मणिपुर हिंसा ने खिलाड़ियों को दी है कभी न ख़त्म होने वाली पीड़ा

लैशराम रिवाल्डो मैतेई को उनके घर से महज़ थोड़ी दूर पर गोली मारी गई थी.

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    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, गुवाहाटी से

"मैं उसे भारत के लिए हॉकी खेलते हुए देखना चाहती थी. लेकिन 5 मई की उस काली रात ने मुझसे मेरा इकलौता बेटा छीन लिया. उसकी बहुत कमी महसूस होती है."

इतना कहते ही राजधानी इंफाल के कोंगबा की रहने वाली थाइबेमा लीमा का गला रुँधने लगता है.

5 मई 2023 की रात 20 साल के लैशराम रिवाल्डो मैतेई को उनके घर से महज़ थोड़ी दूर पर गोली मारी गई थी.

रिवाल्डो मणिपुर के एक उभरते हुए राष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी थे. उन्होंने पिछले सीज़न में गोवा में मणिपुर की सब-जूनियर हॉकी टीम की कप्तानी की थी.

उनको जून में राउरकेला में आयोजित हुई 13वीं हॉकी इंडिया जूनियर पुरुष राष्ट्रीय चैंपियनशिप के लिए मणिपुर टीम में शामिल किया जाना तय था.

रिवाल्डो के पुरस्कार

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लेकिन इससे पहले ही हिंसा की लपटों ने रिवाल्डो की ज़िंदगी ख़त्म कर दी. मणिपुर में 3 मई से भड़की हिंसा में अब तक 150 से अधिक लोगों की जान गई है.

घटना वाली रात का ज़िक्र करते हुए फोन पर थाइबेमा बताती हैं, "इंफाल शहर में हिंसा भड़कने के बाद हम सतर्क हो गए थे. रिवाल्डो को घर से बाहर जाने से मना कर दिया था. लेकिन 5 मई की शाम को हमारे मोहल्ले में कुछ कुकी लोगों के साथ लड़ाई को लेकर हल्ला मचा. इसी को देखने वह बाहर निकला था. मैंने उसे रोका था. फिर रात साढ़े 10 बजे अचानक ख़बर आई कि रिवाल्डो को गोली लगी है. अस्पताल पहुँचने से पहले ही उसने दम तोड़ दिया था."

हालाँकि रिवाल्डो को जिसने कथित तौर पर गोली मारी थी, वो मैतेई युवक है. पुलिस ने उसे गिरफ़्तार कर लिया है और इस समय वो जेल में बंद है.

रिवाल्डो के पिता लैशराम सानायिमा मैतेई ने अपने बेटे की हत्या को लेकर पुलिस में एक मामला दर्ज कराया है.

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रिवाल्डो अपने दोस्त मोइरंगथम धनंजय मैतेई के साथ

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हिंसा के कारण प्रैक्टिस बंद

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रिवाल्डो की मौत से उनके बचपन के दोस्त और मणिपुर हॉकी सीनियर टीम के खिलाड़ी मोइरंगथम धनंजय मैतेई भी सदमे में हैं.

मणिपुर की तरफ से पुणे में साल 2021 में 11वीं हॉकी इंडिया सीनियर पुरुष राष्ट्रीय चैंपियनशिप में खेल चुके धनंजय इस हिंसा को अपने करियर की सबसे बड़ी रुकावट बताते हैं.

वे कहते है, "हिंसा के कारण प्रैक्टिस पूरी तरह बंद है. अभी कुछ दिनों में सीनियर नेशनल होने वाला है. इसके लिए ट्रेनिंग ज़रूरी थी. लेकिन रिवाल्डो की मौत के बाद डर लगने लगा है. यहाँ किसी भी समय दंगा फ़साद शुरू हो जाता है. अगर स्टेडियम जाते समय रास्ते में हिंसा भड़क गई, तो क्या करूँगा. मैंने इस हिंसा में एक प्यारा दोस्त खोया है. पता नहीं यह हिंसा कब तक चलेगी?"

