विदेशी मीडिया में भारत के ख़िलाफ़ जस्टिन ट्रूडो के विस्फोटक आरोप पर क्या छपा है?

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भारत और कनाडा की आपसी कड़वाहट अब पूरी दुनिया के सामने है.
पहले कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो का सिख नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का भारत से कनेक्शन होने का आरोप लगाना. फिर दोनों देशों का बारी-बारी से एक-दूसरे के राजनयिकों को निष्कासित करना.
भारत-कनाडा संबंधों की कड़वाहट बढ़ने के बीच मंगलवार रात जस्टिन ट्रूडो ने कहा, ''भारत सरकार को इस मामले में गंभीरता दिखाने की ज़रूरत है. हम किसी को उकसाना नहीं चाहते.''
तो ट्रूडो आख़िर चाहते क्या हैं?
ये सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि किसी विकसित या जी-7 देश ने इससे पहले कभी सार्वजनिक तौर पर ऐसे गंभीर आरोप भारत पर नहीं लगाए हैं.
साथ ही कंज़र्वेटिव पार्टी के नेता पिएरे पोलिवियरे ने भी इन आरोपों पर ट्रूडो से और जानकारी मांगी है. वो बोले- प्रधानमंत्री ने अब तक कोई तथ्य उपलब्ध नहीं करवाए हैं, हमें और तथ्य देखने की ज़रूरत है.
इस कहानी में यही समझने की कोशिश करेंगे कि ट्रूडो के ऐसा क़दम उठाने के मायने क्या हैं और साथ ही जानेंगे कि भारत-कनाडा के संबंधों में आई तल्खी को भारत समेत विदेशी मीडिया कैसे देख रहा है?

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ट्रूडो की मंशा
द हिंदू अख़बार में भारत-कनाडा संबंधों पर संपादकीय छपा है.
इस संपादकीय के मुताबिक़, ट्रूडो की टिप्पणी से भारत-कनाडा संबंध ख़राब स्थिति में पहुँच गए हैं. कनाडा के साथ इंटेलिजेंस शेयरिंग समझौते वाले समूह 'फाइव आइज' के सदस्य देश अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने भी चिंता ज़ाहिर की है.
ट्रूडो ने भारत पर जो टिप्पणी की, उसे संसद में उनके राजनीतिक विरोधियों का भी समर्थन हासिल हुआ. ये भी संभावना है कि 2025 के चुनावों में अगर यह सरकार सत्ता से बाहर हुई तो ये मामला ठंडे बस्ते में पड़ा रहेगा.
पाकिस्तान के मामले में इस तरह से आरोप लगाना, सार्वजनिक तौर पर आमने-सामने आ जाना आम बात है. मगर बात यहाँ कनाडा की हो रही है, जो नेटो का सदस्य है, जहाँ भारतीय मूल के काफ़ी लोग रहते हैं. ऐसे में विवाद बढ़ेगा तो इसका बड़ा असर होगा.
द हिंदू के संपादकीय में लिखा है कि ऐसे कठिन पल में अगले कुछ क़दम सोच समझकर उठाने चाहिए. ट्रूडो की प्राथमिकता ये होगी कि वो भारत पर लगाए गंभीर आरोपों को सार्वजनिक तौर पर साबित करें या फिर ये स्वीकार करें कि वो ऐसा करने में असक्षम हैं.
भारत का कहना रहा है कि कनाडा की ज़मीन का इस्तेमाल भारत-विरोधी, अलगाववादी खालिस्तानी समूहों की गतिविधियों के लिए होता है. ये बात कई बार साबित भी हुई है. इसकी शुरुआत 1980 से शुरू होती है और हाल के दिनों में भारतीय राजनयिकों और भारतीय कम्युनिटी सेंटर पर हुए हमलों तक जारी रहती है.
हरदीप सिंह निज्जर खालिस्तान टाइगर फोर्स के मुखिया थे. वो भारत में वॉन्टेड थे. निज्जर पर आरोप था कि 1990 के दौर में पंजाब में जो चरमपंथी गतिविधियां हुईं, उनके पीछे वो थे. निज्जर पर इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस जारी हुआ था और ये शख़्स कनाडा का नागरिक था. ये बात पूरी तस्वीर साफ़ कर देती है.
