खालिस्तानी आंदोलन के तार कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन से जुड़ने की पूरी कहानी- विवेचना

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अप्रैल 1979 में पटियाला के पंजाबी विश्वविद्यालय में एक सम्मेलन हो रहा था. तीन घंटे तक लगातार चले भाषणों ने सबको बोर कर दिया था. संयोजक खड़े होकर धन्यवाद प्रस्ताव की तैयारी कर रहे थे और वहाँ मौजूद लोग भी इस उम्मीद में खड़े हो गए थे कि अब लंच का समय आ गया है.
तभी अचानक दो लोग हॉल के पीछे से दौड़ते हुए आए और मंच पर चढ़ गए. उन्होंने भारतीय संविधान के विरोध में नारे लगाए और हवा में कुछ काग़ज़ फेंके. फिर वो जितनी तेज़ी से दौड़ते हुए अंदर आए थे उतनी ही तेज़ी से दौड़ते हुए बाहर चले गए.
अगले दिन ‘द ट्रिब्यून’ अख़बार के संपादक और जाने-माने पत्रकार प्रेम भाटिया ने लिखा कि विश्वविद्यालय सम्मेलन में जो घटना हुई है वो अत्यंत गंभीर है. उन्होंने एक शब्द का इस्तेमाल किया 'खालिस्तान' जो ट्रिब्यून के पाठकों ने पहले कभी नहीं सुना था.
भारत के आज़ाद होने के कुछ सालों के अंदर ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा में बसने वाले भारतीयों में सबसे बड़ी तादाद पंजाब से आने वाले सिखों की थी. इनमें से कुछ लोग तो ब्रिटिश शासन के दौरान ही इन देशों में बस चुके थे.
इन लोगों की दिक्कतें तब शुरू हुईं जब कंपनियों ने ज़ोर देना शुरू किया कि वो अपनी दाढ़ी कटाएँ और पगड़ी पहनना बंद करें.
इन लोगों ने अपनी शिकायतें भारतीय उच्चायोग के सामने रखीं, लेकिन उच्चायोग ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया और सिखों को सलाह दी कि अपनी शिकायतों के निवारण के लिए स्थानीय प्रशासन से संपर्क करें.
रॉ के पूर्व अतिरिक्त सचिव बी रमण ने सिख अलगाववाद पर अपने व्हाइट पेपर में लिखा, "सिखों के मुद्दों को विदेशी सरकारों के सामने उठाने में भारत सरकार की झिझक ने ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा में रहने वाले सिखों के एक तबक़े में इस भावना को बढ़ावा दिया कि एक अलग देश में ही उनके धार्मिक अधिकारों की रक्षा हो सकती है."
"ब्रिटेन के सिख बस ड्राइवरों और कंडक्टरों ने चरण सिंह पंछी के नेतृत्व में सिख होम रूल मूवमेंट की शुरुआत की. इसी तरह अमेरिका के कुछ ख़ुशहाल सिख किसानों ने 'यूनाइटेड सिख अपील' की स्थापना की. लेकिन अधिक्तर सिख लोग इन संगठनों से दूर रहे और उन्होंने अलग सिख देश के विचार का समर्थन नहीं किया."

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खालिस्तान आंदोलन को पाकिस्तान की मदद
1967 से 1969 के बीच पंजाब विधानसभा के उपाध्यक्ष रहे जगजीत सिंह चौहान बाद में पंजाब के वित्त मंत्री भी बने, कुछ समय बाद वे लंदन में बस गए. वहाँ उन्होंने सिख होम रूल लीग की न सिर्फ़ सदस्यता ग्रहण की बल्कि इसके अध्यक्ष भी बन गए.
बाद में उन्होंने इसका नाम बदल कर खालिस्तान आंदोलन कर दिया. उनके ब्रिटेन पहुंचने से पहले से ही पाकिस्तानी उच्चायोग और लंदन में अमेरिकी दूतावास सिख होम रूल आंदोलन के संपर्क में था.
रॉ के अतिरिक्त सचिव रहे बी रमण अपनी किताब ‘काव ब्वॉएज़ ऑफ़ रॉ’ में लिखते हैं, "पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह जनरल याह्या ख़ान ने जगजीत सिंह चौहान को पाकिस्तान आमंत्रित किया. वहाँ उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया और पंजाब के सिख नेता के रूप में उनका प्रचार किया गया. उनकी पाकिस्तान यात्रा के दौरान वहाँ के प्रशासन ने उन्हें पाकिस्तान के गुरुद्वारों में रखे पवित्र सिख दस्तावेज़ भेंट किए. वो उन्हें अपने साथ ब्रिटेन ले गए और अपने आपको सिखों का नेता दिखाने के लिए उनका इस्तेमाल किया."