रिवाल्डो की मौत पर दुख व्यक्त करते हुए उनके कोच थियाम रोशन कुमार सिंह कहते है, "मौत से एक दिन पहले रिवाल्डो ने मुझे फ़ोन किया था. वह मेरी सुरक्षा को लेकर चिंतित था. क्योंकि बिष्णुपुर में मेरे घर के पास कुछ हिंसक घटनाएँ हुई थीं."

वो कहते हैं, "इस हिंसा से न केवल खिलाड़ियों का भविष्य संकट में है बल्कि कई सब-जूनियर और जूनियर खिलाड़ी मानसिक रूप से सदमे में हैं. क्योंकि हर बच्चा इस समय घर पर है और हिंसा के कारण अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंता में है. ऐसे हालात में उनके लिए गेम खेलना कैसे संभव है. आगे नेहरू जूनियर हॉकी टूर्नामेंट आने वाला है. अगर खिलाड़ी ट्रेनिंग नहीं करेंगे, तो टूर्नामेंट कैसे खेलेंगे."

मणिपुर में पिछले करीब 90 दिनों से चल रही हिंसा ने खिलाड़ियों के समक्ष कई परेशानियाँ खड़ी कर दी हैं.

राज्य में लगातार सामने आ रही हिंसक घटनाओं और कर्फ़्यू के कारण खिलाड़ी न ठीक से ट्रेनिंग कर पा रहे हैं और न ही बड़े टूर्नामेंट के बारे में कुछ सोच पा रहे हैं.

भय और दहशत के माहौल में अपनी जान गँवाने के डर से कई प्रतिभावान खिलाड़ी खेल से दूर हो गए है.

भारत की पूर्व फुटबॉल कप्तान ओइनम बेमबेम देवी

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कुकी खिलाड़ी इंफाल नहीं आना चाहते

मणिपुर में जारी हिंसा के कारण पहाड़ी ज़िले और इंफाल वैली आपस में पूरी तरह बँट गए हैं.

लिहाज़ा पहाड़ों पर रहने वाले कुकी जनजाति के खिलाड़ी अब इंफाल आने का जोखिम नहीं उठाना चाहते.

इंफाल स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण के उत्तर-पूर्व क्षेत्रीय केंद्र की एक अधिकारी ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि हिंसा शुरू होने से पहले कई कुकी खिलाड़ी हॉस्टल में रहकर ट्रेनिंग कर रहे थे. लेकिन हिंसा के कारण वो घर चले गए.

अब 17 जुलाई से यहाँ फिर से ट्रेनिंग शुरू हुई है, लेकिन एक भी कुकी खिलाड़ी वापस नहीं आया है.

भारत की पूर्व फुटबॉल कप्तान ओइनम बेमबेम देवी ने कहा कि मणिपुर हिंसा ने ख़ासकर उभरते हुए खिलाड़ियों के जीवन को निराशा से भर दिया है. राज्य में लगातार कर्फ़्यू के कारण खिलाड़ी ट्रेनिंग के लिए मैदान में आने से डरते हैं.

भारत की कुल आबादी में महज 0.24 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला मणिपुर साल 1984 से अभी तक लगभग 19 ओलंपिक स्तर के खिलाड़ियों को तैयार कर चुका है, जिन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया है.

मेरी कॉम (बॉक्सिंग) से लेकर सुशीला चानू (महिला हॉकी खिलाड़ी), एस नीलकांता (पुरुष हॉकी), मीराबाई चानू (भारोत्तोलन), देवेंद्रो सिंह (बॉक्सिंग) और एल सुशीला देवी (जूडो) जैसे कई अनगिनत खिलाड़ियों ने भारत का नाम रोशन किया है.

