डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से क्या रुक जाएगी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जारी जंग?

इमेज स्रोत, Getty Images
बीते हफ़्ते पूरी दुनिया ने जिस ख़बर पर नज़रें जमा रखी थीं, वो था अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव. ऐसा कहा जा रहा था कि चुनाव का फ़ैसला काफ़ी कम अंतर से होगा.
मगर, अंत में रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने आसानी से जीत हासिल कर ली.
अब जबकि डोनाल्ड ट्रंप चुनाव जीत चुके हैं. ऐसे में सवाल ये उठ रहे हैं कि मध्य पूर्व में इसराइल और हमास के बीच और लेबनान में इसराइल और हिज़्बुल्लाह के बीच जो संघर्ष चल रहे हैं, उसका क्या होगा?
ईरान के साथ इसराइल के रिश्तों पर इन नतीजों का क्या असर होगा? रूस और यूक्रेन के बीच जारी लंबे संघर्ष का क्या अंत हो सकता है?
बीबीसी हिन्दी के ख़ास साप्ताहिक कार्यक्रम 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने अमेरिकी चुनाव से जुड़े इन्हीं सवालों पर चर्चा की.
इस चर्चा में अमेरिका और इसराइल में भारत के राजदूत रह चुके अरुण कुमार सिंह, रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ हर्ष पंत और अमेरिका से बीबीसी संवाददाता तरहब असगर और दिव्या आर्य शामिल हुए.

यूक्रेन-रूस और मध्य पूर्व के संघर्ष को कैसे खत्म करेंगे ट्रंप?

इमेज स्रोत, Getty Images
अमेरिकी चुनाव अभियान के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन-रूस और मध्य पूर्व में जारी इन संघर्षों को लेकर कहा था कि अगर वो सत्ता में आए तो ये युद्ध जल्द से जल्द समाप्त हो जाएँगे.
मगर कैसे? इसकी कोई ठोस राह उन्होंने नहीं दिखाई.
इस पर बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य का कहना है, “डोनाल्ड ट्रंप के चुने जाने के बाद ख़ास तौर पर इन दोनों मुद्दों पर चर्चा गर्म है. चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा माना गया कि मध्य पूर्व में जारी संघर्ष और उस पर बाइडन प्रशासन के रवैये के चलते मुसलमानों का वोट डोनाल्ड ट्रंप की ओर झुका.”
उन्होंने कहा, “ट्रंप की रैली में भी मुसलमान नेताओं ने ख़ासतौर पर कहा कि हम डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वो शांति का वादा कर रहे हैं.”
दिव्या आगे कहती हैं, “ये समर्थन तब भी दिया गया जब ट्रंप ने साल 2016 के कार्यकाल में 7 मुस्लिम देशों से मुसलमानों के आने पर प्रतिबंध लगाया था.”
चुनावी अभियान के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने मध्य पूर्व और रूस-यूक्रेन दोनों ही जंग को ख़त्म करने की बात कही थी. ऐसी जंगों में अमेरिका की दखल को भी कम करने की बात उन्होंने कही है.
इस पर दिव्या कहती हैं, “अगर हम उनके पिछले कार्यकाल को देखें तो उन्होंने (डोनाल्ड ट्रंप) इसराइल के साथ अच्छे संबंध बनाए थे. इसराइल के नाखुश होने के कारण ईरान के साथ न्यूक्लियर समझौते को उन्होंने रद्द किया था. इसलिए उनको इसराइल का 'हितैषी' माना जाता है.”
अब ऐसे में देखना होगा कि क्या डोनाल्ड ट्रंप इसराइल को युद्ध खत्म करने के लिए कह पाएंगे और क्या इसराइल उनकी बात मानेगा.
पूर्व राजनयिक अरुण कुमार सिंह का कहना है, “डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में इसराइल को पूरा समर्थन दिया था. उन्होंने इसराइल और फ़लस्तीन के बीच शांति समझौते के लिए एक रूपरेखा तैयार की थी, लेकिन उससे बात नहीं बनी. क्योंकि फ़लस्तीन के लोग जो चाहते थे उसमें उसकी कोई संभावना नहीं थी.”
उन्होंने कहा, “आज की तारीख़ में डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कह दिया है कि बिन्यामिन नेतन्याहू जो चाहते हैं वो उनको करना चाहिए. मुझे नहीं लगता कि डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से गज़ा, हिज़्बुल्लाह को लेकर बिन्यामिन नेतन्याहू पर कोई दबाव होगा.”
नतीजों के बाद मध्य पूर्व को लेकर अमेरिका में क्या चर्चा हो रही है?

इमेज स्रोत, Getty Images
अमेरिकी चुनाव के बाद सभी की नज़रें अब इस चीज़ पर टिकीं हैं कि मध्य पूर्व में जारी संघर्ष को ट्रंप कैसे हल करेंगे.
