आज़म की रिहाई पर शिवपाल का जाना और अखिलेश का 'बहाना'

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
27 महीने बाद समाजवादी पार्टी नेता आज़म ख़ान सीतापुर जेल से रिहा हुए.
शुक्रवार सुबह ही उनको जेल से रिहा किया गया.
इस मौके पर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के संयोजक शिवपाल सिंह यादव उनको रिसीव करने के लिए जेल के बाहर मौजूद थे.
वहीं समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव ने ट्वीट करके ही काम चलाया. वो उनसे मिलने जेल के बाहर नहीं पहुँचे.
उन्होंने ट्विटर पर आज़म ख़ान का स्वागत करते हुए लिखा, "सपा के वरिष्ठ नेता व विधायक आज़म ख़ान के ज़मानत पर रिहा होने पर उनका हार्दिक स्वागत है. ज़मानत के इस फ़ैसले से सर्वोच्च न्यायालय ने न्याय को नये मानक दिये हैं. पूरा ऐतबार है कि वो अन्य सभी झूठे मामलों-मुक़दमों में बाइज़्ज़त बरी होंगे. झूठ के लम्हे होते हैं, सदियाँ नहीं!"
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एक दिन पहले जब आज़म ख़ान की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आया था तब समाजवादी पार्टी के ट्विटर हैंडल से भी फ़ैसले के स्वागत में ट्वीट किया गया था.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी में आज़म ख़ान की अनदेखी की चर्चा विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से ही चल रही है.
कुछ दिन पहले ही आज़म ख़ान के मीडिया प्रभारी फ़साहत अली ख़ान कहा था कि अखिलेश यादव ने विधानसभा में भाषण दिया लेकिन एक बार भी 'आज़म ख़ान साहब' नहीं कहा. आज़म ख़ान से अखिलेश यादव जेल में महज़ एक बार मिलने गए हैं. योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि अखिलेश यादव ही नहीं चाहते हैं कि आज़म ख़ान जेल से बाहर आएं, क्या यह बात सही है?
इस वजह से उनकी रिहाई के समय शिवपाल यादव का वहाँ होना और अखिलेश यादव की ग़ैर मौजूदगी ने आग में घी की तरह काम किया है.
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रिहाई पर मिलने क्यों नहीं पहुँचे अखिलेश?
आज़म ख़ान की रिहाई पर अखिलेश यादव सीतापुर क्यों नहीं गए?
इस सवाल के जवाब में समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी कहते हैं, "अखिलेश जी, उनसे पहले जेल में भी मिलकर आए हैं, उनके घर भी जा चुके हैं. अखिलेश जी की व्यस्तता हो सकती है. पार्टी के कई कार्यक्रमों में आजकल लगे होते हैं. हमारी पार्टी और नेता सभी का स्पष्ट मत है. आज़म ख़ान साहब के साथ अन्याय हुआ है. फर्ज़ी मुकदमें लिखे गए हैं. राजनीतिक रूप से परेशान करने की कोशिश की गई है. इस वजह से लंबे समय तक उन्हें जेल में रहना पड़ा. आज जब वो जेल से बाहर आए हैं, पार्टी के सभी नेता उनकी रिहाई से प्रसन्न है."
हालांकि राजकुमार भाटी इस बात को स्वीकार करते हैं कि अखिलेश जी अगर आज़म ख़ान की रिहाई के समय उनसे मिलने जाते तो अच्छा होता, लेकिन ज़रूर उनकी कोई व्यस्तता रही होगी. कोई मतभेद या जानबूझकर नज़रअंदाज़ करने के आरोप ग़लत हैं.
वैसे अखिलेश यादव का शुक्रवार को लखनऊ में कार्यक्रम था. उत्तर प्रदेश विधानसभा में नवनिर्वाचित सदस्यों के लिए ट्रेनिंग सेशन में उनको शामिल होना था. यह कार्यक्रम सुबह 10.30 बजे था.
लखनऊ से सीतापुर की दूरी तकरीबन दो घंटे की है.

