निर्मला सीतारमण के सामने बजट में क्या है चुनौतियां, क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट

भारतीय अर्थ्यव्यवस्था

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इमेज कैप्शन, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एक फ़रवरी को आम बजट पेश करेंगी.

केंद्रीय बजट 2025 पेश होने की घड़ी करीब आ गई है और सभी लोगों की नज़र इस पर है कि आर्थिक स्लो डाउन के दौर से अर्थव्यवस्था को निकालने के लिए सरकार किन उपायों की घोषणा करती है.

सरकार के सामने राजकोषीय घाटे को कम करने, महंगाई को काबू करने, रोज़गार सृजित करने और मांग में आई कमी को उलटने की चुनौती है.

दूसरी तरफ़ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों पर राहत की मांग ने ज़ोर पकड़ा है, लेकिन क्या इसकी गुंज़ाइश है, ये भी सरकार के लिए एक बड़ा सवाल है.

हमने अर्थव्यवस्था को जानने-समझने वाले चार विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों से बात की और उनकी राय जाननी चाही कि आगामी बजट में सरकार क्या-क्या प्रावधान कर सकती है या उसे करना चाहिए.

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रुचिर शर्मा, जाने माने इन्वेस्टर और बाज़ार विश्लेषक

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रुचिर शर्मा

मैंने बीते दस सालों में कभी भी बजट कवर नहीं किया है क्योंकि अब बजट का महत्व काफी कम हो गया है. 1990 के दशक के आस-पास इसका काफी महत्व हुआ करता था. अब बजट केवल विज्ञापनों में ही सीमित रह गया है.

मेरी राय में भारत में जिस भी सेक्टर में सरकार की भूमिका बहुत ज्यादा है, उस सेक्टर में निवेश करके अच्छा मुनाफ़ा कमाया जा सकता है.

मेरा मानना है कि हमें निजीकरण को अपनाना चाहिए, सरकार पब्लिक सेक्टर की कंपनियों को बेचे और उससे जो पैसा आए वो उसे पब्लिक सेक्टर के कर्मचारियों को दे. जिसके बाद कर्मचारी उस पैसे को लेकर कोई दूसरी नौकरी तलाशें, हालाँकि ऐसा होना बहुत मुश्किल है.

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भारत भले ही दुनिया की टॉप 5 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है. सरकार भी इस बात को कहती है कि हम 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाएंगे.

लेकिन जब हम प्रति व्यक्ति आय या जीडीपी देखते हैं, तो हम इराक़ और ईरान से भी पीछे हैं. ऐसे में एक आदमी के लिए 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने से क्या फ़र्क आएगा.

हालांकि भारत प्रति व्यक्ति आय के मामले में काफी पिछड़ा हुआ है. इसी कारण से मेरा यह कहना है कि जितनी तेजी से हम विकास करेंगे, उतनी ही तेजी से हमारी प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी.

महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ये तीन चीज़ें पिछले 40 साल से भारत में चुनाव का मुद्दा रही हैं. मोदी सरकार में महंगाई की दर बहुत ज्यादा नहीं बढ़ी है. यूपीए-2 की सरकार में यह दर 10-11 प्रतिशत तक पहुंच गई थी.

पिछले 10 सालों में यह दर औसतन 5 के आस-पास रही है. लेकिन इससे भी बहुत ज्यादा फर्क पड़ता है. तो महंगाई अभी भी मुद्दा है. लेकिन जितना बड़ा मुद्दा यह 10 साल पहले हुआ करता था, वह अब उतना बड़ा मुद्दा नहीं है.

मेरी सलाह यह रहेगी कि भारत को भी अपना व्यापार बढ़ाना चाहिए और खासकर अपने पड़ोसी देशों के साथ. ज्यादातर सफल देश अपने पड़ोसियों के साथ काफी व्यापार करते थे.