अब ये भारत पर है कि वो कनाडा के साथ अपने संबंधों को कैसे आगे बढ़ाएगा. 1973 के बाद साल 2015 में पहली बार कोई भारतीय प्रधानमंत्री कनाडा के द्विपक्षीय दौरे पर गया था. पीएम मोदी से पहले एक बार जी-20 सम्मेलन में शामिल होने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह भी कनाडा गए थे.
जी-20 सम्मेलन में पीएम मोदी और जस्टिन ट्रूडो की मुलाक़ात भी अच्छी नहीं रही थी. इसके फौरन बाद मुक्त व्यापार समझौते पर चल रही बातचीत पर कनाडा ने रोक लगा दी थी.
ऐसे में ट्रूडो के बयान से दोनों देशों के राजनयिक संबंध एकदम मुहाने पर आ गए हैं.

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अलगाववादियों पर कनाडा का चौंकाने वाला दावा: द न्यूयॉर्क टाइम्स
द न्यूयॉर्क टाइम्स ने भारत-कनाडा संबंधों के ख़राब होने पर एक लंबी रिपोर्ट की है.
इस रिपोर्ट में कनाडा के आरोपों को तोप के गोलों की तरह बताया गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक़, कनाडा अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे अपने सहयोगियों से भारत को चुनौती देने के लिए साथ आने को कह रहा है. वहीं भारत के लिए पश्चिमी देश, ख़ासकर कनाडा सिख अलगाववादी संगठनों की पनाहगाह बना हुआ जो भारत के लिए ख़तरा है.
न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है, अगर निज्जर की हत्या के पीछे भारत का हाथ निकला तो ये भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए शर्मनाक स्थिति होगी. भारत की ख़ुफिया एजेंसी रॉ पर पहले भी दूसरे देशों में जाकर हत्या करने की साजिश के आरोप लगते रहे हैं.
पूर्व सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि पश्चिमी देशों में हरदीप सिंह निज्जर का मामला पहला ऐसा मामला होगा, जिसके बारे में पता चल पाया.
अख़बार ने लिखा है, रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार लंबे वक़्त से ये कहती रही है कि खालिस्तान के मुद्दे को बस पंजाब में मामूली सा समर्थन हासिल रहा है. ये बात अलग है कि जब 2020-2021 में सिख किसानों के नेतृत्व में किसान आंदोलन हुआ तो सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने किसानों को खालिस्तानी साबित करने की कोशिश की.

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सुरक्षा का सवाल
पूर्व भारतीय राजदूत केसी सिंह ने द न्यूयॉर्क टाइम्स से बात करते हुए कनाडा के आरोपों को गंभीर बताया.
केसी सिंह ने कहा, ''निज्जर की हत्या के बाद ये साफ़ था कि ये मुद्दा उठेगा. इस मामले में सिख संगठनों ने भारतीय राजनयिकों पर उंगली उठाई थी और कनाडा के नेताओं पर दबाव बनाया था.''
केसी सिंह ने कहा, ''भारत कनाडा में खालिस्तान समर्थकों से नाराज़ रहता है. वहीं कनाडा अपने नागरिकों पर मंडराते ख़तरे और संप्रभुता का हवाला देता है. दोनों देशों के बीच दूरियां बढ़ गई हैं.''
द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में खालिस्तान आंदोलन के 1980 के दौर में हिंसक होने, स्वर्ण मंदिर पर उग्रवादियों के क़ब्ज़े और इंदिरा गांधी के सैन्य कार्रवाई के फ़ैसले का भी ज़िक्र किया गया है.
1985 में टोरंटो से लंदन की फ्लाइट में बम लगाने का आरोप भी खालिस्तानी अलगाववादियों पर लगता रहा है. इस हादसे में 300 लोगों की मौत हो गई थी.