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जगजीत सिंह चौहान खालिस्तान के राष्ट्रपति घोषित
दिसंबर, 1971 में पाकिस्तान से लड़ाई शुरू होने से पहले इंदिरा गाँधी के निर्देश पर रॉ ने पूर्वी पाकिस्तान में लोगों के मानवाधिकारों के उल्लंघन को दिखाने के लिए पूरी दुनिया में एक अभियान चलाया.
सीआईए और आईएसआई ने इसका जवाब देते हुए भारत में सिखों के मानवाधिकार हनन और विदेशों में रह रहे सिखों की समस्याओं के प्रति भारत के 'उदासीन रवैये' को प्रचारित करना शुरू कर दिया.
जगजीत सिंह चौहान ने न्यूयॉर्क की यात्रा करके स्थानीय मीडिया से मुलाकात की और उन्हें खालिस्तान आंदोलन की जानकारी दी. उन बैठकों का आयोजन अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिवालय के लोगों ने करवाया जिसका नेतृत्व उस समय हेनरी किसिंजर कर रहे थे.

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टेरी मिलिउस्की अपनी किताब ‘ब्लड फ़ॉर ब्लड फ़िफ़्टी इयर्स ऑफ़ द ग्लोबल खालिस्तान प्रोजेक्ट’ में लिखते हैं, "13 अक्तूबर, 1971 को जगजीत सिंह चौहान ने न्यूयॉर्क टाइम्स में एक पूरे पन्ने का इश्तेहार दिया जिसमें स्वतंत्र सिख राज्य खालिस्तान के लिए आंदोलन शुरू करने की बात कही गई थी."
"यहीं नहीं उन्होंने अपने-आप को खालिस्तान का राष्ट्रपति भी घोषित कर दिया. बाद में रॉ की जाँच में पता चला कि इस विज्ञापन का ख़र्च वॉशिंग्टन स्थित पाकिस्तान के दूतावास ने उठाया था."

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खालिस्तानी करेंसी नोट और डाक टिकट
इस बीच ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा में सिख युवाओं ने अंतरराष्ट्रीय सिख युवा फ़ेडेरेशन, दल खालसा और बब्बर खालसा जैसे कई संगठनों की स्थापना की. इन सभी ने जगजीत सिंह चौहान को दरकिनार कर खालिस्तान की स्थापना के लिए हिंसक आंदोलन की वकालत की.
चौहान इंदिरा गांधी के सत्ता से हटते ही भारत आ गए थे लेकिन जब 1980 में इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में आईं तो चौहान वापस इंग्लैंड चले गए.
टेरी मिलिउस्की लिखते हैं, "70 का दशक ख़त्म होते-होते आईएसआई की चौहान में दिलचस्पी ख़त्म होने लगी और उन्होंने दूसरे नए संगठनों को प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया. चौहान ने अपने प्रचार अभियान के तहत कनाडा में कथित स्वतंत्र राज्य खालिस्तान के करेंसी नोट और डाक टिकट छपवाए और उनको प्रचारित करने लगे."
"इस बीच वो ओटावा भी गए. वहाँ उन्होंने चीनी राजनयिक से मुलाकात कर खालिस्तान आंदोलन के लिए चीन की सहायता माँगी लेकिन चीनियों ने उनकी बात नहीं मानी. सन 1980 के बाद पाकिस्तान ने उन्हें डाउनग्रेड करना शुरू कर दिया लेकिन अमेरिका की उनमें दिलचस्पी बरकरार रही."

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इंदिरा गाँधी के दोबारा सत्ता में आने के बाद अमेरिका में एक नया सिख नेता सक्रिय हो गया. उनका नाम था गंगा सिंह ढिल्लों. वो पहले पंजाब पुलिस के एक अधिकारी थे जो अमेरिका जाकर वॉशिंगटन में बस गए थे.
बी रमण लिखते हैं, "अमेरिका पहुंचने के बाद उन्होंने कीनियाई मूल की सिख महिला से शादी कर ली थी जो कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल ज़िया उल हक़ की पत्नी की नज़दीकी दोस्त थी. अपनी पत्नी की मदद से ढिल्लों जनरल ज़िया का करीबी दोस्त बन गया."
"उसने वाशिंगटन में ननकाना साहब फ़ाउंडेशन की स्थापना की और अक्सर पाकिस्तान जाने लगा. ज़िया और ढिल्लों का परिवार इतने नज़दीक आ गया कि जब भी ज़िया वॉशिंगटन की यात्रा पर जाते थे तो अपनी विकलांग बेटी उनके साथ होटल में न रह कर ढिल्लों परिवार के साथ रहा करती थी."

