एच1-बी वीज़ा के बाद सवालों में ये अमेरिकी प्रोग्राम, भारतीयों के 'वर्क परमिट' पर हो सकता है असर

अमेरिका आने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों के बीच ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग काफी लोकप्रिय है

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, अमेरिका आने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों के बीच ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग काफी लोकप्रिय है
    • Author, अभिनव गोयल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक अब एच1-बी वीज़ा के बाद ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (ओपीटी) प्रोग्राम पर अपना गुस्सा निकाल रहे हैं.

ओपीटी एक ऐसा प्रोग्राम है जिसकी मदद से अंतरराष्ट्रीय छात्र अस्थायी तौर पर अमेरिका में रहकर काम कर सकते हैं.

अमेरिका आने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों के बीच यह प्रोग्राम काफी लोकप्रिय है और इसे पाने वालों में सबसे बड़ा नाम भारत का है.

चुनावी अभियान में ट्रंप ने 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' का नारा दिया था और उनकी नीतियां इसी से प्रेरित हैं.

रेड लाइन

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

रेड लाइन

यूएस टेक वर्कर्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग प्रोग्राम के खिलाफ खुलकर लिख रहे हैं और इसपर कड़े प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं. यूएस टेक वर्कर्स रोज़गार के लिए चलाए जाने वाले वीज़ा प्रोग्राम के ख़िलाफ़ अमेरिकियों का एक प्लेटफ़ॉर्म है.

अपनी एक पोस्ट में यूएस टेक वर्कर्स ने लिखा कि ओपीटी, एच-1बी वीज़ा से भी ज्यादा खराब है, जो अमेरिकी युवाओं के लिए नौकरियां खत्म कर रहा है.

उन्होंने ओपीटी के तहत काम करने वाले छात्रों को सैलरी में मिलने वाली टैक्स छूट पर भी सवाल उठाया है.

भारत में अमेरिकी दूतावास के मुताबिक साल 2023-24 में 3.31 लाख भारतीय छात्र अमेरिका में पढ़ाई के लिए आए.

इन छात्रों में से 29.42 प्रतिशत यानी 97 हजार 556 छात्र ऐसे हैं, जिन्होंने ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग प्रोग्राम को चुना है.

क्या है ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग

छात्रा

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, हर साल करीब दस लाख अंतरराष्ट्रीय छात्र अमेरिका पढ़ने के लिए जाते हैं
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

हर साल दुनियाभर से करीब 10 लाख छात्र उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाते हैं. ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (ओपीटी) एक ऐसा प्रोग्राम है जो अंतरराष्ट्रीय छात्रों को पढ़ाई के बाद एक सीमित समय के लिए काम सीखने का मौका देता है.

आसान भाषा में समझें तो यह प्रोग्राम छात्रों को एक सीमित समय के लिए रोजगार मुहैया करवाता है.

यूनाइटेड स्टेट्स सिटीजनशिप एंड इमीग्रेशन सर्विसेज (यूएससीआईएस) के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय छात्र पढ़ाई के दौरान या उसके बाद इस प्रोग्राम के लिए आवेदन कर सकते हैं.

इसकी मदद से छात्र एक साल तक अमेरिका में काम कर सकते हैं. ओपीटी के लिए वही छात्र अप्लाई कर सकते हैं जिनके पास स्टडी वीजा है.

वीजा काउंसलर गमनदीप सिंह बताते हैं कि अमेरिका में भारत समेत दुनियाभर से पढ़ने आने वाले छात्रों को एफ-1 वीजा दिया जाता है, जिसे स्टडी वीजा भी कहते हैं.

वह कहते हैं, "अमेरिका में ग्रेजुएशन तीन साल की बजाय चार साल की होती है, वहीं मास्टर डिग्री में दो ही साल लगते हैं. अगर ओपीटी प्रोग्राम नहीं होगा तो छात्रों को पढ़ाई पूरी करने के तुरंत बाद अपने देश लौटना पड़ेगा."

गमनदीप बताते हैं, "पढ़ाई खत्म करने के बाद छात्र आमतौर पर ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के लिए अप्लाई करते हैं और इसमें उन्हें सालभर तक काम करने का मौका मिल जाता है."

सिंह कहते हैं, "ओपीटी के दौरान छात्र उसी क्षेत्र में काम कर सकता है, जिसकी उसने पढ़ाई की है."

ओपीटी कितनी तरह का है?

वीजा

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, ओपीटी प्रोग्राम में सबसे ज्यादा भारतीय छात्र हैं

ओपीटी दो तरह का होता है. एक प्री-कम्प्लीशन और दूसरा पोस्ट-कम्प्लीशन.

प्री-कम्प्लीशन में छात्र पढ़ाई के दौरान इस प्रोग्राम के लिए अप्लाई कर सकता है. अगर छात्र को यह मिलता है तो वह हफ्ते में 20 घंटे और सेशन ना होने की स्थिति में फुल टाइम काम कर सकता है.