भारतीय महिला हॉकी टीम में भी मणिपुर का दबदबा रहा है. पिछले साल तक सीनियर महिला राष्ट्रीय टीम में आठ खिलाड़ी मणिपुर से चुने जा चुके हैं.

सुशीला चानू कई सालों तक सीनियर महिला राष्ट्रीय टीम की कप्तान रही हैं.

मणिपुर की के. शर्मिला देवी को इस साल होने वाले नेहरू जूनियर हॉकी टूर्नामेंट की तैयारी करनी है.

लेकिन राज्य में लगातार हो रही हिंसा के कारण वो प्रैक्टिस नहीं कर पा रही है.

वो उदासी के साथ कहती हैं, "मेरे घर से हॉकी अकादमी क़रीब 4 किलोमीटर दूर है. मुझे प्रैक्टिस में जाने के लिए कर्फ़्यू पास भी मिला है लेकिन हिंसा के कारण मुझे घरवाले जाने नहीं देते. अगर प्रैक्टिस करने स्टेडियम नहीं जाऊँगी, तो मेरा खेल ख़राब हो जाएगा. आगे कई टूर्नामेंट खेलने हैं."

इस साल जून में राउरकेला में 13वीं हॉकी इंडिया जूनियर महिला राष्ट्रीय चैंपियनशिप खेल कर आईं शर्मिला पाँच बहनों में सबसे छोटी है.

उनकी बड़ी बहन भी नेशनल लेवल पर हॉकी खेलती हैं. लेकिन घरवालों ने फ़िलहाल दोनों को ही घर से बाहर जाने नहीं दिया है.

बिष्णुपुर के पास एक बेहद छोटे से गाँव खा-पोटसंगबम की रहने वाली शर्मिला घरवालों की चिंता को सही ठहराते हुए कहती हैं, "अभी जिस तरह की स्थिति है. गोलीबारी होती है.अचानक हिंसा भड़क जाती है. इसलिए घरवालों को ज़्यादा चिंता होती है. प्रैक्टिस शाम 3 बजे से साढ़े 5 बजे तक होती है. कई बार थोड़ी देरी भी हो जाती है. इसलिए घरवाले अभी नहीं भेज रहे हैं."

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बिष्णुपुर हॉकी क्लब के हॉकी खिलाड़ी

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एशियाई खेल के लिए खिलाड़ी तैयार नहीं

इस हिंसा का खिलाड़ियों के ट्रेनिंग पर पड़ रहे असर पर चिंता ज़ाहिर करते हुए ओइनम बेमबेम देवी ने बीबीसी से कहा, "हमारे खिलाड़ियों के लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण समय है क्योंकि सितंबर-अक्तूबर में एशियाई खेल होने वाले हैं और कई खेलों के लिए चयन परीक्षण चल रहे हैं. हिंसा के कारण इंफाल में होने वाले सभी टूर्नामेंट रद्द कर दिए गए हैं."

वे कहती हैं, "अगर खिलाड़ी क्लब लेवल के टूर्नामेंट नहीं खेलेंगे या फिर ठीक से ट्रेनिंग नहीं करेंगे तो अलग-अलग गेम के लिए लगने वाले कैंप में कैसे भाग लेंगे."

"इंडिया कैंप से पहले खिलाड़ियों को फ़िटनेस लेवल ठीक करना होता है. लेकिन हिंसा को लेकर आए दिन वायरल हो रहे वीडियो से खिलाड़ियों के मन में भी डर बैठ गया है. हम चाहते हैं कि राज्य में शांति स्थापित करने के लिए दोनों समुदाय को यह बात समझनी होगी."

रिवाल्डो अपने दोस्तों के साथ

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वरिष्ठ खिलाड़ी अवॉर्ड लौटाने का बना चुके थे मन

मणिपुर में हिंसा रोकने और शांति सुनिश्चित करने का अनुरोध लेकर अर्जुन पुरस्कार और पद्मश्री सम्मान पा चुकीं बेमबेम देवी ने इंफाल में गृह मंत्री अमित शाह से भी मुलाक़ात की थी.