2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद उन्होंने आसपास के देशों के साथ व्यापार बढ़ाने पर काफी ध्यान दिया था. इसके बावजूद पिछले 11 सालों में यह व्यापार ज़्यादा बढ़ा नहीं है.

(रुचिर शर्मा ने हाल ही में बीबीसी के संपादकों के साथ भारत और दुनिया भर की अर्थव्यवस्था को लेकर एक विस्तृत चर्चा की है. आप ये पूरी बातचीत इस लिंक पर देख सकते हैं.)

दीपा सिन्हा, अर्थशास्त्री, बीआर आम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली

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दीपा सिन्हा का बयान

एक आर्थिक स्लो डाउन पहले से चल रहा है, ये अलग बात है कि इसकी चर्चा इस बार अधिक हो रही है, क्योंकि अब इसकी आंच मध्य वर्ग तक पहुंच रही है और शायद इसीलिए इनकम टैक्स में छूट बढ़ाने जैसी मांग तेज़ हो गई है.

लेकिन ये हालात कोविड से पहले से थे और ख़ासकर नोटबंदी और जीएसटी लाए जाने के बाद से ही अर्थव्यवस्था में स्लो डाउन शुरू हुआ था. कोविड ने हालात को और बिगाड़ा है.

इस साल जो बदला है, वो ये है कि अभी तक भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में ही उपभोग में कमी की ख़बरें थीं, लेकिन कई उद्योगों की रिपोर्टें आई हैं जिनमें बताया गया है कि इस बार शहरी क्षेत्रों में भी उपभोग में कमी आई है.

दूसरी तरफ़ रोज़गार भी नहीं बढ़ रहा है, ख़ासकर ठीक-ठाक आमदनी वाले रोज़गार. इसलिए इसका असर मांग पर भी पड़ा है. ये दोनों चीज़ें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं.

बजट में मेरी उम्मीद होगी कि इन हालात को देखते हुए, सरकार कुछ ऐसे क़दम उठाए जो मांग की कमी की समस्या को दूर करने की कोशिश करे. इसी से हम अर्थव्यवस्था में जान फ़ूंक सकते हैं.

ग्रामीण इलाक़ों में मनरेगा में सरकार काम और मज़दूरी बढ़ाए जोकि पिछले कुछ सालों में हर साल पांच या आठ रुपये के हिसाब से बढ़ रही है.

क्योंकि यह सिर्फ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सपोर्ट करने का मसला नहीं है, बल्कि जब उनकी मज़दूरी बढ़ती है तो दूसरे क्षेत्रों में भी मज़दूरी बढ़ती है. इससे खेत मज़दूरी, असंगठित क्षेत्र की मज़दूरी भी बढ़ सकती है.

इसी तरह की एक रोज़गार योजना शहरों में भी चलाने की मांग काफ़ी दिनों से उठ रही है, ख़ासकर कोविड के बाद से.

इसके लिए मनरेगा की तर्ज पर अरबन एम्प्लायमेंट गारंटी स्कीम चलाने जाने का भी सुझाव है, जिसमें सरकार की ओर से न्यूनतम मजदूरी निर्धारित हो और काम की गारंटी दी जाए.

हालांकि सरकार सबको तो रोज़गार नहीं दे सकती, लेकिन अगर वह ऐसी छोटी पहलकदमी ले तो इसका एक मल्टिप्लायर इफ़ेक्ट पैदा होगा, रोज़गार और साथ में वेतन भी बढ़ता है.

मेरी मुख्य दिलचस्पी ये होगी कि बजट में सरकार ऐसी कौन सी योजनाओं की घोषणा करती है, जिनसे निचले तबके के हाथ में पैसे जाए, क्योंकि मांग वहीं से आती है.

मुनाफ़ा तो बढ़ ही रहा है, लेकिन जब मांग और खपत की बात होती है तो निम्न और निम्न मध्य वर्ग को राहत देने की ज़रूरत है. ख़ासकर ग़रीबों के लिए तो सीधे हस्तक्षेप करने की ज़रूरत है.

