क्या आप खाने का पैकेट ख़रीदने से पहले उसे पढ़ते हैं?

खाने का पैकेट

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    • Author, पायल भुयन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

खाने-पीने की चीज़ों का कोई पैकेट ख़रीदने से पहले आप कितना समय उस पर लिखी चीज़ों को पढ़ने में लगाते हैं?

अगर आप किसी चिप्स के पैकेट से चिप्स खाएं तो क्या आपको अंदाज़ा रहता है कि उसमें कितना फै़ट और कितना कार्बोहाइड्रेट था?

इन सवालों का जवाब शायद आपके पास नहीं होगा.

बाज़ार में प्रोसेस्ड और अल्ट्रा प्रोसेस्ड पैकेट वाले खाने की भरमार है. ऐसे में किसी भी इंसान के लिए इतने सारे विकल्पों में से एक सही विकल्प चुनना आसान नहीं है.

चर्चित मेडिकल जर्नल लैंसेट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, देश के शहरी और ग्रामीण इलाक़ों में ली जा रही कुल कैलोरी का औसतन 10 फ़ीसदी अल्ट्रा प्रोसेस्ड फ़ूड के ज़रिए पहुंच रहा है.

आर्थिक रूप से बेहतर शहरी परिवारों में ये बढ़कर 30 प्रतिशत तक पहुँच चुका है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में प्रोसेस्ड फ़ूड का खुदरा बाज़ार 2021 में 2535 अरब रुपये तक पहुँच चुका था.

आंकड़े

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वहीं, मार्केट रीसर्च कंपनी यूरोमॉनिटर के डेटाबेस के मुताबिक़, भारत में अल्ट्रा प्रोसेस्ड फ़ूड की बिक्री में छोटे किराना दुकान के विक्रेता सबसे आगे हैं.

साल 2021 के आँकड़े बताते हैं कि नमकीन स्नैक्स की सबसे ज़्यादा बिक्री स्वतंत्र छोटे किराना विक्रेताओं की ओर से ही की गई.

ग्राफ़

उत्तराखंड के ऋषिकेश स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में सामुदायिक और पारिवारिक चिकित्सा विभाग में एडिशनल प्रोफ़ेसर, डॉक्टर प्रदीप अग्रवाल बताते हैं कि पिछले दो दशक से भारत में नॉन कम्यूनिकेबल डिज़ीज, जैसे कि मोटापा, हाइपरटेंशन, मधुमेह से पीड़ित लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा बढ़ी है और इसका कारण पैक्ड प्रोसेस्ड फ़ूड है, जिसका चलन शहरों के साथ-साथ ग्रामीण इलाक़ों में भी बढ़ा है.

वो कहते हैं, ''पिछले कई सालों में लोगों के रहन-सहन में बदलाव आया है. इन वर्षों में पैक्ड प्रोसेस्ड खाना हमारे जीवन का हिस्सा बनता चला गया. ये खाना आपको तुरंत ऊर्जा तो देता है लेकिन इसमें पोषक तत्वों की कमी होती है. इन चीज़ों में मीठा, नमक और एम्पटी कैलरी की मात्रा ज़्यादा होती है.’’

एम्पटी कैलरी उन खाद्य पदार्थों से मिलती है, जिन खानों में पोषक तत्व न के बराबर होते हैं.

बेकरी

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क्यों ज़रूरी है खाने के पैकेट पर लिखी चीज़ों को पढ़ना

फ़ूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (पैकेजिंग और लेबलिंग) रेगुलेशन, 2011 के मुताबिक़, भारत में बिकने वाले हर प्री-पैक्ड प्रोसेस्ड फ़ूड के पैकेट पर उसके पौष्टिक तत्वों की पूरी जानकारी होनी चाहिए.

एफ़एसएसएआई का मानना है कि ये जानकारी उपभोक्ता को कोई भी खाने का पैकेट ख़रीदने से पहले एक जागरूक फ़ैसला लेने में मदद करती है.