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भारतीय विमान को किया हाइजैक
29 सितंबर, 1981 को सिख चरमपंथी एक भारतीय विमान को हाइजैक कर लाहौर ले गए. पाकिस्तानी प्रशासन ने हाइजैकर्स को यात्रियों को छोड़ने और अपने-आप को सुरक्षा एजेंसियों को हवाले करने के लिए मना लिया.
अपह्रत विमान को यात्रियों के साथ भारत लौटा दिया गया. लेकिन सरेंडर करने वाले अपहर्ताओं को ननकाना साहब गुरुद्वारे में रहने की अनुमति दे दी गई.
ज़िया उल हक़ की सरकार ने उन्हें भारत के हवाले करने से इनकार कर दिया. उन्होंने ये वादा ज़रूर किया कि वो पूरी जाँच के बाद पाकिस्तान की अदालत में उनपर मुक़दमा चलाएंगे. मुक़दमे के बाद उनको सज़ा हुई लेकिन उन्हें जेल भेजने के बजाए उन्हें ननकाना साहब गुरुद्वारे में रहने की इजाज़त दी गई.
मुख्य अपहर्ता गजेंद्र सिंह ने गुरुद्वारे में रहते हुए भारत और विदेश से आने वाले तीर्थयात्रियों से मिलकर भारत के खिलाफ़ प्रचार करना जारी रखा.

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रोमेश भंडारी को दुबई भेजा गया
इसके बाद सिख चरमपंथियों ने एक के बाद एक तीन भारतीय विमानों को हाइजैक किया. पाकिस्तानी प्रशासन इन विमानों को अपने यहाँ लैंड करने की अनुमति देता और अपहर्ताओं और मीडिया के बीच बातचीत की व्यवस्था कराता रहा ताकि हाइजैकर्स भारत विरोधी प्रचार चला सकें.
आख़िर में वो उन्हें यात्रियों को छोड़ देने के लिए मना लेते ताकि वो भारत लौट सकें. कथित तौर पर गिरफ़्तार किए अपहर्ताओं को जेल भेजने के बजाए गुरुद्वारे में रखा जाता लेकिन जब 24 अगस्त, 1984 को चरमपंथियों ने पाँचवीं बार भारतीय विमान को हाइजैक किया तो पाकिस्तानी प्रशासन ने बिल्कुल अलग नीति अपनाई क्योंकि पिछले मौकों पर हाइजैकर्स के साथ किए गए उनके व्यवहार की अंतरराष्ट्रीय समुदाय के कुछ हल्कों में आलोचना हुई थी.
बी रमण लिखते हैं, "जब उस विमान ने लाहौर में लैंड किया तो आईएसआई के अधिकारियों ने पाया कि चरमपंथियों ने उस विमान को असली हथियार के बजाए खिलौने वाली पिस्तौल दिखा कर हाइजैक किया था. उन्होंने चरमपंथियों को एक रिवॉल्वर दी और उन्हें दुबई जाने के लिए मना लिया. जब विमान ने दुबई में लैंड किया तो संयुक्त अरब अमीरात के अधिकारियों ने उन्हें इस शर्त पर हाइजैकिंग समाप्त करने के लिए मना लिया कि उन्हें भारत सरकार को नहीं सौंपा जाएगा."
जैसे ही भारत सरकार को इस बारे में पता चला उन्होंने आईबी, रॉ और नागरिक उड्डयन विभाग के अधिकारियों का एक दल दुबई भेजा. जब दुबई के अधिकारियों ने भारतीय दल से सहयोग नहीं किया तो इंदिरा गाँधी ने विदेश मंत्रालय में सचिव रोमेश भंडारी को दुबई भेजा जिनके दुबई के राजपरिवार से गहरे रिश्ते थे.

