बांग्लादेश में अवामी लीग के 75 साल: मुजीबुर रहमान से लेकर शेख़ हसीना तक

    • Author, रकीब हसनत
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज बांग्ला

बांग्लादेश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी अवामी लीग ने 23 जून को अपनी स्थापना के 75 साल पूरे कर लिए हैं. इस लंबे अरसे के दौरान अधिकतर समय यह विपक्षी पार्टी के तौर पर ही सक्रिय रही है.

विश्लेषकों का मानना है कि बीते 15 वर्षों से लगातार सत्ता में रहने के कारण पार्टी की नीतियों और विशेषताओं काफी बदलाव आया है.

कुछ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि पहले पाकिस्तान के शासनकाल और बाद में स्वाधीन बांग्लादेश में विपक्षी पार्टी की भूमिका में रहते हुए पार्टी जिन मुद्दों पर मुखर रही थी, सत्ता में आने के बाद उन मुद्दों पर उसके रुख में बदलाव आया है.

कई लोग मानते हैं कि खासकर लोकतंत्र, चुनाव, मतदान के अधिकार और मानवाधिकार के मुद्दों पर पार्टी के दीर्घकालिक नजरिए के मुकाबले बीते डेढ़ दशकों से सत्ता में रहने के दौरान उसका रुख कुछ भिन्न नजर आता है.

हालांकि पार्टी के नेताओं ने इन आरोपों को निराधार बताया है. उनका कहना है कि सरकार में रहने की स्थिति में विपक्षी पार्टी की भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. इन नेताओं का दावा है कि पार्टी अपनी वैचारिक और राजनीतिक स्थिति से विचलित नहीं हुई है.

23 जून, 1949 को ढाका में पूर्व पाकिस्तान अवामी मुस्लिम लीग नामक एक नई राजनीतिक पार्टी का गठन किया गया था. तब मौलाना अब्दुल हामिद खान भासानी को इसका अध्यक्ष बनाया गया था. उनके अलावा शमसुल हक को महासचिव और शेख मुजीबुर रहमान को संयुक्त सचिव चुना गया था.

पार्टी के जन्म के करीब छह साल बाद इसके नाम से 'मुस्लिम' शब्द हटा दिया गया. इसका मक़सद धर्मनिरपेक्षता और गैर-सांप्रदायिकता की स्थापना का प्रयास करना था.

बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध का नेतृत्व करने वाली ये पार्टी सत्तर के चुनाव में बहुमत हासिल करने के बावजूद पाकिस्तान की सत्ता में नहीं आ सकी थी.

इसके उलट पश्चिम पाकिस्तान की सरकार ने जब 25 जून की रात को सैन्य अभियान शुरू किया तो उस चुनाव में जीतने वाली अवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर्रहमान ने बांग्लादेश की स्वाधीनता की घोषणा कर दी.

उसके बाद के नौ महीनों की लड़ाई के बाद पाकिस्तान की सेना के आत्मसमर्पण करने पर बांग्लादेश को स्वाधीनता मिली और आज़ादी के बाद 1975 में 15 अगस्त को शेख मुजीबुर रहमान हत्याकांड के बाद पार्टी के हाथों से सत्ता निकल गई.

विपक्ष के तौर पर अवामी लीग

अवामी लीग उस हत्याकांड के बाद लगातार 21 वर्षों तक विपक्ष में रही थी. उस दौरान अवामी लीग को पहले इरशाद के ख़िलाफ़ आंदोलन और उसके बाद बीएनपी के कार्यकाल में कार्यवाहक सरकार के तहत चुनाव की मांग मनवाने में कामयाबी मिली थी.

अपनी मांग के समर्थन में होने वाले उस आंदोलन के कारण ही मार्च, 1996 में तत्कालीन प्रधानमंत्री खालिदा जिया ने अपने पद से इस्तीफ़ा देने का एलान किया था. लेकिन उससे पहले संविधान में कार्यवाहक सरकार का प्रावधान जोड़ने के लिए संविधान संशोधन विधेयक संसद में पारित कराया गया था.

जून, 1996 में आयोजित चुनाव में जीत कर अवामी लीग 21 साल बाद सत्ता में लौटी थी.

