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पाकिस्तान से बांग्लादेश के अलग होने की कहानी का क्या है अगरतला कनेक्शन
- Author, फ़ारूक़ आदिल
- पदनाम, लेखक और पत्रकार, इस्लामाबाद से
पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के शिक्षक उस मक़सद के लिए निर्धारित स्थान पर पहुंच चुके थे. सारे इंतज़ाम पूरे हो चुके थे, लेकिन अयूब ख़ान का इरादा बदल चुका था. कुछ प्रोफ़सरों के बजाए उन्हें उस वक़्त पूर्वी पाकिस्तान के गवर्नर का साथ ज़्यादा मुनासिब लग रहा था.
गवर्नर अब्दुल मुनअम ख़ान उस वक़्त उनके बग़ल में बैठे थे जिनसे वो फुसफुसा कर बात कर रहे थे. ड्राइंग रूम के एक तरफ़ मंत्री मौजूद थे. उनके बीच भी कानाफूसी का सिलसिला जारी था. दूसरी तरफ़ सेना और ख़ुफ़िया विभाग के अधिकारी साथ खड़े थे.
क़ुदरतुल्लाह शहाब लिखते हैं कि अयूब ख़ान उन्हें कुछ परेशान दिखाई दिए. शहाब के मुताबिक़ उन्होंने राष्ट्रपति अयूब को मुलाक़ात के बारे में याद दिलाया तो उन्होंने उसके स्थगन की इच्छा जताई. उसी शाम ढाका में रात्रिभोज रखा गया था. यह कार्यक्रम भी फीका रहा. सत्ता के गलियारों में इस उदासी की वजह एक ऐसा रहस्योद्घाटन था जो आगे चलकर पाकिस्तानी सियासत की दिशा बदलने वाला था.
क़ुदरतुल्लाह शहाब के मुताबिक़ अयूब ख़ान को उसी दिन उस साज़िश की ख़बर दी गई थी. परेशान कर देने वाली यही सूचना थी जिसके कारण उस दिन अयूब ख़ान का मूड ख़राब था.
अयूब ख़ान को क़त्ल करने की साज़िश
अयूब ख़ान के सेक्रेटरी के मुताबिक़ प्राथमिक सूचना यह थी कि देश के राष्ट्रपति का अपहरण कर हत्या कर देने के एक षड्यंत्र का पर्दाफ़ाश हुआ है. अयूब ख़ान के सूचना सचिव अल्ताफ़ गौहर ने अपनी किताब 'अयूब ख़ान: फ़ौजी राज के पहले 10 साल' में एक अलग घटना का ज़िक्र किया है.
वो लिखते हैं कि अयूब ख़ान दिसंबर 1967 में पूर्वी पाकिस्तान के चंद्रगोना इलाक़े में जाने वाले थे. यहां उन्हें एक पेपर मिल का निरीक्षण करना था. दौरे की सभी तैयारियां पूरी कर ली गईं लेकिन अचानक इसे रद्द कर दिया गया. सूचना ये थी कि विमान को बम से उड़ाने की योजना बनाई गई है.'क्या यह बैठक स्थगित नहीं की जा सकती?' पाकिस्तान के पहले सैन्य शासक फील्ड मार्शल अयूब ख़ान ने चिंतित मुद्रा में सिर उठाया और अपने सचिव से पूछा. कार्यक्रम के मुताबिक़ उस वक़्त उन्हें विश्वविद्यालय के शिक्षकों के बीच होना चाहिए था क्योंकि यह बैठक पहले से तय थी.
अयूब ख़ान के क़ानून मंत्री एस एम ज़फ़र के अनुसार सरकारी प्रेस विज्ञप्ति के द्वारा जनता को इस षड्यंत्र की आधिकारिक रूप से जानकारी दी गई. ये साज़िश क्या थी? अल्ताफ़ गौहर की किताब में इसके बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध हैं.
गिरफ़्तार होने वालों में सिविल सर्विस और नौसेना के जवान भी थे
अल्ताफ़ गौहर के मुताबिक़ 6 जनवरी 1968 को 28 लोगों को गिरफ़्तार किया गया. गिरफ़्तार होने वालों में आम नागरिकों के अलावा पाकिस्तानी नौसेना के अफ़सर भी शामिल थे. नौसेना के जवानों में लेफ़्टिनेंट कमांडर मुअज़्ज़म हुसैन समेत कुछ नॉन कमीशंड अफ़सरों के नाम भी सामने आए. पकड़े जाने वाले लोगों में सिविल सेवाओं के तीन आला अधिकारी रूहुल क़ुद्दूस, फ़ज़्लुर्रहमान और शम्सुर्रहमान भी शामिल थे.
इन सभी लोगों पर आरोप था कि वो ढाका में भारतीय उच्चायोग के प्रथम सचिव पीएन ओझा के संपर्क में थे. एक आरोप यह भी था कि उनमें से कुछ भारतीय राज्य त्रिपुरा के अगरतला गए थे और दो भारतीय अधिकारियों से मिले थे.
पाकिस्तान के सशस्त्र बलों के अंतिम कमांडर-इन-चीफ़ (बाद में इस पद को चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ नाम दिया गया), लेफ़्टिनेंट जनरल गुल हसन ने अपनी आत्मकथा में साज़िश का विवरण दिया है.
