नवाज़ शरीफ़ की पाकिस्तान वापसी क्या फ़ौज से 'समझौते' का नतीजा है?

    • Author, उमरदराज़ नंगियाना
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू, लाहौर

यह दृश्य सन 2018 का है. पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ और उनकी पुत्री मरियम नवाज़ लंदन से पाकिस्तान के लिए रवाना हुए हैं. पाकिस्तान में एक जवाबदेही अदालत में एवनफ़ील्ड करप्शन केस में उन्हें क्रमशः दस साल और सात साल की क़ैद की सज़ा सुनाई है.

नवाज़ शरीफ़ की पत्नी कुलसुम नवाज़ लंदन में ही में अस्पताल के बिस्तर पर कैंसर से जंग लड़ रही हैं. इधर, पाकिस्तान में आम चुनाव का समय है. इस्लामाबाद और राज्यों में प्रभारी सरकारें चल रही हैं. इमरान ख़ान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) चुनाव की तैयारी कर रही है.

नवाज़ शरीफ़ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) कह रही है, "हमारी पार्टी के लोगों से ज़बर्दस्ती वफ़ादारियां बदलवाई जा रही हैं. हमारे कार्यकर्ताओं को जेल में डाला जा रहा है."

पाकिस्तान में नवाज़ लीग और उसकी राजनीति के बारे में कई सवाल खड़े हो रहे हैं.

क्या नवाज़ शरीफ़ वापस पाकिस्तान आएंगे? अगर वह नहीं आए थे तो उनकी पार्टी का राजनीतिक भविष्य क्या होगा? अगर वह आते हैं तो उनके साथ क्या होगा? क्या उनकी वापसी पाकिस्तान में कुछ बदलेगी?

पहला दृश्य

पहले सवाल का जवाब जल्द मिल जाता है. 13 जुलाई को नवाज़ शरीफ़ और मरियम नवाज़ लंदन से पाकिस्तान वापसी के लिए जहाज़ पर सवार हो जाते हैं. पाकिस्तान के कई पत्रकार और नेता जहाज़ पर उनके साथ हैं. रास्ते में हवाई जहाज़ संयुक्त अरब अमीरात में कुछ घंटे के लिए रुकता है.

इधर, लाहौर में शहबाज़ शरीफ़ अपनी पार्टी के हज़ारों कार्यकर्ताओं के क़ाफ़िले का नेतृत्व करते नवाज़ और मरियम को लेने लाहौर एयरपोर्ट की ओर बढ़ रहे हैं. उनके कार्यकर्ता नारेबाज़ी कर रहे हैं… 'रोक सको तो रोक लो' और 'वोट को इज़्ज़त दो.'

एयरपोर्ट की ओर जाने वाले सभी रास्ते रुकावटें लगाकर बंद कर दिए गए हैं. एयरपोर्ट के चारों तरफ़ सख़्त सुरक्षा घेरा बना दिया गया है.

उड़ान में देरी के कारण नवाज़ शरीफ़ अबू धाबी एयरपोर्ट ही पर टेलीफ़ोन से दूसरे लाउंज में मौजूद मीडिया के प्रतिनिधियों से बात करते हैं.

वह कहते हैं, "मुझे गिरफ़्तारी का डर नहीं. अगर होता तो मैं वापस ही क्यों आ रहा होता."

"मेरे लिए इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि 'नैब' (नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो) या जिन लोगों ने 'नैब' के अधिकारियों को भेजा है, वह मुझे यहां अबू धाबी से गिरफ़्तार करते हैं या लाहौर से. मैं इसके लिए तैयार हूं. नवाज़ शरीफ़ यह भी कहते हैं, "हम वापस आ रहे हैं क्योंकि इस देश की क़िस्मत को बदलना होगा… हम उसकी तक़दीर को बदलेंगे."

देर रात उनका जहाज़ लाहौर के हवाई अड्डे पर उतरता है. जहाज़ ही में से नवाज़ शरीफ़ और मरियम नवाज़ को गिरफ़्तार कर लिया जाता है. वहीं से उन्हें विशेष जहाज़ से इस्लामाबाद रवाना कर दिया जाता है. शहबाज़ शरीफ़ और उनके हज़ारों साथी उस समय तक एयरपोर्ट के रास्ते में ही थे.

