तमिलनाडु सरकार क्या नियंत्रण के नाम पर हड़प रही है मंदिरों का ख़ज़ाना - फ़ैक्ट चेक

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- Author, मुरलीधरन काशीविश्वनाथन
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी तमिल
हाल ही में तेलंगाना के निज़ामाबाद में एक रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तमिलनाडु सरकार पर आरोप लगाया कि वो राज्य के तमाम मंदिरों पर कब्ज़ा करके बैठी है.
भाषण में प्रधानमंत्री ने ये भी सवाल उठाया कि “क्या राज्य सरकार अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों का प्रबंधन अपने हाथ में ले सकती है.”
तेलंगाना में चुनाव नज़दीक आने के साथ ही प्रधानमंत्री का तमिलनाडु के बारे में बोलना कई लोगों को हैरान कर रहा है.
निज़ामाबाद की सभा में में प्रधानमंत्री ने कहा, “दक्षिण में, ख़ासकर तमिलनाडु में, मंदिरों पर सरकार का कब्ज़ा है. सरकार उन्हें अपने नियंत्रण में ले रही है. मंदिर की संपत्तियों को साज़िश के तहत ज़ब्त किया जा रहा है. लेकिन अल्पसंख्यकों के पूजा स्थलों को कोई हाथ भी नहीं लगाता."
"क्या कांग्रेस अपने सहयोगियों से कह सकती है कि ये हालात बदले जाएं. क्या अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों को लोगों के भले के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है?”

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तेलंगाना में रैली, तमिलनाडु से सवाल
तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी और दूसरे हिंदू संगठन लंबे समय से ये मुद्दा उठाते रहे हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भी हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटी एन्डावमेंट बोर्ड (हिंदू धर्मार्थ और चैरिटी बंदोबस्त बोर्ड) के ख़िलाफ़ अपना विरोध दर्ज कराता रहा है.
ये वो संगठन है जो तमिलनाडु के मंदिरों के प्रबंधन की निगरानी करता है.
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी इस बात की वकालत करते रहे हैं कि मंदिरों को सरकार के कब्ज़े से छुड़ाना चाहिए.
साल 2021 में विजयादशमी पर मोहन भागवत ने कहा था, “दक्षिण भारतीय राज्यों के अधिकांश मंदिर सरकारी निगरानी में हैं. उन्हें इससे स्वतंत्र कर देना चाहिए.”
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव एच राजा और आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव ने भी मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने की बात कही.
लेकिन 2021 में डीएमके के राज्य की सत्ता में आने के बाद से इस बहस में थोड़ी कमी आई.
डीएमके ने दावा किया कि राज्य सरकार की निगरानी में सभी मंदिरों का प्रबंधन सुचारू रूप से चल रहा है. साथ ही हिंदू धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के अधीन आने वाले सभी मंदिरों में सरकार ने सभी जातियों के पुजारी नियुक्त करने की पहल की.
हाल ही में सरकार द्वारा संचालित वेदा ट्रेनिंग सेंटर से तीन महिला पुजारियों ने अपनी शिक्षा भी पूरी की.

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पीएम नरेंद्र मोदी के दावे में कितना दम?
प्रधानमंत्री के आरोपों और मंदिरों को लेकर उनके दावे को समझने से पहले ये जानते हैं कि तमिलनाडु में 'हिंदू रिलीजियस एंडॉवमेंट्स एक्ट' बना क्यों?
ये क़ानून आज़ादी से पहले का है. तब कई हिंदुओं ने आरोप लगाया था कि मंदिरों की संपत्ति को प्रभावशाली लोग लूट रहे हैं और सरकार को इसमें दख़ल देना चाहिए.
इस क़ानून के मुताबिक कोई भी सरकार मंदिरों का पैसा अपनी इच्छानुसार खर्च नहीं कर सकती.
मंदिरों की आमदनी संबंधित देवताओं के नाम पर बैंक में जमा की जाती है. पैसा कैसे खर्च किया जाए इसे लेकर भी नियम बहुत विस्तार से और साफ़ साफ़ बताए गए हैं.
सबसे पहले पैसा मंदिर के प्रशासनिक खर्च के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
इसके बाद जो पैसा बचता है उसका क्या इस्तेमाल करना है इसके लिए भी नियम बनाए गए हैं.
बड़े मंदिरों के दानपात्र में जमा पैसे से छोटे मंदिरों की मरम्मत और रखरखाव किया जा सकता है. इस पैसे को ग़रीबों को खाना खिलाने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
कई मंदिर अपने पैसों से शैक्षणिक संस्थान भी चलाते हैं. इन पैसों से आम लोगों के लिए अस्पताल भी खोले जा सकते हैं.
क़ानून के एक प्रावधान के मुताबिक़ कुष्ठ रोगियों की देखभाल और वृद्धाश्रम चलाने में भी मंदिरों का पैसा इस्तेमाल किया जा सकता है.