दावों के मुताबिक़ भारत की ओर से उन्हें आर्थिक मदद के अलावा हथियार भी मुहैया कराए गए थे. जनरल गुल हसन ने लिखा है कि योजना के अनुसार इन लोगों को पूर्वी पाकिस्तान के कुछ इलाक़ों पर क़ब्ज़ा करने का लक्ष्य भी दिया गया था और अगर ये लोग ऐसा करने में सफल हो जाते तो बांग्लादेश की स्वतंत्रता तुरंत घोषित कर दी जाती. भारत ने उन्हें आश्वासन दिया था कि वह इसे स्वीकार कर लेगा.
शेख़ मुजीबुर्रहमान का नाम बाद में जोड़ा गया?
बांग्लादेश के पूर्व उप प्रधानमंत्री मौदूद अहमद ने अपनी किताब 'Bangladesh: Contemporary Events and Documents' में कुछ और विवरणों का उल्लेख किया है.
उनके मुताबिक़ अगरतला जाने वालों की मुलाक़ात भारतीय सेना के एक लेफ़्टिनेंट कर्नल मिश्रा, मेजर मेनन और कुछ अन्य अधिकारियों से हुई थी. उनकी किताब में कुछ और गिरफ़्तार होने वालों के नाम भी मिलते हैं. इनमें अवामी लीग चटगांग के वित्त सचिव भूषण चौधरी उर्फ माणिक चौधरी भी शामिल थे.
मौदूद अहमद के मुताबिक़ ये वो गिरफ्तारियां थीं, जिनसे सरकार को इस साज़िश के सबूत हासिल हुए. उन्होंने लिखा कि मामला दर्ज होने के 12 दिन बाद शेख़ मुजीबुर्रहमान का नाम मामले में मुख्य अभियुक्त के रूप में मुक़दमे में शामिल किया गया.
उन्होंने लिखा है कि यह घटनाएं उस वक़्त हो रही थीं जब शेख़ मुजीब जेल में थे. लेखक के अनुसार, सरकार के पास इस साज़िश में मुजीब के शामिल होने का कोई ठोस सबूत नहीं था. इसलिए, यदि यह मामला बिना किसी दबाव के स्वतंत्र रूप से चलाया जाता, तो उनके ख़िलाफ़ आरोप हटा दिए जाते और उन्हें बरी कर दिया जाता.
डॉक्टर सफ़दर महमूद भी पुष्टि करते हैं कि शेख़ मुजीबुर्रहमान का नाम बाद में शामिल किया गया था.
'वह हमारे साथ नहीं रहेंगे'
इस बारे में अल्ताफ़ गौहर ने और भी दिलचस्प जानकारियां दी हैं. वह लिखते हैं कि एक शाम अयूब ख़ान ने उन्हें अपने बेडरूम में बुलाया. बातचीत के दौरान जब पूर्वी पाकिस्तान का ज़िक्र हुआ तो अयूब ख़ान नाराज़ हो गए और उन्होंने अल्ताफ़ गौहर से कहा: 'जब भी बंगालियों का ज़िक्र होता है तो आप भावुक हो जाते हैं.' फिर उकताए हुए लहजे में कहा, 'अरे भाई, मैंने उन्हें दूसरी राजधानी इसलिए दी है कि एक दिन उन्हें इसकी ज़रूरत पड़ेगी, वो हमारे साथ नहीं रहेंगे.'
अगले दिन कैबिनेट की बैठक हुई तब भी अयूब ख़ान का मूड सही नहीं था. इस मौक़े पर उन्होंने कहा, 'पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान से दोस्ती या भारत की ग़ुलामी में से किसी एक को चुनना होगा.
अल्ताफ़ गौहर के मुताबिक़, उन्होंने बैठक में पूर्वी पाकिस्तान के मंत्रियों के साथ बहुत सख़्त बर्ताव किया. वह लिखते हैं कि इस ग़ुस्से का कारण उस मामले का सामने आना था जिसे बाद में 'अगरतला साज़िश कांड' का नाम दिया गया.
अभियोजन की कहानी धारणाओं पर आधारित थी
कुछ दिनों बाद अयूब ख़ान बीमार पड़ गए. इस बीच अगरतला कांड भी पीछे चला गया. अयूब ख़ान के स्वस्थ होने पर केस में गतिविधियां फिर शुरू हुईं. इस बीच पाकिस्तानी सेना के जनरल हेडक्वॉर्टर ने अपनी जांच पूरी कर ली थी और मामला सुनवाई के लिए तैयार था.
यहया ख़ान चाहते थे कि मामले की सुनवाई विशेष ट्रिब्यूनल करे लेकिन अयूब ख़ान इसके ख़िलाफ़ थे. उनके दिमाग़ में रावलपिंडी षड्यंत्र केस था. इस मामले की सुनवाई ट्रिब्यूनल में भी हुई थी. उन्हें लगा कि खुली अदालत में वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों से पूछताछ से सेना की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है. अब वह ऐसा नहीं चाहते थे लेकिन यहया ख़ान की ज़िद ट्रिब्यूनल पर ही थी.
इन चर्चाओं और बैठकों में सूचना सचिव के रूप में अल्ताफ़ गौहर भी शामिल होते थे. एक बैठक में यहया ख़ान ने ज़ोर देकर कहा कि मुक़दमे की प्रेस कवरेज अच्छी होनी चाहिए क्योंकि हमारा मामला फ़ुलप्रूफ़ है. इस पर अल्ताफ़ गौहर ने जवाब दिया: 'अगर ऐसा है, तो आपको पब्लिसिटी भी फ़ुलप्रूफ़ मिलेगी.'