पहले दृश्य की पृष्ठभूमि

जुलाई सन 2017 की बात है. पाकिस्तान का सुप्रीम कोर्ट नवाज़ शरीफ़ को पनामा केस में अयोग्य घोषित कर देता है. वह प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे देते हैं. ऐसा उनके साथ तीसरी बार हो रहा है. पहले भी वह पांच साल का कार्यकाल पूरा किए बिना दो बार प्रधानमंत्री की कुर्सी से हटाए जा चुके हैं.

इस बार नवाज़ शरीफ़ आवाज़ उठाने का फ़ैसला करते हैं. वह इस्लामाबाद से जीटी रोड होकर लाहौर जाते हैं. रास्ते में वह अलग-अलग शहरों में सभाएं करते हैं. हर जगह लोगों की एक बड़ी संख्या उन्हें सुनने को जमा होती है. सभी सभाओं में उनकी भाषा लगभग एक जैसी है.

झेलम में एक सभा को संबोधित करने के दौरान नवाज़ शरीफ़ कुछ इस तरह कहते हैं, "मेरी सरकार चली गई. पांच जजों ने लाखों लोगों के वोट से चुने हुए नवाज़ शरीफ़ को घर भेज दिया… क्या यह लाखों लोगों के वोट का अपमान नहीं?"

"सत्तर वर्षों में पाकिस्तान में एक भी प्रधानमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया. आप वोट देकर उसे चुनते हैं, कोई फ़ौजी डिक्टेटर या जज आता है और आपका बैलेट पेपर फाड़ कर आपके हाथ में पकड़ा देता है."

"यह प्रधानमंत्रियों का अपमान नहीं, यह देश के बीस करोड़ लोगों का अपमान है… क्या तुम्हें यह अपमान क़बूल है?" वहां उपस्थित भीड़ 'नहीं' में जवाब देती है. इस पर नवाज़ शरीफ़ कहते हैं, "तो फिर तुम्हें इसको बदलना होगा."

विभिन्न स्थानों पर रुकते और सभाएं करते नवाज़ शरीफ़ दो दिन में लाहौर पहुंचते हैं. अगले एक साल में वह 'नैब' की पेशियां भुगतने को अदालतों में पेश होते रहते हैं. उनकी पुत्री मरियम नवाज़ भी उनके साथ हैं.

फिर नवाज़ शरीफ़ की पत्नी कुलसुम नवाज़ को लंदन में कैंसर होने का पता चलता है और उनकी हालत बिगड़ने लगती है. उनकी देखरेख के लिए नवाज़ और मरियम अदालत की अनुमति से लंदन रवाना हो जाते हैं.

पहले दृश्य का शेष भाग

मेडिकल साज़ो समान से लैस हवाई जहाज़ यानी एयर एंबुलेंस लाहौर हवाई अड्डे पर उतरती है. यह जहाज़ नवाज़ शरीफ़ को लाहौर से लंदन ले जाने के लिए आया है.

नवाज़ शरीफ़ बीमार हैं और पिछले कई दिनों से लाहौर के सर्विसेज़ अस्पताल में भर्ती हैं.

उनके डॉक्टर कह रहे हैं कि उनके शरीर का इम्यूनिटी सिस्टम सही से काम नहीं कर रहा. उनकी जान को ख़तरा हो सकता है. उनका बेहतर इलाज लंदन में उनके डॉक्टर ही कर सकते हैं.

उस समय की पीटीआई सरकार की अनुमति से नवाज़ शरीफ़ के भाई शहबाज़ शरीफ़ और उनके निजी चिकित्सक डॉक्टर अदनान उन्हें एयर एंबुलेंस में लंदन ले जाते हैं. शुरुआती तौर पर उन्हें चार हफ़्ते के लिए जाना होता है.

कुछ ही दिन के इलाज के बाद नवाज़ शरीफ़ बेहतर हो जाते हैं. लंदन में चलने-फिरने और रेस्त्रां में बैठने का उनका वीडियो सामने आ जाता है. लेकिन वह पाकिस्तान नहीं लौटते. उनके लंदन में रहते हुए ही उनकी राय से पाकिस्तान में विपक्ष के बड़े दल पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) के नाम से इमरान ख़ान की सरकार के ख़िलाफ़ एक गठबंधन बनाते हैं.