इसके अलावा एमएसएमई यानी छोटे और लघु उद्योगों पर सरकार को फ़ोकस करना चाहिए, क्योंकि वहीं से रोज़गार सृजन बड़े पैमाने पर होगा.

अभी तक एमएसएमई को क्रेडिट के रूप में मदद देने की घोषणाएं होती हैं, मसलन, कर्ज लेने में आसानी, ब्याज़ और निवेश में सब्सिडी, टैक्स में छूट आदि. इन्हें कुछ ठोस प्रोत्साहन देने की ज़रूरत है.

ईशान आनंद, लेबर इकोनॉमिस्ट, आईआईटी दिल्ली

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ईशान आनंद

2019 के लोकसभा चुनावों से पहले 2017-18 के आंकड़ों में बेरोज़गारी दर छह प्रतिशत से अधिक थी. अब यह घटकर तीन प्रतिशत पर आ गई है.

इसमें कहा गया कि पहले के मुक़ाबले अधिक महिलाएं कार्यबल में शामिल हुईं जबकि चिंता की बात है कि अधिकांश रोज़गार कृषि क्षेत्र और स्वरोज़गार में सृजित हुए हैं.

लेकिन जिस तरह की नौकरियों में ये लोग गए, वह 'एक बेहतर अर्थव्यवस्था के साथ बेहतर आंकड़े' दिखाने का मामला अधिक लगता है.

सरकार ने बड़े बड़े प्रोजेक्ट्स- जैसे हाईवे, पोर्ट, ब्रिज जैसे इफ़्रास्ट्रक्चर पर पूंजीगत खर्च (कैपिटल एक्सपेंडिचर) बढ़ा दिया था.

निजी निवेश बढ़ाने के लिए सरकार ने 2019 में ही कॉर्पोरेट टैक्स में छूट देकर प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रही है. सरकार की सोच थी कि कंपनियां आगे आएंगी, लेकिन ये हो नहीं रहा है. पांच छह सालों में निजी निवेश या तो बढ़ा नहीं है या स्थिर है.

पहला सुझाव तो मेरा यही है कि सरकार को बड़े-बड़े प्रोजेक्टों, सड़क हाईवे, इंफ़्रास्ट्रक्चर पर खर्च की दिशा में थोड़ा बदलाव करना चाहिए. अगर इन्हें छोटे शहरों के, सड़क, रेलवे, बस, ट्रांसपोर्ट आदि इंफ़्रास्ट्रक्चर की ओर मोड़ें तब स्थिति थोड़ी बेहतर होगी. जो छोटी फ़ैक्ट्रियां हैं उनका बुनियादी ढाँचा भी मजबूत करना होगा.

दूसरा, वंचित तबकों को दी जाने वाली मदद को तर्कसंगत किया जाना चाहिए. मसलन, वृद्धा पेंशन को ही लीजिए, भारत सरकार 80 साल से कम उम्र पर 200 रुपये और उससे अधिक उम्र पर 500 रुपये देती है. 2007 से इसमें एक पैसा नहीं बढ़ा है.

तीसरा, गिग वर्कर्स को श्रमिकों की मान्यता देकर उन्हें नौकरी और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की ओर क़दम उठाया जाना चाहिए.

चौथा, असंगठित क्षेत्र के कामकाजी लोगों के लिए तर्कसंगत पेंशन स्कीम लानी चाहिए, हालांकि दो-तीन साल पहले सरकार यूपीएस लेकर आई थी, लेकिन वह उतनी दमदार योजना है नहीं.

और पांचवां, वेल्थ टैक्स यानी संपत्ति कर पर विचार करना चाहिए. देश में 50-60 साल तक वेल्थ टैक्स था. कहा गया कि ये प्रभावी तरीक़े से कभी लागू नहीं हो पाया. लेकिन इसमें सुधार करने की बजाय इसे ख़त्म कर दिया गया.

