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एक वैज्ञानिक और टीवी स्टार ने कैसे बदल दी बांग्लादेश की तस्वीर
- Author, मोअज़्ज़म हुसैन
- पदनाम, बीबीसी बांग्ला, लंदन
टंगाइल के एक गाँव में एक नए टीन के शेड वाले घर के सामने शहर से आए लोगों का एक समूह खड़ा है. फ़सल के खेत का दौरा करने के बाद वह थक गया है और थोड़ा आराम कर रहा है. धान की स्थानीय किस्म चामरा के स्थान पर अधिक उपज देने वाले धान की खेती शुरू होने के बाद क्षेत्र की स्थिति क्या है, यह देखने गये थे ये लोग.
कई शहरी लोगों को देख कर घर का एक आदमी निकल कर बाहर आ गया. जानना चाहा कि ये लोग कौन हैं.
"हम बांग्लादेश चावल अनुसंधान संस्थान (राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट) के लोग हैं," उन्होंने कहा.
बांग्लादेश राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के पूर्व वैज्ञानिक डॉक्टर एमए सलाम ने कहा, "इसके बाद जो कुछ हुआ, उसके लिए हम बिल्कुल भी तैयार नहीं थे."
"वह आदमी ख़ुशी से चिल्लाया और मुझे गले लगा लिया. उसने कहा, ''अल्लाह ने आपको फ़रिश्ता बनाकर हमारे पास भेजा है. हम चौंक गए. क्या हुआ, कुछ समझ नहीं पा रहे थे."
घटना 1996 की है. जमुना पुल के निर्माण के लिए जिस नदी को नियंत्रित किया गया था, उसके कारण यह क्षेत्र तब बाढ़ मुक्त हो गया था. पहले वहां चामरा धान की स्थानीय क़िस्में ही उगाई जाती थीं, जो बाढ़ के पानी में उगती हैं और तीन से चार फ़ुट पानी में उगाई जा सकती हैं. लेकिन उपज बहुत कम होती थी. इलाके के बाढ़ से मुक्त होने के बाद किसानों ने पहली बार अधिक उपज देने वाली धान की क़िस्मों की खेती शुरू की.
इसके बाद वह किसान डॉक्टर सलाम और उनके साथियों का हाथ पकड़कर घर के अंदर ले गया. उसने कहा, "यह जो टीन की छत वाला घर आप देख पा रहे हैं, इसे मैंने धान की बिक्री से मिले पैसों से बनाया है. मेरी सात पुश्तें अब तक झोपड़ियों में ही रहती आई हैं. चामरा धान की खेती के समय हमारे पास कभी खाने को होता था, तो कभी नहीं होता था. अब देखिये, मेरे पास कितना धान है. आप लोगों ने हमलोगों की ज़िंदगी बदल दी."
एक सफल चावल वैज्ञानिक के रूप में अपने कई दशक के लंबे कार्यकाल में डॉक्टर सलाम की सबसे मधुर यादों में से यह एक है.
"आउस, आमन और बोरो - इन तीनों मौसमों को मिलाकर अब हमारे देश में कुल 11 से साढ़े ग्यारह मिलियन हेक्टेयर भूमि पर खेती होती है. अब हमें प्रति हेक्टेयर औसतन चार टन उपज मिलती है. परिणामस्वरूप, हम अब अतिरिक्त धान का उत्पादन कर पा रहे हैं. यह न होने पर हम प्रति हेक्टेयर डेढ से दो टन धान का ही उत्पादन कर पाते जिससे बांग्लादेश के 17 करोड़ लोगों का पेट भरना असंभव था," उन्होंने कहा था.
अकाल की यादें
मैमनसिंह शहर से पुरानी ब्रह्मपुत्र नदी पार करके चर ईश्वरदिया गांव है. 1974 की शरद ऋतु में जब बांग्लादेश अपने इतिहास में सबसे ख़राब खाद्य संकटों में से एक का सामना कर रहा था, तब उस गांव में भी भारी अभाव था.
चर ईश्वरदिया की रशीदा उस समय किशोरी थीं. हर दिन भोजन के लिए उन्हें अपने घर के पास एक लंगरखाने में लाइन में खड़ा होना पड़ता था.