अक्टूबर सन 2020 में गुजरांवाला में पीडीएम की शुरुआती सभा होती है. नवाज़ शरीफ़ वीडियो लिंक के ज़रिए लंदन से सभा को संबोधित करते हैं. कोविड-19 के बावजूद लोगों की एक बड़ी संख्या उनका भाषण सुनने के लिए स्टेडियम पहुंचती है.

नवाज़ शरीफ़ पहली बार नाम लेकर उस समय के आर्मी चीफ़ क़मर जावेद बाजवा और आईएसआई के लेफ़्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद को अपना प्रधानमंत्री पद छीनने और इमरान ख़ान को सरकार में लाने का ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

"यह सब तुम्हारा किया है… तुम चाहो तो मुझ पर ग़द्दार का लेबल लगा सकते हो, मेरी जायदाद ज़ब्त कर सकते हो, मेरे ख़िलाफ़ झूठे मुक़दमे बना सकते हो लेकिन नवाज़ शरीफ़ अपने लोगों के लिए आवाज़ उठाता रहेगा."

एक-डेढ़ साल बाद

नवाज़ शरीफ़ का यह बयान और नैरेटिव अब नज़र नहीं आता. नवंबर में आईएसआई चीफ़ के बदलाव का समय है. स्थानीय मीडिया में ख़बरें गर्म हैं कि इस मामले पर उस समय के आर्मी चीफ़ और प्रधानमंत्री इमरान ख़ान में मतभेद हो गया है.

आने वाले कुछ महीनों में 'बदलती हवाएं' बहस का मुद्दा बनती हैं. और फिर सन 2022 की शुरुआत में ही पीडीएम के दल और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी मिलकर इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव ले आते हैं. इमरान ख़ान अविश्वास प्रस्ताव में हार जाते हैं.

इमरान ख़ान का प्रधानमंत्री पद और उनकी सरकार भी चली जाती है. नवाज़ शरीफ़ के भाई और उस समय के नेता प्रतिपक्ष शहबाज़ शरीफ़ नए प्रधानमंत्री चुने जाते हैं. उस समय से अब तक नवाज़ शरीफ़ और उनका इस्टैब्लिशमेंट विरोधी नैरेटिव दोबारा सामने नहीं आता.

अब एक बार फिर नवाज़ शरीफ़ लंदन से वापस पाकिस्तान आ रहे हैं. इधर पाकिस्तान में एक बार फिर यह राय पाई जाती है कि नवाज़ शरीफ़ की वापसी "इस्टैब्लिशमेंट के साथ किसी समझौते का नतीजा है."

क्या नवाज़ शरीफ़ सचमुच भाग्यशाली हैं?

उनके बारे में एक राय यह भी पाई जाती है कि नवाज़ शरीफ़ पाकिस्तान के उन प्रधानमंत्रियों में शामिल हैं जो इस्टैब्लिशमेंट के साथ संबंध ख़राब होने पर हर बार सरकार से निकाले जाते रहे लेकिन वह 'भाग्यशाली' भी हैं कि हर बार किसी समझौते के नतीजे में वापस आ जाते हैं.

पत्रकार और विश्लेषक आसमा शीराज़ी कहती हैं, "अब यह मालूम नहीं कि क्या नवाज़ शरीफ़ के हाथ की लकीरें अच्छी हैं या यह उनकी सियासी समझ है या फिर उनके इस्टैब्लिशमेंट के साथ अच्छे संबंध का नतीजा है."

पत्रकार आसमा शीराज़ी कहती हैं कि नवाज़ शरीफ़ के 'भाग्यशाली' होने की एक वजह यह भी हो सकती है कि पाकिस्तान में इस्टैब्लिशमेंट पंजाब के अलावा किसी दूसरे पर भरोसा करने को तैयार नहीं है. वह कहती हैं कि देश में आज भी पंजाब राजनीतिक शक्ति की धुरी समझा जाता है.

"मुझे लगता है कि यह पंजाब के पानी का असर है."

आसमा शीराज़ी कहती हैं कि यही वजह है कि उनके विचार में "कल को ऐसा भी हो सकता है कि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की किसी समय एक बार फिर वापसी हो जाए."