वहीं पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्र पोस्ट कम्प्लीशन ओपीटी के लिए अप्लाई कर सकते हैं. ऐसा करने पर छात्र एक साल तक बिना स्टडी वीजा के अमेरिका में रहकर काम कर सकते हैं.

यह मिलने पर छात्र हफ्ते में 20 घंटे या फिर फुल टाइम काम भी कर सकते हैं.

अगर किसी छात्र के पास स्टेम यानी विज्ञान, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग या मैथ्स के क्षेत्र में डिग्री है तो उसे 2 साल का एक्सटेंशन और दिया जा सकता है. यानी पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्र तीन साल के लिए अमेरिका में रहकर काम कर सकता है.

काउंसलर गमनदीप सिंह अपनी एक छात्र का उदाहरण देते हुए बताते हैं, "हमारा एक छात्र राकेश साल 2021 में अमेरिका गया था. वह साइंस से ग्रेजुएशन कर रहा है और उसे पढ़ाई के दौरान ही ओपीटी मिल गया है."

वह कहते हैं, "ओपीटी के दौरान किया गया काम एक्सपीरियंस के तौर पर गिना जाता है, जिसकी मदद से राकेश को भविष्य में नौकरी मिलना आसान होगा."

वहीं दूसरी तरफ राकेश साइंस से पढ़ाई कर रहे हैं. इस कोर्स के बच्चे तीन साल तक ओपीटी ले सकते हैं.

ओपीटी खत्म होने के बाद क्या?

ओपीटी खत्म होने के बाद छात्रों को भारत लौटना पड़ता है.

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, ओपीटी खत्म होने के बाद छात्रों को अपने देश लौटना पड़ता है

दिल्ली की आंबेडकर यूनिवर्सिटी से इंग्लिश लिटरेचर की पढ़ाई कर हरमनप्रीत कौर ने साल 2017 में अमेरिका की 'मिसिसिपी कॉलेज' यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया था. यहां से उन्होंने मेंटल हेल्थ काउंसलिंग में मास्टर डिग्री की.

बीबीसी से बातचीत में हरमनप्रीत कौर बताती हैं, "मेंटल हेल्थ काउंसलिंग में मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद मैं एक साल के लिए ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए अप्लाई कर सकती थी. कोर्स खत्म होने के बाद हमें नौकरी तलाशने के लिए 90 दिनों का वक्त दिया गया था."

वह बताती हैं, "मैंने कोर्स खत्म होने से पहले ही नौकरी ढूंढना शुरू कर दिया था. ओपीटी प्रोग्राम के तहत मुझे एक साल का वर्क वीजा मिला और इस दौरान मैंने एक अस्पताल में नौकरी की. इस दौरान मेरे पास जो स्टडी वीजा (एफ-1) था, वो बदलकर एफ-1 ओपीटी वीजा हो गया."

हरमनप्रीत कहती हैं, "ओपीटी का फायदा ये हुआ कि जो पढ़ाई मैंने अमेरिका में की, उसे सालभर काम के दौरान अप्लाई किया, जिससे मुझे अच्छा अनुभव मिला."

वह बताती हैं कि सालभर के ऑप्शनल ट्रेनिंग प्रोग्राम के बाद अगर कोई कंपनी नौकरी के लिए स्पॉन्सर नहीं करती है तो छात्र अक्सर दूसरे कोर्स में एडमिशन ले लेते हैं या फिर उन्हें वापस अपने देश लौटना पड़ता है.

हरमनप्रीत का कहना है कि अक्सर ओपीटी वाले छात्रों को एच1-बी वीज़ा मिलना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि नौकरी देने वाला किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं रखना चाहता जिसके पास सालभर काम करने का ही वीज़ा हो और दूसरा एच1-बी वीज़ा की संख्या बहुत सीमित है.

अगर छात्र किसी दूसरे कोर्स में दाखिला लेता है तो उसे फिर से स्टडी वीज़ा यानी एफ-1 वीज़ा मिलता है.

ऐसी ही बात कनाडा में रहने वाले मुकेश बताते हैं. वह साल 2017 में बिजनेस एनालिटिक्स में मास्टर डिग्री करने अमेरिका गए थे. यह कोर्स 'स्टेम' में आता है, यानी इस कोर्स के बाद छात्र को पढ़ाई खत्म करने के बाद तीन साल तक काम करने की इजाजत मिलती है.

मुकेश कहते हैं, "2019 में मेरी मास्टर डिग्री पूरी हो गई, फिर तीन साल मैंने ओपीटी के तहत 2023 तक फुल टाइम नौकरी की. इस दौरान मेरी कंपनी मेरा वीज़ा एच1-बी की लॉटरी में डालती रही, लेकिन नाम नहीं आया, जिसके चलते मुझे अमेरिका छोड़कर कनाडा शिफ्ट होना पड़ा."

