बांग्लादेश: ख़ालिदा ज़िया को पीएम मोदी ने हर संभव मदद करने की बात कही, क्या हैं इसके मायने

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बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष ख़ालिदा ज़िया पिछले एक हफ़्ते से ढाका के एक अस्पताल में बहुत ही गंभीर स्थिति में हैं.
सोमवार को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ख़ालिदा ज़िया की सेहत के लिए दुआ करते हुए हर तरह की मदद की पेशकश की है.
इससे पहले सोमवार को ढाका के इवरकेयर अस्पताल में चीन के पाँच डॉक्टरों का एक प्रतिनिधिमंडल ख़ालिदा ज़िया के इलाज में मदद के लिए पहुँचा था.
बांग्लादेश के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार ढाका ट्रिब्यून के मुताबिक़ ख़ालिदा ज़िया की हालत नाज़ुक बनी हुई है और सोमवार को चीनी मेडिकल टीम के पाँच डॉक्टर ढाका पहुँचे थे.
ढाका ट्रिब्यून ने लिखा है, ''चीनी मेडिकल टीम की ख़ालिदा ज़िया के इलाज में लगे डॉक्टरों से मुलाक़ात हुई. बीएनपी के महासचिव मिर्ज़ा फ़ख़रुल इस्लाम आलमगीर ने पत्रकारों को बताया कि ख़ालिदा ज़िया की स्थिति अब भी गंभीर बनी हुई है और स्थानीय और विदेशी डॉक्टर्स की टीम मिलकर उनका इलाज कर रही है.''
पीएम मोदी ने एक्स पर लिखा, ''बेगम ख़ालिदा ज़िया की सेहत की स्थिति जानकर मुझे बहुत दुख हुआ है. बेगम ज़िया ने अपने सार्वजनिक जीवन में बांग्लादेश के लिए कई वर्षों तक बहुत कुछ किया है. मैं उनकी सेहत में तेज़ी से सुधार के लिए दुआ करता हूँ. भारत इस मामले में जो भी कर सकता है, करने के लिए तैयार है.''
पीएम मोदी की इस पोस्ट के जवाब में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने लिखा है, ''बीएनपी प्रमुख बेगम ख़ालिदा ज़िया की सेहत की दुआ के लिए भारत के प्रधानमंत्री का हम आभार व्यक्त करते हैं. बीएनपी इस समर्थन की पेशकश की प्रशंसा करती है.''

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बीएनपी को लेकर भारत का नरम रुख़?
इससे पहले, भारत सरकार और बीएनपी के बीच इस तरह की सद्भावना कम ही देखने को मिली है. बल्कि शेख़ हसीना के भारत में होने को लेकर बीएनपी भारत सरकार को आड़े हाथों लेती रही है.
भारत के प्रधानमंत्री ने जून 2015 में अपने बांग्लादेश दौरे में ख़ालिदा ज़िया से मुलाक़ात की थी. इस दौरान भारत ने बांग्लादेश के साथ लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट किया था और शेख़ हसीना प्रधानमंत्री थीं. बांग्लादेश के विपक्ष से तब पीएम मोदी की यह असामान्य मुलाक़ात थी. भारतीय प्रधानमंत्री ने ख़ालिदा ज़िया के अलावा जातीय पार्टी के रौशन इरशाद से भी मुलाक़ात की थी.
कई लोग मानते हैं कि भारत ने अपने पड़ोसी देशों ख़ास कर बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार और श्रीलंका में सत्ताधारी पार्टियों के साथ ज़्यादा संबंध बेहतर करके रखा लेकिन विपक्षी पार्टियों के भरोसे को हासिल करने की पूरी कोशिश नहीं की.
दूसरी तरफ़ चीन इन इलाक़ों में सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष दोनों से अच्छे संबंध रखने की नीति पर चलता है. राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि जब शेख़ हसीना प्रधानमंत्री थीं तब भी चीन के बांग्लादेश से अच्छे संबंध थे और ख़ालिदा ज़िया थीं तब भी. यहाँ तक कि मोहम्मद युनूस से पास बांग्लादेश की कमान है, तब भी चीन के बांग्लादेश से अच्छे संबंध हैं.
