अनंत महाराजः पश्चिम बंगाल से बीजेपी के पहले राज्यसभा सांसद, पार्टी ने उन पर क्यों लगाया दांव

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, कोलकाता से
पश्चिम बंगाल से बीजेपी के टिकट पर राज्यसभा चुनाव में उतरे अनंत महाराज के ख़िलाफ़ कोई उम्मीदवार नहीं उतरा.
राज्यसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के पांच प्रत्याशियों के ख़िलाफ़ भी कोई उम्मीदवार नहीं खड़ा हुआ लिहाजा ये सभी निर्विरोध उच्च सदन के लिए चुन लिए. हालांकि चुनाव की तारीख़ 24 जुलाई है लेकिन अब इसके लिए मतदान नहीं होगा.
बीजेपी की ओर से अनंत महाराज के पहले कभी कोई नेता राज्यसभा के लिए नहीं चुना गया था.
बीजेपी की ओर से राज्यसभा प्रत्याशी के लिए कई नामों की चर्चा थी जिनमें भारतीय क्रिकेट में 'महाराजा' के नाम से चर्चित रहे पूर्व कप्तान सौरव गांगुली का नाम भी शामिल था.
आखिर में पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने अनंत महाराज के नाम पर मुहर लगाई.
अनंत महाराज उत्तर बंगाल के कूचबिहार इलाके में अलग राज्य का नारा बुलंद करने वाले कोच-राजबंशी समुदाय के निर्विवाद हैं.
हालांकि उम्मीदवारी के एलान के साथ ही उनके नाम पर विवाद भी शुरू हो गया. सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने बीजेपी को निशाने पर लेते हुए आरोप लगाया कि वो 'बंगाल के विभाजन को उकसावा दे रही है.'
वैसे, उत्तर बंगाल में अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलन का लंबा इतिहास रहा है. अतीत में कोच-राजबंशी के अलावा गोरखा और कामतापुरी संगठन भी अलग-अलग आवाज़ उठाते रहे हैं.
ये दावा भी किया जा रहा है कि राज्यसभा पहुंचने की तैयारी में लगे अनंत महाराज की अलग राज्य की मांग और उनका अतीत आगे भी बीजेपी को मुश्किल में डाल सकता है.
राज्यसभा के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद उन्होंने पत्रकारों के सवाल पर कहा था, “राज्य का विभाजन होगा या नहीं, इसका फ़ैसला संविधान करेगा. फिलहाल मैं इस मुद्दे पर ज़्यादा कुछ नहीं बोलना चाहता. मैं राजबंशी समुदाय के प्रतिनिधि के तौर पर उनके हितों के लिए काम करूंगा.”

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कौन हैं अनंत महाराज?
लेकिन ये अनंत महाराज हैं कौन और आख़िर बीजेपी ने उन्हें पश्चिम बंगाल से राज्यसभा क्यों भेजा है?
अनंत महाराज का नाम पश्चिम बंगाल से बाहर तो कम लोगों ने ही सुना होगा. राज्य में भी ज़्यादातर लोग उनके बारे में नहीं जानते. उन्होंने करीब दो दशक पहले ख़ुद को कूचबिहार का स्वयंभू राजा घोषित कर दिया था.
वे कूचबिहार और आस-पास के इलाकों में बसे राजबंशी समुदाय के निर्विवाद नेता हैं.
बीते लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बीजेपी को अनंत का समर्थन मिला था. अनंत वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सिलीगुड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी सभा में मंच पर मौजूद थे.
उसके पहले विधानसभा चुनाव के दौरान भी वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी के दूसरे नेताओं की चुनावी रैलियों में शामिल होते रहे हैं.
कोच-राजबंशी समुदाय की आबादी उत्तर बंगाल में कूचबिहार के अलावा जलपाइगुड़ी, दार्जिलिंग, उत्तर दिनाजपुर और मालदा के अलावा दक्षिण बंगाल के मुर्शिदाबाद में फैली है.
2011 की जनगणना के मुताबिक, उत्तर बंगाल में उनकी आबादी क़रीब 30 प्रतिशत थी. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में अनंत महाराज के नेतृत्व में इस समुदाय के समर्थन के कारण ही बीजेपी इलाके की आठ में से सात सीटें जीतने में कामयाब रही थी.
राज्य बीजेपी के नेता चाहते थे कि संगठन से जुड़े किसी नेता को राज्यसभा में भेजा जाए ताकि भविष्य में यहां पार्टी संगठन को मजबूत करने में मदद मिले.
पश्चिम बंगाल में प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष सुकांत मजूमदार और विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने केंद्रीय नेतृत्व को पांच-पांच लोगों की जो अलग-अलग सूची भेजी थी उनमें अनंत का नाम कॉमन था. लेकिन इस पर मुहर लगी पंचायत चुनाव के नतीजों के बाद.
नतीजों से साफ़ हो गया है कि उत्तर बंगाल के जिन इलाकों में विधानसभा और लोकसभा में पार्टी का प्रदर्शन बेहतर रहा था वहां भी उसके पैर तले की ज़मीन खिसकने लगी है.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पंचायत चुनाव के नतीजों और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रख कर ही पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने अनंत महाराज के नाम पर मुहर लगाने का फ़ैसला किया.

