'कनाडा में महज़ दो प्रतिशत सिख, एक तबके को खालिस्तान चाहिए तो वहीं बना दो'- प्रेस रिव्यू

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खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को लेकर भारत और कनाडा के बीच टकराव के बाद दोनों देश एक दूसरे के राजनयिक को अपने यहाँ से निष्कासित कर चुके हैं.
इस मामले में इंडियन एक्सप्रेस ने कनाडा में ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के प्रीमियर रह चुके भारतीय मूल के राजनेता उज्जल दोसांझ से बातचीत की है, जिनका कहना है कि दोनों देशों के बीच गतिरोध को तोड़ने के लिए समझदारी और बड़े दिल की ज़रूरत है.
उज्जल दोसांझ 18 साल की उम्र में पंजाब से कनाडा आकर बस गए थे. उनका परिवार अब भी पंजाब के दोसांझ कला में रहता है.
द इंडियन एक्सप्रेस के साथ इंटरव्यू में दोसांझ ने सुझाव दिया है कि अगर कनाडा में रह रहे छोटे से सिख समुदाय का एक वर्ग खालिस्तान चाहता है, तो उन्हें अल्बर्टा या सस्केचेवान में खालिस्तान दिया जाना चाहिए.
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के पीछे भारत सरकार के होने की बात कही थी, जिसे भारत सरकार ने पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया है.
अख़बार ने दोसांझ से मौजूदा समय में दोनों देशों के बीच संबंधों की स्थिति पर सवाल किया, जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि दोनों देश सबसे निचले स्तर पर खड़े हैं.
उन्होंने कहा, “इस समय दोनों देशों में लीडरशिप के बदलने से ही संबंधों में सुधार हो सकता है. दोनों सरकारों के बीच विश्वास की बहुत कमी है.”
अख़बार के मुताबिक़ दोसांझ कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ऐसे राष्ट्रवाद की बात करते हैं जो मज़बूत है, वहीं ट्रूडो का दृष्टिकोण ज़्यादा जागृत है, (जो नस्लीय पूर्वाग्रह और भेदभाव की प्रति सचेत रहता है) और दोनों ही नेता इसे दिखाना चाहते हैं.
वे कहते हैं कि दोनों देशों के बीच गतिरोध को तोड़ने के लिए परिपक्वता और बड़े दिल की ज़रूरत है.

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'कनाडा में दो प्रतिशत सिख'
दोनों देशों के सामने आगे क्या रास्ता है? इसके जवाब में उज्जल दोसांझ कहते हैं कि खालिस्तान के मुद्दे को किनारे रखकर दोनों देशों को बातचीत करनी चाहिए.
वे कहते हैं, “खालिस्तान की मांग करने वाले कनाडा के लोग भारत को तोड़ने वाले नहीं हैं. भारत के सिख खालिस्तान नहीं चाहते. इस साल, मई के महीने में मैं पंजाब में था और मैं इसकी पुष्टि कर सकता हूं. ऐसे में भारत को इन नारे लगाने वालों की इतनी चिंता क्यों करनी चाहिए?"
"विरोध प्रदर्शन और जनमत संग्रह लोकतंत्र का हिस्सा हैं. यहां तक कि भारत का सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि खालिस्तान की मांग करना तब तक अपराध नहीं है जब तक आप हिंसक नहीं होते हैं.”
दोसांझ कहते हैं, “कनाडा के सिर्फ़ दो प्रतिशत लोग ही सिख हैं. अगर कनाडा में इस छोटे समुदाय का एक वर्ग खालिस्तान चाहता है, तो उन्हें अलबर्टा या सस्केचेवान में इसे लेने दें, भारत को इतना ख़तरा क्यों महसूस हो रहा है?”