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दुबई ने सिख चरमपंथियों को भारत को सौंपा
बी रमण आगे लिखते हैं, "एक पश्चिमी कंपनी का जहाज़ चार्टर कर दुबई भेजा गया. भारतीय दल के सभी सदस्य विमान के अंदर ही रहे. दुबई के अधिकारियों ने हाइजैकर्स से झूठ बोला कि उनकी इच्छानुसार उन्हें अमेरिका को सौंपा जा रहा है. उनको लेने के लिए अमेरिका से एक विशेष विमान आया है. उनको चार्टर्ड विमान के अंदर ले जाकर उनके रिवॉल्वर समेत भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के हवाले कर दिया गया. विमान के अंदर घुसकर हाइजैकर्स को पता चला कि उनको अमेरिका न ले जाकर भारत ले जाया जा रहा है."
हाइजैकर्स को दिया गया रिवॉल्वर जर्मनी में बना हुआ था. रॉ ने उस रिवॉल्वर का विवरण जर्मन ख़ुफ़िया एजेंसी को भेजकर ये पता लगाने के लिए कहा कि इस रिवॉल्वर को किसे बेचा गया था? जर्मन ख़ुफ़िया एजेंसी ने रॉ को बताया कि वो रिवॉल्वर पाकिस्तानी सेना को भेजे गए हथियारों के कंसाइनमेंट का हिस्सा था.
जब भारत ने अमेरिका को ये विवरण देकर माँग की कि इन सबूतों के आधार पर पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित किया जाना चाहिए तो अमेरिकी प्रशासन इससे सहमत नहीं हुआ. उनका कहना था कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि उस हथियार को पाकिस्तानी अधिकारी ने चरमपंथियों को सौंपा था.
रिवॉल्वर को एक पाकिस्तानी अधिकारी ने हाइजैकर्स को दिया था, इस बात की सूचना उस विमान में सवार एक यात्री से मिली थी जिसने अपनी आँखों से ऐसा होते हुए देखा था. हाइजैकर्स को भारत सरकार को सौंपे जाने का नतीजा ये हुआ कि खालिस्तानियों में इस बात का डर बैठ गया कि उनको पकड़ा भी जा सकता है. इसके बाद भारतीय विमानों की हाइजैकिंग पूरी तरह से बंद हो गई.

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खालिस्तानी चरमपंथियों ने अपनी रणनीति बदली
इसके बाद सिख चरमपंथियों ने कई विध्वंसक गतिविधियों में हाथ से चलने वाले हथियारों का सहारा लेना शुरू कर दिया. कई जगह विस्फोट और दहशत फैलाने के लिए रिमोट कंट्रोल्ड और टाइम्ड आईईडी का सहारा लिया गया. राजनीतिक नेताओं, सरकारी अधिकारियों, पत्रकारों और बेगुनाह नागरिकों की जानबूझ कर की गई हत्याओं का सिलसिला शुरू हो गया.
हिंसा का दायरा बढ़ाकर पंजाब से बाहर दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और भारत के दूसरे हिस्सों में ले जाया गया. शुरू में खालिस्तानी चरमपंथियों को आम लोगों का समर्थन नहीं हासिल था लेकिन 1980 के दशक में उन्हें कुछ तबक़ों का समर्थन मिलने लगा.
भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों को ख़बर मिली कि खालिस्तानी अलगाववादी आईईडी के ज़रिए विस्फोट कर 1982 में आयोजित हुए एशियाई खेलों में व्यवधान डालने की कोशिश करेंगे इसलिए दिल्ली जाने वाली सड़कों पर सुरक्षा अवरोधक बनाए गए और दिल्ली की तरफ़ आने वाले हर सिख की तलाशी ली गई.
इस तलाशी को कई सिखों ने अपमानजनक माना क्योंकि पगड़ियों की भी तलाशी ली जा रही थी, इनमें से कई नाराज़ सिखों की सहानुभूति खालिस्तानियों की तरफ़ हो गई.
ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के विशेष सचिव रहे जीबीएस सिद्धू अपनी किताब ‘द खालिस्तान कॉन्सपिरेसी’ में लिखते हैं, "इसी दौरान लंदन में रह रहे जगजीत सिंह चौहान पहले बैंकॉक पहुंचे और फिर वहाँ से काठमांडू गए ताकि वो वहाँ पंजाब के खालिस्तानी तत्वों से मिल सकें."
"रॉ के जासूसों ने बैंकॉक और काठमांडू में उन पर नज़र रखी. भारत ने नेपाल से अनुरोध किया कि वो उन्हें पकड़ कर भारत के हवाले कर दें लेकिन उन्होंने उनकी बात नहीं मानी. नेपाल प्रशासन ने चौहान को पकड़ा ज़रूर लेकिन उन्हें भारत भेजने के बजाए बैंकॉक जाने वाली फ़्लाइट पर बैठा दिया."