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तमिलनाडु के मंदिरों का पैसा सरकार की जेब में?
हिंदू धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग के पूर्व अधिकारी सी जयारमन कहते हैं कि मंदिरों की ज़मीन या श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर को दान की गई राशि सरकार ले ही नहीं सकती.
जयारमन कहते हैं, "मंदिरों के ख़ज़ाने से रुपये लेने के आरोप लंबे समय से लगते आ रहे हैं. ये आरोप आधारहीन हैं, क्योंकि सच्चाई यह है कि श्रद्धालुओं का चढ़ाया हुआ रुपया-पैसा सबकी मौजूदगी में गिना जाता है. इसके बाद गिनी हुई रक़म को मंदिरों के बैंक खाते में जमा कराया जाता है. आजकल तो बैंक अधिकारी खुद ही मंदिर आते हैं और पैसे लेकर सीधे मंदिर के खाते में जमा करते हैं.’’
जयारमन के मुताबिक, सरकार भले ही आम नागरिकों की ज़मीन का अधिग्रहण कर ले, लेकिन वो मंदिरों की ज़मीन नहीं ले सकती. अगर सरकार मंदिर की ज़मीन का इस्तेमाल किसी जनकल्याण कार्य के लिए करना चाहती है, तो इसके लिए उसे मंदिर ट्रस्ट और सदस्यों की मंजूरी लेनी पड़ती है. इसके लिए नियम ये तय है कि सरकार मंदिर के ज़मीन की कीमत बाजार भाव से ढाई गुना ज्यादा देगी.
जयारमन आगे बताते हैं, "मंदिरों की ज़मीन-जायदाद किराए या लीज़ पर लेने के लिए तमाम नियम बनाए गए हैं. इसलिए ये कहना गलत होगा कि सरकार अपनी कल्याणकारी योजनाओं के लिए मंदिरों से पैसे ले रही है.’’
जयारमन के मुताबिक राज्य सरकार ‘हिंदू बंदोबस्ती विभाग’ का खर्च चलाने के लिए जनता के टैक्स के पैसों का इस्तेमाल नहीं कर सकती है. इसलिए मंदिर ट्रस्ट खुद ही अपनी सालाना आमदनी पर 7 से 14 फीसदी के हिसाब से सरकार को टैक्स दे देते हैं.
जयारमन इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि हिंदू मंदिर बंदोबस्ती एक्ट 1959 के तहत किसी भी मंदिर का बैंक में कोई फिक्स डिपॉजिट नहीं होता था. लेकिन आज राज्य के मंदिरों के हजारों करोड़ रुपये बैंकों में फिक्स डिपॉजिट हैं. ये मुमकिन हुआ सिर्फ सरकार की देखरेख में काम करने की वजह से.
कैसे संचालित होता है ‘हिंदू धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग’ ?
ऐसा नहीं कि हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती विभाग के संचालन में कोई ख़ामी नहीं. जयारमन इनकी तरफ भी इशारा करते हैं.
जयारमन बताते हैं, "बड़ी खामी ये है कि कई मंदिरों में पिछले एक दशक से ट्रस्टी ही नियुक्त नहीं किए गए. कुछ मंदिरों में अगर नियुक्त भी किए गए हैं, तो उनमें सिर्फ एक ही ट्रस्टी है, जिन्हें ठक्कर कहा जाता है. ये गलत है. अगर मंदिर में पूरी संख्या के साथ ट्रस्टी बोर्ड बना दिया जाए, तो इतने सारे गलत आरोप लगने बंद हो जाएंगे. सरकार को ये फौरन करना चाहिए.’’
जयारमन ये भी कहते हैं कि मंदिर में किसी ट्रस्टी का कार्यकाल खत्म होने की स्थिति में उसकी जगह नए ट्रस्टी को नियुक्त करने की समयसीमा तय की जानी चाहिए. कई लोगों को ये भी शिकायत रहती है कि जिन मंदिरों में ट्रस्टी नहीं है, उनकी जगह प्रशासन के लोग मंदिरों से जुड़े फैसले लेते हैं.
कई जगहों पर ये भी शिकायत मिली है कि बिना ट्रस्टी वाले मंदिर सरकारी अधिकारियों को मंदिर के पैसे से सुविधाएं मुहैया कराते हैं.

