बीजेपी ने डिब्रूगढ़ सीट पर केंद्रीय मंत्री का टिकट काटकर सर्बानंद सोनोवाल को क्यों उतारा?

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, डिब्रूगढ़, असम से
असम की 82 साल की गुनेश्वरी सोनोवाल उन चंद लोगों में शामिल हैं, जिन्हें केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने एक चुनावी सभा में मंच पर बुलाया और उनसे आशीर्वाद लिया.
कमर में दिक़्क़त के कारण झुक कर चलने वाली गुनेश्वरी उसी सोनोवाल कछारी जनजाति से हैं जिससे सर्बानंद सोनोवाल का नाता है.
एनएसजी कमांडो वाली वीवीआईपी सुरक्षा घेरे में रहने वाले सर्बानंद अपनी चुनावी सभाओं में बुजुर्गों के पैर छूते हैं, बिहू नृत्य करने वाले कलाकारों के साथ ताल मिलाते हैं और चाय जनजाति समुदाय के लोगों से जुड़ने के लिए उनकी भाषा में बात करते हैं.
दरअसल बीजेपी ने इस बार सर्बानंद सोनोवाल को डिब्रूगढ़ लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार बनाया है. इस सीट पर 2014 से केंद्रीय मंत्री रामेश्वर तेली जीतते आ रहे थे. लेकिन बीजेपी ने इस बार चाय जनजाति समुदाय से आने वाले रामेश्वर तेली का टिकट काट दिया.
राजनीति को समझने वाले लोग बीजेपी के इस फ़ैसले को तेली के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का नतीजा बताते हैं, हालांकि तेली चुनाव प्रचार में सर्बानंद के साथ लगातार दिख रहे हैं.

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सोनोवाल कछारी जनजाति की तकलीफ़ें
डिब्रूगढ़ शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर जोकाइ कोलियानी गांव की रहने वाली गुनेश्वरी ने जिस उत्साह के साथ सर्बानंद से मुलाकात की, उसे देखकर कोई अनुमान नहीं लगा सकता कि वो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कई बुनियादी परेशानियों से गुजरती हैं.
जोकाइ कोलियानी गांव तक जाने वाली सड़क से करीब दो सौ मीटर एक कीचड़ से भरे रास्ते से होते हुए हम गुनेश्वरी के घर पहुंचे.
टीन की छत और मिट्टी की फर्श वाले घर में रहने वालीं गुनेश्वरी की बदहाली का अंदाज़ा यहां आए बगैर नहीं लगाया जा सकता. उनके दो बेटे दिहाड़ी मजदूर हैं और 21 साल का पोता भी अब मजदूरी करता है.
सर्बानंद सोनोवाल के साथ हुई मुलाकात पर गुनेश्वरी कहती हैं, "सर्बानंद हमारी जनजाति से है, इसलिए उनकी चुनावी सभा में गई थी. मैं उन्हें अपनी तकलीफ़ बताना चाहती थी लेकिन मंच पर भीड़ के कारण कुछ बोलने का मौका नहीं मिला."
वो कहती है, "सर्बानंद मोदी सरकार में दो बार मंत्री बने लेकिन प्रधानमंत्री आवास योजना का घर हमें अभी तक नहीं मिला. घर से सड़क तक जाने वाले कच्चे रास्ते में बारिश के समय कीचड़ भर जाता है.सरकार ने एक छोटा शौचालय ज़रूर बनाकर दिया है लेकिन कमर झुकी होने के कारण उसके अंदर बैठने में तकलीफ़ होती है."

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इस गांव में सोनोवाल कछारी जनजाति के करीब 160 घर हैं.
इसी गांव में रहने वाले 81 साल के शांतिराम सोनोवाल ने सर्बानंद की चुनावी सभा वाले दिन उनके स्वागत में अपनी जनजातीय पोशाक पहनकर बड़े उत्साह के साथ मृदंग (वाद्य यंत्र) बजाया था. लेकिन शांतिराम भी अपनी परेशानियां गिनाते हुए नहीं थकते.
वो कहते हैं, "हम खेती पर निर्भर हैं लेकिन बंदरों के उत्पात से हमें आधी फसल भी नहीं मिल पाती. एक बेटा नाई की दुकान चलाता है और एक बेटा स्कूल में चौकीदार है. इस महंगाई में परिवार को चलाना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है. हमने कांग्रेस, असम गण परिषद और बीजेपी सबको देखा लेकिन मदद के नाम पर कुछ नहीं मिला. ढाई सौ रुपए वृद्धावस्था पेंशन मिलती है, उससे दो दिन की दवा तक नहीं खरीद पाता हूं."
हालांकि शांतिराम इस बात को मानते हैं कि बीजेपी सरकार ने उनके गांव में एक मॉडल अस्पताल और पक्की सड़क बनाई है.