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स्वर्ण मंदिर को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया
इस बीच, खालिस्तानी चरमपंथियों ने अपनी गतिविधियों के लिए स्वर्ण मंदिर का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. 26 अप्रैल, 1983 को पंजाब के डीआईजी एएस अटवाल की उस समय हत्या कर दी गई जब वो स्वर्ण मंदिर से बाहर आ रहे थे.
तब ज्ञानी ज़ैल सिंह देश के गृह मंत्री थे, उन्होंने खालिस्तानियों में फूट डालने के लिए जरनैल सिंह भिंडरावाले का सहारा लिया लेकिन भिंडरावाले हाथ से निकल गए और खालिस्तानियों के नेता बन बैठे.
उन्होंने अपने समर्थकों के साथ स्वर्ण मंदिर में शरण ली और वहाँ से अपनी गतिविधियाँ चलाने लगे.
राजीव गाँधी और उनके दो नज़दीकी लोगों ने रॉ के दिल्ली गेस्ट हाउस में अकाली दल के नेताओं से गुप्त मुलाकात की. ये बातचीत नाकाम हो गई और अकाली नेताओं ने खालिस्तानी तत्वों को स्वर्ण मंदिर छोड़ने के लिए मनाने में अपनी असमर्थता ज़ाहिर कर दी. इसकी परिणिति पहले ऑपरेशन ब्लू स्टार और फिर इंदिरा गाँधी की हत्या में हुई.

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खालिस्तान आंदोलन को जनसमर्थन मिलना बंद हुआ
लेकिन 1980 का दशक समाप्त होते-होते खालिस्तान आंदोलन में दरार आनी शुरू हो गई. दरअसल, इसकी शुरुआत 10 मई से 18 मई, 1988 तक हुए ऑपरेशन ब्लैक थंडर-2 से हुई.
लोगों को समझ में आने लगा कि खालिस्तानी चरमपंथियों को लूट, जबरन वसूली, अपहरण और ज़मीन पर ग़ैर-कानूनी कब्ज़े से कोई परहेज़ नहीं है.
पंजाब के मुख्य सचिव रहे रमेश इंदर सिंह अपनी किताब, ‘टर्मोइल इन पंजाब बिफ़ोर एंड आफ़्टर ब्लू स्टार’ में लिखते हैं, "लोगों को लग गया कि ये धर्म के कथित मसीहा दरअसल अपराधियों का एक झुंड था. उन्होंने बंदूकों का सहारा धार्मिक वजहों से नहीं बल्कि निजी लोभ को पूरा करने के लिए लिया था. इसका नतीजा ये हुआ कि उनको आम लोगों की सहानुभूति मिलनी बंद हो गई. उनको छिपाने और पनाह देने में किसानों का जो समर्थन उन्हें मिल रहा था वो धीरे-धीरे कम होना शुरू हो गया."
कई चरमपंथी नेताओं ने ग़ैर-क़ानूनी तरीके से काफ़ी पैसे बनाए.
रमेश इंदर सिंह लिखते हैं, "बब्बर खालसा की छवि को उस समय बहुत धक्का लगा जब उसके प्रमुख सुखदेव सिंह बब्बर को पटियाला के एक आलीशान घर में दूसरी पत्नी के साथ रहते पाया गया."
हरीश पुरी, परमजीत सिंह जज और जगरूप सिंह सेखों ने अपनी किताब ‘टेररिज़्म इन पंजाब, अंडरस्टैडिंग ग्रासरूट रिएलटी’ में लिखा, "जब 1991 में 205 चरमपंथियों के सामाजिक आर्थिक प्रोफ़ाइल का सर्वेक्षण किया गया तो पाया गया कि इनमें से अधिक्तर आसान पैसा बनाने के लिए इस आंदोलन में शामिल हुए थे. इन में से कम-से-कम एक-तिहाई लोगो के पास बेइंतहा पैसा हो गया था."