दरअसल, ये इसलिए ज़रूरी है क्योंकि पैकेज्ड फ़ूड इंडस्ट्री पर ये आरोप लगते रहे हैं कि वो ऐसे खाद्य पदार्थों को बढ़ावा देती है, जिनमें चीनी, नमक, वसा (फ़ैट) की मात्रा तय सीमा से बहुत ज़्यादा रहती है.

सवाल ये है कि जब खाद्य पदार्थों की जानकारी पीछे दी गई है तो फिर सामने की ओर लिखने की क्या ज़रूरत है?

दरअसल, भारत की एक बड़ी आबादी ऐसी है जो हिंदी या अंग्रेज़ी में लिखी चीज़ों को नहीं पढ़ सकती.

साथ ही, बहुत बार लोगों की ये शिकायत भी रहती है कि पैकेट पर जो लिखा है उसका साइज़ बहुत छोटा होता है.

इस वजह से वह नज़र नहीं आता. इसलिए, एक ऐसी प्रणाली की ज़रूरत है जिसे कोई भी इंसान समझ पाए, चाहे उसे पढ़ना आता हो या नहीं.

लेबल

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क्या है फ़्रंट ऑफ़ पैक लेबलिंग

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उपभोक्ता पौष्टिक खाने के विकल्पों को चुन सकें, इसके लिए लंबे समय से फ़्रंट ऑफ़ पैक लेबलिंग सिस्टम को बढ़ावा देने की बात हो रही है.

इसे ऐसे समझिए, जैसे आप किसी सिगरेट के पैकेट को देखें तो उस पर ऐसी तस्वीर और चेतावनी होती है, जिससे ग्राहक उसे ख़रीदने से पहले सोचे. फिर ये ग्राहक पर निर्भर है कि वो उसे ख़रीदे या नहीं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, ''फ़्रंट ऑफ़ पैक लेबलिंग ऐसी की जानी चाहिए, जो उपभोक्ता को एक ही नज़र में दिखे, जिसे समझना आसान हो और इसे ग्राफ़िक्स की तरह दिखाया जाए. इस पैकेजिंग में वो जानकारी हो जो पैकेट के पीछे दी गई जानकारी से मेल खाती हो.''

एफ़एसएसएआई ने साल 2014 में खाने के पैकेट्स पर एक ऐसे लेबलिंग सिस्टम का प्रस्ताव दिया था, जो मौजूदा नियम को और दुरूस्त बना सके. ये सिफ़ारिश एफ़एसएसएआई की ओर से बनाई गई एक विशेषज्ञ समिति की ओर से की गई थी.

इस मुद्दे पर कई वर्षों से अलग-अलग स्तर पर परामर्श चल रहे हैं. जहां पैकेट फ़ूड इंडस्ट्री इस पर हामी नहीं भर रही है, वहीं स्वास्थ्य विशेषज्ञ सख़्त से सख़्त मानदंडों की मांग कर रहे हैं.

खाने का पैकेट

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क्या है इंडियन न्यूट्रिशन रेटिंग मॉडल?

साल 2022 सितंबर में एफ़एसएसएआई ने 'फ़्रंट ऑफ़ पैक लेबलिंग' का एक मसौदा पेश किया था.

इस ड्राफ़्ट में इंडियन न्यूट्रिशन रेटिंग मॉडल को लाने का प्रस्ताव रखा गया था. अगर किसी खाने में पोषक तत्व ज़्यादा हैं तो उसे 5 रेटिंग मिलेगी.

अगर किसी में कम है तो उसकी रेटिंग घट जाएगी. लेकिन किसी को भी आधे से कम स्टार नहीं दिया जा सकेगा. ये मसौदा इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट अहमदाबाद की ओर से की गई स्टडी पर आधारित था.

कंज़्यूमर राइट एक्टिविस्ट और सिटिज़न कंज़्यूमर एंड सिविक एक्शन ग्रुप की एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर, एस. सरोजा कहती हैं, ''हम स्टार रेटिंग की बजाए स्पष्ट वॉर्निंग लेबल्स की मांग कर रहे हैं.''