भारत के शीर्ष अमीर 1000 लोगों की इतनी संपत्ति है जितनी दुनिया के शीर्ष कुछ अमीरों के पास है. अगर इन पर एक प्रतिशत का भी टैक्स लगा दिया जाए तो इस पैसे से ही मनरेगा, शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट दोगुना हो सकता है.

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार

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प्रोफ़ेसर अरुण कुमार

बजट में की गईं घोषणाएं महंगाई, रोज़गार सृजन, मांग और खपत पर अहम असर डालती हैं.

केंद्रीय बजट में जीडीपी का 16-17 प्रतिशत खर्च होता है. इतना तो कोई कंपनी भी खर्च नहीं करती है. तो यह सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक इवेंट है. खर्च के अलावा कुछ नीतिगत घोषणाएं भी होती हैं इसमें, इनका भी अर्थव्यवस्था पर असर होता है.

इसलिए बजट की अहमियत अभी भी बहुत ज़्यादा है. मसलन अगर शिक्षा पर बजट बढ़ता है तो बच्चों की शिक्षा अच्छी होगी और भविष्य में उत्पादकता अच्छी होगी.

इसी तरह सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर भी खर्च का असर पड़ेगा, क्योंकि श्रमिक अधिक उत्पादक हो जाएगा. अभी हमारा श्रमिक उतना स्वस्थ नहीं है और पर्याप्त शिक्षा भी नहीं है उसके पास.

चीन के विकास की नज़ीर दी जाती है, लेकिन उसकी बुनियाद में ये चीजें हैं. दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात है रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएंडडी) पर निवेश.

चीन आरएंडी पर जीडीपी का 3 प्रतिशत खर्च करता है और भारत सिर्फ़ 0.7 प्रतिशत. चीन की अर्थव्यवस्था भारत से पांच गुना है यानी वह भारत के मुकाबले 20 गुना खर्च करता है.

इसीलिए वह आज दुनिया का मैन्युफ़ैक्चरिंग हब हो गया है. तो सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए.

इनकम टैक्स में कटौती की मांग हो रही है और हवाला मध्य वर्ग पर बोझ कम करने का दिया जा रहा है, लेकिन इसका आकार उतना नहीं है, जितना बताया जा रहा है.

2017-18 में हुए सामाजिक आर्थिक सर्वे के मुताबिक, 90 प्रतिशत परिवार 25,000 प्रतिमाह से कम खर्च करते हैं. दो प्रतिशत परिवार 50,000 से अधिक खर्च करते थे. और मध्य वर्ग या मिडिल क्लास था वह सिर्फ आठ प्रतिशत था.

इनकम टैक्स के आंकड़ों के अनुसार भी 9 करोड़ लोग टैक्स रिटर्न भरते हैं, इनमें से आधे यानी 4.5 करोड़ लोगों की आमदनी टैक्स देने लायक नहीं है, यानी निल रिटर्न फ़ाइल करते हैं.

प्रभावी टैक्स देने वाले महज डेढ़ करोड़ हैं, जबकि तीन करोड़ के आस-पास मध्य वर्ग के लोग हैं. इसलिए टैक्स में छूट बढ़ाने से स्थिति में ज़्यादा बदलाव नहीं आने वाला है.

दूसरा महंगाई की समस्या ईंधन पर इनडायरेक्ट टैक्स यानी परोक्ष करों से जुड़ी हुई है. ऊर्जा महंगी होने का मतलब है सब्जी और खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़ना. बल्कि इसका सारी चीजों के उत्पादन पर भी असर पड़ता है.

ईंधन पर टैक्स की कमी से महंगाई कुछ हद तक काबू में आ सकती है. सबसे अधिक तो खाद्य वस्तुओं पर इसका असर होगा.

इसके अलावा छोटे, लघु और मध्यम उद्योगों के लिए विशेष नीति बनानी होगी, क्योंकि वहीं से रोज़गार भी बढ़ेगा और मांग भी पैदा होगी.

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