रशीदा कहती हैं, "लाइन में खड़े होने पर किसी दिन रोटी मिलती, किसी दिन माड़ा हुआ आटा मिलता. लगभग एक साल तक अभाव की यह स्थिति रही. चावल अगर होता भी था तो हमारे पास उसे ख़रीद कर खाने का सामर्थ्य नहीं था. इसलिये आटा लाकर खाते थे, आलू लाकर खाते थे, कभी-कभी बिना खाये रह जाते थे. कभी-कभी अरबी के पत्ते का साग बनाकर खा लिया. हमने इस तरह दिन काटे हैं."
एम ए सलाम उस समय चर ईश्वरदिया से मात्र 10 किलोमीटर दूर बांग्लादेश कृषि विश्वविद्यालय के छात्र थे. वह एक ग़रीब किसान परिवार से थे. वह वहां जिस परिवार के साथ रहते थे, उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत ही ख़राब थी.
रशीदा बताती हैं, "उन्होंने उस समय जो किया है, उसे मैं कभी नहीं भूल सकता. चाहे उन्हें कितनी भी दिक्क़त का सामना करना पड़ा, वे मुझे हर दिन चावल खाने को देते थे, हालांकि वे ख़ुद दलिया खाकर रह जाते थे. वे मुझसे इतना प्यार करते थे."
एम ए सलाम ने कृषि वैज्ञानिक बनने का सपना देखा था. छोटी उम्र में ही एक ग़रीब किसान पिता ने उन्हें ये सपना दिखाया था.
"जब मैं कक्षा तीन में था, तब एक दिन धान की कटाई के मौसम में मैं अपने पिता के साथ धान लेने के लिये बैलगाड़ी में खेत पर गया था. थोड़ी देर बाद मेरे गालों से पसीना बहने लगा. तब मेरे पिता ने कहा, 'देखो बेटा, खेती बाड़ी कितना कठिन काम है. कितनी मेहनत लगती है इसमें. तुम अगर पढ़-लिख गए तो तुम्हें इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ेगी. तुम अच्छी तरह रहोगे, तो हम भी अच्छी तरह रह पाएंगे," अपने बचपन की बात करते हुए डॉक्टर सलाम की आंखें छलछला आईं.
डॉक्टर एम ए सलाम अब बांग्लादेश के सबसे प्रमुख चावल वैज्ञानिकों में से एक हैं. बांग्लादेश के चावल अनुसंधान संस्थान ने धान की जितनी उन्नत क़िस्में विकसित की हैं, उनमें से कम से कम 20 क़िस्मों के विकास से वह सीधे तौर पर जुड़े हैं.
उन लोगों की खोज ने बांग्लादेश की कृषि की तस्वीर बदल कर रख दी है. मैं उनसे ढाका के गुलशन स्थित संस्थान में बात कर रहा था जहां वे अब एक नये शोध में लगे हुए हैं.
जब उन्होंने 1977 में बांग्लादेश चावल अनुसंधान संस्थान में नौकरी शुरू की तो उस समय अकाल के बाद के बांग्लादेश के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि इस देश की विशाल आबादी के लिए खाद्यान्न की व्यवस्था कैसे की जाए.
डॉक्टर सलाम कहते हैं, "तब बांग्लादेश में एक व्यक्ति दिन में शायद केवल एक बार ही भोजन करता था और वह भी शायद एक सेर चावल का भोजन होता था. चावल ही उसका प्रोटीन था, चावल ही उसका विटामिन था, वही सब कुछ था. बांग्लादेश चावल की भूमि है. फिर भी कितना अकाल, कितनी दुखद स्थिति थी.''
चावल अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों के सामने तब सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि धान का उत्पादन कैसे बढ़ाया जाए.
डॉक्टर सलाम कहते हैं, "जब मैंने काम शुरू किया, तब हमारे वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने कहा कि हमें यह करना ही होगा. हमारी भी प्रतिज्ञा है कि हम इस देश की स्थिति को बदल कर रख देंगे."
