बाबा सिद्दीक़ी के कांग्रेस छोड़ने से पार्टी पर क्या होगा असर?

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कांग्रेस आजकल एक झटके से उबरने की कोशिश कर रही होती है कि उसी वक़्त दूसरा झटका लग जाता है.
मुंबई कांग्रेस अभी मिलिंद देवरा के जाने से उबरी भी नहीं थी कि बाबा सिद्दीक़ी ने आठ फ़रवरी को पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी.
सिद्दीक़ी ने पार्टी छोड़ने की कोई वजह नहीं बताई.
उन्होंने कहा कि वह पार्टी छोड़ते वक़्त बहुत कुछ कहना चाहते हैं लेकिन कई चीज़ों को बिना कहे छोड़ देना ही अच्छा होता है.
सिद्दीक़ी ने कहा कि वह जवानी के दिनों में कांग्रेस में शामिल हुए थे और 48 सालों तक पाार्टी में रहे.
जब मिलिंद देवरा ने कांग्रेस छोड़ी थी तो उन्होंने भी कहा था कि पार्टी से 55 साल का पुराना संबंध ख़त्म होता है.
मिलिंद देवरा एकनाथ शिंदे वाली शिव सेना गुट में शामिल हो गए थे.
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने शुक्रवार को घोषणा की है कि बाबा सिद्दीक़ी 10 फ़रवरी की शाम एनसीपी में शामिल होंगे.
कांग्रेस जब महाराष्ट्र में शिव सेना (उद्धव बाला साहेब ठाकरे) और एनसीपी (शरद पवार) से लोकसभा चुनाव के लिए सीटों के बँटवारे पर बात कर रही है, तब उसके वरिष्ठ नेता पार्टी को अलविदा कह रहे हैं.

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बाबा सिद्दीक़ी के बेटे ज़ीशान सिद्दीक़ी बांद्रा (ईस्ट) से कांग्रेस विधायक हैं और मुंबई की यूथ कांग्रेस यूनिट के अध्यक्ष हैं.
ज़ीशान ने अभी पार्टी कांग्रेस छोड़ने पर कोई फ़ैसला नहीं लिया है. लेकिन कहा जा रहा है कि वे पिता की राह अपना सकते हैं.
2004 से 2008 तक महाराष्ट्र की विलासराव देशमुख सराकर में बाबा सिद्दीक़ी खाद्य आपूर्ति मंत्री थे.
1992 और 1997 में बाबा सिद्दीक़ी कांग्रेस के टिकट पर मुंबई सिविक बॉडी के लिए कॉर्पोरेटर चुने गए थे. बाबा सिद्दीक़ी 1999 में बांद्रा (वेस्ट) से विधायक चुने गए थे.
2004 और 2009 में भी इसी सीट से बाबा सिद्दीक़ी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते थे.
2014 से बाबा सिद्दीक़ी मुंबई कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष थे.
सिद्दीक़ी 2000-2004 तक महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवेपलमेंट अथॉरिटी के अध्यक्ष भी रहे हैं.
2004 और 2009 में मिलिंद देवरा मुंबई दक्षिण से लोकसभा चुनाव जीते थे.
कहा जा रहा है कि मिलिंद के बाद बाब सिद्दीक़ी के कांग्रेस छोड़ने से पार्टी मुंबई में कमज़ोर हुई है.
बाबा सिद्दीक़ी बॉलीवुड में अपनी क़रीबी के लिए भी जाने जाते हैं. कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे और जाने-माने अभिनेता सुनील दत्त से भी बाबा सिद्दीक़ी की क़रीबी रही थी.

