जस्टिन ट्रूडो से मोदी की बेरुख़ी में कितनी सच्चाई?

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- Author, आयशा परेरा
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो पहली बार भारत की आधिकारिक यात्रा पर आए, लेकिन उनकी ये यात्रा न तो मीडिया में सुर्खियां बन रही है और न ही उनकी यात्रा को लेकर सरकार की तरफ़ से किसी तरह की गर्मजोशी दिख रही है.
हाँ, युवा और हैंडसम ट्रूडो के अपनी पत्नी और बच्चों के साथ ताजमहल घूमने की तस्वीरें ज़रूर सोशल मीडिया में छाई हुई हैं.
ट्रूडो जब राजधानी दिल्ली पहुँचे तो उनकी आगवानी के लिए वहां भारत सरकार के एक जूनियर मंत्री मौजूद थे और राजनीतिक विश्लेषकों को मानना है कि ये संकेत है कि मोदी सरकार ट्रूडो की यात्रा को बहुत ज़्यादा तरजीह नहीं देना चाहती.

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अपनी बेहतरीन मेज़बानी के लिए अक्सर सुर्खियां बटोरने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई मौकों पर अपने विदेशी मेहमानों का गर्मजोशी से स्वागत करते हैं. यही नहीं विदेशी मेहमानों से उनका गले मिलने की तस्वीरें भी घर ही नहीं विदेश में ही मशहूर हुई हैं.
हाल ही में जब इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू भारत दौरे पर आए थे तो प्रधानमंत्री ने स्वयं उनकी आगवानी की थी और उन्हें गले लगाया था.
लेकिन कनाडा के प्रधानमंत्री ट्रूडो को भारत आए हुए दो दिन हो गए हैं, लेकिन अभी तक उनकी मोदी से मुलाक़ात नहीं हुई है. मोदी तब भी ट्रूडो के साथ नहीं थे, जब ट्रूडो सोमवार को मोदी के गृह राज्य गुजरात की यात्रा पर थे.
सिर्फ़ मोदी ही नहीं, वरिष्ठ राजनेता भी ट्रूडो के साथ नहीं दिख रहे हैं.

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रविवार को जब ट्रूडो आगरा में ताजमहल देखने पहुँचे थे तो कुछ मीडिया रिपोर्ट्स ने इस बात की ओर इशारा किया था कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उनकी मेजबानी के लिए वहाँ मौजूद नहीं थे.
तो ट्रूडो की भारत यात्रा को मोदी सरकार क्या वाकई बहुत तरजीह नहीं दे रही है? और अगर ऐसा है तो इसकी वजह क्या है?
अर्थशास्त्री और स्तंभकार विवेद दहेजिया ने बीबीसी को बताया, "हां, ये बड़ा अपमान है. असलियत ये है कि एक जूनियर मंत्री को ट्रूडो और उनके परिवार की आगवानी के लिए भेजना निश्चित तौर पर अनादर है."
दहेजिया कहते हैं कि इसकी वजह ये हो सकती है कि ट्रूडो की सरकार में कई मंत्री सिखों के स्वतंत्रता आंदोलन (खालिस्तान आंदोलन) से क़रीबी रही है.
कनाडा के अधिकारियों ने 1985 में एयर इंडिया के विमान को बम से उड़ाने की घटना के लिए भी सिख अलगाववादियों से जोड़ा था. इस हादसे में 329 लोगों को मौत हो गई थी.
दहेजिया ने कहा, "उनकी लिबरल पार्टी सिख-कनाडाई वोट बैंक पर बुरी तरह आश्रित है और उनकी सरकार के कुछ सदस्य खालिस्तानियों के साथ अक्सर दिखाई देते हैं."
ट्रूडो की कैबिनेट में चार सिख शामिल हैं.
अगर मामला सिर्फ़ ये ही है, तो ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है कि ख़ालिस्तान की वजह से भारत और कनाडा के संबंध मधुर नहीं हैं.

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पिछले साल पंजाब के मुख्यमंत्री ने कनाडा के रक्षा मंत्री हरिजीत सज्जन से मिलने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि वह "खालिस्तानियों से सहानुभूति" रखते हैं.
लेकिन कनाडा में भारत के पूर्व उच्चायुक्त विष्णु प्रकाश इस बात से इनकार करते हैं कि ट्रूडो का अनादर हुआ है. उनका कहना है कि विदेशी मेहमानों की मेजबानी में भारत कूटनीतिक प्रोटोकॉल का गंभीरता से ध्यान रखता है.
प्रकाश ने बीबीसी से कहा, "प्रोटोकॉल के मुताबिक, विदेशी मेहमानों की मेजबानी कैबिनेट मंत्री करता है और ट्रूडो के मामले में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई."
उन्होंने कहा कि हालांकि पूर्व में मोदी ने विदेशी मेहमानों की आगवानी खुद कर प्रोटोकॉल तोड़ा, उनसे ये अपेक्षा नहीं की जाती कि वो भारत आने वाले हर विदेशी राजनेता का खुद स्वागत करें.
उन्होंने कहा, "ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री उनसे कभी नहीं मिलेंगे. उनका 23 फ़रवरी को स्वागत होगा और वह उनसे मुलाक़ात भी करेंगे."
पूर्व राजनेता कंवल सिब्बल ने बीबीसी को बताया कि ये राजनीतिक और पेशेवर दोनों तरह से गलत है कि भारत ट्रूडो की यात्रा को खालिस्तान पर पूर्व में बनी हुई राय के चश्मे से देखे, बल्कि भारत को इस मंच का इस्तेमाल खालिस्तान पर भारत की चिंताओं को साझा करने के लिए करना चाहिए.

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सिब्बल कहते हैं, "ये सही है कि घरेलू राजनीतिक वजहों से भारत को इस पर उस तरह का समर्थन नहीं मिल रहा है, लेकिन हम इस यात्रा में कनाडा सरकार से कह सकते हैं कि वो इस पर कार्रवाई करे."
सिब्बल ने कहा कि उनका मानना है कि ये सच नहीं है कि भारत ट्रूडो का अनादर कर रहा है. उनका कहना है कि दोनों देशों के बीच पिछले कुछ समय में रिश्ते नाटकीय रूप से सुधरे हैं. परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर होने से साबित होता है कि दोनों के हित साझा हैं.
कनाडा ने साल 2015 में घोषणा की थी कि वह भारत को यूरोनियम की आपूर्ति करेगा. इस घोषणा को दोनों देशों के रिश्तों में सुधार की दिशा में अहम कदम माना गया था.
सिब्बल ने कहा कि उनका मानना है कि इस बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है कि एक जूनियर मंत्री को ट्रूडो के स्वागत के लिए एयरपोर्ट भेजा गया.
उन्होंने कहा, "ये सामान्य प्रोटोकॉल है. न तो भारत और न ही कनाडा उस सरकारी यात्रा को ख़तरे में नहीं डालेंगे जिस यात्रा के बारे में वो अच्छी तरह जानते हैं. इस यात्रा की सफलता सुनिश्चित करना दोनों देशों के हित में है."












