अजित पवार के एनडीए में आने से क्या बीजेपी को बढ़त मिलेगी?

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महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर उबाल है और इसकी वजह एनसीपी नेता अजित पवार हैं जो आठ विधायकों के साथ शिव सेना (शिंदे गुट)-बीजेपी गठबंधन सरकार में शामिल हो गए हैं.
एनसीपी नेता ने ये रुख़ उस समय अपनाया है जब देश भर में आगामी लोकसभा चुनाव के लिए एक बड़े विपक्षी गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ने को लेकर बैठकें हो रही हैं.
विपक्षी पार्टियों की 23 जून को पटना में एक बड़ी बैठक हुई थी, जिसमें एनसीपी प्रमुख शरद पवार से लेकर ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और राहुल गांधी जैसे नेता शामिल हुए थे.
अंग्रेज़ी अख़बार ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ सूत्रों के हवाले से लिखता है कि इस बैठक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ शरद पवार के जाने से अजित पवार खेमे के विधायक नाराज़ थे.
कहा जा रहा है कि शरद पवार ने ये एकतरफ़ा फ़ैसला लिया था, जिसकी वजह से एनसीपी के अंदर विवाद पैदा हुआ.
वहीं इस टूट को राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े विपक्षी गठबंधन को सफल न होने देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
इसका ठीकरा एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फोड़ा है.
उन्होंने रविवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके कहा कि ‘कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री मोदी ने भोपाल में महाराष्ट्र कॉपरेटिव बैंक और महाराष्ट्र सिंचाई घोटाले का ज़िक्र करते हुए कहा था कि हमारी पार्टी भ्रष्टाचार में डूबी हुई है.’

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बीजेपी को क्या होगा फ़ायदा?
विपक्ष ने बीजेपी पर इस फूट का आरोप लगाया है. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आरोप लगाया है कि बीजेपी मनी पावर और केंद्रीय एजेंसियों के ज़रिए विपक्ष को ख़त्म करने की कोशिश कर रही है.
अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में लगभग सभी पार्टियां जुटी हुई हैं. महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं और दिल्ली की कुर्सी तक पहुंचने में इसकी अहम भूमिका है.
महाराष्ट्र में शिव सेना में टूट के बाद बीजेपी एकनाथ शिंदे के साथ सरकार बनाने में सफल ज़रूर रही लेकिन वो महाराष्ट्र में अपने पैर और भी मज़बूती से जमाना चाहती है.
अंग्रेज़ी अख़बार ‘द हिंदू’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, एनसीपी में टूट से उसके छगन भुजबल, प्रफुल्ल पटेल, ततकरे और दिलीप वलसे पाटिल जैसे नेता ग्राउंड पर बीजेपी को फ़ायदा पहुंचा सकते हैं.
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव का कहना है कि मध्य प्रदेश के बाद महाराष्ट्र बीजेपी के लिए ‘सबसे बड़ी लैब’ बनकर उभरी है और सत्ता में रहने के लिए 2024 के आम चुनावों में भगवा पार्टी और भी ‘प्रयोग’ करेगी.

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विपक्षी एकता का ख़्वाब पूरा होगा?
एनसीपी चीफ़ शरद पवार ने रविवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस में साफ़ किया कि महा विकास अघाड़ी गठबंधन अभी भी मज़बूती के साथ खड़ा है.
उन्होंने कहा है कि देशभर से उन्हें कई विपक्षी पार्टियों के फ़ोन कॉल आए हैं. उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे समेत कई नेताओं ने बीजेपी के ख़िलाफ़ उनकी लड़ाई में एकजुटता दिखाई है.
महाराष्ट्र में विपक्षी एकता बरक़रार रहे भी तो वहां पर दो बड़ी पार्टियों के दो धड़े ज़रूर दिखाई देंगे. इनमें शिवसेना और एनसीपी के अलग-अलग धड़ों के नेता चुनाव में दिखाई दे सकते हैं.
अगर राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के महागठबंधन की बात करें तो उस पर भी अभी कोई एकरूपता नहीं दिख रही है.
पटना में विपक्षी पार्टियों की बैठक के बाद अगली बैठक बेंगलुरु में होनी थी जो रद्द हो गई है. ये देखना दिलचस्प होगा कि बैठक अब कहां होती है और वहां कौन-कौन से दल पहुंचते हैं क्योंकि पटना में हुई बैठक में तेलंगाना के मुख्यमंत्री और बीआरएस प्रमुख के. चंद्रशेखर राव शामिल नहीं हुए थे.

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केजरीवाल-ममता क्या मानेंगे?
वहीं रविवार को तेलंगाना के खम्मम ज़िले में एक रैली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बीआरएस को बीजेपी की बी टीम बताया था.
उन्होंने भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) को ‘बीजेपी रिश्तेदार समिति’ बताया. साथ ही कहा कि हाल ही में हुई विपक्षी दलों की बैठक में बीआरएस को न्यौता भेजने का कांग्रेस ने विरोध किया था.
राहुल गांधी ने कहा, “हमने कहा था कि अगर बीजेपी की बी टीम बीआरएस आई तो हम बायकॉट करेंगे. हम इस तरह की पार्टी के साथ नहीं बैठ सकते हैं. हम किसी भी समझौते पर एकसाथ नहीं आ सकते हैं.”
विपक्षी बैठक का आयोजन करने वाले दल जेडीयू ने बताया था कि उसने 23 जून की बैठक में बीजेडी प्रमुख नवीन पटनायक, बीआरएस प्रमुख के. चंद्रशेखर राव, बीएसपी प्रमुख मायावती, वाईएसआर कांग्रेस चीफ़ वाईएस जगनमोहन रेड्डी, शिरोमणी अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल और जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी को आमंत्रित नहीं किया है.
हालांकि, के. चंद्रशेखर राव अलग-अलग मौक़ों पर नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी से मुलाक़ात कर चुके हैं. राष्ट्र स्तर पर बीजेपी को चुनौती देने के लिए ही उन्होंने अपनी तेलंगाना राष्ट्र समिति का नाम बदलकर भारत राष्ट्र समिति किया था.
वहीं आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पटना की बैठक में शामिल ज़रूर हुए थे लेकिन इससे पहले उनके बैठक में शामिल होने को लेकर काफ़ी बयानबाज़ियां हुई थीं.
आम आदमी पार्टी की मांग थी कि जब तक कांग्रेस केंद्र के दिल्ली को लेकर लाए गए अध्यादेश पर उसका समर्थन नहीं करता है तब तक वो बैठक में शामिल नहीं होगी. कहा जा रहा है कि केजरीवल पटना में बैठक के बीच से ही उठकर चले गए थे.
केजरीवाल के अलावा ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ किस तरह से गठबंधन कर पाएंगी ये भी एक बड़ा सवाल है.
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