उन्होंने यहाँ तक कहा था कि अगर सरकार स्थिति को नियंत्रित नही कर पाई, तो वे अपने सारे पुरस्कार लौटा देंगी.

अवॉर्ड लौटाने के बारे में पूछने पर बेमबेम देवी कहती हैं, "बात हमारे मणिपुर की है और इसे बचाना ज़रूरी है. अगर हमारा राज्य ही नहीं बचेगा तो हम इन अवॉर्ड का क्या करेंगे? इसलिए कुंजरानी देवी, सरिता देवी, सोनिया चानू, सुशीला देवी, संध्यारानी देवी समेत कई वरिष्ठ खिलाड़ियों ने अपने अवॉर्ड सरकार को लौटाने का फ़ैसला किया था."

मणिपुर को भारतीय फुटबॉल के केंद्रों में से एक माना जाता है क्योंकि यह सालों से बेहतरीन फुटबॉल खिलाड़ी तैयार करता रहा है.

भारतीय फुटबॉल टीम में अपनी छाप छोड़ने वाले खिलाड़ियों की जब भी बात होती है, तो उनमें मणिपुर के गौरमांगी मोइरांगथेम, सुरकुमार सिंह, रेनेडी सिंह के नाम आज भी याद किए जाते है.

मणिपुर के छह युवा फुटबॉल खिलाड़ियों को क़तर फ़ीफ़ा विश्व कप 2022 और एएफ़सी एशियाई कप 2023 के क्वालिफ़ायर के लिए भारतीय राष्ट्रीय टीम में चुना गया था.

वहीं साल 2017 में अंडर-17 फ़ुटबॉल विश्व कप में हिस्सा लेने वाली भारतीय महिला और पुरुष टीम में आठ खिलाड़ी मणिपुर के थे.

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खाइमिनथांग लुंगडिम मणिपुर के चुराचांदपुर के जेलमोल गाँव के रहने वाले हैं

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नेरोका एफ़सी और टीआरएयू एफसी डूरंड कप में नहीं लेंगे भाग

मणिपुर में जारी हिंसा और आर्थिक कठिनाइयों के कारण राज्य के चर्चित फुटबॉल क्लब नेरोका एफ़सी और टीआरएयू एफ़सी इस साल डूरंड कप में भाग नहीं ले पा रहे हैं. जबकि पिछले साल मणिपुर को डूरंड कप की सह-मेज़बानी करने का सम्मान मिला था.

इस समय पंजाब एफ़सी क्लब के लिए खेलने वाले खाइमिनथांग लुंगडिम मणिपुर के चुराचांदपुर के जेलमोल गाँव के रहने वाले हैं.

डूरंड कप के लिए कोलकाता में ट्रेनिंग कर रहे 23 साल के खाइमिनथांग कहते है, "हिंसा के कारण मणिपुर के कई उभरते हुए खिलाड़ियों के करियर को नुक़सान पहुँचा है. क्योंकि मणिपुर में इस समय कोई भी टूर्नामेंट नहीं हो रहा है. इससे पहले मैंने डूरंड कप मणिपुर के नेरोका एफ़सी क्लब के लिए खेला था."

वे आगे बताते हैं, "मुझे लगता है कि हिंसा के कारण नेरोका एफ़सी अपनी टीम नहीं बना पाए. क्योंकि नेरोका एफ़सी में पहले 11 खिलाड़ियों में खेलने वाले तीन-चार प्रमुख खिलाड़ी कुकी जनजाति के हैं. जो अब ट्रेनिंग के लिए इंफाल नहीं आ सकते. किसी खिलाड़ी को अभ्यास करने का मौक़ा नहीं मिला है. क्योंकि ग्रांउड बंद पड़े है."