इस जवाब पर यहया ख़ान झुंझला गए और उन्होंने एडवोकेट जनरल को निर्देश दिया कि वह मामले की फ़ाइल अल्ताफ़ गौहर को सौंप दें. वह लिखते हैं: 'इस फ़ाइल को पढ़ने के बाद, उन्हें आश्चर्य हुआ कि अभियोजन पक्ष की कहानी धारणाओं पर आधारित थी. गवाहियों में 'शेख़' नाम का एक किरदार मुख्य साज़िश कर्ता बताया गया था लेकिन अभियोजन पक्ष के पास इस 'शेख़' को शेख़ मुजीबुर्रहमान साबित करने के लिए कुछ नहीं था.
मुजीबुर्रहमान का नाम प्रेस रिलीज़ से हटाया गया
अल्ताफ़ गौहर ने लिखा है कि जिस दिन उन्हें केस फ़ाइल पढ़ने का मौक़ा मिला, उसी दिन जीएचक्यू में एक प्रेस विज्ञप्ति तैयार की गई, जिसमें यह सामने आना था कि शेख़ मुजीबुर्रहमान इस मामले में मुख्य अभियुक्त हैं.
यह प्रेस विज्ञप्ति 7 अप्रैल, 1968 को अख़बारों में प्रकाशित होनी थी. तब तक ऑफ़िस का वक़्त ख़त्म हो चुका था. लेकिन अल्ताफ़ गौहर ने इस घटनाक्रम की जानकारी अयूब ख़ान को देना ज़रूरी समझा. उन्होंने बताया कि जीएचक्यू बिना किसी ठोस सबूत के मामले में शेख़ मुजीबुर्रहमान का नाम शामिल कर रहा है जो सही नहीं है.
उन्होंने सुझाव दिया कि यदि इस मामले में मुजीब को शामिल करना ज़रूरी है, तो एक और तरीक़ा अपनाया जाना चाहिए. यानि अगर अभियोजन पक्ष सुनवाई के दौरान उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत मुहैया कराता है तो अदालत उन्हें ख़ुद ही तलब कर लेगी. अयूब ख़ान को यह दलील पसंद आई और इस तरह उनके निर्देश पर शेख़ मुजीबुर्रहमान का नाम हटा दिया गया.
कुछ दिनों बाद, पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसए रहमान की अध्यक्षता में एक विशेष ट्रिब्यूनल बनाया गया. मुक़दमा अभी शुरू नहीं हुआ था जब एक प्रेस नोट के ज़रिए शेख़ मुजीबुर्रहमान का नाम फिर से अभियुक्तों की सूची में जोड़ा गया. इस संबंध में अयूब ख़ान को आगाह भी किया गया. लेकिन उस समय तक उनका मन भी बदल चुका था. उन्होंने सूचना सचिव को बताया कि यहया ख़ान के क़ानूनी सलाहकार का विचार है कि 'मुक़दमे की कामयाबी के लिए मुजीब का नाम शामिल करना ज़रूरी है.'
'मुक़दमा खुली अदालत में चलना चाहिए'
अगरतला षड्यंत्र का मुक़दमा किस अदालत में चलाया जाए? सरकार इस मामले में काफ़ी दुविधा में रही. किसी फ़ैसले पर आसानी से ना पहुंच पाने के कई कारण थे. इस मुद्दे पर एसएम ज़फ़र ने रौशनी डाली है. मामले में नौसेना के अधिकारी शामिल थे, इसलिए यह कोर्ट-मार्शल का मुक़दमा था. नौकरशाहों के सम्मिलित होने की वजह से मामला सर्विस ट्रिब्यूनल में जा सकता था.
शेख़ मुजीब और अन्य लोगों की वजह से यह आम अदालत का केस था. इसलिए फ़ैसला मुश्किल था. एसएम ज़फ़र के मुताबिक़, इस संबंध में सरकार के सामने तीन चीजों को ध्यान में रखते हुए विशेष ट्रिब्यूनल में मुक़दमा चलाने का फ़ैसला किया:
- चूंकि यह देश को तोड़ने की साज़िश है, इसलिए सुनवाई खुली अदालत में होनी चाहिए ताकि कार्रवाई में जनता का विश्वास बहाल हो सके.
- अगर शेख़ मुजीबुर्रहमान का कोर्ट-मार्शल किया जाता है, तो यह धारणा बनाई जाएगी कि उनके ख़िलाफ़ बदले की कार्रवाई की जा रही है, इसलिए खुली अदालत की पारदर्शिता की धारणा मज़बूत होगी.
- मुक़दमे में शामिल कई लोग विभिन्न सेवाओं से हैं इसलिए अलग-अलग मुक़दमा चलाने के बजाय यही बेहतर है कि एक स्पेशल ट्रिब्यूनल बनाया जाए.
उन्होंने लिखा कि पुलिस ने ओपन कोर्ट में मुक़दमा चलाने की राय भी दी थी. राजनीतिक दलों ने भी यही मांग की थी.
'अयूब ख़ान चाहते थे कि सभी जज पूर्वी पाकिस्तान से हों'
विशेष ट्रब्यूनल में तीन न्यायाधीश शामिल थे, जिनमें से दो पूर्वी पाकिस्तान से थे. जस्टिस एमआर ख़ान और जस्टिस मक़सूदुल हकीम. ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे. वह पश्चिमी पाकिस्तान से थे.