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छवि सुधारने की कोशिश
खालिस्तानी आंदोलन से जुड़े लोगों ने अपनी छवि सुधारने के लिए एक आचार संहिता जारी की थी जिसमें लड़कियों से फ़ैशनेबल कपड़े न पहनने और आई ब्रो न बनवाने के लिए कहा गया था. पुरुषों को भी अपनी दाढ़ी न तराशने की हिदायत दी गई.
शादियों में नाच और संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया गया और शादी में बारातियों की संख्या घटाकर 11 कर दी गई. स्कूल जाने वाले बच्चों से कहा गया कि वो सिर्फ़ केसरिया, सफ़ेद या काले कपड़े पहनकर ही स्कूल जाएँ. खालिस्तान कमांडो फ़ोर्स ने एक पोस्टर जारी करके कहा कि जो भी इन नियमों का उल्लंघन करेगा उसे ज़िंदा जला दिया जाएगा.
इन लोगों ने ब्यूटी पार्लरों और औरतों के साड़ी और जींस पहनने पर भी प्रतिबंध लगा दिया. सिख महिलाओं से कहा गया कि वो अपने सिर को ढँक कर रखें और माथे पर बिंदी और सिंदूर न लगाएं. चरमपंथियों ने आदेश जारी किया कि वाहनों के नंबर प्लेटों में पंजाबी भाषा का इस्तेमाल किया जाए.
ट्रक ड्राइवरों ने इसे पसंद नहीं किया क्योंकि इसकी वजह से पंजाब से बाहर जाने पर उनके सामने दिक्कतें पेश आने लगीं. इस सबका कुल परिणाम ये हुआ कि चरमपंथियों को आम लोगों का समर्थन मिलना बंद होना शुरू हो गया.

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चरमपंथियों का नेतृत्व हुआ कमज़ोर
इसका नतीजा ये हुआ कि सुरक्षा एजेंसियों ने इन संगठनों में सेंध लगानी शुरू कर दी और ख़ुफ़िया अफ़सरों ने तीन पंथिक कमेटी के प्रमुखों डॉक्टर सोहन सिंह, गुरबचन सिंह मनोचहल और वासन सिंह ज़फ़रवाल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क साधना शुरू कर दिया.
अमेरिका में रहने वाले गंगा सिंह ढिल्लों जैसे खालिस्तानियों का असर भी जाता रहा. अलगाववादियों का नेतृत्व धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगा. इसका परिणाम ये हुआ कि चरमपंथियों की संख्या और नई भर्ती कम होने लगी.
रमेश इंदर सिंह लिखते हैं, "कट्टर चरमपंथियों की संख्या कभी भी 1500 से अधिक नहीं रही. बड़ी संख्या में मारे जाने और सुरक्षा एजेंसियों के दबाव के चलते उनका काडर कम होने लगा और हिंसक आंदोलन समाप्त हो गया. सन 1988 में 372 चरमपंथी मारे गए, सन 1989 में 703, सन 1990 में 1335, सन 1991 में 2300 और 1992 में 2110 चरमपंथियों को सुरक्षा बलों ने मारा. सन 1993 तक 916 चरमपंथियों ने पुलिस के सामने हथियार डाले."

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चरमपंथी गतिविधियाँ हुईं समाप्त
पंजाब पुलिस ने चरमपंथियों के कारनामों और वरिष्ठता के हिसाब से रास्ते से हटाए जाने वाले चरमपंथियों की सूची बनाई और उनको बेअसर करने के अभियान में लग गए.
चरमपंथियों के ख़िलाफ़ सुरक्षा बलों के अभियान के आकार का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सेना के करीब एक लाख जवानों को पंजाब में तैनात किया गया.
इसके अलावा करीब 40 हज़ार अर्धसैनिक बलों के जवानों को भी पंजाब भेजा गया. इन सबको पंजाब पुलिस की मदद करने की ज़िम्मेदारी दी गई.
सैनिक ऑपरेशन का नेतृत्व पहले लेफ़्टिनेट जनरल जीएस गरेवाल और लेफ़्टिनेंट जनरल बीकेएस छिब्बर कर रहे थे, उनके बाद जनरल वीपी मलिक ने कमान संभाली.

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इस सबका परिणाम ये हुआ कि खालिस्तान आंदोलन की कमर टूटने लगी. सन 1992 में जहाँ चरमपंथियों के हाथ 1518 नागरिकों की हत्या हुई थी, 1994 आते आते ये संख्या घट कर सिर्फ़ 2 रह गई.
31 अगस्त, 1995 को चरमपंथियों ने पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या कर दी, जो पंजाब में हिंसा की आखिरी बड़ी वारदात थी.
इसके बाद चरमपंथी गतिविधियों में कमी आती गई सिवा हिंसा के छिटपुट मामलों को छोड़कर.
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