राजस्थानः सेना के जवान की मौत, पांच दिन तक क्यों धरने पर रहा परिवार

भारतीय सेना के जवान

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इमेज कैप्शन, भारतीय सेना के जवान रामस्वरूप की 24 सितंबर को मौत हो गई थी
    • Author, मोहर सिंह मीणा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, बीकानेर से लौटकर

भारतीय सेना के जवान रामस्वरूप की 24 सितंबर को कश्मीर के अनंतनाग में गोली लगने से मौत हो गई थी. 24 साल के जवान रामस्वरूप राजस्थान के बीकानेर के रहने वाले थे.

रामस्वरूप का शव 25 सितंबर को बीकानेर ले जाया गया लेकिन परिवार ने शव लेने से इनकार किया और धरने पर बैठ गया. रामस्वरूप का शव पांच दिन तक बीकानेर के मिलिट्री अस्पताल में रखा रहा.

परिवार रामस्वरूप की मौत की वजह सुसाइड बताए जाने से नाराज़ था और सैन्य सम्मान के साथ शव का अंतिम संस्कार करने की मांग कर रहा था.

परिवार की मांगों पर प्रशासन के साथ छह दौर की वार्ता के बाद सहमति बनी, जिसके बाद 29 सितंबर की शाम को सैन्य सम्मान के साथ रामस्वरूप का अंतिम संस्कार किया गया.

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'सुसाइड' बताए जाने पर आपत्ति

रामस्वरूप के बड़े भाई श्रीराम भी सेना में हैं

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इमेज कैप्शन, रामस्वरूप के बड़े भाई श्रीराम ने कई सवाल उठाए हैं

जवान का परिवार बीकानेर शहर के म्यूजिक सर्किल पर धरने पर बैठा था.

धरना स्थल पर जवान रामस्वरूप के बड़े भाई श्रीराम ने बीबीसी को बताया था, “24 तारीख़ को सुबह 9.46 की घटना थी, लेकिन मेरे पास दोपहर एक बजे रामस्वरूप के ओसी का फोन आया. उन्होंने मुझे कहा कि गोली लगने से रामस्वरूप की मौत हो गई है. इसके अलावा मुझे कुछ नहीं बताया.”

वह बताते हैं, “मेरे भाई की उसी दिन सुबह 8.26 बजे हमारे पिता से फोन पर बात हुई थी, वह अच्छा था. रामस्वरूप ने मुझसे भी क़रीब नौ बजे फोन पर बात की थी. वह ठीक था. उसने कहा था कि ढाई बजे बात करेगा.”

जिस दिन रामस्वरूप का शव बीकानेर ले जाया गया, उसी दिन राजस्थान सैनिक कल्याण विभाग के बीकानेर ज़िला अधिकारी (सेवानिवृत्त कर्नल) यश राठौड़ की ओर से कलेक्टर को भेजे गए एक पत्र के बाद विवाद गहरा गया.

पत्र में लिखा गया, ''संबंधित कोर हेड मुख्यालय से प्राप्त प्रारंभिक सूचना के आधार पर रामस्वरूप फिजिकल कैजुअल्टी (अटेम्पटेड सुसाइड) का केस है न कि बैटल कैजुअल्टी (शहीद) का केस है.''

इस पत्र में रामस्वरूप की मौत का कारण सुसाइड बताने की बात से नाराज़ परिजन और समाज के लोगों ने शव लेने से इनकार कर दिया और धरने पर बैठ गए.

श्रीराम कहते हैं, “हमने पहले ही मना कर दिया था कि शहीद का दर्जा नहीं मिलने तक हम शव नहीं लेंगे. सेना की ओर से हमसे कोई संपर्क नहीं किया गया. हमें स्पष्ट रूप से कुछ नहीं बताया गया है.”

25 सितंबर की रात करीब दस बजे धरना स्थल पर मौजूद नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल ने भी सुसाइड बताने पर सवाल खड़े किए थे.

उन्होंने बीबीसी से कहा था, “अधिकारी इसको सुसाइड कैसे बता सकते हैं, जबकि वहां कोई सुसाइड नोट नहीं मिला था.”

सांसद बेनीवाल ने शहीद का दर्जा देने की मांग करते हुए पूरे प्रदेश में आंदोलन की चेतावनी दी थी.

ज़िला सैनिक कल्याण

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इमेज कैप्शन, ज़िला सैनिक कल्याण अधिकारी बीकानेर ने इस पत्र में बताया था फिजिकल कैजुअल्टी है

राजस्थान सैनिक कल्याण विभाग ने क्या बताया?