वो कहती हैं, ''पैकेट पर ऐसे लेबल्स हों, जिन्हें हर कोई आसानी से समझ सके. चाहे उसे पढ़ना आता हो या नहीं. चाहे वो अंग्रेज़ी बोलता हो या हिंदी. हम चाहते हैं कि इसे बहुत आसान रखा जाए.''

वो बताती हैं, ''फ़्रंट ऑफ़ पैक लेबलिंग पर एफ़एसएसएआई की जो बैठक हुई थी, उसमें एफ़एसएएआई की तरफ़ से स्टार रेटिंग की बात कही गई थी. यानी आधे स्टार से लेकर 5 स्टार. इसका मतलब ये हुआ कि अगर किसी को 5 स्टार मिलते हैं तो वो बहुत हेल्दी है लेकिन किसी को आधा स्टार मिलता है तो वो कम हेल्दी है.''

''लेकिन इस रेटिंग सिस्टम में हमें जो समस्या लगी, वो ये कि आप किसी को आधे से कम स्टार नहीं दे सकते. स्टार का मतलब हुआ कि सभी चीज़ों में कुछ ना कुछ अच्छा है. जबकि ये बात सच नहीं है.''

एस. सरोजा

सरकार के सामने मसौदा पेश करने से पहले एफ़एसएसएआई ने जनता की राय जाननी चाही. इसके लिए उसने 2022 नवंबर में इस मसौदे को सार्वजनिक किया. इस मसौदे पर काफ़ी बहस हुई.

पब्लिक हेल्थ प्रोफ़ेशनल्स ने इसकी काफ़ी आलोचना की. उन्होंने आई एन आर सिस्टम में एजुकेशनल कंपोनेंट जोड़ने का आग्रह किया, जो ग़ायब था.

डॉक्टर प्रदीप अग्रवाल कहते हैं, ''औसतन एक इंसान कोई भी खाने का पैकेट ख़रीदने से पहले 7 से 8 सेकेंड लगाता है. हमें इन 7 से 8 सेकेंड में पढ़े जाने वाला एक ऐसा फ़्रंट ऑफ़ पैक लेबल बनाना होगा, जो स्पष्ट तौर पर समझा पाए कि हम उसे ख़रीदें या नहीं.''

''इसमें दो चीज़ें हैं- पहली तो वो आसानी से समझ आनी चाहिए और दूसरी वो साइन लैंग्वेज में हो. हमें अपने देश की विविधता को ध्यान में रख कर फ़्रंट ऑफ़ पैक लेबलिंग का चयन करना होगा.''

लेकिन कई विशेषज्ञ पैनल की सिफारिशों और मसौदा नियमों के बाद भी भारत में अभी भी पैकेट के सामने की ओर एक स्पष्ट लेबलिंग या फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग प्रणाली पर सहमति नहीं बन पाई है.

डॉ. प्रदीप अग्रवाल

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किन देशों में है फ़्रंट ऑफ़ पैक लेबलिंग सिस्टम?

लैंसेट में छपी एक लेख के मुताबिक़ फ़्रंट ऑफ़ पैक लेबल्स को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है.

  • 'नॉर्डिक की होल लोगो' और 'हेल्थियर चॉइस लोगो'
  • वॉर्निंग लेबल्स
  • स्पेक्ट्रम लोगो

'नॉर्डिक की होल लोगो' उत्तरी यूरोपीय देशों में लागू है. 'हेल्थकेयर चॉइस लोगो' सिंगापुर में लागू है. ये दोनों प्रकार के लोगो फ़ूड इंडस्ट्री को ज़्यादा स्वीकार्य हैं क्योंकि ये पैक्ड खाने को सकारात्मक तरीके से पेश करते हैं.

ये लेबलिंग ग्राहकों को स्पष्ट तौर पर ये नहीं बता पाती हैं कि इन पैकेट्स का खाना पौष्टिक है या नहीं.

एफ़ओपीएल की दूसरी श्रेणी वॉर्निंग लेबल्स की है. ये लेबलिंग सिस्टम चिली और मेक्सिको में लागू है. वॉर्निंग लेबल्स पैकेट में मौजूद खाने की ऐसी चीज़ को साफ़ तौर पर दर्शाते हैं, जो उसमें तय सीमा से ज़्यादा हैं और हमें उनका नियमित तौर पर सेवन नहीं करना चाहिए.

