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बांग्लादेश में प्रदर्शनः छात्रों ने एशिया की सबसे ताक़तवर महिला शेख़ हसीना को कैसे हिला दिया?
- Author, शुभोज्योति घोष
- पदनाम, बीबीसी बांग्ला संवाददाता
हिंसक प्रदर्शनों के बीच शेख़ हसीना ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दिया और अपनी बहन के साथ देश से बाहर निकल गई हैं. शेख़ हसीना वर्ष 2009 से लगातार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री थीं.
कई लोगों का मानना है कि पिछले सोलह सालों में प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजिद ने बांग्लादेश को ग़रीबी से बाहर निकाला है.
कुछ लोग ये भी मानते हैं कि बांग्लादेश ने जो प्रगति की है, वो शेख़ हसीना की वजह से है.
जानकारों का कहना है कि यह शेख़ हसीना के लगातार बढ़ रहे तानाशाही शासन के बावजूद हुआ है. लेकिन उनकी स्थिति जितनी कमज़ोर अब है, उतनी पहले कभी नहीं थी.
यूनिवर्सिटी और कॉलेज के छात्रों का प्रदर्शन, देशभर में व्यापक असंतोष, ख़ून ख़राबे और अफ़रातफ़री तक पहुंच गया है.
बांग्लादेश की सरकार ने प्रदर्शनों को रोकने की कोशिश की, लेकिन लोग पीछे नहीं हटे.
इसी दबाव की वजह से आख़िरकार शेख़ हसीना को इस्तीफ़ा देकर देश छोड़ना पड़ा है.
क्या छात्रों के प्रदर्शन ने गिरा दी सरकार?
शेख़ हसीना ने सोमवार को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा देकर देश छोड़ दिया. बड़ी तादाद में प्रदर्शनकारियों ने उनके निवास पर धावा बोल दिया.
शांत लेकिन मज़बूत मानी जाने वाली शेख़ हसीना देश के संस्थापक राष्ट्रपति की बेटी हैं और कई बार अपनी जान पर हमलों और संकट के समय से उबर चुकी हैं.
अपने कार्यकाल के दौरान शेख़ हसीना की सरकार देश के सीमा सुरक्षा बलों के हिंसक विद्रोह से भी बच चुकी है. उसमें 57 सैन्य अधिकारी मारे गए.
वो तीन विवादित आम चुनाव चुनाव जीत चुकी हैं. इन चुनावों की अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी आलोचना की है.
मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों और विपक्षी दलों के कई बार व्यापक प्रदर्शनों का सामना कर चुकी हैं.
लेकिन देश भर में छात्रों के प्रदर्शन से शुरू हुआ ये मौजूदा संकट उनके राजनीतिक जीवन की सबसे मुश्किल चुनौती साबित हुआ.
छात्रों के प्रदर्शन में समूचा देश घिर गया और विपक्षी दल छात्रों के पीछे एकजुट हो गए.
बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने विवादित कोटा व्यवस्था को समाप्त कर छात्रों की मुख्य मांग को तो पूरा कर दिया लेकिन अंसतोष समाप्त नहीं हुआ.
इन प्रदर्शनों में 100 से अधिक छात्र मारे गए जबकि बीते सप्ताह सरकार के ख़िलाफ़ शुरू हुए जन-आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा हुई और बड़ी तादाद में लोग मारे गए हैं.
प्रेशर कुकर जैसे हालात
ओस्लो यूनिवर्सिटी से जुड़े डॉ. मुबशर हुसैन मानते हैं कि ये हालात एक दिन में नहीं बने हैं बल्कि ‘प्रेशर कुकर की तरह फटे हैं.’
डॉ मुबशर हुसैन ने एशिया में तानाशाही पर गहन अध्ययन किया है.
डॉ. हसन ने बीबीसी बांग्ला से कहा, ‘याद रखिए, हम ऐसे देश की बात कर रहे हैं जिसका प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक रूस से भी नीचे है.’
वे कहते हैं, “शेख़ हसीना और उनकी पार्टी ने मुक्ति संग्राम की भावना का अति राजनीतिकरण किया, साल दर साल नागरिकों को मताधिकार के मूल मानवाधिकार से वंचित रखना, और उनकी सरकार की तानाशाही प्रवृति ने समाज के एक बड़े वर्ग को आक्रोशित कर दिया. दुर्भाग्यवश वो कभी भी समूचे देश की प्रधानमंत्री नहीं बनीं बल्कि एक समूह की ही प्रधानमंत्री बनकर रह गईं.”
डॉ. हसन पिछले सप्ताह से शुरू हुए घटनाक्रम से बिलकुल भी हैरान नहीं हैं.
छात्रों का प्रदर्शन
बांग्लादेश में छात्रों ने सरकारी नौकरियों में मुक्ति संग्राम के सेनानियों के परिजनों के लिए 30 प्रतिशत के आरक्षण को समाप्त करने की मांग के साथ विरोध शुरू किया था.
ये आरक्षण 1971 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिजनों के लिए लागू था.
हाई कोर्ट के इस विवादित कोटा व्यवस्था को बरक़रार रखने के बाद छात्रों के प्रदर्शन और तेज़ हो गए.
सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं के प्रदर्शनकारियों पर हमला करने के बाद ये प्रदर्शन और उग्र हो गए.
हालांकि, बाद में बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने इस कोटा व्यवस्था को लगभग समाप्त ही कर दिया.
वहीं सरकार की तरफ़ से अदालत में पेश हुए महाधिवक्ता ने भी यही संकेत दिए थे कि सरकार भी इस मुद्दे का समाधान करना चाहती है.
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