अयूब ख़ान चाहते थे कि सभी न्यायाधीश पूर्वी पाकिस्तान से हों ताकि कोई यह न कह सके कि भाषाई और क्षेत्रीय पूर्वाग्रह हावी हो गए हैं मगर यह मुमकिन नहीं हो सका. टर्म ऑफ़ रेफ़रेंस में इस शर्त को शामिल करके इस कमी को पूरा किया गया कि फ़ैसला बहुमत से होना चाहिए.
सरकार द्वारा तमाम एहतियाती क़दम उठाने के बावजूद मामले में पारदर्शिता का अहसास न जगाया जा सका. मामले में शेख़ मुजीबुर्रहमान का नाम शामिल होने के कारण मामला सही मायनों में आगे नहीं बढ़ सका और किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका.
मुक़दमा चल रहा था जब ढाका में होटल आरज़ू जला दिया गया. प्रदर्शनकारियों का मानना था कि सरकार ने यहां एक वादा माफ़ गवाह को ठहरा रखा है. चटगांग में एक डिस्पेंसरी में आग लगा दी गई क्योंकि सईद नाम के एक शख़्स वहां काम करते थे जो इस मामले में गवाह थे.
एसएम ज़फर ने लिखा कि इस स्थिति को देखते हुए उन्होंने मुख्य न्यायाधीश को स्थिति में सुधार होने तक सुनवाई स्थगित करने की सलाह दी.
क़ुदरतुल्लाह शहाब ने मुक़दमे में व्यवधान का एक और कारण भी बताया है: 'एक दिन, ढाका में एक बेक़ाबू भीड़ ने उस राज्य अतिथि गृह पर हमला कर दिया, जिसमें अगरतला षड्यंत्र केस ट्रिब्यूनल के प्रमुख, जस्टिस एसए रहमान रह रहे थे. उन्होंने बहुत ही मुश्किल से एक वफ़ादार बंगाली नौकर की कोठरी में छिपकर अपनी जान बचाई और चुपचाप हवाई जहाज़ में बैठकर लाहौर चले आए.'
'इस गोली ने पाकिस्तान के जिस्म को छलनी किया है'
ये मुक़दमा अवाम के ग़ुस्से और आक्रोश का शिकार क्यों हुआ? इसके कई कारण थे. मामले में शेख़ मुजीबुर्रहमान का नाम शामिल किए जाने से लोग पहले से ही नाराज़ थे. बाद में कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं भी हुईं. इस सिलसिले की पहली असाधारण घटना सार्जेंट ज़हूरुल हक़ की हत्या थी.
सार्जेंट अगरतला साज़िश के मामले में शामिल थे. क़ुदरतुल्लाह शहाब ने लिखा कि शुरू में सार्जेंट की मौत की ख़बर आई. बताया गया कि उन्हें सेना की हिरासत में हिंसा के बाद मौत के घाट उतार दिया गया था. पहले उन्हें किसी भारी चीज़ से गंभीर रूप से मारा गया और फिर गोली मार दी गई.
दूसरी ख़बर यह थी कि वह जेल से भागने की कोशिश में मारे गए हैं. शहाब के मुताबिक़, दूसरी ख़बर पर यक़ीन नहीं हुआ. उनके अनुसार, आम राय यह थी कि उन्हें बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया था. एस एम ज़फ़र भी उनके फ़रार होने की कहानी पर सवाल उठाते हैं.
वो कहते हैं कि सार्जेंट ज़हूरुल हक़ की मौत एक छिपा हुआ राज़ है. उन्होंने मामले में सरकारी वकील मंज़ूर क़ादिर की एक विशेष टिप्पणी का भी हवाला दिया: 'ये गोली सार्जेंट ज़हूर के जिस्म पर नहीं लगी, इसने पाकिस्तान के जिस्म को छलनी किया है.'
बदक़िस्मती का ये सफ़र सार्जेंट ज़हूर की रहस्यमयी मौत पर नहीं रुका. उसके बाद कई दर्दनाक घटनाएं हुईं. शहाब के मुताबिक़ सार्जेंट की मौत के बाद पूरे पूर्वी पाकिस्तान में दंगे शुरू हो गए.
ढाका में दो मंत्रियों के घरों में आग लगा दी गई. उनमें से एक ख़्वाजा शहाबुद्दीन थे और दूसरे अबदुस्सुबूर ख़ान. छात्रों ने राजशाही में विरोध रैली निकाली. राजशाही विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर डॉ. शमसुज़्ज़ुहा ने छात्रों को समझा-बुझाकर सलाह दी कि वो इधर-उधर हो जाएं. उनकी बातचीत जारी थी कि शहाब के मुताबिक़, एक सिपाही ने उन पर संगीन से हमला किया और टार्चर कर मौक़े पर ही मौत के घाट उतार दिया.
इस तरह सार्जेंट के बाद डॉक्टर शम्स का नाम भी 'शहीदों' की सूची में शामिल हो गया. इस घटना के बाद, क़ानून के राज की अवधारणा ख़त्म हो गई. कर्फ़्यू का उल्लंघन मामूली बात थी, बड़े पैमाने पर दंगे भड़क उठे.