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बीजेपी की रणनीति
अनंत की पार्टी ग्रेटर कूचबिहार पीपुल्स एसोसिएशन (जीसीपीए) एनडीए में शामिल है.
लेकिन अनंत महाराज को लेकर बीजेपी भी कटघरे में है. इसकी वजह यह है कि अनंत लंबे समय से ग्रेटर कूचबिहार नामक अलग राज्य या केंद्रशासित प्रदेश की मांग करते रहे हैं और इसके समर्थन में आंदोलन भी करते रहे हैं. कई बार यह आंदोलन हिंसक हुआ है और अनंत महाराज को भूमिगत होकर असम में शरण लेनी पड़ी है.
राजनीतिक विश्लेषक समीरन पाल कहते हैं, "बीजेपी को बंगाल के अलावा असम में भी राजबंशी तबके के समर्थन की ज़रूरत है. ग्रेटर कूचबिहार की मांग में अनंत कूचबिहार और आसपास के राजबंशी बहुल इलाकों के अलावा असम के भी कुछ इलाकों को शामिल करने की मांग करते रहे हैं."
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बीजेपी को लगातार समर्थन देने के बदले अनंत को अब तक बदले में कुछ नहीं मिला था.
नतीजतन राजबंशी समुदाय में असंतोष की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी. इसलिए उनको राज्यसभा में भेज कर पार्टी एक तीर से दो शिकार करना चाहती है. इससे उनके अहसानों का बदला भी उतर जाएगा और अगले लोकसभा चुनाव में राजबंशी समुदाय का समर्थन भी पक्का हो जाएगा.

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ममता बनर्जी ने भेजे थे फूल
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने अनंत महाराज को लेकर बीजेपी से कड़े सवाल पूछे हैं.
पार्टी के प्रवक्ता जयप्रकाश मजूमदार कहते हैं, "यह बंगाल के विभाजन के बीजेपी के एजेंडे का हिस्सा है. अनंत महाराज बीजेपी के सदस्य नहीं है. वह बंगाल के विभाजन की मांग करते रहे हैं. लेकिन बीजेपी ने उनको चुना है और लोकसभा चुनाव से पहले उनको केंद्र में मंत्री भी बनाया जा सकता है."
उनके मुताबिक, पंचायत चुनाव के नतीजों से साफ़ है कि बीजेपी के पैरों तले की ज़मीन तेज़ी से खिसक रही है.
लेकिन प्रदेश बीजेपी के प्रवक्ता शमीक भट्टाचार्य ने तृणमूल कांग्रेस के आरोप को निराधार बताया.
उनका कहना था कि, “केंद्रीय नेतृत्व ने सोच-समझ कर ही अनंत को राज्यसभा भेजने का फ़ैसला किया है. इसका मतलब अलगाव को समर्थन करना नहीं है.”
तृणणूल कांग्रेस ने भले ही अनंत महाराज को लेकर सवाल उठाया हो लेकिन एक समय वो भी था जब वो उन्हें (अनंत महाराज को) अपने पाले में खींचने का प्रयास कर रही थी.
बीते साल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अनंत के जन्मदिन पर फूलों का गुलदस्ता भिजवाया था.
उससे पहले बीते साल 16 अप्रैल को कूचबिहार के वीर चिला राय की जयंती के मौके पर ममता और अनंत एक ही मंच पर मौजूद थे.

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अनंत ‘दोधारी तलवार’ हैं?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अनंत एक ऐसी ‘दोधारी तलवार’ हैं जिससे बीजेपी को आगे चल कर नुकसान भी हो सकता है.
समीरन पाल कहते हैं, "अनंत का राज्यसभा जाना तृणमूल कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. बीजेपी ने अनंत की उम्मीदवारी के ज़रिए यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह उत्तर बंगाल के विकास के लिए कृतसंकल्प है. लेकिन अनंत शुरू से ही अलग राज्य की मांग करते रहे हैं और तृणमूल कांग्रेस हमेशा बंगाल के विभाजन के ख़िलाफ़ रही है. ममता एकाधिक बार यह बात दोहरा चुकी हैं. अब पार्टी इसे बीजेपी के ख़िलाफ़ एक मुद्दा बना सकती है."
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