लेबलिंग

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तीसरी श्रेणी स्पेक्ट्रम लेबलिंग की है, इसमें न्यूट्री स्कोर और ट्रैफ़िक लाइट सिग्नल जैसी वॉर्निंग और हेल्थ स्टार रेटिंग आती है. न्यूट्री स्कोर यूरोपीय देशों में, मल्टीपल ट्रैफ़िक लाइट्स यूनाइटेड किंगडम में और हेल्थ स्टार रेटिंग न्यूज़ीलैड और ऑस्ट्रेलिया में लागू है.

लेकिन कई प्रकार के लेबलिंग सिस्टम के बीच क्या कोई ऐसा पैकेट लेबलिंग है जो दूसरों से बेहतर हो?

इस बात पर एस सरोजा कहती हैं, ''चिली और इसराइल में वॉर्निंग लेबल का इस्तेमाल किया जाता है. कई स्टडी में पाया गया है कि लोगों ने ऐसे खाद्य पदार्थ जिनमें नमक, चीनी या फ़ैट की मात्रा ज़्य़ादा है, उसका सेवन धीरे-धीरे कम कर दिया है. साथ ही जो कंपनियां इन फ़ूड पैकेट्स को बनाती हैं, उन्हें भी अपने सामान बनाने का तरीका बदलना पड़ा है.''

पैकेट

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कैसे चुनें सही खाना

यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया में पीडिएट्रिक एंडोक्रोनोलॉजिस्ट और 'शुगर द बिटर ट्रूथ' के लेखक, जाने माने अमेरिकी डॉक्टर रॉबर्ट लस्टिग का मानना है कि 'पैकेट के पीछे की गई लेबलिंग का कोई मतलब नहीं है और जो फ्रंट ऑफ़ पैक लेबल सिस्टम है, वो भी समाधान नहीं है.'

वो कहते हैं, ''पीछे की गई लेबलिंग को बहुत कम लोग पढ़ते हैं. दूसरा, कंपनी आपको सही जानकारी नहीं देती है. वो ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करती है, जो आम लोगों की समझ से बाहर है. इसे हम कहते हैं 'हाइडिंग इन प्लेन साइट' यानी सीधे-सीधे चीज़ों को छिपा देना."

"दरअसल, दिक़्क़त इसमें नहीं कि खाने की चीज़ों में क्या है, दिक़्क़त इसमें है कि इन लोगों ने खाने की इन चीज़ों के साथ क्या किया है. मेरे हिसाब से इस वक्त दुनिया भर में जो फ़्रंट ऑफ़ पैक लेबलिंग मौजूद है, वो भी समस्या का समाधान नहीं है.’’

डॉ. रॉबर्ट

खाने का पैकेट खरीदते समय क्या ध्यान में रखना चाहिए? इस सवाल पर डॉक्टर रॉबर्ट लस्टिग कहते हैं कि कोई भी पैकेट खरीदें या अपना खाना चुनें तो तीन चीज़ों को ध्यान में रखें-

  • खाद्य पदार्थ ऐसा हो जो गट यानी आंतों का ख़्याल रखे. आपके लिवर यानी कलेजे की रक्षा करे और आपके दिमाग़ को ताक़त दे.
  • गट या आंतों को ठीक रखने के लिए खाद्य पदार्थ में रफ़ेज की मात्रा पर्याप्त हो.
  • लिवर को चीनी और कैडमियम से बचाएं. जिन चीज़ों में चीनी होती है, वो आपके लिवर पर असर डालती हैं और इसलिए आप देखेंगे कि अब बहुत से लोगों में फ़ैटी लिवर की समस्या रहती है.
  • दिमाग़ के लिए ओमेगा 3 फ़ैटी एसिड की बहुत ज़रूरत है, ये उन चीज़ों में होना चाहिए.

डॉ. रॉबर्ट कहते हैं, "मेरी सलाह ये रहेगी कि जिनमें इन तीनों में से कुछ भी नहीं है, उसे बिलकुल ना खरीदें.''

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