आज़म ख़ान: सपा नेता को यूपी के रामपुर की कोर्ट ने सुनाई दो साल की सज़ा, कितनी मुश्किल आगे की राह

आज़म ख़ान

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उत्तर प्रदेश के रामपुर की स्पेशल एमपी-एमएलए कोर्ट ने हेटस्पीच के एक मामले में समाजवादी पार्टी के नेता आज़म ख़ान को शनिवार को दो साल क़ैद की सज़ा सुनाई है. उन पर 2,500 रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक आज़म ख़ान पर आरोप था कि उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान 8 अप्रैल को धमोरा इलाक़े में हुई एक सभा में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और रामपुर के तत्कालीन ज़िलाधिकारी आन्जनेय कुमार सिंह पर आपत्तिजनक और भड़काऊ टिप्पणियां की थीं.

उनके कथित बयान का वीडियो वायरल भी हुआ था.

आज़म खान के विवादित बयान के बाद रामपुर में भाजपा कार्यकर्ताओं ने हंगामा किया था. उसके बाद एडीओ पंचायत अनिल कुमार चौहान ने शहज़ाद नगर थाने में तीन धाराओं में केस दर्ज कराया था.

अभियोजन पक्ष के वकील संदीप सक्सेना ने इस बारे में मीडिया को बताया, ‘‘आज़म खान को तीन धाराओं में सज़ा सुनाई गई है. दो धाराओं में दो-दो साल की सज़ा सुनाई गई है, जबकि एक धारा में एक माह की सज़ा सुनाई गई है.

बीबीसी के सहयोगी पत्रकार अमन द्विवेदी के मुताबिक रामपुर से बीजेपी विधायक आकाश सक्सेना ने आज़म खान को दो साल की सज़ा सुनाए जाने पर कहा है कि न्यायपालिका के इस कड़े रुख़ से कम से कम हिंदुस्तान के राजनीतिक स्तर में बहुत सुधार आएगा.

आज़म ख़ान

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रामपुर में बोलती रही तूती

अगले महीने की 14 तारीख़ को 75 साल के होने जा रहे आज़म ख़ान 1980 में रामपुर से पहली बार विधायक बने थे.

पेशे से वकील आज़म ख़ान ने उसके बाद लगातार 15 साल तक विधानसभा में रामपुर का प्रतिनिधित्व किया. इस दौरान वो पांच बार विधायक बने.

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उसके बाद वो और पांच बार रामपुर के विधायक रहे. उसमें 2002 से 2019 तक वो लगातार वहां के विधायक रहे.

आज़म ख़ान 1996 से 2002 तक राज्यसभा और 2019 से 2022 तक लोकसभा के सांसद भी रहे. 2022 में रामपुर से विधायक बनने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया था.

समाजवादी पार्टी के महासचिव रहे आज़म ख़ान कई बार उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रह चुके हैं.

उनके बेटे अब्दुल्ला आज़म ख़ान पहली बार 2017 में विधायक बने.

हालांकि 2022 में चुनाव जीतने के बाद कई जन्म प्रमाण पत्र इस्तेमाल करने के आरोप में सज़ा मिलने के बाद अब्दुल्ला को विधायक पद के लिए अयोग्य करार दे दिया गया था.

फर्जी जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के इस मामले में आज़म ख़ान और उनकी पत्नी के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज कराया गया था.

26 फरवरी, 2020 को पुत्र अब्दुल्ला के साथ आज़म ख़ान और उनकी पत्नी को क़ैद की सज़ा सुनाई गई.

आज़म ख़ान उसके बाद अगले 27 महीने तक जेल में रहे. उन पर अन्य कई मामले भी दर्ज थे.

उसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई को उन्हें अंतरिम ज़मानत दी, तो वे 20 मई को सीतापुर जेल से बाहर आए.

आकाश सक्सेना

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इमेज कैप्शन, आकाश सक्सेना, आज़म ख़ान और उनके बेटे के ख़िलाफ़ केस लड़ने में काफ़ी सक्रिय थे. बाद में वे रामपुर से विधायक बने.

2019 में मिली तीन साल की सज़ा

2019 में पीएम नरेंद्र मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के एक मामले में 27 अक्टूबर, 2022 को एमपी-एमएलए कोर्ट से तीन साल की सज़ा सुनाए जाने के बाद आज़म ख़ान को भी विधायक पद के लिए अयोग्य क़रार दिया गया था.

हालांकि 25 मई, 2023 को रामपुर के सेशन कोर्ट ने इस मामले में आज़म ख़ान को बरी करने का फ़ैसला सुनाया था.