अवामी लीग के अध्यक्ष मंडल के पूर्व सदस्य नूह उल आलम लेनिन का कहना है कि विपक्ष में रहने के दौरान लोकतंत्र, मूल्यवृद्धि पर अंकुश लगाना, मतदान का अधिकार हासिल करना और युद्ध अपराधियों के खिलाफ मुकदमा ही अवामी लीग के प्रमुख मुद्दे थे.

वह बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "अवामी लीग कभी विपक्ष तो कभी सरकार में रहते हुए इन मुद्दों को अमली जामा पहनाने में कामयाब रही है. इसलिए उसके बदलने का सवाल ही नहीं पैदा होता."

अवामी लीग की वेबसाइट में कहा गया है, ".....बीएनपी ने जिया-उर रहमान की लोगों को दिखाने के लिए मतदान कराने की शैली में फरवरी 1996 में एक नाटकीय चुनाव के जरिए जबरन सत्ता में रहने का कुप्रयास किया था. लेकिन चुनावी प्रहसन के खिलाफ बांग्लादेश की सड़कों पर अवामी लीग की ओर से व्यापक आंदोलन के कारण खालिदा जिया को इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा."

अवामी लीग के आंदोलन के एक चरण में इस मुद्दे पर राजनीतिक हिंसा शुरू हो गई कि इस कार्यवाहक सरकार का प्रमुख आखिर कौन होगा. उस वजह से 22 जनवरी, 2007 को हुए चुनाव को रद्द कर दिया गया और सेना के समर्थन वाली कार्यवाहक सरकार ने सत्ता संभाली.

उस सरकार के तहत दिसंबर, 2008 में हुए संसदीय चुनाव में दो-तिहाई बहुमत हासिल अवामी लीग एक बार फिर सत्ता में लौटी थी.

अवामी लीग उस हत्याकांड के बाद लगातार 21 वर्षों तक विपक्ष में रही थी. उस दौरान अवामी लीग को पहले इरशाद के खिलाफ आंदोलन औऱ उसके बाद बीएनपी के कार्यकाल में कार्यवाहक सरकार के तहत चुनाव की मांग मनवाने में कामयाबी मिली थी.

अपनी मांग के समर्थन में होने वाले उस आंदोलन के कारण ही मार्च, 1996 में तत्कालीन प्रधानमंत्री खालिदा जिया ने अपने पद से इस्तीफा देने का एलान किया था. लेकिन उससे पहले संविधान में कार्यवाहक सरकार का प्रावधान जोड़ने के लिए संविधान संशोधन विधेयक संसद में पारित कराया गया था.

जून, 1996 में आयोजित चुनाव में जीत कर अवामी लीग 21 साल बाद सत्ता में लौटी थी.

अवामी लीग के अध्यक्ष मंडल के पूर्व सदस्य नूह उल आलम लेनिन का कहना है कि विपक्ष में रहने के दौरान लोकतंत्र, मूल्यवृद्धि पर अंकुश लगाना, मतदान का अधिकार हासिल करना और युद्ध अपराधियों के खिलाफ मुकदमा ही अवामी लीग के प्रमुख मुद्दे थे.

वह बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "अवामी लीग कभी विपक्ष तो कभी सरकार में रहते हुए इन मुद्दों को अमली जामा पहनाने में कामयाब रही है. इसलिए उसके बदलने का सवाल ही नहीं पैदा होता."

अवामी लीग की वेबसाइट में कहा गया है, ".....बीएनपी ने जिया-उर रहमान की लोगों को दिखाने के लिए मतदान कराने की शैली में फरवरी 1996 में एक नाटकीय चुनाव के जरिए जबरन सत्ता में रहने का कुप्रयास किया था. लेकिन चुनावी प्रहसन के खिलाफ बांग्लादेश की सड़कों पर अवामी लीग की ओर से व्यापक आंदोलन के कारण खालिदा जिया को इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा."

अवामी लीग के आंदोलन के एक चरण में इस मुद्दे पर राजनीतिक हिंसा शुरू हो गई कि इस कार्यवाहक सरकार का प्रमुख आखिर कौन होगा. उस वजह से 22 जनवरी, 2007 को हुए चुनाव को रद्द कर दिया गया और सेना के समर्थन वाली कार्यवाहक सरकार ने सत्ता संभाली.

उस सरकार के तहत दिसंबर, 2008 में हुए संसदीय चुनाव में दो-तिहाई बहुमत हासिल अवामी लीग एक बार फिर सत्ता में लौटी थी.