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खालिस्तान की मांग क्यों की जा रही है?
अख़बार ने उनसे सवाल किया कि कनाडा में खालिस्तानी आंदोलन कितने समय से मौजूद है?
इसके जवाब में वे कहते हैं, यह आंदोलन 1970 के दशक से मौजूद है, जब खालिस्तानी विचारक जगजीत सिंह चौहान पहली बार कनाडा पहुँचे थे.
वे कहते हैं कि इस विचार के बढ़ने की एक वजह यह है कि इन लोगों का कनाडा के साथ एक सीमित संबंध है और अक्सर वे अपनी जगह से कटा हुआ महसूस करते हैं.
उनकी कनाडा सरकार के बारे में समझ भी कम है और वे भारत के ख़िलाफ़ लगातार शिकायतें करते हैं.
इंटरव्यू में दोसांझ कहते हैं, “1980 के दशक में भारत में सिखों पर अत्याचार हुआ, लेकिन वे आगे बढ़ गए. वहीं कनाडा में लोगों की शिकायतें उनके दिल और दिमाग़ में रहती हैं. वे सोशल नेटवर्क पर सक्रिय रहते हैं और उन मंदिरों में जाते हैं, जहाँ भावनाएं भड़कती हैं. खालिस्तान की मांग करने वालों में से कई लोगों ने कभी भारत में क़दम तक नहीं रखा है. कनाडा में पैदा हुए युवाओं ने कभी भारत को अनुभव नहीं किया है, ऐसे में वे अपने माता-पिता के नैरेटिव से ही प्रभावित हैं.”
वे कहते हैं कि इस आंदोलन में जो नए लोग हैं वे शायद कनाडा में शरणार्थी का दर्जा पाने की प्रक्रिया में हो सकते हैं, वे इस दौरान भारत के ख़िलाफ़ सबूत गढ़ सकते हैं.
दोसांझ से अख़बार ने सवाल किया है कि क्या कनाडा की सरकार खालिस्तानियों का पक्ष लेती है?
इसके जवाब में वह कहते हैं, “ऐसा माना जाता है कि प्रधानमंत्री ट्रूडो के खालिस्तानियों के साथ गहरे संबंध हैं और इस बात में कुछ सच्चाई भी हो सकती है. हालांकि इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे हिंसा करने वाले खालिस्तानियों के साथ नहीं हैं.”
क्या हाल की घटनाओं के कारण कनाडा में हिंदुओं और सिखों के बीच ध्रुवीकरण हुआ है?
इसके जवाब में दोसांझ इंडियन एक्सप्रेस को कहते हैं, “बिल्कुल नहीं. यह कहीं भी देखने को नहीं मिलता. मुझे पता है कि कुछ असामाजिक तत्वों ने कई मौक़ों पर हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ और हिंसा भड़काने की कोशिश की है लेकिन वे कामयाब नहीं हो पाए हैं. 1984 में दोनों समुदायों के बीच कुछ दूरी महसूस हुई थी लेकिन समय के साथ वह कम हुई है.”