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उत्तर प्रदेश की राजनीति को दशकों से कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि कहते हैं, " इस बार विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को भले ही वैसी सफलता नहीं मिली जैसी उनको उम्मीद थी. लेकिन ये सच है कि सपा के 111 विधायकों में से 31 मुसलमान हैं. वो भी तब जब आज़म ख़ान जेल में थे. किसी तरह का कोई प्रचार इस चुनाव में उन्होंने नहीं किया.
आज़म ख़ान के बिना भी अगर सपा को चुनाव में मुसलमानों का इतना बड़ा सपोर्ट मिला है, तो इसका एक मतलब ये भी निकलता है कि उत्तर प्रदेश के मुसलमान हर हाल में सपा को सपोर्ट करेंगे इस बात के लिए अखिलेश आश्वस्त हैं. सपा का आज़म ख़ान के साथ होना या नहीं होना कोई मायने नहीं रखता. ऐसी स्थिति में पार्टी में ज़रूर ये विचार चल रहा होगा कि क्या पार्टी को आज़म ख़ान की वाक़ई में ज़रूरत है?"
हालांकि नवभारत टाइम्स के पश्चिम उत्तर प्रदेश के अस्टिटेंट एडिटर शादाब रिज़वी की राय थोड़ी अलग है.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, " पिछले दिनों आज़म ख़ान और अखिलेश के बीच नाराज़गी की जो ख़बरे सामने आई थी. पार्टी के दूसरे नेता जब आज़म ख़ान से मिलने गए थे तो वो नहीं मिले. अखिलेश सुबह सुबह मिलने जाते और वो नहीं मिलते तो बात ज़्यादा बिगड़ सकती थी. इस वजह से मध्यस्थ के ज़रिए उन्होंने अपना संदेशा पहुँचवाया. आज़म ख़ान रिहा होने के बाद सीतापुर से सपा के नेता अनूप गुप्ता के घर गए. वहाँ उनके साथ नाश्ता किया. अनूप गुप्ता ने बाद में मीडिया को बताया कि अखिलेश जी ने ख़ुद आज़म ख़ान का ख़्याल रखने का बात उनसे कही थी."
वो आगे कहते हैं, "मेरा आकलन है कि इस वजह से कयास लगाए जा रहे हैं कि देर-सवेर ही सही अखिलेश यादव रामपुर जाकर आज़म ख़ान से मिलेंगे. ये मुलाक़ात लखनऊ में भी हो सकती है या रामपुर में भी. ज़्यादा संभावना है कि अखिलेश रामपुर जाकर ही उनसे मिलें."
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अखिलेश और आज़म के बीच दूरियों के संकेत
यूपी में चुनाव प्रचार के दौरान और उसके बाद भी समाजवादी पार्टी पर आज़म ख़ान की अनदेखी के कई आरोप लगे.
आज़म ख़ान के एक सहयोगी शानी ख़ान ने हाल ही में मुलायम सिंह के व्यवहार पर सवाल उठाते हुए अख़बार को दिए एक इंटरव्यू में कहा था,"मुलायम सिंह शेर देखने सफारी के लिए इटावा जा सकते हैं, लेकिन 70 किलोमीटर का सफ़र तय करके आज़म ख़ान से एक बार मिलने सीतापुर जेल नहीं जा सकते."
चुनाव से पहले आज़म ख़ान ने सपा की ओर से जेल पहुँचे प्रतिनिधिमंडल से मिलने से मना कर दिया था जबकि उन्होंने अख़िलेश के चाचा शिवपाल यादव से मुलाक़ात की थी.
चुनाव के नतीजों के बाद आज़म ख़ान के मीडिया प्रभारी फ़साहत अली ख़ान उर्फ शानू ने कहा था, ''हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष जी को हमारे कपड़ों से बदबू आती है. अखिलेश और उनके पिता मुसलमानों की मदद से मुख्यमंत्री बने लेकिन आज़म ख़ान को उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाया गया."
उनके इस माँग पर समाजवादी पार्टी नेता राजकुमार भाटी कहते हैं, " नेता प्रतिपक्ष अगर अखिलेश जी नहीं बनते तो आज़म ख़ान जी को ही बनाया जाता. लेकिन अखिलेश जी ने लोकसभा से इस्तीफ़ा दिया और उत्तर प्रदेश में रहने का फ़ैसला किया तो नेता प्रतिपक्ष वो बने. वैसे भी पार्टी के नेता तो वही हैं, पार्टी के अध्यक्ष भी वही हैं तो पहली दावेदारी उनकी है. वो नेता प्रतिपक्ष हैं, इससे बढ़िया और क्या हो सकता है. अखिलेश यादव की जगह किसी तीसरे को बनाया जाता तब ये सवाल विचारणीय हो भी सकता था. "

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संदेश क्या है?
तो क्या अखिलेश ने सुबह सुबह सीतापुर ना जाकर कोई संदेश देने की कोशिश की है? अब आगे अखिलेश आज़म से मिलने जाएं, कितने दिन बाद जाएं इससे कोई फ़र्क पड़ेगा?
इस पर रतन मणि कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में इस वक़्त जो राजनीतिक माहौल है, ऐसे समय में समाजवादी पार्टी या अखिलेश यादव मुसलमानों के साथ ज़्यादा खड़े होना नहीं चाहेंगे. ऐसा कर वो हिंदूओं के बीच अपना सपोर्ट थोड़ा खो सकते हैं. अखिलेश इस वक़्त ऐसी नाराज़गी मोल लेने की स्थिति में नहीं हैं.
यानी अखिलेश की नज़र 2024 के लोकसभा चुनाव पर है. इस वजह से भी अखिलेश वो तत्परता नहीं दिखा रहे.
अखिलेश बाद में कभी भी मिलने जाएं, संदेश तो चला ही गया है."

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आज़म ख़ान के पास विकल्प
हालांकि शादाब रिज़वी, रतन मणि की बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखते.
उनका कहना है कि मुसलमान के पास उत्तर प्रदेश में कोई और विकल्प नहीं है और ना ही अखिलेश के पास मुसलमानों के सिवाय कोई दूसरा विकल्प है. उत्तर प्रदेश की सियासत में अखिलेश यादव आज अगर प्रासंगिक हैं तो इसके पीछे उनका यादव वोट बैंक नहीं बल्कि मुसलमान वोट बैंक है. इस वजह से अखिलेश यादव ना तो मुसलमानों को खोना चाहेंगे और ना ही आज़म ख़ान को.
रतन मणि कहते हैं, "27 महीने जेल में रहने के बाद अचानक से बाहर आकर आज़म ख़ान सपा के ख़िलाफ़ नहीं हो सकते. इस वक़्त आज़म ख़ान की ये मजबूरी है. अखिलेश की ऐसी कोई मजबूरी नहीं है.
संख्या बल के लिहाज़ से देखें तो आज़म ख़ान कांग्रेस और बसपा में जाकर क्या ही करेंगे. AIMIM उनको उत्तर भारत का चेहरा बनाएगी इस पर मुझे शक है. यूपी में नई पार्टी बनाकर कल्याण सिंह को क्या मिला और शिवपाल को क्या मिला, ये सभी ने देखा है. आज़म ख़ान राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी है. वो भी इस बात को जानते हैं."
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