हुकूमत से जुड़े दूसरे लोगों को भी निशाना बनाया गया. कई काउंसलर्स भी मारे गए. स्थिति इतनी ख़राब हो गई कि उन्हें छिपना पड़ा. कई अन्य कारणों में, ये भी एक प्रमुख कारण था जिसने मुक़दमे की सुनवाई को असंभव बना दिया.
सरकार ने केस वापिस क्यों लिया?
अगरतला साज़िश केस का दुर्भाग्य सिर्फ़ यही नहीं था कि मुक़दमे की सुनवाई पूरी ना हो सकी बल्कि ये भी कि सरकार इस मुक़दमा को वापिस लेने पर भी मजबूर हो गई. अयूब ख़ान मुक़दमा वापिस लेने पर मजबूर क्यों हुए? एस एम ज़फ़र ने लिखा है कि इसके कई कारण थे. इनमें से एक बड़ी वजह राजनेताओं की गोल मेज़ कॉन्फ़्रेंस थी.
अयूब ख़ान ने यह कॉन्फ़्रेंस राजनीतिक संकट तेज़ हो जाने पर बुलाई थी. कॉन्फ़्रेंस में शेख़ मुजीबुर्रहमान को भी बुलाया गया. वह अगरतला साज़िश केस की वजह से उन दिनों नज़रबंद थे. उन्होंने आने से इनकार कर दिया. उनके इंकार के बाद विपक्ष के पाकिस्तान डेमोक्रेटिक फ़्रंट ने उनकी रिहाई की मांग कर दी.
एसएम ज़फर ने लिखा कि विपक्ष की मांग पर उन्होंने अयूब ख़ान से कहा कि जब तक किसी व्यक्ति पर जुर्म साबित नहीं हो जाता तब तक उसे निर्दोष माना जाता है. इसलिए, उन्हें सम्मेलन में शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है. इस दौरान हालात बदल गए.
कुछ ग्रुप्स की तरफ़ से मुजीब के ख़िलाफ़ मुक़दमा वापस लेने की मुहिम शुरू कर दी गई. इस सिलसिले में एसएम ज़फर ने सबसे पहला नाम क़ानून के जाने माने जानकार एके ब्रोही का लिया है. एके ब्रोही ने अयूब ख़ान से मुलाक़ात की और उनपर ज़ोर दिया कि वो केस वापिस लें.
इसी बीच एक और घटना हुई. एसएम ज़फ़र ने लिखा कि शुरू में यह तय किया गया था कि मुजीब को ओपन कस्टडी एक्ट के तहत सम्मेलन में शामिल होने की अनुमति दी जाएगी.
ओपन कस्टडी का मतलब है कि अगर कोई व्यक्ति सेना की हिरासत में है तो वह आवश्यकतानुसार कहीं भी आ सकता है. गोल मेज़ सम्मेलन के प्रतिभागियों को भी इसकी जानकारी दी गई. इससे पहले कि मामला आगे बढ़ता, रावलपिंडी के कुछ लोगों ने मुजीबुर्रहमान की पत्नी को फ़ोन कर दिया. उन्हें सुझाव दिया गया कि वो मुजीब को ओपन कस्टडी यानि सेना की हिरासत में आने से रोक दें.
इस घटनाक्रम पर मुजीब के वकील डॉक्टर कमाल हुसैन ने एसएम ज़फ़र से मुलाक़ात कर उन्हें ज़मानत देने की मांग की. बदले हुए हालात में उन्होंने (एसएम ज़फ़र) पूर्वी पाकिस्तान के डिप्टी अटॉर्नी जनरल को मुजीब के वकीलों को ज़मानत अर्ज़ी दाख़िल करने के लिए कहने का निर्देश दिया.
मुजीबुर्रहमान ने ज़मानत के लिए आवेदन करने से इनकार क्यों किया?
जिस दिन मुजीब की ज़मानत अर्ज़ी दायर होनी थी एक और घटना हुई. ज़मानत याचिका की सुनवाई के लिए ट्रिब्यूनल ने समय तय कर दिया. दूसरी तरफ़ वकील ज़मानत अर्ज़ी जमा कराने की अनुमति के लिए जेल पहुंच गए.
इस बीच, रेडियो पाकिस्तान से एक समाचार प्रसारित किया गया. ख़बर में बताया गया कि शेख़ मुजीबुर्रहमान ने गोल मेज़ सम्मेलन में शिरकत के लिए ज़मानत पर रिहा होने की पेशकश को क़बूल कर लिया है.
यह ख़बर उनकी ज़मानत अर्ज़ी पर सुनवाई से पहले ही प्रसारित हो गई जिस पर मुजीब ने बेल एप्लिकेशन दाख़िल करने से इंकार कर दिया. उनका कहना था कि इस तरह ये संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि जैसे उन्हें ख़रीद लिया गया है.
मुजीब की पत्नी को को एक बार फिर रावलपिंडी से फ़ोन किए गए. इस बार उन्हें सलाह दी गई कि मुजीब बिना शर्त रिहाई की मांग दोहराएं. एस एम ज़फ़र के अनुसार ये टेलीफ़ोन कॉल्स मंत्री अब्दुस्सुबूर ख़ान के घर से की गई थीं.
अवामी लीग के एक नेता ताजुद्दीन ने पत्रकारों से कहा कि शेख़ मुजीबुर्रहमान एक आज़ाद शख़्स के रूप में गोल मेज़ सम्मेलन में शिरकत करेंगे. उनसे पूछा गया कि ये सब कब हुआ?
