ब्रिक्स समिट के लिए रवाना हुए पीएम मोदी, क्या शी जिनपिंग से होगी मुलाक़ात?

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- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
चीन ने दक्षिण अफ्रीका में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात के संकेत दिए हैं.
दक्षिण अफ्रीका में चीन के राजदूत चेन जियाओदोंग ने प्रिटोरिया में पत्रकारों के साथ बातचीत में भरोसा जताया था कि दोनों देशों के नेताओं के बीच सीधी मुलाक़ात और बात होगी.
इसके बाद से ही दोनों देशों के बीच सीमा पर चले आ रहे तनाव कम होने उम्मीद बढ़ गई है.
भारतीय अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि दोनों नेता दो दिनों तक सम्मेलन कक्ष और नेताओं के लाउंज में होंगे. ऐसे में इन दोनों के बीच बैठक की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
हालांकि नई दिल्ली में चीनी दूतावास से जुड़े सूत्रों का कहना है कि उन्हें ऐसी किसी संभावित मुलाक़ात के बारे में जानकारी नहीं है.
नरेंद्र मोदी ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुईस ईनास्यू लूला डा सिल्वा और मेज़बान देश दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा से द्विपक्षीय बैठक करेंगे.
लेकिन दुनिया भर की निगाहें उन पर चीन के राष्ट्रपति पर होगी. लोग इस बात का कयास लगा रहे हैं कि शी जिनपिंग और पीएम मोदी के बीच द्विपक्षीय बैठक होगी या नहीं.
अगर होगी तो क्या इससे दोनों देशों के रिश्तों में मौजूदा तनाव को कम करने के के क़दम उठाने पर चर्चा होगी.
जोहानिसबर्ग में 22 से 24 अगस्त तक ब्रिक्स (ब्राजील,रूस,चीन,भारत और दक्षिण अफ्रीका) के सदस्य देशों के नेताओं का सम्मेलन होने जा रहा है.
अगर यहाँ शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी की आमने-सामने की बैठक होती है तो मई में 2020 में दोनों के देशों के बीच सीमा विवाद शुरू होने के बाद पहली तय बैठक होगी.
शी जिनपिंग 21 से 24 अगस्त तक दक्षिण अफ्रीका में रहेंगे. वहीं पीएम मोदी 22 अगस्त की दोपहर को जोहानिसबर्ग पहुंचेंगे.
ब्रिक्स देशों के नेताओं के मुख्य सम्मेलन 23 अगस्त को होगा. 24 अगस्त को ब्रिक्स के सदस्य देशों के नेता अफ्रीकी नेताओं से मुलाक़ात करेंगे.
कब-कब हुई मुलाक़ात

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अगर राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पीएम मोदी की ब्रिक्स सम्मेलन से इतर आमने-सामने की मुलाक़ात होती है तो सत्ता में आने के बाद दोनों के बीच ऐसी 20वीं मुलाक़ात होगी.
2014 से लेकर 2019 तक दोनों के बीच 18 बार मुलाक़ात हो चुकी है. लेकिन 2020 में दोनों देशों के सैनिकों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा के नजदीक गलवान घाटी में झड़प के बाद पहले से निर्धारित कार्यक्रम के तहत जिनपिंग और भारतीय पीएम मोदी के बीच कोई मुलाक़ात नहीं हुई है.
पिछले साल इंडोनेशिया के बाली में डिनर के दौरान दोनों नेताओं की 19वीं मुलाकात थी. हालांकि इसके बारे में भारत की ओर से सात महीने बाद जानकारी दी गई.
इसी मुलाक़ात के बारे में कहा गया कि दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय रिश्तों को स्थिरता देने की बात हुई.
लेकिन सवाल ये है कि अगर मोदी और शी जिनपिंग की आमने-सामने कोई मुलाक़ात हुई तो क्या ये दोनों देशों के रिश्तों के बीच मौजूदा तनाव को कम कर पाएगी?
इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पूर्वी एशिया अध्ययन केंद्र में एसोसिएट प्रोफेसर अरविंद येलेरी से बात की.
येलेरी फ़िलहाल एकेडेमिक प्रतिनिधि के तौर पर ब्रिक्स में हिस्सा लेने के लिए दक्षिण अफ्रीका में हैं.
ब्रिक्स में भारत और चीन का टकराव
बीबीसी हिंदी से बातचीत के दौरान हमने उनसे पूछा कि फ़िलहाल भारत और चीन के रिश्तों में मौजूदा तनाव कम होने की क्या संभावना है?
इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ’फ़िलहाल इस तनाव के कम होने की संभावना नहीं दिखती. क्योंकि चीन ब्रिक्स का विस्तार करने में लगा हुआ है. ब्रिक्स में नए-नए सदस्य आमंत्रित किए जा रहे हैं. सऊदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र से लेकर अर्जेंटीना जैसे देश ब्रिक्स की सदस्यता लेना चाहते हैं. सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान को लेकर है. चीन उसे भी ब्रिक्स का सदस्य बनाना चाह रहा है. ब्रिक्स सम्मेलन में बड़ी तादाद में पाकिस्तान के ग़ैर आधिकारिक प्रतिनिधि आ रहे हैं.''