बीआर-3 या विप्लव
बांग्लादेश में स्वतंत्रता के शुरुआती दिनों में चावल की अच्छी उपज देने वाली केवल एक किस्म 'ईरी - 8' की खेती प्रयोग के रूप से की जा रही थी, जिसका विकास अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान द्वारा किया गया था.
लेकिन बांग्लादेश में इस क़िस्म की खेती में सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इसकी खेती का समय काफ़ी लंबा था. इसके अलावा बोरो मौसम में खेती करने के लिए भूमि को सिंचाई की आवश्यकता होती है और उस समय बांग्लादेश में आधुनिक सिंचाई प्रणाली विकसित नहीं हुई थी.
चावल अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने तब 'इरी-8' के साथ बांग्लादेश के एक स्थानीय क़िस्म लतीशाइल धान को मिलाकर संकरप्रजाति की किस्म 'बीआर -3' विकसित की, जिसका दूसरा नाम विप्लव था.
लेकिन यह भी धान की खेती में अपेक्षित सफलता लाने में विफल रही.
"मुख्य समस्या रोशनी के प्रति संवेदनशीलता की थी. बांग्लादेश में सामान्यत: धान की जितनी भी स्थानीय क़िस्में रोपी जाती थीं, वे सभी प्रकाश संवेदनशील थीं. नतीजतन, इनकी रोपाई से कटाई तक का समय बहुत लंबा था. हमारे सामने अब चुनौती थी कि हम स्थानीय क़िस्म के धान से प्रकाश संवेदनशीलता कैसे ख़त्म कर सकते हैं."
1985 में एम ए सलाम इसी प्रकाश संवेदनशीलता विषय पर पीएचडी करने के लिए फ़िलिपींस गए. वह 1988 में वापस आए.
"अब हमारी कोशिश शुरू हुई कि हम चावल की स्थानीय क़िस्मों से फ़ोटो अवधि संवेदनशीलता को कैसे हटा सकते हैं. यदि ऐसा किया जा सका तो धान की खेती तीन महीने में ही की जा सकेगी. हम इसके विज्ञान को जानते हैं. यह शुद्ध रूप से आनुवांशिकी है."
ब्री -29 लाया क्रांति
बांग्लादेश को चावल अनुसंधान में धीरे-धीरे सफलता मिलने लगी. एक के बाद एक चावल की अधिक उपज देने वाली क़िस्मों के आ जाने से खाद्य उत्पादन में वृद्धि होने लगी. नब्बे के दशक के मध्य में सबसे बड़ी सफलता मिली. चावल अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित 'ब्री-28' और 'ब्री-29' धान की क़िस्मों से आख़िरकार क्रांति आई.
बांग्लादेश में वार्षिक धान उत्पादन का आधा हिस्सा अब अकेले इन दो क़िस्मों से आता है. ब्री-28 से प्रति हेक्टेयर पांच टन तक उपज होती है और ब्री -29 से उपज छह टन प्रति हेक्टेयर तक होती है. यह प्रमाणित है.
डॉक्टर सलाम के अब तक के सबसे सफल अनुसंधानों में से एक 'ब्री -50' है. 2006 में आविष्कृत इस क़िस्म का लोकप्रिय नाम बांग्लामती है. चावल की इस सुगंधित क़िस्म की गुणवत्ता काफ़ी हद तक बासमती जैसी है.
डॉक्टर एम ए सलाम को चावल अनुसंधान के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 2006 में भारत में आयोजित अंतरराष्ट्रीय चावल कांग्रेस में सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक का पुरस्कार मिला.
शेख़ सिराज
बांग्लादेश में कृषि को आधुनिक बनाने का पहला प्रयास साठ के दशक में कुमिल्ला ग्रामीण विकास अकादमी में किया गया था. इसके संस्थापक अख़्तर हामिद ख़ान ने प्रायोगिक तौर पर जापान से लाए गए उन्नत क़िस्म के धान की खेती की पहल की थी. लेकिन इस धान की खेती के लिए कृत्रिम सिंचाई की आवश्यकता होती है. इसलिए गांव में गहरे ट्यूबवेल लगवाए जा रहे थे.