"डिक्टेटर की एक, नेता की 10 ज़िंदगियां होती हैं"

वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक मुजीबुर रहमान शामी समझते हैं कि नवाज़ शरीफ़ हर बार निकाले जाने के बाद इसलिए वापस आए कि उन्होंने अवाम से अपना संबंध नहीं तोड़ा, वह लोगों के साथ जुड़े रहे.

वह कहते हैं कि 'भाग्य की देवी' तो मेहरबान होती रहती है. लेकिन उनके विचार में "नवाज़ शरीफ़ की वापसी इसलिए भी हर बार संभव होती रही क्योंकि वह एक लोकप्रिय और केंद्रीय नेता रहे हैं. जनता की ताक़त उन्हें वापस लाती रही है."

पत्रकार और विश्लेषक सलमान ग़नी कहते हैं कि नवाज़ शरीफ़ के इस्टैब्लिशमेंट के साथ खट्टे-मीठे संबंध और उनकी हर बार वापसी की वजह उनके विचार में इस बात में है कि एक डिक्टेटर की एक ही ज़िंदगी होती है. "जब वह यूनिफ़ॉर्म उतारता है, वह ज़िंदगी ख़्त्म हो जाती है."

"लेकिन मैं समझता हूं कि एक नेता की 10 ज़िंदगियां होती हैं. वह एक बार ख़त्म होता है तो दोबारा कहीं और से उभर कर सामने आ जाता है."

नवाज़ शरीफ़ के मामले में वह समझते हैं कि नवाज़ शरीफ़ को जिस बात का फ़ायदा होता रहा है, वह यह भी है कि वह निकाले जाने के बाद भी कभी लड़ाई की हद तक नहीं गए.

"इस देश में सत्तर साल से इस्टैब्लिशमेंट एक राजनीतिक सच्चाई है. नवाज़ शरीफ़ जेल भी गए लेकिन उन्होंने कभी पूरी तरह इस्टैब्लिशमेंट के साथ संबंध नहीं तोड़ा."

वह कहते हैं कि नवाज़ लीग में नवाज़ शरीफ़ के भाई शहबाज़ शरीफ़ के हमेशा इस्टैब्लिशमेंट के साथ अच्छे संबंध रहे हैं.

"सारी बात संपूर्ण अधिकार की इच्छा की है"

लेकिन सवाल यह भी है कि नवाज़ शरीफ़ हर बार निकाले जाने के बाद प्रधानमंत्री बनते रहे तो हर बार उनके इस्टैब्लिशमेंट के साथ संबंध ख़राब हो जाने की वजह क्या बनी.

पत्रकार और विश्लेषक सलमान ग़नी कहते हैं, "सारी बात संपूर्ण अधिकार लेने से जुड़ी हुई है." वह समझते हैं कि पाकिस्तान में इस्टैब्लिशमेंट राजनीति में एक सच्चाई है और इसकी एक भूमिका है, "जबकि नेता चाहते हैं कि अधिकारों का पूरा कंट्रोल उनके पास हो."

पत्रकार और विश्लेषक आसमा शीराज़ी भी अधिकारों की जंग को ही नवाज़ शरीफ़ के बार-बार सत्ता खोने की वजह समझती हैं.

"पाकिस्तान में सिविल-मिलिट्री संबंध में हमेशा से नेता, चाहे वह नवाज़ शरीफ़ हो या इमरान ख़ान, यह चाहते रहे कि लोग उनके नियंत्रण में रहें. संस्थाएं तो वैसे भी संवैधानिक तौर पर उनके मातहत होती हैं लेकिन वह पदों पर बैठे लोगों को भी अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं."

वह समझती हैं कि संविधान के अठारहवें संशोधन के बाद ऐसा लगता था कि नवाज़ लीग बहुत बदल गई है लेकिन उनके विचार में पिछले एक साल के दौरान नवाज़ लीग दोबारा ज़ीरो पर आ खड़ी हुई है.

पत्रकार और विश्लेषक मुजीबुर रहमान शामी भी अधिकारों के मामले को ही इसकी वजह समझते हैं लेकिन वह यह भी कहते हैं कि हर 'विदाई' की अपनी वजहें होती हैं लेकिन यह बात तय है कि नवाज़ शरीफ़ ने जनता से कभी अपना रिश्ता नहीं टूटने दिया.