सत्ताधारी अवामी लीग

प्रोफेसर सैयद अनवर हुसैन कहते हैं कि बांग्लादेश का जन्म लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता से हुआ था. पाकिस्तानी शासन के 24 वर्षों में इस देश के नागरिकों को लोकतंत्र हासिल नहीं हुआ था.

हुसैन कहते हैं, "आज़ादी के बाद संविधान के सहारे लोकतंत्र की यात्रा भी ठीक रही. लेकिन वर्ष 1975 में होने वाले एक संविधान संशोधन के कारण इसमें बाधा पैदा हो गई. हालांकि बंगबंधु ने इसे सामयिक बताया था."

यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि उस साल संविधान के चौथे संशोधन के जरिए संसदीय प्रणाली को समाप्त कर दिया गया और राष्ट्रपति प्रणाली की स्थापना की गई. इसके लिए उस समय अवामी लीग को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था. उस समय चार के अलावा बाकी तमाम अख़बारों को बंद कराने के आरोप भी लगते रहे.

अवामी लीग की अध्यक्ष शेख़ हसीना ने 12 जून, 1996 को हुए चुनाव में जीत के बाद पांच साल सत्ता में रहने के बाद कार्यवाहक सरकार को सत्ता सौंप दी थी. लेकिन वर्ष 2009 में आयोजित संसदीय चुनाव में जीत कर सत्ता में आने के बाद कार्यवाहक सरकार के प्रति अवामी लीग सरकार का रुख बदल गया. एक अदालती आदेश का हवाला देते हुए उसने संविधान से कार्यवाहक सरकार का प्रावधान हटा दिया.

उसके बाद अवामी लीग सरकार के तहत ही अगले तीन चुनावों का आयोजन हुआ और वह सभी काफी विवादास्पद रहे. उनमें से 2014 और 2024 के चुनावों में बीएनपी समेत तमाम विपक्षी दलों ने हिस्सा नहीं लिया. उस दौरान विपक्ष के कई नेताओं को जेल में रहना पड़ा था. विपक्षी दलों ने आखिरी बार वर्ष 2018 के चुनाव में हिस्सा लिया था. लेकिन उसमें भी बड़े पैमाने पर धांधली के आरोप उठे थे.

राजनीतिक विश्लेषक औऱ ढाका विश्वविद्यालय की प्रोफेसर जुबैदा नसरीन कहती हैं कि मुक्ति युद्ध के बाद जीत की खुमारी के साथ सत्ता में आने वाली अवामी लीग में जिस तरह का लापरवाह रवैया देखने को मिला था, अब भी वैसा ही नजर आ रहा है.

उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, "दूसरी पार्टियों और विचारों को कोई तवज्जो नहीं देने की प्रवृत्ति उस समय भी थी और अब भी है. विपक्ष में रहते हुए लोकतंत्र, मताधिकार औऱ मानवाधिकार के मुद्दे पर उसका जो रुख था, सत्तारूढ़ पार्टी के तौर पर वैसा नजर नहीं आता. मतदान के नाम पर पिछले तीन चुनावों में जो कुछ हुआ है, वह सबके लिए शर्मनाक है."

हालांकि अवामी लीग के नेता बीते कुछ वर्षों से लोकतंत्र की बजाय विकास पर ही ज्यादा जोर दे रहे हैं. पार्टी के शीर्ष नेता अक्सर दावा करते रहे हैं कि सरकार की निरंतरता यानी अवामी लीग के लगातार सत्ता में रहने के कारण ही तेजी से विकास हो सका है.

दूसरी ओर, प्रोफेसर सैयद अनवर हुसैन अवामी लीग के खिलाफ उठने वाले लोकतंत्र हीनता के आरोपों को तार्किक मानते हैं.

वह कहते हैं, "मुझे लगता है कि अवामी लीग विपक्ष में रहने के दौरान ठीक रहती है. उसने लोकतंत्र प्रति जो प्रतिबद्धता जताई थी उसकी कहां तक रक्षा कर सकी है, यह सवालों के घेरे में है. अपने आदर्शों से अवामी लीग का यह विचलन दुखद है.”