"जब ट्यूबवेल से ज़मीन के नीचे से पानी निकाला जा रहा था तो कुछ ग्रामीण डर के मारे भाग गए. उन्होंने इसे अल्लाह के ख़िलाफ़ क़दम के तौर पर माना था. समझ ही सकते हैं कि शुरुआत में कृषि में नई तकनीकों या विचारों के प्रति बांग्लादेशी किसानों का रवैया कैसा था," शेख़ सिराज ने बताया. वह बांग्लादेशी टेलीविज़न के बहुत लोकप्रिय प्रस्तुतकर्ता हैं.
घुटने तक पैंट मोड़े, जैतूनी हरे रंग की ट्रेडमार्क शर्ट पहने और हाथ में कैमरा लिये शेख़ सिराज अब बांग्लादेश में जहां भी जाते हैं, किसान उनका गर्मजोशी से स्वागत करते हैं.
लेकिन जब उन्होंने पहली बार बांग्लादेश के राष्ट्रीय टेलीविज़न पर कृषि पर कार्यक्रम शुरू किया था, तब स्थिति बहुत प्रतिकूल थी.
उन्होंने बताया, "तब हम बड़े कैमरे लेकर जब गांवों में जाते थे तो लोग उसे देखकर डर जाते थे. उन्हें लगता था कि यह तोप है. माइक्रोफ़ोन को वे बंदूक़ की नली समझते थे. गांव तब सामाजिक रूप से बहुत पिछड़े हुए थे. गांव के लोग इतने शर्मीले थे कि कैमरे के सामने लोगों से बात करवाना मुश्किल था"
'माटी ओ मानुष'
पिछले कुछ दशक में बांग्लादेश के कृषि क्षेत्र में हुए नाटकीय परिवर्तनों के पीछे शेख़ सिराज को मुख्य पात्रों में से एक के रूप में वर्णित किया गया है. बांग्लादेश में जब वैज्ञानिक एक के बाद एक चावल की नई उच्च उपज देने वाली क़िस्मों का आविष्कार कर रहे थे, कृषि में नये तौर तरीके और रणनीतियों से लोगों को परिचित कराने के लिए सरकार की ओर से विभिन्न तरह से प्रयास किए गए, तब उनको पूरे देश में फैलाने में शेख़ सिराज के कृषि कार्यक्रम, 'माटी ओ मानुष' ने बड़ी भूमिका निभाई.
वो बताते हैं, "शुरुआत में इस कार्यक्रम का नाम था 'आमार देश'. तब यह 50 मिनट का पाक्षिक कार्यक्रम था. बाद में मैंने इसे 'माटी ओ मानुष' नामक साप्ताहिक कार्यक्रम में बदल दिया. मुझे लगा था कि बांग्लादेश के किसानों को मनोरंजनपूर्ण कार्यक्रमों की बजाय शिक्षामूलक और प्रेरक कार्यक्रमों की अधिक ज़रूरत है. किसानों को नए बीज, नई रणनीति और नए कौशल अगर ठीक ढंग से समझाया जाए तो कृषि के क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाना संभव है."
पिछले चार दशक से शेख़ सिराज बांग्लादेश के किसानों के लिए कृषि के बारे में जानकारी प्रदान करने का मुख्य स्रोत रहे हैं. 1980 के दशक में जब टेलीविज़न हर घर तक नहीं पहुंचा था, तब लोग हर शनिवार शाम को गांव के बाज़ारों और सामुदायिक केंद्रों में 'माटी ओ मानुष' कार्यक्रम देखने के लिए जमा होते थे.
हालांकि, किसानों को कृषि के नए तौर तरीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना आसान नहीं था.
वो बताते हैं, "आज के किसान और तीस साल पहले के किसानों के बीच ज़मीन आसमान का अंतर है. तब कृषि के प्रचार के लिए कार्य कर रहे अधिकारी जो कहते थे या एक टेलीविज़न प्रस्तोता के रूप में मैं जो कुछ कहता था, वे उसे मानना नहीं चाहते थे. वे सोचते थे कि हम लोग कृषि के बारे में जो कुछ बता रहे हैं, उससे अगर फ़सल अच्छी नहीं हुई तो? इसलिए वह आसानी से प्रेरित नहीं होते थे. वह नई तकनीक को आसानी से नहीं अपनाना चाहते थे."
