कनाडा में हरदीप सिंह निज्जर की हत्या से क्यों बढ़ा भारत के साथ तनाव?

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- Author, नदीन यूसुफ़
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, टोरंटो
पिछले महीने खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में सरेबाजार हत्या के बाद सिख अलगावादियों और भारत सरकार के बीच बढ़े तनाव के मंजर कई देशों में दिखे.
निज्जर को सरे में एक गुरुद्वारे के पार्किंग स्पेस के नजदीक दो नकाबपोश बंदूकधारियों ने गोली मार दी थी. उस वक्त वो अपने ट्रक में बैठे थे.
निज्जर को किसने मारा ये पता नहीं चल पाया है लेकिन इस हत्याकांड की गूंज कनाडा समेत कई देशों में सुनाई पड़ रही है.
खालिस्तान समर्थकों ने निज्जर की हत्या के ख़िलाफ़ कनाडा के टोरंटो के अलावा लंदन, मेलबर्न और सैन फ्रांसिस्को समेत कई शहरों में प्रदर्शन किए.
प्रदर्शनकारी भारत सरकार के ख़िलाफ़ नारे लगा रहे थे. उन्हें शक है कि भारत सरकार ने ही निज्जर को मरवाया है. हालांकि भारत सरकार ने इन आरोपों पर अब तक कुछ नहीं कहा है.
45 साल के निज्जर की हत्या के बाद खालिस्तान का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है.
भारत में सिखों की आबादी दो फीसदी है. कुछ सिख अलगाववादी सिखों के लिए अलग देश खालिस्तान बनाने की मांग करते रहे हैं.
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निज्जर की हत्या, टारगेट किलिंग?
अलग खालिस्तान की मांग ने 1980 के दशक में जोर पकड़ा जिसके चलते कई हिंसक हमले हुए और मौतें हुईं.
हालांकि ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद ये आंदोलन खत्म होने के कगार पर पहुंच गया था.
लेकिन हाल के वर्षों में विदेशों में खासकर कनाडा, इंग्लैंड, अमेरिका समेत कई देशों में बसे एनआरआई लोगों के एक तबके ने खालिस्तान की मांग जारी रखी और हाल के दिनों में इसमें तेजी आई है.
भारत खालिस्तानी आंदोलन का कड़ा विरोध करता रहा है. पंजाब समेत देश की सभी मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां हिंसा और अलगाववाद की निंदा करती रही हैं.
ब्रिटिश कोलंबिया में रहने वाले प्रमुख सिख नेता निज्जर अलग खालिस्तान देश के मुखर समर्थक थे. उनके समर्थकों का कहना है कि इस मांग की वजह से उन्हें धमकियां मिलती रहती थीं.
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जबकि भारत ने कहा है वो चरमपंथी और एक अलगाववादी समूह का नेतृत्व कर रहे थे. उनके समर्थकों का कहना है कि ये आरोप बेबुनियाद हैं.
कनाडा पुलिस का कहना है कि निज्जर की हत्या के पीछे मकसद का पता नहीं चल पाया है. उन्होंने किसी संदिग्ध की भी पहचान नहीं की है लेकिन कहा है कि यह 'टारगेट किलिंग' थी.
निज्जर की हत्या के ख़िलाफ़ सैकड़ों लोगों ने टोरंटो में इंडिया कॉन्सुलेट के बाहर 8 जुलाई को प्रदर्शन किया था.
हालांकि भारत सरकार के समर्थकों का एक समूह उसी समय इन प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ नारे लगा रहा था और भारतीय झंडा फहरा रहा था.
खालिस्तान और भारत सरकार के समर्थक कई घंटों तक एक दूसरे के ख़िलाफ़ नारे लगाते रहे.
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भारत सरकार की नाराज़गी
हालांकि बैरिकेड लांघने की कोशिश में पुलिस ने एक खालिस्तान समर्थक प्रदर्शनकारी को गिरफ़्तार किया था.
इन प्रदर्शनों को लेकर अब भी चिंताएं जताई जा रही हैं. प्रदर्शनकारी ऐसे पोस्टर लिए हुए थे जिनमें ''किल इंडिया' लिखा था. इनमें भारतीय राजनयिकों को 'किलर' कहा गया था.
इन पोस्टरों और इनमें लिखी धमकियों की वजह से खफा भारत सरकार ने अपने यहां के कनाडा के राजदूत को समन भेजकर बुलाया और रोष जताया.
वर्ल्ड सिख ऑर्गेनाइजेशन के प्रवक्ता बलप्रीत सिंह ने कहा कि हाल के दशकों के दौरान खालिस्तान आंदोलन उतना मुखर नहीं रहा है. ये शांतिपूर्ण ढंग से चलता रहा है.
खास कर उन युवाओं में इसे लेकर ज्यादा उबाल देखा जा रहा है, जिनका 1980 के दशक की हिंसा से सामना नहीं हुआ है.
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अब तक कितनी मौतें?