"और हर लोकप्रिय जन नेता यह चाहता है कि अधिकार उसके पास रहें. उसने इसी स्वतंत्रता और संविधान की रक्षा की शपथ भी ली होती है."

मुजीबुर रहमान शामी कहते हैं कि यही नवाज़ शरीफ़ के साथ भी हुआ क्योंकि वह चाहते थे कि पड़ोसियों के साथ संबंध अच्छे होने चाहिए, "मुक़ाबला सिर्फ तरक़्क़ी के मैदान में होना चाहिए."

क्या एक बार फिर नवाज़ शरीफ़ की वापसी 'सौभाग्य' का नतीजा है?

पत्रकार और विश्लेषक आसमा शीराज़ी समझती हैं कि ज़ाहिर तौर पर तो "यही लगता है कि नवाज़ शरीफ़ की पाकिस्तान वापसी इस्टैब्लिशमेंट के साथ किसी समझौते या डील का नतीजा हो सकती है."

वह कहती हैं कि पहले भी ऐसे दृश्य सामने आ चुके हैं. "यह वैसे ही हो रहा है जैसे सन 2018 से पहले इमरान ख़ान को सहायता दी गई और नवाज़ शरीफ को रास्ते से हटाया गया. वही सहायता अब नवाज़ शरीफ़ को दी जा रही है, उनकी वापसी की राह आसान की जा रही है."

वह कहती हैं कि नवाज़ शरीफ़ को सुरक्षात्मक (अग्रिम) ज़मानत भी मिल गई है, वह सरेंडर भी कर रहे हैं और मीनार-ए-पाकिस्तान पर सभा भी कर रहे हैं. हालांकि वह कहती हैं कि किसी निश्चित नतीजे पर पहुंचने से पहले हमें इंतज़ार करना होगा और यह देखना होगा कि क्या नवाज़ लीग इस राय को जलसे में ख़त्म करती है या नहीं.

आसमा शीराज़ी कहती हैं कि नवाज़ शरीफ़ और नवाज़ लीग अगर यह समझते हैं कि पंजाब में इस्टैब्लिशमेंट का समर्थक नैरेटिव ही चलता है तो उनको यह भी मालूम होगा कि पंजाब अब बदल गया है.

"वह भी इंतज़ार करेंगे और उस सभा से यह अंदाज़ा लगाने की कोशिश करेंगे कि क्या असल में पंजाब बदला है या वही पुराना पंजाब है जो चुनाव में उसी के साथ होता था जिसके बारे में यह राय होती थी कि वह सत्ता में आ रहा है क्योंकि वह इस्टैब्लिशमेंट का समर्थक है."

"अब कोई डील नहीं, हालात बदल चुके हैं"

पत्रकार और विश्लेषक सलमान ग़नी भी समझते हैं कि इस समय संकेत तो ज़ाहिर तौर पर उन्हीं की ओर है लेकिन वह कहते हैं कि नवाज़ शरीफ़ को वापस लाने की एक बड़ी वजह यह भी हो सकती है कि इस्टैब्लिशमेंट को इस 'ख़तरे' से निपटने के लिए एक लोकप्रिय नेतृत्व की ज़रूरत है.

"इमरान ख़ान की लोकप्रियता का असर ख़त्म करने के लिए उन्हें ऐसे नेतृत्व की ज़रूरत है जो पंजाब में लोकप्रिय हो. वह कहते हैं कि निश्चित तौर पर कुछ कहना समय से पहले होगा लेकिन वह नवाज़ शरीफ़ को दोबारा सत्ता में आता नहीं देख रहे.

लेकिन वह कहते हैं कि नवाज़ शरीफ़ के पास यह ताक़त है कि वह जिसको चाहे प्रधानमंत्री बना सकते हैं. "मेरे विचार में इस्टैब्लिशमेंट की राय में नवाज़ शरीफ़ वापस आकर इमरान ख़ान की लोकप्रियता को प्रभावित करेंगे जिसका लाभ आने वाले चुनाव में लिया जाएगा."