प्रोफेसर जुबैदा हुसैन कहती हैं कि सत्ता में आने के बाद अवामी लीग हर क्षेत्र में अपनी पार्टी का दबदबा कायम कर रही है. इसके कारण तमाम संस्थाएं कमजोर हो गई हैं. वह कहती हैं, “इस सरकार ने मानवाधिकारों के मामले में जो रिकार्ड बनाया है उसकी पूरी दुनिया में आलोचना हो रही है. अभिव्यक्ति का अधिकार सीमित हुआ है. अवामी लीग जैसे-तैसे चुनाव करा कर किसी भी तरीके से सत्ता पर कब्जा बरकरार रखने के अलोकतांत्रिक सोच के जाल में फंस गई है.”

यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि इस साल अप्रैल में बांग्लादेश में मानवाधिकारों की स्थिति पर अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2023 में देश में मानवाधिकारों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है.

उसमें कहा गया है कि ज्यादातर मामलों में मानवाधिकार उल्लंघन की तमाम घटनाओं में शामिल कार्यकर्ताओं या सुरक्षा बलों के सदस्यों की शिनाख्त करने और उनको सजा देने के मामले में सरकार ने कोई भरोसेमंद कदम नहीं उठाया है. इसके उलट बड़े पैमाने पर उनको ‘जिम्मेदारी या सजा से मुक्त’ करने की अनगिनत खबरें सामने आई हैं.

हालांकि सरकार ने उस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है.

अवामी लीग की वेबसाइट में कहा गया है, "बांग्लादेश राष्ट्र की स्थापना और बंगाली राष्ट्र की पारंपरिक शांति और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के लिए अवामी लीग हमेशा लोगों के मानवाधिकारों की सुरक्षा को विशेष महत्व देती रही है. सरकार में रहने के दौरान लोगों की सामाजिक सुरक्षा और अधिकार सुनिश्चित करना ही अवामी लीग की पहली प्राथमिकता है."

अवामी लीग का दावा

पार्टी के अध्यक्ष मंडल के सदस्य काजी जफर उल्ला ने बीबीसी बांग्ला से कहा कि उनका मानना है कि सत्तारूढ़ होने के बाद अवामी लीग के बदलने के आरोप राजनीति से प्रेरित हैं. वह कहते हैं, "हमने अवामी लीग के लंबे अरसे तक संघर्ष करते देखा है. उसी की वजह से बांग्लादेश को आजादी मिली. बंगबंधु की हत्या के बाद हम लगातार 21 साल तक विपक्ष में रहे थे. लेकिन उस समय भी अवामी लीग आम लोगों के हित में काम करती रही. हमारी पार्टी को वर्ष 2001 के बाद भारी अत्याचार का सामना करना पड़ा था. ग्रेनेड से हमले कर खत्म कर देने के प्रयास भी किए गए. लेकिन इन सबका सामना करते हुए आम लोगों के भारी समर्थन के कारण पार्टी दोबारा सत्ता में लौटी है."

लेकिन उन्होंने विपक्षी दलों के इस बयान को 'एकतरफा राजनीतिक बयान' करार दिया कि अवामी लीग सरकार ने सत्ता में आने के बाद लोकतंत्र और मतदान का अधिकार छीन लिया है.

काजी जफर उल्ला कहते हैं, "लोकतंत्र होने के कारण ही तो लोग ऐसे बयान दे पा रहे हैं. निष्पक्ष और व्यवस्थित राजनीति में विश्वास नहीं करने वाले लोगों ने चुनाव का सामना करने की बजाय अलग तरीके से सत्ता में आने की कोशिश की है. अब वही लोग अवामी लीग की आलोचना कर रहे हैं. अवामी लीग अपने राजनीतिक सिद्धांतों, आदर्शों और रवैए से कभी विचलित नहीं हुई है."

पार्टी के अध्यक्ष मंडल के पूर्व सदस्य नूह आलन लेनिन भी मानते हैं कि अवामी लीग नहीं बदली है और अपने आदर्शों से भी विचलित नहीं हुई है.

उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, “सत्तारूढ़ पार्टी औऱ विपक्ष की भाषा तो एक नहीं हो सकती. सहनशीलता, विचारों की भिन्नता का सम्मान करना और लोकतांत्रिक मूल्य. विपक्षी पार्टियां अगर बातचीत करती को लोकतंत्र और मजबूत होता.”

उनकी राय में अवामी लीग सरकार लोकतंत्र के बाकी तमाम पहलुओं को मजबूत करने की कोशिश कर रही है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)