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चाय जनजाति के वोटरों की निर्णायक भूमिका
डिब्रूगढ़ लोकसभा सीट पर चाय जनजाति के मतदाताओं का दबदबा रहा है.
इस संसदीय सीट पर करीब 16 लाख 50 हज़ार मतदाता हैं जिनमें साढ़े छह लाख के आस-पास चाय जनजाति के वोटर हैं और करीब डेढ़ लाख सोनोवाल कछारी जनजाति के मतदाता हैं.
डिब्रूगढ़ के जामीरा चाय बागान में 250 रुपए में दिहाड़ी मजदूर का काम करने वाली रूपा बावरी चुनाव को लेकर ज़्यादा उत्साह नहीं दिखातीं.
चाय जनजाति समुदाय से आने वाली रूपा कहती हैं, "चुनाव के समय सभी नेता बागान में आते हैं और वादे करके चले जाते है. हमें पीने का साफ़ पानी अब तक नहीं मिला है. नल का कनेक्शन लगा दिया है लेकिन पानी कब मिलेगा, कोई नहीं बताता."
मौजूदा सांसद रामेश्वर तेली के बारे में पूछने पर वो कहती हैं, "मैंने रामेश्वर तेली को कभी नहीं देखा. हमारे बाप-दादा मजदूर थे और हमें भी चाय बागान में मजदूरी करके ही पेट पालना पड़ेगा.चाय जनजाति का व्यक्ति मंत्री-विधायक बन जाए तब भी कुछ नहीं बदलेगा. इस महंगाई मे ढाई सौ रुपए की दिहाड़ी से क्या जीवन बदल सकता है?"

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असम चाय जनजाति छात्र संघ ने भी डिब्रूगढ़ सीट से सांसद रामेश्वर तेली को उम्मीदवारी का विरोध किया था.
चाय जनजाति छात्र नेता बिमल बाग ने कहा, "रामेश्वर तेली पिछले 10 साल के कार्यकाल में चाय जनजाति समुदाय के मुद्दों को संसद में उठाने में विफल रहे हैं. हमारे समुदाय से होने के बावजूद तेली ने एसटी दर्जे, भूमि पट्टा समेत कई अन्य ज्वलंत मुद्दों पर एक आवाज़ तक नहीं उठाई."
वरिष्ठ पत्रकार अभीक चक्रवर्ती कहते है, "चाय समुदाय के मतदाताओं में बीजेपी की अच्छी पकड़ है और सर्बानंद यहां के स्थानीय नेता है. इसलिए रामेश्वर तेली के टिकट काटने से बीजेपी को कुछ ख़ास नुकसान नहीं होगा."
"पिछले कुछ सालों में चाय जनजाति के बीच तेली की छवि कमजोर हुई है. क्योंकि वे अपने क्षेत्र में सांसद पूंजी को ही पूरी तरह ख़र्च नहीं कर पाए.सर्बानंद का राज्यसभा सांसद के तौर पर अभी तीन साल का कार्यकाल बचा हुआ था, फिर भी बीजेपी ने उन्हें यहां से खड़ा किया है."

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सर्बानंद के भाषण में 'जाति, माटी, भेटि' का ज़िक्र नहीं
2016 में जब बीजेपी ने असम में पहली बार अपनी सरकार बनाई थी तो सर्बानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री बने थे.
उस दौरान चुनाव प्रचार में सर्बानंद ने असमिया लोगों की पहचान और सुरक्षा के लिए 'जाति, माटी, भेटि' अर्थात समुदाय, भूमि और आधार का नारा लगाया था. लेकिन अब वो इस नारे को नहीं दोहराते. वो अपने चुनावी भाषण में ज्यादातर प्रधानमंत्री मोदी की योजनाओं की ही बात करते हैं.
डिब्रूगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार राजीव दत्ता असम में नागरिकता संशोधन बिल को लेकर 2019 में हुए आंदोलन को सर्बानंद की छवि से जोड़ते हैं.
वो कहते हैं, "2005 में आईएमडीटी अर्थात अवैध प्रवासी (निर्धारण) अधिनियम 1983 को खत्म करने के लिए सर्बानंद ने सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ी थी उसके बाद असम की राजनीति में न केवल उनकी अहमियत बढ़ी बल्कि उनको जातीय नायक के तौर पर देखा जाने लगा. लेकिन 2019 में नागरिकता संशोधन बिल के ख़िलाफ़ जो व्यापक आंदोलन हुआ उससे उनकी छवि को धक्का लगा है. विरोधी दल के लोग सर्बानंद पर असमिया जाती के संकट के दौरान चुप्पी साधने के आरोप लगाते हैं."