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कनाडा के आरोपों पर जी7 ने क्या कहा?
खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत सरकार के एजेंटों की संभावित भूमिका को लेकर कनाडा को अपने साथी जी7 देशों को मनाने में कामयाबी नहीं मिली है.
इस ख़बर को हिंदुस्तान टाइम्स अखबार ने अपने यहां जगह दी है.
अख़बार के मुताबिक़ सोमवार को उच्च स्तरीय संयुक्त राष्ट्र महासभा के साइड लाइन में जी7 देशों के विदेश मंत्रियों ने न्यूयॉर्क में मुलाक़ात की थी.
ख़बर के मुताबिक़ जापान के विदेश मंत्री ने जारी एक बयान में रूस-यूक्रेन, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और सहयोग और स्वतंत्र इंडो पैसिफिक की बात की, लेकिन बयान में कहीं भी कनाडा के मामले का ज़िक्र नहीं था.
अख़बार के मुताबिक़ कनाडा के आरोपों पर अपनी बात रखने के लिए भारत, जी7 और उससे अलग अपने साथी देशों के साथ चुपचाप काम कर रहा है. जी7 सदस्यों में से भारत के अमेरिका, जापान और फ्रांस के साथ बेहद क़रीबी और गहरे द्विपक्षीय संबंध हैं, वहीं हाल के सालों में भारत के जर्मनी, इटली और यूके के साथ संबंधों में सुधार हुआ है.
ख़बर के मुताबिक़ सहयोगी और अपने क़रीबी पड़ोसी के रूप में कनाडा की स्थिति को देखते हुए अमेरिका ने इस मुद्दे पर नपातुला रुख़ अपनाया है.
अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने कहा कि इस मामले में कनाडा जो जांच कर रहा है, अमेरिका उसका समर्थन करता है.
किर्बी ने कहा कि राष्ट्रपति जो बाइडन को मामले की जानकारी है और उन्होंने अपील की है कि इस मामले की पूरी तरह से पारदर्शी और व्यापक जांच होनी चाहिए और भारत को इसमें सहयोग करना चाहिए.
वॉशिंगटन पोस्ट की एक स्टोरी में कहा गया था कि ऐसा लगता है कि कनाडा ने जो आरोप भारत पर लगाए हैं, उन्हें लेकर अमेरिका नरम है.
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के दूसरे प्रवक्ता एड्रिएन वॉटसन ने ट्वीट किया कि इस मामले में कनाडा के साथ सख़्ती से पेश आने वाली खबरें पूरी तरह से ग़लत हैं.
उन्होंने लिखा कि इस मामले में हम कनाडा के साथ सहयोग कर रहे हैं. यह एक गंभीर मामला है और कनाडा की क़ानून एजेंसियां जो जांच कर रही हैं, हम उनका समर्थन करते हैं. हम भारत सरकार से भी बातचीत कर रहे हैं.
अख़बार के मुताबिक़ यह समझा जाता है कि अमेरिका अपने क़रीबी सहयोगी कनाडा और अपने रणनीतिक साझेदार भारत के बीच में तनाव को बढ़ते हुए नहीं देखना चाहता है.

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ऑस्ट्रेलिया ने क्या कहा?
खालिस्तानी नेता निज्जर की हत्या में भारत के संभावित एजेंटों की भूमिका के जो आरोप कानाडा ने लगाए हैं, उसे लेकर अमेरिका के साथ ऑस्ट्रेलिया ने कनाडा का साथ देते हुए भारत को जांच में सहयोग करने के लिए कहा है.
इस खबर को इंडियन एक्सप्रेस ने अपने यहां जगह दी है.
ऑस्ट्रेलिया ने मामले में चिंता जाहिर करते हुए कहा कि उन्होंने इस मुद्दे को भारत सरकार के सामने उठाया था.
खबर के मुताबिक, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के वरिष्ठ अधिकारियों और मंत्रियों के बयान महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये देश फाइव आइज़ एलायंस में कनाडा के भागीदार हैं, लेकिन भारत ने अभी तक सार्वजनिक रूप से जांच में सहयोग करने की बात नहीं कही है.
अखबार के मुताबिक सीबीएस न्यूज़ को दिए इंटरव्यू में अमेरिका राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने कहा, “ये आरोप गंभीर हैं और हम जानते हैं कि कनाडा इसकी जांच कर रहा है.”
उन्होंने कहा, “हम भारत से भी जांच में सहयोग करने की अपील करते हैं. हम सभी चाहते हैं कि इस मामले में पारदर्शी तरीके से जांच हो, जिससे कनाडा के लोगों को जवाब मिल सकता है. इसलिए हम दोनों देशों के साथ संपर्क में रहेंगे.”
अखबार ने भारत में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी के बयान को भी जगह दी है, जिसमें उन्होंने कनाडा के आरोपों को चिंताजनक बताया है.
उन्होंने उम्मीद जताई है कि ऐसा करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी.
इस मामले में ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग ने आरोपों को चिंताजनक बताते हुए कहा कि जांच चल रही है और वे इस मामले पर नजर बनाए हुए हैं.
उन्होंने कहा कि इस मामले को ऑस्ट्रेलिया ने भारत के सामने भी उठाया है.
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