निज्जर का इंटरव्यू कर चुके ब्रिटिश कोलंबिया के पत्रकार गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि इस आंदोलन को दोबारा रफ्तार देने की कोशिश के बीच ये धारणा बनने लगी है कि पंजाब में लोग अब सिखों के लिए अलग देश की मांग को पीछे छोड़ चुके हैं.
उन्होंने कहा, ''कनाडा में हम जिन सिख प्रदर्शनकारियों को देख रहे हैं वो खालिस्तान के मुखर समर्थक हैं.''
निज्जर तीसरे ऐसे बड़े सिख नेता थे, जिनकी हाल के दिनों में हत्या हुई है.
ब्रिटेन में जून में अवतार सिंह खांडा की रहस्यमय हालातों में मौत हो गई.
वो खालिस्तान लिबरेशन फोर्स के चीफ बताए जाते थे. कहा जा रहा है उन्हें ज़हर देकर मार दिया गया.
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भारत सरकार की ओर से चरमपंथी घोषित किए गए परमजीत सिंह पंजवाड़ की भी मई में लाहौर में गोली मार दी गई थी.
वर्ल्ड सिख ऑर्गेनाइजेशन के प्रवक्ता बलप्रीत सिंह ने कहा निज्जर को लगातार धमकियां मिल रही थीं.
उन्होंने कनाडाई सुरक्षा और ख़ुफिया एजेंसियों से कहा था कि उनकी हत्या हो सकती है.
सिंह ने कहा कि निज्जर सितंबर में सरे में खालिस्तान के समर्थन में रेफरेंडम कराना चाहते थे. ये ग्लोबल रेफरेंडम सिरीज के तहत होना था.
पिछले साल ओंटारियो के ब्रैम्पटन शहर में भी ऐसा ही रेफरेंडम हुआ था. यहां लगभग 16 हजार सिख रहते हैं.
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कनाडा और भारत के बीच तल्खी
इसके नतीजे अभी तक घोषित नहीं हुए हैं लेकिन बलप्रीत सिंह का कहना है लगभग एक लाख लोग जुटे थे. भारत सरकार इससे काफी नाराज थी.
बलप्रीत कहते हैं, '' ये सुनना ही सदमे जैसा है कि भारत इसे हाशिये का या फिर उग्रवादी आंदोलन मानता है.''
रेफरेंडम के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने कनाडा में हेट क्राइम, अलगाववादी हिंसा व भारत विरोधी गतिविधियां बढ़ने की आशंका जाहिर की थी. हालांकि उसने किसी घटना या रेफरेंडम का हवाला नहीं दिया था.
भारत में खालिस्तान आंदोलन और निज्जर की मौत की वजहों पर अलग-अलग राय है. कुछ भारतीय टिप्पणीकारों की नजर में निज्जर की मौत कनाडा में सिख संगठनों की आपसी प्रतिद्वंद्विता का नतीजा थी.
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उन्होंने खालिस्तानी समर्थकों पर मार्च में कनाडा में हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ करने और ओटावा में भारतीय हाई कमीशन पर हमला करने का आरोप लगाया है.
लेकिन सिख और कनाडा में कुछ राष्ट्रीय सुरक्षा के एक्सपर्ट ने भारतीय सरकार पर सिख समुदाय और अलग खालिस्तान देश के समर्थकों को बदनाम करने के लिए अपने मीडिया के द्वारा ग़लत सूचनाएं फैलाना का आरोप लगाया है. भारत ने इस आरोप का खंडन किया है.
कनाडा के प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने आरोप लगाते हुए कहा कि उनके यहां विदेशी हस्तक्षेप करने वाले स्रोतों में भारत सबसे अव्वल है.
भारत ने कहा है कि कनाडा में सिख अलगाववादी आंदोलन के उभार ने भारत के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप किया है.
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रिश्तों पर असर
इन सबके बावजूद दोनों देशों के बीच राजनयिक और कारोबारी रिश्तों का लंबा इतिहास रहा है और दोनों ही देश मुक्त व्यापार समझौते के क़रीब हैं.
हालांकि अबी ये साफ़ नहीं हुआ है कि हालिया कूटनीतिक तनाव का इस समझौते पर क्या असर होगा.
बलप्रीत सिंह का मानना है कि भारत द्वारा विदेशी हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ कनाडा को कड़ा रुख़ अपनाने की ज़रूरत है. उनका तर्क है कि उसने मुख्य रूप से सिख समुदाय को निशाना बनाया है.
लेकिन वो ये भी कहते हैं कि कनाडा को ऐसी जगह मुहैया करानी चाहिए जहां खालिस्तानी आंदोलन के समर्थक खुले तौर पर अपनी बात कह सकें.
उनके अनुसार निज्जर की मौत के बाद भी सिख समुदाय निडर बना हुआ है.
उन्होंने कहा, “हमें कोई ये नहीं बता रहा है कि आप यहां खालिस्तान के बारे में बात नहीं कर सकते. अगर आप हमसे कहेंकि हम अपनी संप्रभुता के बारे में बात नहीं कर सकते तो हम इसका उलटा ही करेंगे.”
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