"जब मैं अस्सी के दशक में अधिक उपज देने वाली धान की नई क़िस्मों के बारे में बात करता था, गेंहू की बात करता था तो उन्होंने मुझे स्पष्ट रूप से कहा था कि इस रबर के चावल को वे नहीं खाएंगे. तब तक विकास किए गए चावलों की गुणवत्ता उतनी अच्छी नहीं थी. पका हुआ चावल रबर की तरह लगता था, चावल अगर ऊपर से थाली में डाला जाता तो वह रबर की तरह गिरता था."
लेकिन जहां वैज्ञानिक अपने शोध में नई-नई सफलताएं पाते जा रहे थे, वहीं शेख़ सिराज भी अपने कार्यक्रमों के ज़रिए किसानों का दिल जीतने के लिए नई-नई रणनीतियां अपना रहे थे.
भाषा में बदलाव
वो बताते हैं, "तब बांग्लादेश के टेलीविज़न कार्यक्रम में मानक भाषा में बात करना पड़ता था. मैं समझ पा रहा था कि गांव के लोगों से मेरी कुछ दूरी रह जा रही है. किसान मेरी कुछ बातें समझ पाते थे, कुछ नहीं समझ पाते थे. दूसरी ओर जब मैं किसानों से बात करता था, तब वह भी अपनी बात सही ढंग से नहीं समझा पा रहे थे.''
टेलीविज़न शो में शेख़ सिराज ने अपनी भाषा में बदलाव किया, गांव के लोगों के साथ उनकी बोली में बातचीत शुरू की. अपनी वेश भूषा में भी उन्होंने बदलाव किया. फ़ैशनेबल शहरी कपड़ों की जगह ली उनकी वर्तमान ट्रेडमार्क जैतूनी हरे रंग की शर्ट ने.
कैमरे के शॉट में अब वे लोग केवल ताकते नहीं रहते थे बल्कि गांव के आम किसान, मज़दूर और महिला किसान बात करते भी नज़र आए.
अस्सी के दशक के उत्तरार्ध से स्थिति तेज़ी से बदलने लगी. विश्व बैंक के अनुसार, बांग्लादेश पिछले कुछ दशकों में कृषि क्षेत्र में सबसे तेज़ी से बढ़ती उत्पादकता का एक बड़ा उदाहरण है. केवल एक देश ने इसकी तुलना में अधिक कृषि उत्पादन किया है और वह देश चीन है.
शेख़ सिराज ने कहा, "एक बात तब से ही सब लोग समझ पा रहे थे. किसी भी तरह लोगों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी. आज हमारी स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ पर हम गर्व से कह सकते हैं कि लोग अब भूखे नहीं मर रहे हैं और इसमें सबसे बड़ी भूमिका है बांग्लादेशी किसानों की. इस सफलता के असली नायक वे ही हैं,''
बीएडीसी का योगदान
कृषि में नये-नये आविष्कार हुए, नई-नई तकनीकें लोगों को दी गईं, किसानों ने भी इन्हें अपनाना शुरू कर दिया. लेकिन उन्हें फ़सल उगाने के लिए और भी बहुत कुछ चाहिए था. शेख़ सिराज का कहना है कि बांग्लादेश में सरकार की सहायक नीति और बीएडीसी (बांग्लादेश एग्रीकल्चरल डिवेलपमेंट कॉरपोरेशन) जैसी संस्थाओं ने तब इस दिशा में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी.
उन्होंने कहा, "बांग्लादेश में आज का सिंचाई का बुनियादी ढांचा बीएडीसी द्वारा बनाया गया है. आज बीजों की जो उत्पादकता है, देश भर के किसानों को जो बीज मिलते हैं, उसकी डिलीवरी बीएडीसी द्वारा की जाती है."
उन्होंने कहा, "अगर सरकार ने कम क़ीमत पर सब्सिडी वाले उर्वरक उपलब्ध नहीं कराया होता तो यह सफलता कृषि को नहीं मिलती." अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में यूरिया खाद की जो क़ीमत है, बांग्लादेश सरकार द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले सब्सिडी वाले उर्वरक की क़ीमत उससे आधी है.