उन्होंने बताया कि उन्हें इस बात का आश्वासन दिया गया है. पता चला कि मौलवी फ़रीद अहमद ने अब्दुस्सुबूर ख़ान को फ़ोन पर यह आश्वासन दिया था. उन्होंने कहा कि इस अवसर पर विपक्ष के नेता नवाबज़ादा नसरुल्लाह ख़ान भी मौजूद थे.
'शेख़ मुजीब को फांसी से बचा लिया गया'
बात इतनी बढ़ गई कि राजनेताओं ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया. ऐसे नेताओं में मियां मुमताज़ मुहम्मद ख़ान दौलताना, सरदार शौकत हयात ख़ान, जुल्फ़िक़ार अली भुट्टो और एयर मार्शल रिटायर्ड असगर ख़ान शामिल थे.
असग़र ख़ान तो इस क़दर जोश में थे कि किसी अस्पष्ट सूचना पर मुजीब के स्वागत के लिए लाहौर हवाई अड्डे चले गए. सरदार शौकत हयात ने कहा कि अगर मुजीब को रिहा किया जाता है, तो वह शायद 6 सूत्र से अलग हो जाएंगे. एसएम ज़फर लिखते हैं, ऐसी बातें कही ज़रूर गईं लेकिन उनका असर नहीं हो सका.
जनरल गुल हसन लिखते हैं कि एक के बाद एक घटनाओं ने अयूब ख़ान पर दबाव बढ़ा दिया और उन्हें केस वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा. जनरल गुल हसन इन घटनाओं का विवरण देने के बाद लिखते हैं: 'इस तरह शेख़ मुजीब की गर्दन को फांसी के फंदे से बचा लिया गया.'
जनरल गुल हसन को क्यों उम्मीद थी कि शेख़ मुजीबुर्रहमान अगरतला साज़िश केस से बच नहीं पाएंगे? उन्होंने लिखा कि जब गोल मेज़ सम्मेलन में शामिल होने के लिए उनकी रिहाई की मांग की गई, तो अयूब ख़ान ने शुरू में इसे ख़ारिज कर दिया. अयूब ख़ान ने राजनेताओं के सामने देश तोड़ने की साज़िश में शामिल होने के सबूत पेश किए.
क्या शेख़ मुजीब अगरतला षड्यंत्र में शामिल थे ?
पूर्वी पाकिस्तान के लोग देश तोड़ने की साज़िश के बारे में क्या सोच रहे थे? इस संबंध में मौदूद अहमद ने अपनी किताब में अपने विचार व्यक्त किए हैं.
वह लिखते हैं कि स्वशासन का अधिकार हासिल करने के लिए विदेशियों से मदद मांगने की परंपरा रही है. क्या शेख़ मुजीब ने भी ऐसा किया होगा? वह इस संभावना से इनकार करते हैं. वह लिखते हैं कि पाकिस्तान और भारत के बीच जिस तरह की कड़वाहट मौजूद थी, उसकी पृष्ठभूमि में इस तरह के समर्थन को स्वीकार करना घातक होगा.
अल्ताफ़ गौहर ने भी कुछ ऐसा ही लिखा है. उस समय की स्थिति का ज़िक्र करते हुए वह लिखते हैं कि उन दिनों देश में असाधारण सियासी बेचैनी थी. कड़वाहट बढ़ती जा रही थी. जनता मायूस थी और प्रशासन भरोसा क़ायम करने में नाकाम था. ऐसे हालात में ख़ुफ़िया एजेंसियां साज़िश के सुराग़ में लगी रहती थीं: 'आख़िरकार, उन्हें इसका फल अगरतला एजेंसी के रूप में मिल गया.'
क़ुदरतुल्लाह शहाब की राय अल्ताफ़ गौहर के विपरीत है. उन्होंने लिखा: 'बेशक, साज़िश का मामला तथ्यात्मक सबूतों पर आधारित था, लेकिन जिस तरह से इस मामले को अख़बारों और अन्य मीडिया संसाधनों के ज़रिए प्रसारित और प्रचारित किया गया, इसने इसके तथ्यों को राजनीतिक और सार्वजनिक उन्माद के दलदल में झोंक दिया.'
हालांकि, अगरतला साज़िश केस के मामले में शेख़ मुजीब की संलिप्तता के बारे में जनरल गुल हसन का बयान दो टूक है. उनके अलावा किसी अन्य लेखक ने उन पर कोई दो टूक आरोप नहीं लगाया है. अल्ताफ़ गौहर ने खुले तौर पर कहा है कि अभियोजन पक्ष के पास उनके ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत नहीं था. एसएम ज़फ़र ने ऐसा खुलकर नहीं कहा लेकिन ये ज़रूर लिखा है कि उनकी ख़्वाहिश थी कि वो इस मुक़दमे में बरी हों. ये बात उन्होंने जिस अंदाज़ में लिखी, उससे लगता है कि वो ख़ुद मामले से अलग होना चाहते थे.
'सरकार का ख्याल था मुजीब की सियासी मौत हो जाएगी'
इस तरह के बयानों से आम धारणा यह है कि शेख मुजीब के खिलाफ मामला बहुत मज़बूत नहीं था. अगर तथ्य कमज़ोर थे तो उन्हें इस मामले में क्यों खींचा गया? इस विषय पर इतिहासकारों और शोधकर्ताओं ने काफ़ी तवज्जो दी है.