इस साल डूरंड कप में पंजाब एफ़सी में खाइमिनथांग के साथ मैतेई समुदाय के भी दो खिलाड़ी खेल रहे हैं.

भले ही मणिपुर में हुई हिंसा ने कुकी और मैतेई समुदाय को एक-दूसरे का दुश्मन बना दिया है, लेकिन पंजाब एफ़सी में मणिपुर के ये खिलाड़ी एक साथ डूरंड कप में अपनी टीम को जिताने के लिए उतरेंगे.

 खाइमिनथांग ने हिंसा में अपने चचेरे भाई को खोया है

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फुटबॉल खिलाड़ी ने खोया अपना भाई

एक बेहतर मिडफ़ील्डर के तौर पर नाम कमाने वाले खाइमिनथांग ने इस हिंसा में अपने एक चचेरे भाई को खोया है.

वे बताते हैं, "जिस समय हिंसा शुरू हुई थी, मैं उस दौरान घर पर ही था. इस लड़ाई में मैंने अपने एक भाई को खोया है. वह भी एक अच्छा फुटबॉल खिलाड़ी था. लेकिन मेरे मन में किसी भी समुदाय के प्रति कोई ग़ुस्सा नहीं है. सभी खिलाड़ी ऐसे ही होते हैं."

पिछले साल तक कोलकाता के मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब के लिए खेलते रहे सेबस्टियन थांगमुआनसांग भी मणिपुर में जारी हिंसा और खिलाड़ियों पर पड़ रहे इसके असर से बेहद चिंतित हैं.

कुकी जनजाति से आने वाले सेबस्टियन कहते हैं, "खिलाड़ियों की ताक़त उनकी ट्रेनिंग होती है. लेकिन हिंसा के कारण इस समय फुटबॉल मैदान में जाना सुरक्षित नहीं है. क्योंकि क्षेत्र में गोलीबारी हो रही है. गाँवों की सुरक्षा करने वाले विलेज गार्ड वॉलिंटियर भी बाहर जाने की अनुमति नहीं देते."

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सेबस्टियन थांगमुआनसांग

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हिंसा की चपेट से बचने का एक किस्सा सुनाते हुए सेबस्टियन बताते हैं, "अगर यह हिंसा 3 मई की जगह चार-पाँच दिन बाद शुरू होती तो शायद मेरी जान भी जोखिम में पड़ जाती. दरअसल मुझे अपने एक मैतेई दोस्त के आमंत्रण पर थौबल में एक टूर्नामेंट खेलने जाना था. उसके बाद मैं इंफाल जाता. लेकिन उससे पहले ही हिंसा शुरू हो गई और मैं बच गया."

मणिपुर में खेल के प्रति युवाओं के इस जुनून के पीछे अपना एक इतिहास रहा है. इस प्रदेश में प्राचीन काल से ही खेलों को लेकर सक्रियता रही है.

रिवाल्डो की माँ

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ब्रिटिश सेना में अफ़सर रहे सर जेम्स जॉनस्टोन ने मणिपुर पर एक किताब लिखी, 'मणिपुर एंड नगा हिल्स' जिसमें उन्होंने मणिपुर के पारंपरिक खेलों का ज़िक्र करते हुए स्थानीय लोगों की खेलों में कुशलता की प्रशंसा की.

तभी तो बेहद ग़रीब परिवार से आने के बाद भी रिवाल्डो की माँ ने अपने बेटे को भारतीय हॉकी टीम में पहुँचाने का सपना देखा था.

रिवाल्डो की माँ आज भी अपने बेटे की जीती हुई ट्रॉफ़ियों और प्रमाणपत्रों को संभाल कर रखे हुए हैं.

वो कहती हैं, "मैं इन मेडल और ट्रॉफियों के ज़रिए अपने बेटे को महसूस करती हूँ. यह मुझे गर्व और सुकून दोनों का अहसास कराते हैं. उसे हॉकी से बहुत प्यार था. हम सबका सपना अधूरा रह गया."

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