कर्नाटक के चुनावी नतीजों के बाद कांग्रेस के प्रति क्या बदल गया ममता का रवैया

ममता बनर्जी

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    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद उसके प्रति पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नज़रिया कुछ बदलता सा नज़र आ रहा है.

साल 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद ममता बनर्जी ने लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी एकता की कवायद शुरू की थी. लेकिन जल्दी ही कांग्रेस से उनका मोहभंग हो गया और वे कांग्रेस और वामपंथी दलों से समान दूरी बना कर चलने की बात दोहराने लगी थी.

हाल तक ममता कांग्रेस को कोसते नहीं थकती थी.

लेकिन सोमवार को कोलकाता में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने जो कहा, वह पहले के उनके बयानों से एकदम उलट है. लेकिन उन्होंने साथ ही कांग्रेस की नीति पर भी सवाल उठाया है.

लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर विपक्षी एकता की अपील दोहराते हुए ममता ने कहा कि वे कुछ इलाकों में कांग्रेस का समर्थन करेंगी.

उनका कहना था, "किसी ख़ास क्षेत्र में मजबूत दलों को एक साथ मिल कर लड़ना चाहिए. मैं कर्नाटक में कांग्रेस का समर्थन कर रही हूं. लेकिन उसे बंगाल में मेरे खिलाफ नहीं लड़ना चाहिए."

ममता ने हाल के दिनों में विपक्षी एकता के मुद्दे पर कांग्रेस को लेकर पहली बार स्पष्ट बात कही है.

यहां राज्य सचिवालय नवान्न में पत्रकारों से बातचीत में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने कहा, "जहां कांग्रेस मजबूत है, वहां लड़े. हम उसका समर्थन करेंगे. इसमें कुछ ग़लत नहीं है. लेकिन उसे (कांग्रेस को) दूसरे दलों का भी समर्थन करना होगा."

उन्होंने साफ़ कर दिया कि सीटों के बंटवारे में अपने-अपने इलाके में मजबूत क्षेत्रीय दलों को प्राथमिकता देनी होगी. उन्होंने कहा, ''मजबूत क्षेत्रीय दलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.''

ममता ने बीते विधानसभा चुनाव के बाद विपक्षी एकता की कवायद के सिलसिले में दिल्ली में विपक्षी नेताओं और कांग्रेस की प्रमुख सोनिया गांधी के साथ भी कई बार मुलाकात की थी. लेकिन यह कवायद परवान नहीं चढ़ सकी.

उतार चढ़ाव वाले रिश्ते

अधीर रंजन

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इमेज कैप्शन, तृणमूल कांग्रेस के नेता कहते रहे कि उनकी पार्टी ही भाजपा का एकमात्र विकल्प है और कांग्रेस उसे हराने में सक्षम नहीं है.

खासकर गोवा विधानसभा चुनाव के समय दोनों दलों के बीच की खाई चौड़ी हो गई. उसके बाद ममता पर त्रिपुरा और मेघालय जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में भी कांग्रेस के नेताओं को तोड़ कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल करने के आरोप लगे. दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस के नेता लगातार कहते रहे कि वही पार्टी (तृणमूल कांग्रेस) ही भाजपा का एकमात्र विकल्प है और कांग्रेस उसे हराने में सक्षम नहीं है.

दूसरी ओर, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी मेघालय की एक चुनावी रैली में तृणमूल कांग्रेस को इतिहास की याद दिलाते हुए उसे जमकर खरी-खोटी सुनाई थी.

बीते मार्च में मुर्शिदाबाद ज़िले की सागरदीघी सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार की जीत के बाद ममता ने भाजपा, कांग्रेस और वामपंथी दलों के बीच मिलीभगत के आरोप लगाए थे. तब उन्होंने साफ कहा था कि उनकी पार्टी किसी विपक्षी गठबंधन में शामिल होने की बजाय अकेले ही लड़ेगी.

लेकिन उसके बाद राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता खारिज होने के बाद ममता ने अपने एक ट्वीट में राहुल गांधी का नाम लिए बिना नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना की थी.

कर्नाटक चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद भी ममता ने कांग्रेस की जीत से ज्यादा भाजपा की पराजय को अहमियत दी थी. लेकिन दो दिनों के भीतर उन्होंने अपना रुख बदलते हुए विपक्षी गठबंधन के लिए कांग्रेस के समर्थन का एलान कर दिया.

वैसे, ममता और सोनिया गांधी की नजदीकी जैसे जगजाहिर है उसी तरह प्रदेश कांग्रेस और इसके प्रमुख अधीर रंजन चौधरी के साथ ममता का छत्तीस का आंकड़ा भी किसी से छिपा नहीं है.

साथ में उठाए सवाल

ममता बनर्जी और अखिलेश यादव

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इमेज कैप्शन, हाल के महीनों में ममता बनर्जी समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी नेताओं से मिलीं हैं

ममता ने समर्थन के साथ ही कांग्रेस की नीति पर भी सवाल उठाया है. उनका कहना था कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है.

कुछ दिनों पहले ही एच.डी. कुमारस्वामी, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने यहां विपक्षी एकता के मुद्दे पर विचार-विमर्श के लिए ममता से मुलाकात की थी. उसके बाद अपने ओडिशा दौरे के दौरान ममता ने वहां मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से भी मुलाकात की थी.

ममता के ताजा बयान पर कांग्रेस के एक नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, "ममता बनर्जी कब क्या कहती और करती हैं, इसका अनुमान लगाना या इसकी वजह को समझना मुश्किल है. पहले कांग्रेस के साथ की बात करती थी, फिर दूरियां बढ़ गई और अब एक बार फिर उनका रुख बदल गया है. गठजोड़ या समर्थन के बारे में कोई भी फैसला केंद्रीय नेतृत्व ही करेगा."

राजनीतिक पर्यवेक्षक समीरन पाल कहते हैं, "लंबे समय तक कांग्रेस से रार रखने के बाद अब कर्नाटक चुनाव के नतीजों के बाद शायद ममता समझ गई हैं कि कांग्रेस को साथ लिए बिना एक मजबूत विपक्षी गठबंधन बनाना संभव नहीं है. इसलिए उन्होंने अपने पहले के रुख में बदलाव किया है. अब आगे क्या होगा, यह देखने के लिए संभवतः कुछ समय तक इंतजार करना पड़ सकता है."

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