अमृतपाल सिंह को पंजाब से असम की डिब्रूगढ़ जेल ले जाने की क्या है वजह?

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, गुवाहाटी से
'वारिस पंजाब दे' संगठन के प्रमुख और खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह को पंजाब पुलिस ने रविवार की सुबह गिरफ़्तार कर लिया. 30 वर्षीय अमृतपाल सिंह पिछले करीब एक महीने से फ़रार थे.
पंजाब पुलिस ने मोगा ज़िले के रोडे गाँव से उन्हें गिरफ़्तार करने के बाद एक विशेष विमान से असम के डिब्रूगढ़ जेल भेज दिया.
रविवार दोपहर करीब 3 बजकर 20 मिनट पर पुलिस की भारी सुरक्षा में अमृतपाल सिंह को डिब्रूगढ़ जेल लाया गया. उनको डिब्रूगढ़ हवाई अड्डे से जिस वाहन में बैठाकर जेल लाया गया उसके आगे-पीछे पुलिस के 12 वाहनों का काफ़िला चल रहा था.
इससे पहले एनएसए यानी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ़्तार किए गए अमृतपाल सिंह के नौ साथियों को भी डिब्रूगढ़ सेंट्रल जेल में रखा गया है. इनमें उनके चाचा हरजीत सिंह भी शामिल हैं. अमृतपाल सिंह के खिलाफ़ भी एनएसए सहित पंजाब के अलग-अलग थानों में 16 मामले दर्ज हैं.
अमृतपाल सिंह के जेल पहुंचने से पहले डिब्रूगढ़ जिले के पुलिस अधीक्षक श्वेतांक मिश्रा ने जेल का दौरा कर सुरक्षा इंतज़ाम का जायज़ा लिया. जब से डिब्रूगढ़ सेंट्रल जेल में खालिस्तान समर्थकों को लाया गया है तब से जेल की सुरक्षा को कई स्तर पर बढ़ा दिया गया है.

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नए सुरक्षा इंतज़ामों के तहत जेल में प्रवेश करने वाले गेट के बाहर काली पोशाक वाले ब्लैक कैट कमांडो को आधुनिक हथियार के साथ तैनात किया गया है. इसके अलावा जेल परिसर के चारों तरफ़ अतिरिक्त सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं.
गुजरात, महाराष्ट्र, यूपी की बजाय असम की जेल क्यों?

ये अहम सवाल सबके ज़हन में उठ रहा है कि आखिर अमृतपाल सिंह और उनके नौ साथियों को पंजाब से करीब 2800 किलोमीटर दूर डिब्रूगढ़ सेंट्रल जेल में बंद करने की क्या वजह हो सकती है?
अगर इसका एक कारण असम में बीजेपी सरकार होना है तो फिर सवाल है कि गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में भी बीजेपी की सरकार है और अमृतपाल और उनके साथियों को वहां की जेल में भी भेजा जा सकता था.

असम में कई दशक से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी कहते है,"अमृतपाल सिंह और उनके साथियों को डिब्रूगढ़ जेल में लाने के पीछे राजनीतिक से ज्यादा प्रशासनिक कारण अहम है. असम में खालिस्तान के समर्थन का कोई आधार नहीं है. लिहाज़ा यहां जेल ब्रेक होने की संभावना बहुत कम है."
"लेकिन गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सिख समुदाय के लोग काफी संख्या में रहते हैं और ये सभी राज्य असम के मुकाबले पंजाब के नज़दीक भी हैं. पंजाब से इन राज्यों में समर्थकों के लिए पहुंचना आसान है, लेकिन इतनी दूर असम आकर कुछ करना बहुत मुश्किल है. भारत सरकार के पास हो सकता है इन राज्यों को लेकर ऐसी ख़ुफ़िया रिपोर्ट हो कि वहां खालिस्तान समर्थक हैं. इसलिए इन लोगों को इतनी दूर असम भेजने का फैसला किया है."
एक सवाल का जवाब देते हुए पत्रकार गोस्वामी कहते हैं,"आम आदमी पार्टी की सरकार पंजाब के अलावा दिल्ली में है. लेकिन वह जगह पंजाब के बेहद पास है. चूंकि असम में खालिस्तान समर्थक नहीं के बराबर है और यहां सिख समुदाय की जनसंख्या भी बहुत कम है. लिहाज़ा असम में जेल तोड़कर इन लोगों को बाहर निकालने की संभावना बिलकुल नहीं के बराबर है."
"इसके अलावा अमृतपाल सिंह के आंदोलन को पूरी तरह खत्म करने के लिए डिब्रूगढ़ जेल को चुना गया है. इस जेल में उन्हें पूरी तरह अलग-थलग रखा जाएगा. क्योंकि जेल से भी कुछ कट्टरवादी नेता और गैंगस्टर अपना काम जारी रखने के कुछ उदाहरण पहले रहे हैं."
असम पर नज़र रखने वाले कई विश्लेषक याद दिला रहे हैं कि महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट के वक़्त भी ये राज्य चर्चा में था. तब महाराष्ट्र के 'बागी विधायक' कई दिन तक गुवाहाटी में थे.
गोस्वामी कहते हैं कि कुछ लोग दोनों मामलों की भले ही तुलना कर रहे हों लेकिन दोनों ही अलग घटनाक्रम है. वो एक राजनीतिक घटनाक्रम था और ये सुरक्षा से जुड़ा मामला है.
गोस्वामी कहते हैं,"दरअसल इस मामले में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की कार्यक्षमता से ज़्यादा काउंसलिंग में उनके सहयोग की ज़रूरत पड़ेगी. क्योंकि एकनाथ शिंदे जब अपने विधायकों के साथ गुवाहाटी आए थे उस समय मुख्यमंत्री ने अपनी राजनीतिक चालाकी से सबकुछ हैंडल किया था."