येलेरी कहते हैं, ''भारत को डर है कि चीन ब्रिक्स को हड़प न ले. चूंकि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पूरी तरह से चीन के प्रभाव में है. इसलिए ब्रिक्स में रूस का असर कम हो रहा है. चीन ने खाड़ी देशों में भी अपना प्रभाव जमाना शुरू किया है. ईरान और सऊदी अरब के बीच समझौते के बाद दुनिया ने देखा कि चीन का अरब देशों में असर किस कदर बढ़ रहा है.
वो कहते हैं, ‘’इसके अलावा उसने ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका से भी लगातार अपने संबंध मज़बूत करने करने की कोशिश की है. अगर चीन अपने असर वाले देशों को ब्रिक्स का सदस्य बनाने में कामयाब रहा तो इस अहम वैश्विक संगठन में भारत अलग-थलग पड़ जाएगा.’’
'फ़ाइनेंशियल टाइम्स' ने एक रिपोर्ट में बताया है कि चीन ब्रिक्स को दुनिया की सात सबसे बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समूह जी-7 के प्रतिद्वंद्वी के तौर पर खड़ा करना चाहता है.
अरविंद येलेरी कहते हैं, ''चीन ब्रिक्स को नेटो विरोधी गुट की तरह इस्तेमाल करना चाहता है. भारत के लिए ये चिंता की बात है. क्योंकि भारत के अमेरिका और यूरोपीय देशों से अच्छे संबंध हैं.’’
जिनपिंग-मोदी की संभावित मुलाक़ात से क्या सीमा पर तनाव कम होगा?

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इस सवाल पर अरविंद येलेरी ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर ज़रूर चाहेंगे कि सीमा मुद्दे पर बात उठे. लेकिन चीन ये नहीं चाहेगा कि इस पर बात पर हो.
दोनों देश के बीच कोर कमांडर लेवल की 19वें राउंड की बातचीत के बावजूद हालात में नरमी के संकेत नहीं मिले हैं. चीनी सेना के बड़े अधिकारी आते हैं. बात करते हैं लेकिन तनाव कम करने के लिए कुछ नहीं होता.
येलेरी कहते हैं, ‘’जब तक शी जिनपिंग और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के स्तर से कोई बातचीत नहीं होती तब तक सीमा पर तनाव में कमी की उम्मीद बेमानी है. ऐसे में प्रधानमंंत्री नरेंद्र मोदी विदेश मंत्री एस जयशंकर चाहेंगे कि आमने-सामने की मुलाक़ात में यह मुद्दा उठे. ताकि चीन की ओर से इस मुद्दे पर कोई पुख्ता जवाब मिल सके.’’
2014 के बाद कैसे रहे हैं, भारत-चीन संबंध

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नरेंद्र मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बने. इसके बाद 2015 में नरेंद्र मोदी ने चीन का दौरा किया. इसके बाद सीमा विवाद को लेकर 2017 में सिलिगुड़ी कॉरिडोर के पास डोकलाम में भारत और चीन के सैनिक दो महीने तक आमने-सामने डटे रहे.
हालांकि उसी साल चीन के शियामेन में ब्रिक्स के नौवें सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बेहद औपचारिक संक्षिप्त मुलाक़ात हुई थी.
इसके बाद ही चीन ने अमरनाथ तीर्थयात्रियों के लिए नाथूला दर्रा खोलने के संकेत दिए थे. चीन ने डोकलाम विवाद के बाद इसे बंद कर दिया था. वर्ष 2018 में शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी के बीच वुहान में आयोजित भारत चीन अनौपचारिक शिखर सम्मेलन में बातचीत हुई.
इसके एक साल बाद 2019 में प्रधानमंत्री तथा चीन के राष्ट्रपति बीच चेन्नई में दूसरा अनौपचारिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था. वर्ष 2020 में भारत और चीन के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 70वीं वर्षगांठ मनाई जा रही थी.
लेकिन उसी साल भारत और चीन के बीच गंभीर स्थिति पैदा हो गई थी. एक मई 2020 को दोनों देशों के सौनिकों के बीच पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग त्सो झील के नॉर्थ बैंक में झड़प हुई थी.
इसमें दोनों ही तरफ़ के दर्जनों सैनिक घायल हो गए थे. इसके बाद 15 जून को गलवान घाटी में एक बार फिर दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प हुई.
इस झड़प को लेकर 16 जून को भारतीय सेना का बयान सामने आया.इसमें कहा गया, "झड़प वाली जगह पर ड्यूटी पर तैनात गंभीर रूप से घायल होने वाले 17 सैनिकों की मौत हो गई. इस संघर्ष में मरने वाले सैनिकों की संख्या बढ़कर 20 हो गई है."
भारत और चीन की सेना के बीच लद्दाख के गलवान में हुई हिंसक झड़प के बारे में एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन ने उसमें अपने नुक़सान को कम बताया.
समाचार एजेंसियों पीटीआई और एएनआई के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया के एक अख़बार 'द क्लैक्सन' ने अपनी एक खोजी रिपोर्ट में दावा किया है कि चीन की तरफ़ से चार सैनिकों की मौत का आंकड़ा बताया गया था लेकिन इससे 9 गुना ज़्यादा, कम-से-कम 38 पीएलए जवानों की मौत हुई थी.
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