ख़ालिदा ज़िया के वक़्त में भारत के बांग्लादेश से अच्छे संबंध नहीं रहे हैं और अब जब मोहम्मद युनूस हैं तब भी भारत के साथ संबंधों में पहले जैसी गर्माहट नहीं है.
पिछले साल अगस्त महीने में बांग्लादेश की सत्ता से बेदख़ल होने के बाद शेख़ हसीना को भारत आना पड़ा और वे अब भी यहीं हैं. बांग्लादेश की मौजूदा सरकार शेख़ हसीना को प्रत्यर्पित करने मांग कर रही है.
शेख़ हसीना को बांग्लादेश में मौत की सज़ा सुनाई गई है. कूटनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि भारत के लिए ये सब असहज करने वाला है लेकिन चीन इन मामलों से बिल्कुल मुक्त है.
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के दक्षिण एशिया अध्ययन केंद्र में प्रोफ़ेसर महेंद्र पी लामा कहते हैं कि ख़ालिदा ज़िया की सेहत की जो अभी स्थिति है, उस स्थिति तक पहुँचाने में शेख़ हसीना का सबसे बड़ा हाथ है और हसीना को भारत ने शरण दे रखी है.
प्रोफ़ेसर लामा कहते हैं, ''अगर आप सरसरी निगाह से देखें तो ऐसा ही लगता है कि प्रधानमंत्री ने मानवीय आधार पर पोस्ट की है. लेकिन थोड़ी गंभीरता से देखें तो ऐसा लगता है कि यह इतना भी सामान्य नहीं है. अगले साल बांग्लादेश में चुनाव है और अनुमान है कि बीएनपी सत्ता में आ सकती है. बांग्लादेश में हमारी विदेश नीति सत्ता और व्यक्ति केंद्रित रही है और इसका नतीजा हम सबके सामने है.''
''शेख़ हसीना के सत्ता से जाते ही हम वहां कहीं नहीं दिख रहे हैं. मुझे लगता है कि हमने बांग्लादेश में शेख़ हसीना के अलावा बाक़ी पक्षों से कभी संबंध बेहतर करने की कोशिश ही नहीं की. चीन इस मामले में बिल्कुल अलग है. चीन का संबंध किसी देश से इस बात पर निर्भर नहीं करता है कि वहां किसकी सरकार है.''

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बेग़म ज़िया की अहमियत
हालांकि शेख़ हसीना के परिवार का भारत से जो संबंध रहा है, वो चीन से नहीं है. बांग्लादेश बनाने में शेख़ हसीना के पिता मुजीब-उर रहमान और भारत की अहम भूमिका थी.
ख़ालिदा ज़िया चार दशक से ज़्यादा समय से बांग्लादेश की राजनीति में हैं. अपने पति के मारे जाने के बाद ख़ालिदा ज़िया ने बीएनपी की कमान अपने हाथों में ली थी.
1981 में ज़ियाउर रहमान बांग्लादेश के राष्ट्रपति थे और तभी उनकी हत्या कर दी गई थी. ख़ालिदा ज़िया बांग्लादेश में बहुदलीय लोकतंत्र की समर्थक रही हैं.
बेगम ज़िया 1991 में बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी थीं. 1991 में बीएनपी को चुनाव में जीत मिली थी. इसके बाद वो 2001 में सत्ता में लौटी थीं और 2006 तक रही थीं. बीएनपी ने पिछले तीन चुनावों का बहिष्कार किया है. 2024 में शेख़ हसीना के ख़िलाफ़ शुरू हुए आंदोलन का ख़ालिदा ज़िया ने समर्थन किया था. बीएनपी अभी बांग्लादेश की सबसे बड़ी पार्टी है और कहा जा रहा है कि अगले साल होने वाले चुनाव में वो सत्ता में आ सकती है.