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दूसरे राज्यों की स्थिति क्या है?
जयारमन उन आरोपों को भी गलत बताते हैं, जिनमें कहा जाता है कि सरकार हिंदू मंदिरों को नियंत्रित करती है, लेकिन दूसरे धर्म के पूजास्थलों को छोड़ देती है.
जयारमन के मुताबिक मुस्लिम पूजा स्थलों की देखभाल के लिए वक्फ बोर्ड पूरे देश में लंबे समय से काम कर रहा है.
इसी तर्ज़ पर तमिलनाड में हिंदू धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग बनाया गया है, जो मंदिरों की देखभाल करती है. इसी तरह की व्यवस्था आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक में भी की गई है.
देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में ‘चार-धाम देवस्थानम बोर्ड एक्ट’ पास किया गया था, जिसके ज़रिए कुछ मंदिरों के प्रबंधन की व्यवस्था की गई थी. हालांकि इस एक्ट को पुजारियों के विरोध के बाद 2021 में वापस ले लिया गया था.
इससे पहले 1960 में हिंदू धार्मिक दान आयोग बनाया गया था. इसके चेयरमैन थे सी.पी. रामास्वामी.
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया था कि मंदिरों की बेहतर देखभाल के लिए सरकार की निगरानी ज़रूरी है.
आज की तारीख़ में हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती विभाग के तहत 38,635 हिंदू धार्मिक संस्थान आते हैं, जिनमें 36,595 हिंदू मंदिर हैं. इसके तहत 17 जैन मंदिरों को भी नियंत्रित किया जाता है.
हालांकि तमिलनाडु में अब भी हज़ारों ऐसे मंदिर हैं, जो हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती विभाग की निगरानी से बाहर हैं. ऐसे में ये ज़रूरी हो जाता है कि ऐसे मंदिर भी अपने सालाना खर्चों का ब्योरा बंदोबस्ती विभाग को देकर अपनी जवाबदेही बहाल रखें.

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पीएम के बयान पर क्या बोले तमिलनाडु के मंत्री
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में ये कह तो दिया कि तमिलनाडु सरकार के नियंत्रण की वजह से मंदिरों की हालत यहां बेहद खराब है. लेकिन तमिलनाडु के हिंदू धार्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के मंत्री शेखर बाबू इस तरह के आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं
बीबीसी से शेखर बाबू ने कहा, "बीजेपी शासित कई राज्यों में हिंदू मंदिर सरकार के नियंत्रण में हैं. हमारी सरकार ने ना तो किसी मंदिर के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण किया और ना ही हम इनके ख़ज़ाने का इस्तेमाल करते हैं. राज्य में सभी मंदिरों का प्रबंधन बंदोबस्ती विभाग के ज़रिए बेहतर तरीके से किया जा रहा है.’’
शेखर बाबू ने मंदिरों को लेकर पीएम मोदी के आरोपों की टाइमिंग पर भी सवाल खड़े किए.
उन्होंने कहा, ''आखिर 9 साल से राज कर रहे पीएम मोदी को अचानक ही तमिलनाडु के मंदिरों की याद कैसे आ गई? अगर कोई समस्या उन्हें दिखती है, तो साफ साफ बतानी चाहिए. हमारी सरकार उसका निदान करेगी.''
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