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आज़ादी के बाद क्या भारत ने देसी रजवाड़ों को निराश किया?
- Author, जॉन ज़ुब्रिज़्की
- पदनाम, लेखक
वे भव्य राजमहलों में रहते थे और उनके पास बेशुमार हीरे जवाहरात थे.
उनके रॉल्स रॉयस कारों का कारवां उनकी शानो शौकत का गवाह था. वे ट्रेनों के ख़ास डिब्बे में सफ़र करते थे, दिल्ली पहुंचने पर उन्हें तोपों की गड़गड़ाहट के साथ सलामी दी जाती थी.
प्रजा की ज़िंदगी और मौत उनके हाथ में होती थी और उनकी हर ज़रूरत को पूरा करने के लिए लाखों लोग तैयार खड़े रहते थे.
1947 में जब भारत को आज़ादी मिली उस समय देश के क़रीब आधे क्षेत्र और करीब एक तिहाई आबादी पर 562 रजवाड़ों का शासन था.
चूंकि वे ब्रिटेन के सबसे वफ़ादार सहयोगी थे इसलिए वे अछूत माने जाते थे, इनमें से उन लोगों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था जिन्होंने सबसे जघन्य अपराध किए थे या बहुत दुर्लभ मामलों में उन्हें हटा दिया गया था.
हालांकि ब्रिटिश सम्राज्य के ख़ात्मे के साथ सबसे अधिक उन्हें ही नुकसान हुआ और तीन चौथाई सदी बाद धनी और राजनीतिक रूप से सक्रिय लोगों को छोड़ वे सभी आम ज़िंदगी जी रहे हैं.
अपनी नई किताब के लिए रिसर्च के दौरान मैंने आज़ादी मिलने से पहले और उसके बाद की उथल पुथल भरी घटनाओं पर क़रीब से गौर किया. ये साफ़ था कि विभाजन और भ्रम ने महाराजाओं का बहुत नुकसान किया और उन्हें उस सत्ता से सबसे अधिक निराशा मिली जिनपर उन्होंने सबसे अधिक भरोसा था.
इन शासकों के पास अपना साम्राज्य बचाने और आज़ाद, लोकतांत्रिक भारत के साथ सहअस्तित्व बनाए रखने का सबसे अच्छा विकल्प खुद को अधिक लोकतांत्रिक बनाना था.
हालांकि अंग्रेज़ अधिकारियों ने धीमी गति से इन सुधारों को लाने की कोशिश की थी, जिससे राजघरानों में सुरक्षा का भ्रम पैदा हुआ.
लॉर्ड माउंटबेटन के विरोधाभासी संदेश
जब लॉर्ड माउंटबेटन अंतिम वायसरॉय बने, राजाओं ने सोचा कि वे उनकी रक्षा करेंगे.
निश्चित तौर पर उनके जैसा कुलीन व्यक्ति उन्हें राष्ट्रवादियों के हवाले तो नहीं छोड़ेगा?
हालांकि, माउंटबेटन को इस उप महाद्वीप की बहुत सीमित समझदारी थी और रियासतों के बारे में क्या किया जाना चाहिए इस पर फैसला लेने में बहुत देर कर दी.
इसके अलावा उन्होंने विरोधाभासी संदेश भेजे.
एक तरफ़ तो कहा कि ब्रिटेन उनके साथ किए समझौतों को भंग नहीं करेगा. यानी भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का दबाव नहीं डालेगा.
दूसरी तरफ लंदन में इंडिया ऑफ़िस के अधिकारियों के मार्फ़त महाराजाओं को सत्ता में बनाए रखने के लिए हर संभव कोशिश की.
राष्ट्रवादी इन महाराजाओं को बहुत प्रशंसक नहीं थे, ख़ासकर जवाहरलाल नेहरू जो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने.
वो ऐसे लोगों के अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर सकते थे जो उन्हीं के शब्दों में- ‘प्रतिक्रियावाद, अक्षमता और बेरोकटोक निरंकुश सत्ता का गढ़ था और जिसका कभी कभार इस्तेमाल शातिर और बदनाम लोग करते थे.’
कांग्रेस पार्टी के नेता सरदार वल्लभभाई पटेल को गृहमंत्री के तौर पर अंततः इन रियासतों से निपटना था.
अपनी प्रतिक्रियाओं में वे कम भावनात्मक थे, लेकिन इस बात पर दृढ़ प्रतिज्ञ थे कि अगर भारत को भौगोलिक और राजनीतिक रूस से सुदृढ़ राष्ट्र बनना है तो रियासतों को इसका हिस्सा होना पड़ेगा.
वे मानते थे खि इस लक्ष्य से कोई भी भटकाव आख़िर में 'भारत के दिल में एक खंजर घोंपने का ख़तरा' मोल लेना होगा.
विलय को मजबूर
सिद्धांत में तो सत्ता हस्तानांतरण के बाद ब्रिटिश राजशाही से हुए समझौते के समाप्त होने के बाद रियासतें भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र रहने का चुनाव कर सकती थीं.