शेख़ हसीन जब प्रधानमंत्री थीं तो ख़ालिदा ज़िया जेल में थीं. ख़ालिदा ज़िया के बेटे तारिक़ रहमान को भी कई मामलों में अदालत ने दोषी ठहराया था, लेकिन मोहम्मद युनूस की अंतरिम सरकार ने ख़ालिदा और उनके बेटे को बरी कर दिया.
बीएनपी बांग्लादेश बनाने में भारत की भूमिका पर भी सवाल उठाता रहा है. पिछले साल दिसंबर महीने में बीएनपी की स्टैंडिंग कमिटी के सदस्य मिर्ज़ा अब्बास ने भारत की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा था, ''भारत दो हिन्दू देश बनाना चाहता है. ये चटगाँव पर क़ब्ज़ा करना चाहते हैं. हर कोई कहता है कि बांग्लादेश एक छोटा और ग़रीब देश है. लेकिन मैं मानता हूँ कि बांग्लादेश एक उदार और मज़बूत देश है. भारत को याद रखना चाहिए कि हमारे पास छोटी सेना है लेकिन 1971 में हमने बिना ट्रेनिंग के लड़ाई लड़ी थी. बांग्लादेश के 20 करोड़ लोग सैनिक हैं.''

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मुक्ति युद्ध या पाकिस्तान से जंग?
मिर्ज़ा अब्बास ने कहा था, ''यहाँ तक कि इसी साल तानाशाह हसीना को हमारे बेटों और बेटियों ने बिना हथियार के सत्ता से हटाया. राहुल गांधी ने कहा था कि भारत ने बांग्लादेश को मुक्त कराया. लेकिन भारत ने बांग्लादेश नहीं बनाया. हमने बांग्लादेश मुक्त कराया. भारत ने तो पाकिस्तान को बाँटा और ये अपने स्वार्थ में किया न कि हमारे स्वार्थ के लिए.''
शेख़ हसीना के सत्ता से बेदख़ल होने के बाद से बीएनपी की ओर से भारत पर हमले बढ़ गए थे. पिछले साल एक दिसंबर को बीएनपी के संयुक्त महासचिव रुहुल कबीर रिज़वी ने भी भारत पर निशाना साधते हुए कहा था, ''शेख़ हसीना के सत्ता से बाहर होने को भारत पचा नहीं पा रहा है. भारत की सत्ताधारी पार्टी और उसके सहयोगी प्रौपेगेंडा फैला रहे हैं. भारत का व्यवहार बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने जैसा है जो कि हमारी संप्रभुता और स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ है.''
1971 की जंग को भारत और पाकिस्तान का युद्ध कहना चाहिए या बांग्लादेश का मुक्ति युद्ध?
पाकिस्तान इसे भारत के साथ जंग कहता है. वो इसे बांग्लादेश का मुक्ति संग्राम नहीं कहता है. भारत की किताबों में भी इसे भारत-पाकिस्तान जंग के रूप में ही देखा जाता है लेकिन भारत को बांग्लादेश का मुक्ति युद्ध कहने में भी कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन इसे लेकर विवाद होता रहा है.
2021 में छह दिसंबर को बांग्लादेश के तत्कालीन विदेश मंत्री डॉ अब्दुल एके मोमेन ने बांग्लादेश के राष्ट्रीय प्रेस क्लब में भारत के साथ राजनयिक रिश्ता कायम होने के 50 साल पूरे होने पर आयोजित एक कार्यक्रम में अपनी पार्टी का रुख़ रखा था.
मोमेन ने कहा था, ''पाकिस्तान, बांग्लादेश मुक्ति युद्ध को भारत-पाकिस्तान के बीच का युद्ध दिखाने की कोशिश करता है. लेकिन यह बांग्लादेश का मुक्ति युद्ध था, जिसमें भारत ने केवल मदद की थी. छह दिसंबर को भारत ने बांग्लादेश को एक संप्रभु राष्ट्र के तौर पर मान्यता भी दे दी थी.''
1971 की जंग युद्ध की शुरुआत पाकिस्तान ने वेस्टर्न फ्रंट से की. बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने युद्ध में जाने का फ़ैसला किया था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