भारतीय अधिकारियों ने कहा कि ऐसे संगठनों के ख़िलाफ़ घरेलू राजनीति के चलते एक्शन नहीं लिया जाता है. ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में भी सिख समुदाय ताकतवर हो रहा है.
भारत ने 2018 में निज्जर के प्रत्यर्पण की मांग भी की थी.
पंजाब में बीजेपी के नेता विनीत जोशी ने कहा- कनाडा के नेताओं को ये समझने की ज़रूरत है कि ये पहले वाला भारत नहीं रहा, ये पीएम मोदी के नेतृत्व में काफ़ी मज़बूत हुआ है.

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भारत की ज़िम्मेदारी
वॉशिंगटन पोस्ट ने भारत-कनाडा पर एक विश्लेषण छापा है.
इस विश्लेषण में मिहिर शर्मा लिखते हैं- ट्रूडो का भारत पर आरोप लगाना कई कारणों से चौंकाने वाला रहा. इनमें एक कारण ये भी है कि हम में से ज़्यादातर को ये लगता है कि हम अच्छे लोग हैं और हमारी सरकार ऐसे किसी काम को नहीं करती.
अगर भारत ने वाक़ई पश्चिमी देश की ज़मीन पर ऐसा काम किया है तो इससे टकराव और ज़्यादा बढ़ जाएगा. सरकार के ताक़तवर रवैये के समर्थक भी इस बात से इनकार नहीं करेंगे.
पीएम मोदी अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मामले में भारत के पारंपरिक रवैये को बदलने की कोशिश में दिखते रहे हैं. 2019 में कश्मीर में हुए हमले के बाद 'घर में घुसकर मारेंगे' जैसी बातों का भी प्रचार हुआ.
सब जानते हैं कि पीएम मोदी का इशारा पड़ोसी देश में पनाह लिए हुए चरमपंथियों की ओर था. इसके बाद पाकिस्तान की ज़मीन पर एयर स्ट्राइक भी की गई.
कुछ लोगों को उम्मीद है कि इस मामले में भारत इसराइल जैसी स्थिति में होगा, जहाँ हर किसी को भारतीय खुफिया एजेंसियों पर शक तो होगा लेकिन कोई ये बात साबित नहीं कर पाएगा.
वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक़, भारत और कनाडा के बीच अगर ऐसी स्थिति बन गई है तो साफ है कि ये राजनयिक और इंटेलिजेंस की विफलता है.
इस मामले में अभी बहुत ज़्यादा चीज़ें पता नहीं हैं. मायने ये रखता है कि कनाडा ऐसी जांच करे जो पारदर्शी हो और भारत सरकार इसमें सहयोग करे.
अगले साल जब पीएम मोदी फिर से चुनावी मैदान में होंगे, उनके समर्थक इस मामले को भारत की मज़बूत होती छवि के रूप में ही देखेंगे.
वॉशिंगटन पोस्ट के विश्लेषण में लिखा है- जो आपके लिए ख़तरा हैं, उन्हें दूसरे देश जाकर मारने की ताकत रखना एक चीज़ है. मगर इसे ऐसे करना दूसरी चीज़ है कि आपके दोस्त का अपमान भी ना हो और ये उन मूल्यों के अनुरूप भी हो जिनकी आप बात करते हैं.

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भारत-कनाडा संबंध
अमेरिका की प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम ने भारत-कनाडा संबंधों के टूटने पर एक विस्तृत रिपोर्ट की है.
रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत कनाडा संबंध बिगड़ने की शुरुआत जी-20 सम्मेलन के दौरान तब ही हो गई थी, जब पश्चिमी देशों की तरह औपचारिक तौर पर मोदी और ट्रूडो के बीच द्विपक्षीय वार्ता नहीं हुई थी.
इस मुलाक़ात में दोनों नेताओं ने एक-दूसरे से गहरी चिंता व्यक्त की थी.
जानकारों का कहना है कि कनाडा से व्यापार और मुल्क में मौजूद भारतीय मूल के लोगों की बड़ी संख्या के चलते जो रिश्ते थे, वो बीते सालों में कमज़ोर होते चले गए हैं.