लेकिन सलमान ग़नी समझते हैं कि नवाज़ शरीफ़ शहबाज़ शरीफ़ नहीं बनेंगे. "नवाज़ लीग की लोकप्रियता नवाज़ शरीफ़ की वजह से है और नवाज़ शरीफ़ अपनी सियासी भूमिका स्थापित करेंगे."

दूसरी और पत्रकार और विश्लेषक मुजीबुर रहमान शामी समझते हैं कि नवाज़ शरीफ़ की वापसी किसी डील का नतीजा नहीं है. "अब माहौल बदल चुका है."

वह कहते हैं कि इमरान ख़ान डिलीवर नहीं कर सके बल्कि सत्ता जाने के बाद उनकी इस्टैब्लिशमेंट के साथ जंग औपचारिक लड़ाई में बदल चुकी है. "दूसरी और नवाज़ शरीफ़ आज भी लोकप्रियता और महत्व रखते हैं, इसलिए स्वाभाविक तौर पर उनकी वापसी होनी ही थी."

"इतिहास से कभी किसी ने कुछ नहीं सीखा"

नवाज़ शरीफ़ इस बार भी जिस ढंग से पाकिस्तान और राजनीति में वापस आ रहे हैं उसमें उनके अतीत की झलक नजर आ रही है.

सत्ता से निकाला जाना, इस्टैब्लिशमेंट विरोधी नैरेटिव अपनाना, लेकिन फिर देश से बाहर चले जाना और वह नैरेटिव छोड़कर इस्टैब्लिशमेंट के साथ किसी समझौते के बाद वापस आ जाना…यह वही राह है जिससे नवाज़ शरीफ़ कम से कम तीन बार पहले भी गुज़र चुके हैं.

तो सवाल यह है कि क्या वह एक बार फिर वही ग़लती करने जा रहे हैं जो पहले भी कर चुके हैं? क्या वह यह समझते हैं कि उनके या उनकी पार्टी के साथ दोबारा वह नहीं होगा जो तीन बार पहले हो चुका है?

पत्रकार और विश्लेषक सलमान ग़नी कहते हैं कि इतिहास का सबसे बड़ा सबक़ यही है कि इतिहास से कभी किसी ने सबक़ नहीं सीखा.

सलमान ग़नी कहते हैं कि इसमें कोई दो राय नहीं कि ज़ाहिर तौर पर ऐसा ही नज़र आता है कि नवाज़ शरीफ़ इस्टैब्लिशमेंट के साथ किसी समझौते के ज़रिए ही वापस आ रहे हैं.

सलमान ग़नी कहते हैं, "ऐसा ही नज़र आता है कि वही राह दोबारा बन रही है जिससे नवाज़ शरीफ़ और उनसे पहले और उनके बाद में आने वाले कई दूसरे नेता गुज़र चुके हैं. लेकिन अब देखना यह होगा की मीनार-ए-पाकिस्तान की सभा में नवाज़ शरीफ़ अपने संबोधन में क्या कहते हैं."

विश्लेषक सलमान ग़नी समझते हैं कि इस सभा से मालूम हो पाएगा कि नवाज़ शरीफ़ क्या सोच रखते हैं और उनके पास आगे के लिए क्या कार्ययोजना है.

उनके विचार में नवाज़ शरीफ़ पूरी तरह अपने पुराने 'वोट को इज़्ज़त दो' या इस्टैब्लिशमेंट विरोधी नैरेटिव को छोड़ नहीं पाएंगे.

"मीनार-ए-पाकिस्तान की सभा में दो बातें महत्वपूर्ण होंगी, एक यह कि कितने लोग नवाज़ शरीज़ के साथ आते हैं और दूसरी यह कि नवाज़ शरीफ़ क्या नैरेटिव अपनाते हैं. नवाज़ शरीफ़ यह जानते हैं कि इस्टैब्लिशमेंट पाकिस्तान की राजनीति की एक सच्चाई है."

सलमान ग़नी के अनुसार, "अब देखना यह होगा कि नवाज़ शरीफ़ इस बात को सामने रखते हुए क्या रणनीति अपनाते हैं. क्या वह उस दौर से आगे बढ़ पाए हैं जो इतिहास में उनके साथ होता रहा है और अपनी और अपनी पार्टी की राजनीति को भी बचा सकें."

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