वो कहते हैं, "बीजेपी में यह बात सबको पता है कि वो इस तरह के काम में बेहद सक्षम है. लेकिन अमृतपाल सिंह वाली घटना में सरकार को काउंसलिंग कर उनके दिमाग से सिखों के लिए अलग खालिस्तान वाली बात को पूरी तरह बाहर करना होगा."
गोस्वामी कहते हैं, "जिस तरह 'कश्मीर षड्यंत्र मामले' में शेख अब्दुल्ला को जवाहर लाल नेहरू ने जेल में रखकर काउंसलिंग करवाई थी. उसका ही नतीजा था कि शेख अब्दुल्ला भारत के साथ सहयोग करने की बात पर सहमत हुए थे. अमृतपाल सिंह की अगर इस तरह काउंसलिंग करने की बात आएगी उसमें मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का सहयोग बहुत महत्वपूर्ण होगा. यह बात सुरक्षा सलाहकार से लेकर बाकी की एजेंसियों को पता है."
असम सीएम को एसएफ़जे की धमकी

बीती 23 फ़रवरी को अमृतपाल सिंह के नेतृत्व में उनके समर्थकों की भीड़ ने अजनाला के एक पुलिस स्टेशन पर जिस तरह धावा बोला था उसे लेकर सरकार अलर्ट है.
इसके अलावा हाल ही में अमेरिका स्थित अलगाववादी सिख संगठन सिख फ़ॉर जस्टिस (एसएफ़जे) ने डिब्रूगढ़ सेंट्रल जेल में बंद खालिस्तान समर्थकों को लेकर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को धमकी दी थी.

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इस संगठन के सदस्य गुरपतवन सिंह पन्नू ने असम के कई मीडिया आउटलेट्स को एक रिकॉर्डेड ऑडियो संदेश भेजा था, जिसमें अमृतपाल सिंह के सहयोगियों के असम की जेल में होने को लेकर मुख्यमंत्री सरमा को चेतावनी दी थी.
पूर्वोत्तर भारत की सबसे पुरानी जेलों में से एक डिब्रूगढ़ सेंट्रल जेल की सुरक्षा इस समय काफ़ी अहम है.
साल 1859-60 में ब्रिटिश सरकार के दौरान स्थापित हुई डिब्रूगढ़ सेंट्रल जेल इससे पहले इतनी चर्चा में कभी नहीं रही और न ही कभी इस जेल में किसी अन्य राज्य से एनएसए के तहत गिरफ़्तार किसी बंदी को लाकर रखा गया था.
डिब्रूगढ़ जेल की सुरक्षा व्यवस्था को देखने पहुंचे डिब्रूगढ़ जिले के डिप्टी कमिश्नर विश्वजीत पेगू ने इससे पहले बताया था कि डिब्रूगढ़ जेल में किसी भी अप्रिय घटना को टालने के लिए जेल के अंदर और बाहर कई स्तर पर सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए हैं.
उन्होंने कहा था, "एनएसए में बंद व्यक्तियों को जिस सेल में रखा गया है, उसके आसपास भी कई स्तर के सुरक्षा बंदोबस्त किए गए हैं. असम पुलिस के अलावा केंद्रीय सैन्य बल के जवानों को भी जेल की सुरक्षा में तैनात किया गया है."
इतनी दूर डिब्रूगढ़ जेल में अमृतपाल सिंह और उनके सहयोगियों को लाकर बंद करने के पीछे सरकार की रणनीति पर वरिष्ठ पत्रकार राजीव दत्ता कहते हैं, "अमृतपाल सिंह के समर्थकों ने थाने के अंदर हथियारों के साथ घुसकर जिस तरह शक्ति प्रदर्शन किया था उन तस्वीरों को समूचे देश ने देखा है. दरअसल यह एक बहुत ही संवेदनशील मामला है जिसको लेकर देश-विदेश में विरोध प्रदर्शन हुए है. भारत सरकार बहुत सोची समझी रणनीति के तहत इसमें कार्रवाई कर रही है."

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उन्होंने कहा," मेरी जानकारी के अनुसार इस समय डिब्रूगढ़ जेल में करीब 450 कैदी बंद है जिसमें एक भी स्थानीय पंजाबी कैदी नहीं है. अमृतपाल सिंह और उनके साथियों के लिए इस जेल में किसी भी तरह की गुटबाजी करना संभव नहीं है. इस जेल में अन्य कैदियों के साथ बातचीत में भाषा उनकी सबसे बड़ी दिक्कत होगी."
"इसके अलावा समूचे डिब्रूगढ़ जिले में सिख समुदाय की आबादी मुश्किल से 1400 के करीब होगी. लिहाज़ापंजाब से इतनी दूर आकर किसी भी तरह का समर्थन जुटाया नहीं जा सकता. ये तमाम कारण है कि पंजाब सरकार ने महाराष्ट्र, हरियाणा, गुजरात और उत्तर प्रदेश की जेलों में एनएसए एक्ट के तहत गिरफ़्तार किए गए इन लोगों को भेजने की बजाए असम भेजा है."
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