अमेरिकी मीडिया में इसको लेकर क्या चर्चा है और अमेरिकी लोगों का इस पर क्या रुख़ है. हमने जानने की कोशिश की.
इस पर बीबीसी संवाददाता तरहब असग़र कहती हैं, "अगर मीडिया की बात करें तो ज़्यादातर एनालिसिस के मुताबिक़ अलग-अलग जंगों में अमेरिका जो पैसे दे रहा है उसकी बात की जा रही है कि नेटो का क्या किरदार होगा."
वह कहती हैं, "क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप इस बारे में पहले भी बात कर चुके हैं कि पैसे सिर्फ़ अमेरिका देता रहा है इसलिए बाक़ी देशों को भी इसमें अपना शेयर डालना चाहिए, हम अकेले पैसे नहीं देंगे. वहीं वॉशिंगटन में बहुत सारे लोगों को मानना है कि अमेरिका के लिए ये महंगी जंग नहीं है."
तरहब का कहना है कि वहां इसके साथ ये भी चर्चा तेज़ है कि शायद डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद इसराइल के हवाले से उनका 'टू स्टेट थ्योरी' भी शुरू किया जा सकता है. अब ये सभी चीज़ इस बात पर निर्भर करती है कि सरकार चलाने के लिए किन लोगों की बहाली होती है.
अमेरिकी लोगों से बात करते हुए तरहब ने पाया कि अफ़ग़ानिस्तान युद्ध बेहद लंबा चला जिसकी वजह से यहां के लोग उस चीज़ की बहुत आलोचना करते थे. लोगों का मानना था कि हमारे लोग वहां बेवजह मारे जा रहे हैं.
तरहब बताती हैं, "अभी जो युद्ध चल रहे हैं इसको लेकर लोगों की अलग-अलग राय है. कुछ लोगों का मानना है कि ये युद्ध ख़त्म होना चाहिए. वहीं कुछ लोगों का कहना है कि अमेरिकन फर्स्ट पॉलिसी के मुताबिक़ वहां जो पैसा लगाया जा रहा है वो यहां के लोगों पर लगाया जाए."
वह कहती हैं, "बल्कि बहुत से लोगों का ये भी कहना कि फ्लोरिडा में जो प्राकृतिक आपदाएं आईं वहां पैसे लगाने के बजाए मौजूदा प्रशासन यूक्रेन, इसराइल के युद्ध में पैसे देने में व्यस्त है."
उन्होंने कहा, "लोगों ने इन सब चीज़ों को देखते हुए डोनाल्ड ट्रंप के लिए वोट किया है. क्योंकि उन्होंने शांति की बात की, युद्ध ख़त्म करने को लेकर अपनी स्पष्ट नीति लोगों के सामने रखी."
ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से इसराइल पर किस बात का दबाव?

इमेज स्रोत, Getty Images
रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ हर्ष पंत कहते हैं, “डोनाल्ड ट्रंप को बिन्यामिन नेतन्याहू एक शील्ड की तरह देख रहे हैं. ट्रंप के आने से बाइडन प्रशासन का जो बढ़ता दबाव था वो कहीं ना कहीं कम होगा. लेकिन अभी देखना होगा कि किस तरह का प्रशासन आता है और कौन किस पद पर आता है.”
वह कहते हैं, “इन दो बड़े युद्ध में अमेरिका केंद्र में है. चूंकि ये घरेलू मुद्दों से जुड़े हैं तो ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप के ऊपर भी दबाव होगा कि कैसे इसका समाधान करना है. वहीं नेतन्याहू पर भी इस चीज़ का दबाव है.”
उन्होंने कहा, “हमने देखा कि किस तरह इसराइल ने अपने रक्षा मंत्री को हटाया, जिससे आंतरिक विवाद बढ़ता जा रहा है. उसको लेकर जो आलोचनाएं हो रही हैं वो ज़्यादा दबाव पैदा करेंगी.”
वह कहते हैं, “लेकिन अगर हम डोनाल्ड ट्रंप की पुरानी नीतियों को देखें तो ऐसा लगता है कि नेतन्याहू को कुछ समय ज़रूर दिया जाएगा.”
हर्ष पंत का मानना है कि अगले कुछ महीने बेहद निर्णायक होने वाले हैं कि किस तरह से इस युद्ध को हम समाप्ति की ओर जाता हुआ देखेंगे.
इस पर पूर्व राजनायिक अरुण कुमार सिंह कहते हैं, “लेकिन इसराइल को अब खुद देखना होगा कि युद्ध को एक साल से ज़्यादा का समय हो गया है.”