वह कहते हैं, "ओपीटी खत्म होने के बाद आप अमेरिका में काम नहीं कर सकते. ऐसे में या तो फिर से किसी यूनिवर्सिटी में दाखिला लेना पड़ता है, या फिर घर वापस लौटना पड़ता है."

मुकेश का कहना है कि स्टडी वीज़ा खत्म होने के बाद जो बच्चे सेकेंड मास्टर में दाखिला लेते थे, उनमें ट्रंप के आने के बाद डर है, क्योंकि अब उसमें रिजेक्शन रेट बढ़ सकता है.

ओपीटी को लेकर चिंताएं

एक्सपर्ट्स को डर है कि ओपीटी के तहत मिलने वाले एक्सटेंशन को कम किया जा सकता है.

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, एक्सपर्ट्स को डर है कि ओपीटी के तहत मिलने वाले एक्सटेंशन को कम किया जा सकता है

20 जनवरी को डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे.

अमेरिका की सत्ता में ट्रंप की वापसी से भारत में एपिकल इमीग्रेशन एक्सपर्ट्स के डायरेक्टर मनीष श्रीवास्तव चिंतित नजर आते हैं.

बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, "ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट नीति का असर कुछ ही दिनों में दिखाई देने लगेगा, क्योंकि वह बार-बार कह चुके हैं कि अमेरिकी नौकरियों पर पहला अधिकार अमेरिका के लोगों का है."

श्रीवास्तव कहते हैं, "अभी साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) के क्षेत्र में पढ़ाई करने वाले जिन बच्चों को तीन साल तक वर्क वीज़ा मिलता है, वह घटकर एक साल हो सकता है. वहीं सामान्य कोर्स के बाद जो एक साल का वर्क वीज़ा मिलता था, उसे खत्म किया जा सकता है."

उनका कहना है कि ट्रंप के आने के बाद वीज़ा रिजेक्शन रेट बढ़ जाएगा और पहले के मुकाबले कागजों की ज्यादा जांच होगी.

ऐसी ही बात वीज़ा काउंसलर गमनदीप सिंह भी करते हैं. उनका कहना है कि भारत से ज्यादातर बच्चे अमेरिका में बसने के लिए जाते हैं और पढ़ाई तो एक बहाना होता है.

वह कहते हैं, "अगर ओपीटी के तहत मिलने वाले वर्क वीज़ा को लेकर नियम कड़े किए जाएंगे तो हजारों की संख्या में बच्चों को वापस लौटना पड़ेगा और इसमें सबसे ज्यादा मार उन बच्चों पर पड़ेगी जो सामान्य कोर्स कर रहे हैं."

एच1-बी वीज़ा को लेकर मुश्किलें

एच-1बी वीजा के लिए आवेदन करने वाले ज़्यादातर लोग साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग सेक्टर या गणित से जु़ड़े पेशेवर होते हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, एच-1बी वीज़ा के लिए आवेदन करने वाले ज़्यादातर लोग साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग सेक्टर या गणित से जुड़े पेशेवर होते हैं

अमेरिकी एच-1 बी वीज़ा की शुरुआत 1990 में हुई थी. ये कुशल कर्मचारियों को दिया जाता है.

शुरुआत में यह वीज़ा तीन साल के लिए दिया जाता है, लेकिन इसकी अवधि छह साल तक बढ़ाई जा सकती है.

साल 2004 से हर साल जारी होने वाले एच-1 बी वीज़ा की संख्या 85 हजार पर सीमित कर दी गई है.

इनमें से 20 हजार वीज़ा उन विदेशी छात्रों को दिया जाता है जिनके पास अमेरिकी विश्वविद्यालयों की मास्टर या इससे ऊंची डिग्री है.

लेकिन यह वीज़ा तभी मिलता है जब अमेरिका स्थित कंपनियां या दूसरे संस्थान नौकरी का ऑफर दें और खुद स्पॉन्सर बनें.

लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद एच-1 बी वीज़ा को लेकर भारतीय एक्सपर्ट्स चिंताएं जाहिर कर रहे हैं, क्योंकि इस समय सबसे ज्यादा एच-1 बी वीज़ा भारतीयों के पास है.

डोनाल्ड ट्रंप शुरू से एच-1 बी वीज़ा का विरोध करते आए हैं. हालांकि हाल ही में उन्होंने इसका समर्थन भी किया है.

ट्रंप के पहले कार्यकाल में एच-1 बी वीज़ा का रिजेक्शन रेट सबसे ज्यादा था. अक्टूबर 2017 से लेकर सितंबर 2018 के बीच यह रेट 24 फीसदी तक पहुंच गया था.

वहीं इससे पहले के ओबामा प्रशासन के दौरान रिजेक्शन रेट पांच से आठ फीसदी ही था, जो बाइडन प्रशासन के दौरान दो से चार फीसदी रह गया था.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)