अजित पवार नहीं बल्कि इनसे ख़फ़ा हैं शरद पवार - प्रेस रिव्यू

अजित पवार

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एनसीपी नेता अजित पवार बाग़ी रुख़ अपनाते हुए महाराष्ट्र की शिव सेना (शिंदे गुट) और बीजेपी की गठबंधन सरकार में शामिल हो गए हैं.

उन्होंने रविवार को राजभवन में आठ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के विधायकों के साथ शपथ ली.

अजित पवार ने उप-मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली और बीते चार सालों में तीसरी बार उन्होंने इस पद की शपथ ली है.

शपथ लेने वाले विधायकों में एनसीपी नेता छगन भुजबल भी शामिल थे जबकि राजभवन में इस मौक़े पर एनसीपी के वरिष्ठ नेता और हाल ही में कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए प्रफुल्ल पटेल भी थे.

अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया सूत्रों के हवाले से लिखता है कि राजभवन में जो समर्थन पत्र जमा किया गया है, उसमें एनसीपी नेता अजित पवार ने अपने पास 40 एमएलए और छह एमएलसी का समर्थन दिखाया है.

वहीं एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने इस घटना को ‘डकैती’ बताया है.

अंग्रेज़ी अख़बार ‘द हिंदू’ लिखता है कि शरद पवार ने कहा कि ‘कुछ दिनों पहले पीएम मोदी ने भोपाल में एनसीपी पर भ्रष्टाचार को लेकर निशाना साधा था अब मैं पीएम का शुक्रगुज़ार हूं कि उन्होंने एनसीपी को आरोपों से मुक्त कर दिया है.’

हालांकि राज्यसभा सांसद प्रफुल्ल पटेल के फ़ैसले को शरद पवार के लिए झटका बताया जा रहा है.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक़, प्रफुल्ल पटेल को हमेशा से शरद पवार का सबसे भरोसेमंद साथी समझा जाता रहा है और उन्होंने कभी भी अपने ‘गुरु’ (शरद पवार) की सलाह के बिना कोई फ़ैसला नहीं लिया.

शरद पवार ने रविवार को अपने पुणे स्थित आवास पर प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान कहा भी कि वो प्रफुल्ल पटेल और सुनील ततकरे (लोकसभा सांसद) को छोड़कर किसी से भी नाराज़ नहीं हैं.

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शरद पवार राजनीति में लेकर आए

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अख़बार एक वरिष्ठ एनसीपी नेता के हवाले से लिखता है कि पटेल को शरद पावर राजनीति में लेकर आए, गोंदिया नगर निगम के चेयरमैन से लेकर वो केंद्रीय मंत्रिमंडल के पद तक पहुंचे.

साल 1991 में वो पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए और फिर इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

अगर वो किसी चुनाव में हारे भी तो शरद पवार ने भरोसा दिलाया कि उन्हें राज्यसभा में भेजा जाएगा.

साल 2014 में वो बीजेपी के उम्मीदवार नाना पटोले से चुनाव हार गए. हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मतभेदों के कारण पटोले बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए. इस हार के बाद भी पटेल को राज्यसभा में भेजा गया.

शरद पवार के लिए पटेल ‘संकटमोचक’ की भूमिका निभाते रहे हैं. हाल ही में जब पवार ने एनसीपी अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दिया तो पटेल ही थे जिन्होंने इस विवाद को सुलझाया. उनके दख़ल के बाद ही शरद पवार ने इस्तीफ़ा वापस लिया था.

साल 1999 में एनसीपी के गठन के बाद से ही पटेल लोकसभा और विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों के चयन से लेकर मंत्रिमंडल के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं.

बाद में महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की महाविकास अघाड़ी गठबंधन सरकार बनाने में भी पटेल ने अहम भूमिका निभाई. इस काम के लिए उन्होंने गांधी परिवार से लेकर दिग्गज कांग्रेस नेता अहमद पटेल को साधा था.

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शिव सेना की तरह एनसीपी का होगा हाल?

बीते साल शिवसेना से अलग होकर एकनाथ शिंदे ने बीजेपी के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाई थी जिसके बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया था.

ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि एकनाथ शिंदे की तरह ही अब एनसीपी में अजित पवार गुट को क़ानूनी दांवपेच का सामना करना पड़ेगा.

हालांकि टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट कहती है कि अजित पवार के लिए चीज़ें उतनी मुश्किल होने नहीं जा रही हैं.

अख़बार क़ानूनी विशेषज्ञों के हवाले से लिखता है कि अजित पवार का फ़ैसला ‘क़ानूनी तौर पर अड़चनों से भरा नहीं बल्कि राजनीतिक तौर पर सोचा-समझा है.’

कई विशेषज्ञों का यह मानना है कि अजित पवार ने जब ख़ुद कहा कि एनसीपी सरकार का समर्थन कर रही है तो इसमें किसी पार्टी के बंटने या क़ानूनी असर का सवाल ही नहीं उठता है.

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उद्धव ठाकरे और शिंदे

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बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस बीएच मरलापल्ले अख़बार से कहते हैं, “कई मीडिया रिपोर्ट के आधार पर ये साफ़ हो चुका है कि एनसीपी विधायकों ने सुबह में बैठक की थी और सरकार को समर्थन देने का फ़ैसला किया था. इस वजह से ये माना जा रहा है कि गवर्नर को तुरंत प्रस्ताव भेज दिया गया था जिसके बाद वो (गवर्नर) इससे संतुष्ट थे.”

पूर्व स्टेट एडवोकेट जनरल एसजी अणे अख़बार से कहते हैं, “अजित पवार के पास पार्टी का पूरा समर्थन होने के सवाल पर विवाद है. इसके साफ़ न होने तक भविष्य में पार्टी में विभाजन होने से विधायकों के अयोग्य घोषित होने का सवाल बना रहेगा.”

उन्होंने कहा कि राज्यपाल की संतुष्टि इस मामले में इस स्तर पर अप्रासंगिक है. उन्होंने शिव सेना मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फ़ैसले का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर ऐसा मुद्दा सामने आता है तो सबसे पहले सदन का स्पीकर इस पर कोई फ़ैसला ले सकता है.

क्या कोई क़ानूनी क़दम उठाया जा सकता है? इस सवाल पर वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी कहते हैं कि अजित पवार के मुताबिक़ बहुसंख्यक विधायक उनके साथ हैं, इस वजह से पहली नज़र में लगता है कि यह असली एनसीपी बोल रही है.

वो कहते हैं कि अगर कोई विवाद पैदा होता है तो वो सबसे पहले स्पीकर के आगे जाएगा.

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