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पत्रकार दत्ता के अनुसार, डिब्रूगढ़ सीट पर अब तक ज्यादातर चाय जनजाति के नेता ही जीतते रहे हैं लेकिन रामेश्वर तेली ने बीते 10 साल में इस संसदीय क्षेत्र में कुछ ख़ास काम नहीं किया.
चाय जनजाति के मतदाताओं में भी उनके खिलाफ नाराज़गी खुलकर सामने आने लगी थी. अगर बीजेपी तेली को खड़ा करती तो यह सीट उनके हाथ से निकलने की संभावना थी. लिहाजा बीजेपी ने सर्बानंद सोनोवाल को यहां से टिकट देकर उनकी घर वापसी की है.
2004 में डिब्रूगढ़ सीट से सर्बानंद सोनोवाल क्षेत्रीय पार्टी असम गण परिषद की टिकट पर सांसद चुने गए थे. सर्बानंद ने उस समय बीजेपी उम्मीदवार कामाख्या प्रसाद तासा को हराया था.
लेकिन 2009 में सोनोवाल यहां हार गए. चाय जनजाति से आने वाले वरिष्ठ कांग्रेस नेता पवन सिंह घटवार यहां से फिर सांसद चुने गए.
साल 1991 से 1999 के बीच डिब्रूगढ़ सीट पर हुए चुनाव में पवन सिंह घटवार ने लगातार जीत दर्ज की थी. लेकिन राज्य में बीजेपी का शासन आने के बाद से चाय जनजाति का झुकाव बीजेपी की तरफ़ दिखा.

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सर्बानंद के मुख्य प्रतिद्वंद्वी उठा रहे हैं सीएए का मुद्दा
61 साल के सर्बानंद सोनोवाल के सामने असम जातीय परिषद (एजेपी) के 44 वर्षीय लुरिनज्योति गोगोई मैदान में हैं. लुरिनज्योति कांग्रेस के नेतृत्व में बने संयुक्त विपक्षी मंच, असम की ओर से समर्थित उम्मीदवार हैं.
सर्बानंद और लुरिनज्योति दोनों असम के सबसे प्रभावशाली छात्र संगठन ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन से निकले हुए राजनेता हैं. 2019 में नागरिकता संशोधन बिल के ख़िलाफ़ आंदोलन में लुरिनज्योति राज्य का एक मुख्य चेहरा बनकर उभरे थे और उन्होंने बाद में एजेपी नाम से एक क्षेत्रीय पार्टी बनाई.
पत्रकार राजीव दत्ता कहते हैं, "एक जमाने में चाय जनजाति के लोग कांग्रेस के पारंपरिक वोटर हुआ करते थे लेकिन अब चाय बागानों में बीजेपी का दबदबा है. लिहाजा कांग्रेस ने डिब्रूगढ़ सीट पर अपना उम्मीदवार उतारने की बजाए लुरिनज्योति को समर्थन दिया है ताकि वो सीएए के मुद्दे पर सोनोवाल पर हमला कर सके. अगर सीएए का मुद्दा चुनाव में क्लिक होता है तो कांग्रेस को इसका फ़ायदा ऊपरी असम की और चार सीटों में मिलेगा."
असम के जाने-माने लेखक और साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता डॉ. नगेन सैकिया बीजेपी की आक्रामक राजनीति को असमिया समुदाय के लिए अच्छा नहीं मानते.
डा.सैकिया के अनुसार, पिछले 10 सालों में बीजेपी की हिंदुत्व की राजनीति ने असमिया समुदाय के जातीय मूल्यों को बहुत नुकसान पहुंचाया है.
लेकिन सर्बानंद सोनोवाल के बारे में वो कहते है, "बीजेपी के अन्य नेताओं की तरह सर्बानंद किसी के ख़िलाफ़ अपमानजनक बयानबाजी नहीं करते. असमिया समाज में सर्बानंद की स्वीकार्यता को बीजेपी भी जानती है. लिहाजा सीएए को लेकर जो लोग नाराज हैं उसका असर मतदान पर शायद ही पड़ेगा."
आम आदमी पार्टी ने डिब्रूगढ़ से चाय जनजाति के नेता मनोज धनोवार को मैदान में उतारा है.
कांग्रेस छोड़कर आप में शामिल हुए 48 साल के मनोज कहते हैं, "पिछले 10 सालों में बीजेपी सरकार ने हमारे लोगों को ठगा है. हम दिल्ली के तर्ज पर विकास का मॉडल लेकर लोगों के बीच चुनावी प्रचार कर रहे हैं."
हालांकि राजनीतिक टिप्पणीकारों का कहना है कि डिब्रूगढ़ सीट पर मुक़ाबला सर्बानंद और लुरिनज्याति के बीच होने की उम्मीद है.
असम की कुल 14 लोकसभा सीटों में जिन पांच सीटों पर पहले चरण के तहत 19 अप्रैल को मतदान होने है उनमें डिब्रूगढ़ भी एक है.
(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित)
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