डाक्टर सफ़दर महमूद ने पाकिस्तान क्यों टूटा नामक किताब में इसकी वजह बताई है. वो लिखते हैं कि इसकी वजह पूर्वी पाकिस्तान में गवर्नर मुअन्नम ख़ान थे जिनकी शेख मुजीब से दुश्मनी थी.
वह लिखते हैं कि पूर्वी पाकिस्तान में उनके बारे में यह धारणा थी कि मुअन्नम अयूब ख़ान की कठपुतली हैं. उनके प्रति इसी धारणा की वजह से उनकी सत्ता बंगालियों को पश्चिमी पाकिस्तान से दूर ले जाने का कारण बनी. अल्ताफ़ गौहर ने लिखा है: 'गवर्नर मुनअम ख़ान अकसर अयूब ख़ान को कहा करते थे कि वह शेख़ मुजीबुर्रहमान को एक दिन के लिए भी जेल से बाहर रहने की इजाज़त नहीं देंगे. अपने ख़ास अंदाज़ में ऐलान करते: 'किसी मां के पुत्तर को मेरे राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ बात करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती.'
जानी मानी शोधकर्ता समांथा क्रिस्टीन सेन ने उस समय की स्थिति पर एक लेख लिखा था. उन्होंने लिखा कि अगरतला साज़िश के मामले से पहले मुजीब ने 6 प्वाइंट्स बनाए थे और जनता की राय को अपने पक्ष में करने की कोशिश में व्यस्त थे. उनके विचार में इस मुक़दमे का उद्देश्य उनके आंदोलन को कुचलना था जो आत्म निर्णय के अधिकार के लिए चलाया जा रहा था. सरकार का ख़्याल था कि इस मुक़दमे से मुजीब की राजनीतिक मौत हो जाएगी.
लेखक क़मरुद्दीन अहमद ने अपनी किताब 'सोशियो-पॉलिटिकल हिस्ट्री ऑफ बंगाल एंड बर्थ ऑफ बांग्लादेश' में लिखा है कि सरकार का विचार था कि भारत के साथ मिलीभगत की बात सामने आने पर जनता मुजीब के ख़िलाफ़ उठ खड़ी होगी और उन्हें सज़ा-ए-मौत देने की मांग करेगी. क़मरुद्दीन अहमद ने उस समय के क़ानून मंत्री एस एम ज़फ़र का हवाला देते हुए लिखा: हुकूमत समझती थी कि उस (मुजीब) के परिवार को जनता के ग़ुस्से और आक्रोश से बचाना मुश्किल होगा.'
'मुजीब हीरो बनकर उभरेगा'
सरकार ने जिन उम्मीदों पर ये मुक़दमा किया और उसमें शेख़ मुजीबुर्रहमान का नाम भी शामिल किया, क्या ये उम्मीदें पूरी हुईं
मशहूर लेखक और ब्यूरोक्रेट एजी नूरानी ने अपने एक लेख में मौदूद अहमद की किताब की समीक्षा की है. वो लिखते हैं कि उस ज़माने के हालात को समझने के लिए मौदूद अहमद की गवाही अहम है. मौदूद अहमद ने अगरतला षड्यंत्र केस के सामने आने के बाद के हालात की विस्तृत समीक्षा की है.
उन्होंने लिखा है कि जब शेख़ मुजीबुर्रहमान ने 6 बिंदु पेश किए तो उन्हें महत्वपूर्ण वर्गों का समर्थन प्राप्त था. इन वर्गों में व्यवसायियों के अलावा समाज की अहम और प्रभावशाली शख़्सियतें भी शामिल थीं. हालांकि, साज़िश का मामला सामने आने के बाद ये लोग पीछे हट गए. उनकी क़ैद के दौरान, स्टूडेंट्स का ग्रुप उनके संपर्क में रहा था, वह भी पीछे हट गया. उनकी ओर से कोई वकील पेश होने तक को तैयार नहीं था.
लेखक मौदूद अहमद लिखते हैं कि यह देखकर मैं जूनियर वकील होते हुए भी आगे बढ़ गया. हालांकि मेरा अवामी लीग या शेख़ मुजीबुर्रहमान से कोई संबंध नहीं था. उन्होंने लिखा: 'मैं मुजीब का बचाव करना चाहता था क्योंकि मेरा मानना था कि मुजीब ने बंगालियों के लिए बहुत क़ुर्बानियां दी हैं.
कुछ ही समय बाद, ब्रिटेन में रहने वाले पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने इस मुक़दमे के लिए एक ब्रिटिश वकील थॉमस विलियम्स की सेवाएं लीं. इस तरह दुनियाभर में इस मामले की गूंज सुनाई दी. समांथा क्रिस्टीना सेन भी मुजीब के राजनीतिक अलगाव की धारणा का समर्थन करती हैं.
उन्होंने लिखा कि छात्र सहमे हुए थे. ढाका यूनिवर्सिटी के इक़बाल हॉल में उन्होंने स्थिति की समीक्षा के लिए एक बैठक की लेकिन वो कई रणनीति तैयार करने में नाकाम रहे. इस सिलसिले में एक प्रदर्शन का ज़िक्र भी मिलता है जिसमें शामिल होने वालों की तादाद 150 के क़रीब थी.