उन्होंने कहा, “इसराइल की सिविलियन इकोनॉमी और हाईटेक सेक्टर से लोग निकलकर इस युद्ध में लगे हुए हैं. ऐसे में इकोनॉमी को लंबे समय तक बनाए रखना उनके लिए मुश्किल होगा. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की तरफ़ से उनके ऊपर कोई रोक नहीं लगाई जाएगी.”
क्या युद्ध को लेकर ट्रंप अचानक कर सकते हैं फ़ैसला?

इमेज स्रोत, Getty Images
हर्ष पंत का मानना है कि ट्रंप अपनी अस्थिरता को अपनी ताक़त मानते हैं.
हर देश उस चीज़ को अपनी विदेश नीति में शामिल कर रहा होगा कि अगर हम डोनाल्ड ट्रंप के साथ काम करेंगे तो हमेशा एक अस्थिरता जैसा स्थिति बनी रहेगी. ये पता नहीं होगा कि किस परिस्थिति में उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी.
हर्ष पंत कहते हैं, “इस चीज़ को लेकर यूक्रेन और मध्य पूर्व में दोनों जगह परेशानी आएगी कि डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल की नीति वह इस कार्यकाल में बरकरार रहेगी कि नहीं.”
उन्होंने कहा, “लेकिन जहां तक इसराइल का सवाल है, चूंकि इसराइल ने हमेशा से अमेरिका की विदेश नीति में खास किरदार निभाया है और डोनाल्ड ट्रंप की जो व्यक्तिगत वरीयता हमेशा से इसराइल के लिए रही है, उससे कहीं ना कहीं इसराइल को कुछ महीनों का वक्त मिल गया है.”
ईरान के लिए क्या चुनौती?
अरुण कुमार सिंह कहते हैं, “कहना आसान है और करके दिखाना ज़्यादा मुश्किल होता है.”
वो कहते हैं, “2018 में डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के ऊपर पूरा दबाव बनाया था. लेकिन ईरान की नीतियों में कोई बदलाव नहीं आया था. जो ईरान की उस समय की क्षमता थी अब वो उससे आगे बढ़ चुका है.”
उन्होंने कहा, “पहले कहा जाता था कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने में एक साल लगेगा लेकिन अब कुछ हफ़्तों या कुछ महीनों की बात करते हैं. ट्रंप की उस वक्त की नीति से भले ही ईरान के ऊपर आर्थिक दबाव आया लेकिन उनके नीति चयन पर कोई असर नहीं पड़ा था.”
अरुण कुमार सिंह आगे कहते हैं, “हम ये नहीं कह सकते हैं कि वो ईरान की नीति को बदल देंगे लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की नीति रही है ईरान पर दबाव बनाने की. क्योंकि अमेरिका में कुछ समुदाय हैं जो चाहते हैं कि ईरान पर दबाव बनाया जाए.”
उनका मानना है कि ट्रंप प्रशासन के पहले कार्यकाल में फ़लस्तीनी प्रशासन को ज़्यादा महत्व नहीं दिया गया था. और अभी ये दिक्कत है कि फ़लस्तीनियों में भी बंटवारा है.
रूस-यूक्रेन युद्ध को कैसे ख़त्म करेंगे ट्रंप?
बीबीसी संवाददाता असगर का कहना है, “विश्लेषकों के मुताबिक़ रूस-यूक्रेन संघर्ष मध्य पूर्व संघर्ष के मुक़ाबले पहले समाप्ति की ओर जाएगा. क्योंकि वो समझते हैं वहां पर यूक्रेन के हवाले से डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन इस बात से निश्चित है कि चीज़ों को साइड रख कर हमें शांति की ओर इसे लेकर जाना है.”
“ज़्यादातर लोगों का मानना है कि मध्य पूर्व के मुक़ाबले यूक्रेन-रूस का युद्ध का पैमाना ज़्यादा बड़ा नहीं है. इसलिए ये संघर्ष मध्य पूर्व संघर्ष से पहले हल हो सकता है.”
वहीं हर्ष पंत का मानना है कि मध्य पूर्व संघर्ष के मुक़ाबले रूस-यूक्रेन संघर्ष को भी हल करने में बहुत सारी परेशानियां आएंगी.
वो कहते हैं, “ऐसा इसलिए क्योंकि उसका मूलभूत पहलू यूरोपीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है. यूक्रेन जो कि कमज़ोर दल है, जिससे उसको ये भी ख़तरा है कि अगर वो बातचीत के लिए नहीं आएगा तो शायद जो समर्थन अभी उसे मिल रहा है वो मिलना बंद ना हो जाए."