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सुनील दत्त के परिवार से सिद्दीक़ी के अच्छे संबंध रहे हैं.
संजय दत्त और प्रिया दत्त से भी सिद्दीक़ी परिवार के भरोसे वाले संबंध रहे हैं. 2014 में बाबा सिद्दीक़ी बांद्रा ईस्ट से बीजेपी से हार गए थे लेकिन 2019 में उनके बेटे ज़ीशान सिद्दीक़ी को जीत मिली थी.
बाबा सिद्दीक़ी की मुंबई में सालाना इफ़्तार पार्टी की चर्चा ख़ासी रहती है. उनकी इफ़्तार पार्टी में बॉलीवुड की बड़ी हस्तियां शाहरुख़ ख़ान, आमिर ख़ान, सलमान ख़ान से लेकर संजय दत्त तक आते हैं.
2017 में ईडी ने बांद्रा में बाबा सिद्दीक़ी से जुड़े ठिकानों पर मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में रेड मारी थी. इसके बाद से वह सियासी रूप से बहुत सक्रिय नहीं थे और उनके बेटे ज़ीशान ही ज़्यादा सक्रिय थे.
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, बाबा सिद्दीक़ी ने आरजेडी नेता तेजस्वी यादव से राज्यसभा सीट के लिए भी संपर्क किया था लेकिन कोई बात नहीं बन पाई थी.
पिछले हफ़्ते उन्होंने कहा था कि वह कांग्रेस के साथ हैं लेकिन भविष्य के बारे में कुछ भी नहीं कह सकते हैं.
बाबा सिद्दीक़ी के कांग्रेस छोड़ने पर मुंबई कांग्रेस प्रमुख वर्षा गायकवाड़ ने कहा, ''कांग्रेस में वर्षों तक सेवा देने के बाद आपका अलग होने का निर्णय बहुत ही निराशाजनक है. आपने कांग्रेस छोड़ने का फ़ैसला तब किया है जब देश अहम मोड़ पर है और कांग्रेस बीजेपी से लोकतंत्र बचाने की अहम लड़ाई लड़ रही है. लेकिन आपने कहा कि कुछ बातें अनकही ही छोड़ देनी चाहिए.''
कहा जा रहा है कि अजित पवार सिद्दीक़ी के कांग्रेस छोड़ने को अल्पसंख्यकों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने में मौक़े की तरह देख रहे हैं. अभी छगन भुजबल के भतीजे अजित पवार वाली एनसीपी गुट के मुंबई प्रमुख हैं.
बाबा सिद्दीक़ी ने पार्टी से इस्तीफ़ा देने के बाद खुलकर कोई कारण नहीं बता रहे हैं लेकिन उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा है कि वजह बाद में बताएंगे.
सिद्दीक़ी ने कहा, ''छेड़ेंगे तो छोड़ूंगा नहीं है. मुझे कोई छेड़ेगा नहीं तो मैं भी कुछ नहीं करूंगा.''
बीबीसी संवाददाता मयूरेश कोण्णूर का विश्लेषण

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मुंबई कांग्रेस में हमेशा से ही मराठी और हिंदी भाषी नेताओं के दो गुट रहे हैं. पिछले कुछ सालों की बात करें तो मुरली देवड़ा, मिलिंद देवड़ा, संजय निरुपम, कृपाशंकर सिंह, गुरदास कामत जैसे नेताओं के हाथ में मुंबई कांग्रेस का नेतृत्व हुआ करता था. ये लोग मुंबई के रहने वाले थे और हिंदी भाषी थे.
जबसे शिवसेना के साथ महाविकास आघाडी मे कांग्रेस शामिल हुई है तब से कई स्थानीय समीकरण बदल गए हैं. अब भाई जगताप, उनके बाद वर्षा गायकवाड़ को मुंबई कांग्रेस की कमान सौंपी गई. वर्षा गायकवाड़ मराठी नेता हैं.
ये गुटबाजी जाहिर तौर पर दिखती है. और इसी वजह से जिन्हें लगता है कि अब मुंबई कांग्रेस मे उनकी अहमियत नहीं है वो पार्टी छोड़कर दूसरे रास्ते अपना रहे हैं.
मिलिंद देवड़ा को मुंबई दक्षिण की लोकसभा सीट मिलना मुश्किल लग रहा था क्योंकि वहां पर शिवसेना के अरविंद सावंत पिछले दो टर्म से सांसद हैं.
मुरली देवड़ा के राजनीतिक करियर पर सवाल खड़ा हो गया था. बाबा सिद्दिक़ी के बेटे जीशान सिद्दिक़ी बांद्रा से विधायक हैं. लेकिन इस चुनाव मे जब शिवसेना के साथ कांग्रेस चुनाव लड़ेगी तो समीकरण बदल जाएंगे. जो नये समीकरणों को अच्छा नही मानते हैं, वो बाहर के रास्ते तलाश रहे हैं.

एक दूसरा कारण यही है कि कांग्रेस हमेशा से सत्ता मे रही है. जो कई साल सत्ता मे बने रहे, मंत्री बने रहे, ऐसे नेता 2014 से विपक्ष मे हैं. उनके लिए विपक्ष में और ज़्यादा समय रहना मुश्किल लग रहा था.
शिवसेना टूटी, उनका एक गुट बीजेपी के साथ गया. फिर शरद पवार की एनसीपी टूटी और उनका भी एक गुट सरकार मे शामिल होने के लिए बीजेपी के साथ गया.
यही रास्ता अपनाना ठीक है, ऐसे मानने वाले कई नेता कांग्रेस मे हैं. उन्हें ये लगता है कि आने वाले चुनाव के बाद फिर से सत्ता मे शामिल होना मुश्किल है और उनका राजनीतिक करियर ख़राब हो सकता है.
वही लोग दूसरे छोर पर जाने की कोशिश कर रहे हैं. मुंबई में बाबा सिद्दिक़ी या फिर उनके बेटे या फिर बाक़ी कुछ नेताओं के लिए बीजेपी और शिवसेना (एकनाथ शिंदे) के साथ जाना मुश्किल था.
लेकिन अजित पवार की एनसीपी उनके लिए एक विकल्प बन गई है. एनसीपी हमेशा सेक्युलर राजनीति करती आई है और उनके पास और भी मुस्लिम विधायक हैं.
कुछ लोगों का कहना है कि फिलहाल राजनीति का जो स्वरूप है, उसे देखते हुए बाबा सिद्दिक़ी के लिए वहां जाना आसान हो सकता है.
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