लेकिन माउंटबेटन, पटेल और उनके सहयोगी नौकरशाह वीपी मेनन, जिन्हें रणनीति बनाने में मास्टर कहा जाता था, की संयुक्त ताकतवर तिकड़ी के सामने वे असहाय होते जा रहे थे.
उनसे कहा गया कि भारत में विलय करिए और आपको तीन विषयों के अलावा पूरा नियंत्रण दिया जाएगा. ये विषय थे, रक्षा, विदेश के मामले और संचार. आपके अंदरूनी मामले अछूते रहेंगे. अगर इनकार करते हैं तो अपनी प्रजा द्वारा उखाड़ फेंके जाने का ख़तरा रहेगा और कोई भी बचाने नहीं आएगा.
अनिष्ट की आशंका और असहायता के चलते अधिकांश रियासतों ने विलय के समझौते पर हस्ताक्षर कर दे.
जिन कुछ ने प्रतिरोध किया, ख़ासकर जूनागढ़, कश्मीर और हैदराबाद, उनका बंदूक के ज़ोर पर विलय कराया गया. हैदराबाद में कथित ‘पुलिस कार्रवाई’ में 25,000 लोगों की जान गई.
विलय पर हस्ताक्षर के समय राजाओं से जो वायदे किए गए थे, वे जल्द ही टूट गए.
छोटी रियासतों को पहले से मौजूद प्रांतों, जैसे ओडिशा, या राजस्थान जैसे नए बने प्रांतों में विलय को मजबूर किया गया.
यहां तक कि ग्वालियर, मैसूर, जोधपुर और जयपुर जैसी बेहतर प्रशासित रियासतों को पटेल और मेनन ने स्वशासित राज्य बने रहने का वादा किया था उन्हें भी बड़े प्रशासनिक क्षेत्रों में मिला दिया गया, जैसा आज भारत का नक्शा दिखता है.
इसमें कोई शक नहीं कि एक नए देश के लिए एकीकरण फ़ायदे का सौदा था.
विभाजन के बाद पाकिस्तान बनने से जितना इलाक़ा कम हुआ भारत को लगभग उतना ही इलाक़ा एकीकरण से मिल गया.
साथ ही उसे नक़द और निवेश के रूप में एक अरब रुपये (आज के हिसाब से 84 अरब रुपये) भी मिले.
प्रिवी पर्स की समाप्ति
इसके बदले इन पूर्व शासकों में से आधों को कर मुक्त प्रिवी पर्स दिए गए.
प्रिवी पर्स एक निश्चित रकम थी जो इन राजाओं को दी जाती थी. मैसूर के महाराजा को 20,000 पाउंड प्रति साल से लेकर कटोड़िया के तालुकदार को 40 पाउंड प्रति वर्ष तक निर्धारित किए गए थे.
कटोड़िया के तालुकदार ने क्लर्क के रूप में काम किया और पैसे बचाने के लिए हर जगह साइकिल से आते जाते थे.
लेकिन ये बंदोबस्त भी सिर्फ दो दशक तक ही चला.
शाही परिवारों की औरतें और मर्द सदस्य राजनीति में आ गए.
कुछ इंदिरा गांधी के कांग्रेस में आ गए लेकिन अधिकांश विपक्षी पार्टियों में चले गए.
अपने पिता नेहरू की तरह ही इंदिरा गांधी राजाओं से नफ़रत करती थीं और वे कांग्रेस के उम्मीदवारों को हराने में कामयाब हो रहे थे जिससे संसद में इंदिरा गांधी का बहुमत कम हो रहा था.
महाराजाओं की मान्यता ख़त्म करने को एक लोकप्रिय एजेंडा मानकर उन्होंने अपनी बात मानने वाले एक राष्ट्रपति का सहारा लिया लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश से इस ओर उठाए गए कदम रुक गए.
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि इस तरह का आदेश पारित करना राष्ट्रपति के अधिकार के दायरे से बाहर है.
लेकिन इससे इंदिरा डिगी नहीं और 1971 के बाद दो तिहाई के भारी बहुमत से गांधी ने राजाओं के टाइटल, अधिकार और प्रिवी पर्स को ख़त्म करने के लिए संविधान संशोधन वाला एक विधेयक लोकसभा से पास करा लिया.
उनका कहना था कि वक्त आ गया है कि ‘एक ऐसे सिस्टम को ख़त्म कर दिया जाए जिसकी हमारे समाज में कोई प्रासंगिकता नहीं बची है.’
रियासतों को लेकर इस क़ानून पर कुछ भारतीयों ने अफसोस जताया और इसे विश्वासघात करार दिया.
ब्रिटेन से अलग, भारतीय लोकतंत्र में राजशाही की कोई जगह नहीं है.
फिर भी इसे तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता है. जब फैसले हो रहे थे तो राजाओं के साथ कुछ नाइंसाफ़ी की गई.
(जॉन ज़ुब्रिज़्की किताब ‘डीथ्रोन्डः पटेल, मेनन एंड इंटीग्रेशन ऑफ़ प्रिंसली इंडिया’ के लेखक हैं और इसे जगरनॉट ने प्रकाशित किया है.)
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