जनता की प्रतिक्रिया की यह स्थिति सरकार के अनुमानों के अनुरूप थी, लेकिन धीरे-धीरे हालात बदलने लगे. समांथा क्रिस्टीन सेन ने पूर्वी पाकिस्तान की स्थिति के बारे में अमेरिकी दूतावास के तार का ज़िक्र किया है. उस तार में कहा गया है कि: 'अगर सरकार इन मामलों में मुजीब को खुलेआम घसीटती है, तो वह एक हीरो बनकर उभरेगा.'
मौदूद अहमद ने भी इस विषय पर विचार व्यक्त किए हैं. उन्होंने लिखा: 'जिस तरह राजनीतिक मुक़दमों में होता है, स्थिति बदल गई. बदले हुए हालात की मांग ये है कि बंगाल में राष्ट्रवाद की लहर चल पड़ी.'
इस विषय पर मौदूद अहमद ने भी अपने विचार व्यक्त किए हैं। उन्होंने लिखा: "जैसा कि राजनीतिक मामलों में होता है, स्थिति बदल गई है. बदली हुई परिस्थितियों का मतलब यह है कि बंगाली राष्ट्रवाद की लहर शुरू हो गई है.
'यहया को मालूम होना चाहिए था अगरतला केस बम की तरह फटेगा'
शोधकर्ता डॉ. सफ़दर महमूद ने पाकिस्तानी दृष्टिकोण से इस मामले के प्रभाव की समीक्षा की है. वह लिखते हैं कि मुजीब इस मुक़दमे के परिणामस्वरूप नायक के रूप में उभरे. उनके 6 बिंदुओं को मज़बूती मिली और देश में पहली बार अलगाव की संभावना पर खुलकर बहस होने लगी.
क़ुदरतुल्लाह शहाब ने यही बात कुछ और स्पष्टता के साथ लिखी है: 'पूर्वी पाकिस्तान का अलगाव, उसका अलग नाम, झंडा और राष्ट्रगान की जानकारियां खुल कर सामने आ गईं. अलगाववादियों को भी अपनी जायज़ और नाजायज़ शिकायतों को प्रचारित करने का अच्छा मौक़ा मिल गया. बहुत ही हौसले के साथ ये जानकारियां अख़बारों में दी जाती थीं, इसके दो पहलू थे. एक पहलू ये था कि पश्चिमी पाकिस्तान के ख़िलाफ़ नफ़रत बढ़ती थी और अयूब ख़ान की केंद्र सरकार पर भरोसा कमज़ोर पड़ता था. दूसरा ये पहलू ये था कि अलगाववाद की जड़ें और गहरी होती गईं और शेख़ मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व को बैठे बिठाए लोकप्रियता हासिल हो गई.'
'पाकिस्तान ज़िंदाबाद की जगह जॉय बांग्ला के नारे'
एक अन्य शोधकर्ता डेविड लुडिन ने लिखा है कि शेख़ मुजीबुर्रहमान को अगरतला साजिश मामले सहित अन्य मामलों में तीन साल जेल में बिताने पड़े. इस दौरान छात्रों ने अयूब ख़ान के ख़िलाफ़ उग्र आंदोलन शुरू कर दिया. देश के पूर्वी भाग में स्थिति अपेक्षाकृत भिन्न थी.
वामपंथी राजनेताओं और छात्रों ने 'स्वतंत्र गणराज्य पूरबा देश' की स्थापना की मांग कर दी. सर्वदलीय छात्र संग्राम परिषद नाम के छात्र संगठन ने 11 सूत्रीय चार्टर पेश किया. उनका कहना था कि पूर्वी पाकिस्तान में इस चार्टर के तहत स्वशासन का अधिकार दिया जाए.
मुजीब के इस मामले में शामिल किए जाने से न केवल सरकार की विश्वसनीयता, बल्कि उसका भरोसा भी कम हुआ. इसका कारण यह था कि लोगों को न तो सरकार की मंशा पर भरोसा था और न ही उसकी निष्पक्षता पर. ब्रिटिश अख़बार 'द टाइम्स' की एक टिप्पणी यह समझने के लिए काफ़ी है कि कैसे सरकार की छवि ख़राब की गई. अख़बार ने लिखा: 'शेख़ मुजीब को एक ऐसे मामले में फंसाने की कोशिश की जा रही है, जो कथित तौर पर उस वक़्त तैयार हुआ जब मुजीब जेल में थे.'
बांग्लादेश से आरोपों के पक्ष में गवाही
अगरतला षड्यंत्र के दिनों में माहौल हुकूमत के पक्ष में नहीं था. मुजीब या इस साज़िश के पक्ष में अगर उसके पास कुछ सबूत थे भी तो कोई उनपर यक़ीन करने को तैयार नहीं था. मुक़दमा ख़त्म हो जाने के बाद तो स्थिति बिल्कुल ही बदल गई. आने वाले 4 दशकों तक इस धारणा में कोई तब्दीली नहीं हुई लेकिन 2011 में बांग्लादेश से आने वाली एक गवाही ने स्थिति बदल दी.
बांग्लादेश के सांसद शौकत हुसैन ने संसद के अंदर ख़ुलासा किया कि अगरतला साज़िश के बारे में पाकिस्तान सरकार के आरोप सही थे. उन्होंने एक हीरो की तरह अपना कारनामा बयान करते हुए कहा: 'ये आरोप इसलिए सही हैं कि मैं ख़ुद उन घटनाओं का एक किरदार था.'
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