उसके बाद, रामपुर में हुए उप-चुनाव के बाद बीजेपी के आकाश सक्सेना विधायक बने.

आज़म ख़ान के ख़िलाफ़ केस लड़ने में आकाश काफ़ी सक्रिय थे. उनके बेटे अब्दुल्ला के खि़लाफ़ मामला भी आकाश सक्सेना ने ही दर्ज करवाया था.

दिसंबर 2022 में हुए उपचुनाव में सक्सेना ने समाजवादी पार्टी के आसिफ़ राजा को हरा कर रामपुर पर बीजेपी का झंडा फहरा दिया, जहां मुसलमानों की आबादी ज़्यादा है.

बीते चार दशक के दौरान ज़्यादातर वक़्त इस सीट पर आज़म ख़ान के परिवार का कब्ज़ा रहा लेकिन बीजेपी ने इस सिलसिले को तोड़ दिया.

जौहर विश्वविद्यालय को लेकर रहे विवादों में

आज़म ख़ान अपने गृहनगर रामपुर में मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय स्थापित करवाने के लिए काफ़ी चर्चित रहे हैं.

हालांकि इस विश्वविद्यालय की स्थापना के पहले से ही उन पर ज़बरन ज़मीन हथियाने के आरोप लगते रहे.

लेकिन 2017 में उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार आने के बाद आज़म ख़ान और विश्वविद्यालय की संचालक संस्था ‘जौहर ट्रस्ट’ पर इस सिलिसिले में एक के बाद कई मामले दर्ज किए गए.

बताया जाता है कि इस मामले में क़ानून की विभिन्न धाराओं के तहत आज़म ख़ान पर 78 से अधिक मामले दर्ज हैं.

आज़म और अखिलेश

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अखिलेश की उपेक्षा की चर्चा

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा में आज़म ख़ान की अनदेखी की चर्चा विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से ही चल रही थी.

सीतापुर जेल से उनकी रिहाई के कुछ दिन पहले आज़म ख़ान के एक सहयोगी ने कहा था, "अखिलेश यादव ने विधानसभा में भाषण दिया, लेकिन एक बार भी ‘आज़म ख़ान साहब’ का नाम नहीं लिया."

उन्होंने कहा था कि आज़म ख़ान से जेल में मिलने अखिलेश यादव महज़ एक बार गए. उनके अनुसार, "योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि अखिलेश यादव ही नहीं चाहते कि आज़म ख़ान जेल से बाहर आएं, तो क्या ये बात सही है."

उसके बाद, उनकी रिहाई के समय जेल के बाहर शिवपाल यादव का होना और अखिलेश यादव का न होना सपा में उनकी उपेक्षा के दावों को बल मिला था.

उसके बाद, सपा के नेतृत्व से मतभेद की ख़बरों पर आज़म ख़ान ने तंज़ कसते हुए कहा था, ‘‘नाराज़ होने की मेरी हैसियत नहीं.’’

रसूख बचाने को जूझ रहे आज़म

एक मध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुए आज़म ख़ान ने 1970 के दशक में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से क़ानून की पढ़ाई की. यहीं के छात्रसंघ में सियासत का ककहरा सीखा. इंदिरा गांधी ने जब देश में आपातकाल लगाया तो वो भी जेल गए. जब बाहर आए तो नई पहचान और लंबा राजनीतिक सफ़र उनका इंतज़ार कर रहा था.

रामपुर को नवाबों का शहर कहा जाता है. इन्हीं नवाबों के साए में आज़म ख़ान ने रामपुर में अपनी राजनीतिक सरगर्मियां शुरू कीं. 1980 में पहली बार विधायक का चुनाव जीता और अगले दशकों में रामपुर को अपने नाम का पर्याय बना लिया.

रामपुर शहर पर आज उनकी छाप ऐसी है कि लोगों की ज़बान और जगह-जगह लगे शिलान्यास के पत्थरों पर उनका ही नाम नज़र आता है लेकिन आज इसी रामपुर में उन पर 78 से अधिक मुक़दमे दर्ज हैं.

उन पर लोगों को डराने-धमकाने, ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करने से लेकर, भैंसें और किताबें चोरी करने तक के आरोप हैं.

आज़म ख़ान सभी आरोपों को सिरे से ख़ारिज करते हुए उन्हें' राजनीतिक साज़िश' का नतीजा बताते रहे हैं.

ये अलग बात है कि जिस रामपुर में आज़म ख़ान इस रौब से चलते थे कि शासन-प्रशासन उनके सामने झुका नज़र आता था, उसी रामपुर में अब वो अपने राजनीतिक अस्तित्व और साख़ को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

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