"बांग्लादेश में किसान उचित मूल्य न मिलने पर भी धान की खेती क्यों करते हैं? क्योंकि उसे कम क़ीमत पर सभी कृषि उपकरण मिलते हैं," शेख़ सिराज ने कहा.
साग सब्ज़ियों के मामले में भी क्रांति
बांग्लादेश को केवल धान के उत्पादन में ही नहीं बल्कि सभी प्रकार के खाद्य उत्पादन में सफलता मिली है.
"अब अनेक तरह की फ़सलें आ रही हैं. मीठे पानी में मत्स्य पालन के क्षेत्र में क्रांति हुई है. बांग्लादेश अब इस मामले में दुनिया में चौथे नंबर पर है. गांव-गांव में गायों के फ़ार्म हैं, बतख और मुर्गी के लिए पोल्ट्री फ़ार्म हैं. कुल मिलाकर बांग्लादेश की कृषि में महान क्रांति हुई है."
शेख़ सिराज और उनके टेलीविज़न कार्यक्रमों ने इस क्रांति में एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक के रूप में काम किया है.
ईश्वर दिया के कालिकापुर में बांग्लादेश सरकार के कृषि विभाग के कर्मचारियों ने 16 फ़ुट गुना 12 फ़ुट की ज़मीन पर छह बेड बनाकर दिखाया था कि वहां कितनी तरह की सब्ज़ियां उगाई जा सकती हैं. हर क्यारी में अलग-अलग तरह की सब्ज़ियां लगाई गई थीं ताकि साल भर वहां से एक परिवार का भरण-पोषण हो सके.
"तब इतनी साग सब्ज़ियां नहीं उगाई जाती थीं. किसान के अहाते में भी इतनी सब्जियां नहीं थीं. मैंने इसे टेलीविज़न पर बड़े पैमाने पर प्रसारित किया था."
शेख़ सिराज की इन पहलों का क्या परिणाम हुआ इसके बारे में उन्हें कोई संदेह नहीं है.
शेख़ सिराज कहते हैं, "आज़ादी के बाद गांव का आम किसान खाने के नाम पर सिर्फ़ चावल को ही जानता था. उसके साथ थाली में होता था थोड़ा सा नमक और हरी मिर्च. आज बांग्लादेश के गांव के आम लोगों की खाने की थाली में चावल के साथ थोड़ी सी सब्ज़ी, थोड़ी सी मछली, मांस का एक टुकड़ा भी होता है. इन्हें आज वे ही पैदा कर रहे हैं. मैं इसे बांग्लादेश में पिछले 50 वर्षों में एक बड़ा बदलाव मानता हूं.''
टेलीविजन के साथ-साथ यूट्यूब पर भी
शेख सिराज अभी भी 'हृदाये माटी ओ मानुष' (दिल में धरती और लोग) नामक एक नियमित कृषि कार्यक्रम बनाते करते हैं. उन्होंने अपने कृषि कार्यक्रमों और कृषि में योगदान के लिए बांग्लादेश के स्वतंत्रता पुरस्कार, एकुशे पदक से लेकर अनेक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किए हैं. वह बांग्लादेश में चैनल आई टेलीविज़न के निदेशकों में से एक हैं.
लेकिन समय बीतने के साथ वह अब किसानों तक पहुंचने के लिए टेलीविज़न के साथ-साथ यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म का भी उपयोग कर रहे हैं. वह यूट्यूब पर बांग्लादेश के सबसे बड़े सितारों में से एक हैं, उनके यूट्यूब चैनल को 27 लाख से अधिक लोग फ़ॉलो करते हैं.
वो कहते हैं, "पांच साल पहले जब मैं गांव जाता था तो किसान मुझसे कहते थे, 'आपको टेलीविज़न पर देखता हूं.और अब जब मैं गांव जाता हूं तो अस्सी प्रतिशत लोग मुझसे कहते हैं, 'सर, मैंने आपको यूट्यूब पर देखा. मोबाइल फ़ोन पर देखा."
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