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समाप्त

ज़िला सैनिक कल्याण अधिकारी कर्नल (सेवानिवृत्त) यश राठौड़ के फिजिकल कैजुअल्टी (अटेम्प्टेड सुसाइड) बताने पर राजस्थान सैनिक कल्याण विभाग के निदेशक (सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर) वीरेंद्र सिंह राठौड़ बीबीसी से कहते हैं, “इस संबंध में हमने कश्मीर रीजन के सबसे बड़े मुख्यालय 15 कोर से पता लगाया कि किन परिस्थितियों में जवान की मौत हुई है. वही जिला सैनिक कल्याण अधिकारी यश राठौड़ ने कलेक्टर के साथ शेयर किया था.”

वे कहते हैं, “जब यह विवाद बढ़ने लगा तो उसके बाद हमने फिर मुख्यालय 15 कोर से बात की. वो इसी बात पर कायम हैं. हमने जो जानकारी शेयर की है वह बिल्कुल सच्ची है. इसमें किसी तरह की कोई लापरवाही नहीं है.”

वो बताते हैं, “ऑपरेशन के अलावा किसी भी परिस्थिति में किसी जवान की मौत को फिजिकल कैजुअल्टी बोला जाता है. आत्महत्या, सड़क एक्सीडेंट या नेचुरल डेथ हो जाए इन सबको फिजिकल कैजुअल्टी बोला जाता है. जबकि ऑपरेशन के दौरान हुई मौत को बैटल कैजुअल्टी बोला जाता है.”

रामस्वरूप के बड़े भाई श्रीराम ख़ुद भारतीय सेना में हैं. उनका कहना था, “अधिकारी गलत कह रहे हैं कि उसने सुसाइड किया है.”

पांच दिन तक चला धरना

रामस्वरूप का घर

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इमेज कैप्शन, पांचू गांव में रामस्वरूप का घर

रामस्वरूप के परिवार की मांग थी कि ज़िला सैनिक कल्याण अधिकारी पर सुसाइड बताने के लिए कार्रवाई की जाए और पूरे सैन्य सम्मान के साथ रामस्वरूप का अंतिम संस्कार किया जाए.

29 सितंबर की सुबह धरना स्थल पर रामस्वरूप के दो बड़े भाई और समाज के लोग मौजूद रहे. मगर रामस्वरूप के पिता पांचू अपने गांव चले गए.

धरना स्थल पर कई दौर की वार्ता बेनतीजा रहने के बाद ज़िला कलेक्टर और एसपी, डिप्टी एसपी, एसडीएम और तहसीलदार समेत कई अधिकारी पांचू गांव से करीब चार किलोमीटर दूर रामस्वरूप के घर पहुंचे थे.

लेकिन, घर पर दो महिलाओं के अलावा कोई नहीं मिला. बहुत प्रयास के बाद भी प्रशासन की जब रामस्वरूप के पिता, माता और पत्नी से मुलाकात नहीं हो सकी तो वह लौट गए.

जब बीबीसी पांचू गांव में खेतों के बीच बने घर पर पहुँचे तो हमें वहां श्रीराम की पत्नी सावित्री, उनका छोटा बच्चा और रामस्वरूप की भतीजी मौजूद थी.

सावित्री ने बीबीसी को बताया, “हमें न्याय चाहिए. सेना में भर्ती के लिए तो एक इंच कम नहीं लेते हैं. लेकिन, जवान को न्याय देने में देर कर रहे हैं. रामस्वरूप की पत्नी, मां पर क्या गुजर रही है इसका अंदाजा किसी को नहीं है.”

धरना स्थल पर ही बनी सहमति

रामस्वरूप कस्वां

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इमेज कैप्शन, धरना स्थल पर कलेक्टर की परिजनों के साथ बैठक में बनी सहमति.

बाद में पांचू से बीकानेर लौटे कलेक्टर और एसपी समेत वरिष्ठ अधिकारियों की वार्ता परिजनों के साथ धरना स्थल पर हुई.

29 सितंबर को रामस्वरूप के बड़े भाई श्री राम ने बीबीसी से कहा, “हमारी मांगें प्रशासन ने मान ली हैं. गार्ड ऑफ ऑनर (सैन्य सम्मान) के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा, ज़िला सैनिक कल्याण अधिकारी पर कार्रवाई होगी, रामस्वरूप की पत्नी को नौकरी और परिवार को परिलाभ दिए जाएंगे.”

सहमति बनने के बाद ही सेना के वाहन से पूरे सम्मान के साथ रामस्वरूप का शव पांचू गांव ले जाया गया. पूरे रास्ते लोगों ने जवान को अंतिम विदाई दी.

पांचू पंचायत समिति कार्यालय के पास नाथूसर रोड़ क्षेत्र में सेना ने रामस्वरूप के शव का पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया.

रामस्वरूप के बड़े भाई श्रीराम बोले, “मेरे भाई को अगर न्याय नहीं मिलता तो मैं भी लौटकर सेना में नौकरी के लिए नहीं जाता...”

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