विलसन सेंटर थिंक टैंक में साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर माइकल कुगलमैन ने कहा, ''कनाडा में सिख एक्टिविज़्म का बढ़ना और भारत की चिंताओं का समाधान तलाशने की अनिच्छा ने दोनों देशों के संबंधों को अब गहरे संकट में ढकेल दिया गया है. छुरियां निकल चुकी हैं.''
कनाडा में पंजाब के बाद सबसे ज़्यादा क़रीब साढ़े सात लाख सिख रहते हैं.
दोनों देशों के बीच तनाव सबसे पहले तब बढ़ा था, जब ट्रूडो ने सत्ता में आते ही अपने 30 सदस्यों वाली कैबिनेट में चार सिखों को जगह दी थी.
ट्रूडो के पीएम बनने के बाद पीएम मोदी ने एक बार भी कनाडा का दौरा नहीं किया है. कनाडा में हिंदू मंदिर पर हमले और 'भारत की मौत' या 'खालिस्तान' जैसी बातें उर्दू भी दीवारों पर लिखी जाती रही हैं.
टाइम की रिपोर्ट में लिखा है कि 2018 में जब ट्रूडो भारत के दौरे पर गए थे, तब उनके साथ जसपाल अटवाल भी थे. अटवाल पंजाब के एक मंत्री की हत्या मामले में दोषी भी थे. मगर चीन को चुनौती देने के लिए जब दोनों देश साथ आए तो ये सारी बातें पीछे छूट गईं.
इसी साल मई तक दोनों देश ऑटोमोबाइल, कृषि, सूचना एवं प्रौद्योगिकी के मामले में व्यापार समझौते को करने के क़रीब भी आ गए थे. मगर बीते हफ़्ते कनाडा ने इससे इनकार किया.
टाइम की रिपोर्ट में लिखा है, जून की शुरुआत में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि खालिस्तान मुद्दे को सुलझाने के मामले में कनाडा वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित लगता है.
जयशंकर के इस बात को कहने के 10 दिन बाद निज्जर की कनाडा में गुरुद्वारे के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी जाती है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि ताज़ा प्रकरण से कनाडा की वैश्विक स्थिति पर फ़र्क पड़ेगा.
2019 में चीन से कनाडा के संबंध बिगड़े थे. 2018 में सऊदी अरब के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिए जाने के बाद कनाडा की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आई थी.
ट्रूडो ने ये मसला अपने सहयोगी देशों से भी उठाया था मगर इन देशों ने कनाडा की चिंताओं को नज़रअंदाज़ किया.

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ट्रूडो चाहते क्या हैं?
द इकोनॉमिस्ट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि 18 जून को निज्जर की हत्या के तीन महीने बाद 18 सितंबर को एक लोकतांत्रिक देश के नेता का दूसरे लोकतांत्रिक देश पर ऐसा आरोप लगाना असमान्य घटना है.
रिपोर्ट में लिखा गया है कि भारत के दक्षिणपंथी मीडिया और मोदी के समर्थकों ने सरकार की बात को ही दोहराते हुए ट्रूडो पर आतंकवादियों को पनाह देने का आरोप लगाया है.
सरकार समर्थकों की ओर से ये भी कहा गया कि इससे पीएम मोदी को फ़ायदा पहुंचेगा.
द इकोनॉमिस्ट एक राइट विंग वेबसाइट की संपादक के ट्वीट के हवाले से लिखता है- ''भारत सरकार ने कनाडा में आतंकवादियों को मारा, ये कहकर जस्टिन ट्रूडो ने मोदी के 2024 चुनाव प्रचार की शुरुआत कर दी है.''
जी-20 सम्मेलन में पश्चिमी देशों के साथ मोदी की लंबी मुलाक़ात चली मगर ट्रूडो को समिट में ही 10 मिनट मिलकर टरका दिया गया.