हर्ष पंत आगे कहते हैं, “इन सब चीज़ का प्रभाव सिर्फ़ रूस-यूक्रेन पर नहीं है. रूस के संबंध किस तरह से यूरोपीय संघ के साथ होंगे इस बात पर निर्भर करता है. इसको लेकर अमेरिकी प्रशासन को सोचना होगा कि वो किस तरह के संबंध यूरोप के साथ चाहते हैं. क्योंकि ये सिर्फ यूक्रेन-रूस का मसला नहीं है. लेकिन अगर डोनाल्ड ट्रंप चाहें तो दबाव की रणनीति बनाकर इस संघर्ष को एक हल की ओर पहुंचा सकते हैं.”
इस पर दिव्या कहती हैं, “अगर रूस-यूक्रेन की बात करें तो ये भी सवाल उठता है कि क्या वो पुतिन को इस युद्ध विराम के लिए मना पाएंगे. अगर पुतिन उनकी बात नहीं मानते हैं तो ऐसे में क्या डोनाल्ड ट्रंप और ज़ोर-शोर से यूक्रेन की मदद करेंगे, ये देखना होगा.”
“हालांकि डोनाल्ड ट्रंप की नीति और रवैये से दोनों ही संघर्ष पर भारी असर ज़रूर पड़ेगा.”
अमेरिका के लिए कैसे दिक्कत पैदा करेगा चीन?
अरुण कुमार सिंह बताते हैं कि ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में रूस के साथ संबंध सुधारना चाहते थे, लेकिन यूएस कांग्रेस ने उनका हाथ रोक दिया.
जब वो आगे बढ़ना चाहते थे तो यूएस कांग्रेस ने काउंटरिंग अमेरिकाज़ एडवर्सरीज़ थ्रू सैन्सन्स एक्ट (सीएएटीएसए) को पास किया.
वो आगे कहते हैं, “अगर ट्रंप चाहते हैं कि चीन से मुक़ाबले में अमेरिका जीते तो उन्हें यूरोपीय देशों के सहयोग की ज़रूरत होगी. और अगर यूरोपीय देश देखें कि यूरोप में जो उनकी चिंता है अमेरिका उसपर ध्यान नहीं दे रहा है तो चीन के ख़िलाफ़ अमेरिका का जो मुकाबला है उसमें यूरोपीय देश साथ नहीं देंगे.”
उन्होंने कहा, “क्योंकि जब तक ट्रंप आए थे उस समय तक यूरोपीय देश इंडो पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा समस्याओं पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते थे. सिर्फ चीन के साथ व्यापारिक रिश्ते बनाना चाहते थे.”
वो कहते हैं, “अभी भी जर्मनी जैसे देश नहीं चाहते हैं कि चीन के ऊपर किसी तरह की पाबंदी हो. अगर वो अमेरिका के साथ चीन के संकट में आगे नहीं बढ़ते हैं तो अमेरिका को चीन के ख़िलाफ़ टेक्नोलॉजी या दूसरे तरह की पाबंदी को बरकरार रखने में दिक्कत आएगी.”
अरुण कुमार सिंह बताते हैं कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में अमेरिकी सरकार ने पहली बार ये साफ किया था कि चीन एक कॉम्पटीटर है जिसके ख़िलाफ़ उनको व्यापार और टेक्नोलॉजी को लेकर प्रतिबंध लगाने हैं और बाक़ी देशों के साथ सहयोग बढ़ाना है.
लेकिन आज की तारीख़ में तो उनके आस पास कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने चीन में बहुत ज़्यादा निवेश किया हुआ है. इसमें एक नाम एलन मस्क का भी है.
अरुण सिंह का मानना है कि ऐसे में वो सब ट्रंप पर दबाव बनाने की कोशिश करेंगे कि चीन पर पहले कार्यकाल की तरह पाबंदियां नहीं लगाई जाएं.
ट्रंप के पहले कार्यकाल में उनके साथ काम किए लोगों के आर्टिकल या किताब पढ़ेंगे तो उसमें साफ जाहिर है कि ट्रंप अपनी नीतियां बदलते रहते थे.
इस पर हर्ष पंत कहते हैं, “अगर डोनाल्ड ट्रंप और व्लादिमीर पुतिन की शख़्सियत को देखें तो काफ़ी मिलती-जुलती है. उनमें किसी मुद्दे को डील करने की ख़ासियत है, जिसके लिए ट्रंप जाने जाते हैं.”
उन्होंने कहा, “अभी तक यूक्रेन को लेकर जो चल रहा था कि रूस को पीछे जाना पड़ेगा तभी बात आगे बढ़ेगी. जिस तरह से यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने शांति योजना पेश की थी उसमें रूस कहीं शामिल ही नहीं था. कहीं ना कहीं उस चीज पर ट्रंप के आने से ज़रूर फर्क पड़ेगा. ट्रंप चाहेंगे कि जो पुतिन के साथ उनका व्यक्तिगत समीकरण है वो चमक कर आए.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















