किया था.
इससे पहले कई हफ़्तों तक चले विरोध प्रदर्शनों के बाद साल 2018 से भर्ती की इस व्यवस्था पर रोक लगी हुई थी.
एक प्रदर्शनकारी ने बीबीसी बांग्ला से कहा है, "मेरी मांग इस व्यवस्था को रद्द करने की नहीं है. मेरी मांग कोटा (आरक्षण) में सुधार की है."
एक अन्य छात्र का कहना है कि वो तब तक विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे जब तक इसका कोई स्थायी समाधान नहीं मिल जाता है.
बांग्लादेश में अच्छी सैलरी की वजह से सरकारी नौकरियों की बहुत ज़्यादा मांग है.
देश में लाखों सरकारी नौकरियों में आधे से ज़्यादा पद कुछ ख़ास समूहों के लिए आरक्षित हैं.
इस महीने की शुरुआत में शेख़ हसीना ने विरोध प्रदर्शनों की निंदा करते हुए कहा था कि छात्र अपना समय बर्बाद कर रहे हैं और कोटा विरोधी आंदोलन का कोई औचित्य नहीं है.
बांग्लादेश कभी दुनिया के सबसे ग़रीब देशों में शामिल था लेकिन अब वह एशिया में सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है.
पिछले दस साल में इसके प्रति व्यक्ति आय में तीन गुना इज़ाफ़ा हुआ है और वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि पिछले दो दशकों में देश के ढाई करोड़ से अधिक लोग ग़रीबी से बाहर आ गए हैं.
लेकिन कोविड-19 महामारी और वैश्विक आर्थिक मंदी की वजह से साल 2022 के मध्य में बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था उथल-पुथल में आ गई है.