सिख अलगाववाद के कारण भारत और कनाडा के बीच लंबे वक़्त से कड़वाहट रही है. भारत कनाडा पर अलगाववादियों पर नरम रवैया रखने का आरोप लगाता रहा है. कनाडा ख़ुद भी अलगाववाद चरमपंथ का शिकार रहा है, जब एक हवाई जहाज में हुए धमाके में 300 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.
रिपोर्ट में लिखा है- ''ये कनाडा के इतिहास का सबसे ख़तरनाक आतंकवादी हमला था. मगर इससे सिखों और कनाडा के दूसरे नागरिकों के बीच दूरियां नहीं आईं.''
कनाडा की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों में सिख हैं.
द इकोनॉमिस्ट ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कनाडा के निवेशकों के लिए भारत एक अहम बाज़ार है क्योंकि वो तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था से मुनाफा कमाना चाहते हैं.
अमेरिका और ब्रिटेन का कनाडा का साथ देना मुश्किल रहेगा. ये दोनों देश चीन के असर को रोकने के लिए भारत का साथ चाहते हैं.
अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने अब तक इस मामले में बेहद संभलकर प्रतिक्रिया दी है.
द इकोनॉमिस्ट ने लिखा है कि भारत इसराइल जैसा दिखने की उम्मीद कर रहा होगा मगर ख़तरा ये है कि वो दुनिया में रूस की तरह ना देखा जाने लगे.

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जैसे को तैसा के चक्कर में रिश्ते बिगड़ेंगे
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सिख अलगाववादी की हत्या के मामले में जैसे को तैसा करने के चक्कर में पुराने अच्छे व्यापारिक रिश्ते पटरी से उतर सकते हैं.
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक़, जानकारों का कहना है कि इन द्विपक्षीय रिश्तों पर बहुत पहले ध्यान दिया जाना चाहिए था.
किंग्स कॉलेज लंदन में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर हर्ष पंत ने कहा, ''इस मुद्दे को उठाने के पीछे ट्रूडो के पास घरेलू कारण हैं और भारत के लिए भी खालिस्तान के चलते ये मुद्दा अहम है.''
सोसाइटी ऑफ पॉलिसी स्टडीज़ के डायरेक्टर सी उदय भास्कर ने कहा, ''दोनों देशों के बीच संबंध ख़राब स्तर पर हैं और इससे बचा जा सकता था.''
भास्कर कहते हैं- जून में कनाडा में जिस तरह इंदिरा गांधी और उनके हत्यारों की एक झांकी निकाली गई थी और भारत की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया दर्ज की गई थे, ये एक साफ इशारा था.
भास्कर ने कहा, ''तब कनाडा की ओर से ठंडी प्रतिक्रिया दी गई थी.''
प्रोफ़ेसर हर्ष पंत ने कहा, ''दोनों देशों के बीच संबंधों को बेहतर करने का एक ही रास्ता हो सकता था और वो था- मुक्त व्यापार समझौता. मगर अब इसे भी रोक दिया गया है. ऐसे में जो संबंधों में स्थायित्व ला सकता था, वो अब मौजूद ही नहीं है.''
कनाडा 2022 में भारत का 10वां सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर था.
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिसिएटिव के फाउंडर अजय श्रीवास्तव ने कहा- कनाडा और भारत के बीच व्यापार की मज़बूत संभावनाएं हैं और ये ऐसी हैं कि एक-दूसरे की मदद कर सकती हैं. जैसे भारत से कनाडा में दवाइयों का निर्यात या फिर कनाडा से पेपर और कृषि से जुड़ी चीज़ों का आयात.
अजय श्रीवास्तव बोले, ''दोनों देशों को एक दूसरे के सामान की ज़रूरत है.
व्यापार, सिखों के अलावा भारत और कनाडा को शिक्षा भी जोड़ती है. कनाडा के शैक्षणिक संस्थानों में क़रीब सवा तीन लाख स्टूडेंट्स पढ़ाई कर रहे हैं.
अजय श्रीवास्तव ने कहा, ''थोड़े वक़्त या लंबे वक़्त के लिए जो भी राजनीतिक पारा चढ़ जाए, मगर इसका दोनों देशों के रिश्तों पर कोई असर नहीं होगा.''
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