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पाकिस्तान: सियासी उठापटक के कारण गहराते संकट के लिए कौन ज़िम्मेदार
- Author, कैरोलाइन डेविज़
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
पाकिस्तान के हालात शायद इससे पहले इतने ख़राब कभी नहीं रहे होंगे.
इसकी अर्थव्यवस्था डूबने के कगार पर है और समाज राजनीतिक रूप से पूरी तरह बंटा हुआ है.
पिछले साल आई बाढ़ के कारण प्रभावित हुए लाखों लोग अभी भी उससे उबरने की कोशिश कर रहे हैं.
चरमपंथी हमले बढ़ रहे हैं और महंगाई आसमान छू रही है. पाकिस्तान में ऐसे कई लोग हैं जो अपने और अपने बच्चों के लिए दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
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एक तरफ़ पूरा देश परेशानियों से जूझ रहा है, लेकिन दूसरी तरफ़ राजनेता और संस्थाएं आपस में इस बात के लिए लड़ रहे हैं कि पाकिस्तान पर शासन किसे करना चाहिए.
लेकिन घंटों तक एक दूसरे से बहस करने, एक दूसरे को चेतावनी देने और सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने के बावजूद एक साल के बाद भी इस सवाल का कोई उचित जवाब नहीं मिल सका है कि पाकिस्तान की सत्ता पर किसे होना चाहिए.
वाशिंगटन डीसी स्थित विल्सन सेंटर में साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के निदेशक माइकल कुगेलमैन कहते हैं, "दूसरी गंभीर समस्याओं के मद्देनज़र पाकिस्तान का मौजूदा संकट अप्रत्याशित हो गया है."
कुगेलमैन आगे कहते हैं, "पाकिस्तान यह भी नहीं कह सकता है कि यह राजनीतिक संकट दूसरी तरफ़ ध्यान को खींचने के लिए पैदा की गई है और आख़िरकार हमलोग वहां आजाएंगे जहां हमें होना चाहिए यानी जल्द ही सबकुछ ठीक हो जाएगा."
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था ख़स्ताहाल है. विदेशी मुद्रा भंडार दशकों से सबसे कम हो गया है. तेल समेत दूसरी ज़रूरी चीज़ों का आयात विदेशी मुद्रा के ज़रिए ही संभव है.
इस साल के शुरू में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के अधिकारियों से कई राउंड की बातचीत हुई थी लेकिन 1.1 अरब डॉलर की क़िस्त अभी तक पाकिस्तान को नहीं मिल सकी है.
इस बीच चरमपंथी हमलों में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है और ख़ासकर सुरक्षाकर्मियों को निशाना बनाया जा रहा है.
पाकिस्तानी सेना ने हाल ही में कहा था कि अब तक केवल इसी साल 436 चरमपंथी हमले हुए हैं.
हद तो यह हो गई है कि चरमपंथी ख़ुद पूरे आंकड़े जारी कर दावा करते हैं कि उन्होंने कितने लोगों को मारा है, कितने घायल हुए हैं और उन्होंने सुरक्षाकर्मियों से कितने हथियार छीने हैं.
इन सबके बीच खाने-पीने की चीज़ों की क़ीमत लगातार बढ़ती जा रही है. पिछले साल आई भीषण बाढ़ से हुए नुक़सान से उबरने के लिए पाकिस्तान अभी तक संघर्ष ही कर रहा है.
इस साल तो अभी बारिश शुरू भी नहीं हुई है. ऐसे कई बड़े सवाल हैं जिसका नेताओं को जवाब देना चाहिए.
राजनीतिक समीक्षक महमल सरफ़राज़ कहती हैं, "राजनीतिक अनिश्चितता चीज़ों को और कठिन बना रही है. पाकिस्तान में सिस्टम ध्वस्त हो रहा है और अगर ऐसा होता है तो इससे किसी का भला नहीं होगा, ना ही राजनीतिक पार्टियों का और ना ही पाकिस्तान की जनता का."
राजनीतिक गतिरोध
राजनीति पर नज़र रखने वालों का कहना है कि मौजूदा संकट की शुरुआत तब हुई जब पिछले साल (2022) अप्रैल में इमरान ख़ान सदन में विश्वास मत हासिल नहीं कर सके और उनकी सरकार गिर गई.
कुगेलमैन कहते हैं, "इमरान ख़ान ने इस फ़ैसले को मानने से इनकार कर दिया. और यह बिल्कुल साफ़ था कि सरकार (शहबाज़ शरीफ़ की सरकार) इमरान ख़ान के विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों को भी नज़रअंदाज़ नहीं करेगी."
सत्ता से बेदख़ल किए जाने के बाद इमरान ख़ान ने पूरे देश में कई रैलियां निकालीं और राजधानी इस्लामाबाद तक एक मार्च भी निकाला.
इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ कोर्ट केस भी बढ़ते जा रहे हैं. इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ का कहना है कि उन पर इस वक़्त 100 से भी ज़्यादा मुक़दमे हो चुके हैं जिनमें चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होने, भ्रष्टाचार और अदालत की अवमानना जैसे मुक़दमे भी शामिल हैं.
इमरान ख़ान ने इन मुक़दमों को अपने सरकार विरोधी अभियान का हिस्सा बना दिया है और वो सरकार पर आरोप लगाते हैं कि पाकिस्तान में क़ानून का नहीं बल्कि 'जंगल राज' है.
दूसरी तरफ़ शहबाज़ शरीफ़ सरकार में शामिल कई मंत्री आरोप लगाते हैं कि इमरान ख़ान अहंकार और आत्ममोह के शिकार हैं.
अदालत ने उन्हें कई बार पेश होने के लिए कहा, लेकिन जब वो अदालत में पेश नहीं हुए तो इस्लामाबाद पुलिस उन्हें गिरफ़्तार करने के लिए लाहौर स्थित उनके घर दो बार पहुंची थी.
इमरान ख़ान ने भी सरकार को अदालत में खींचा है. दो राज्यों में उनकी पार्टी की सरकार थी. इमरान ख़ान ने आम चुनाव कराने के लिए सरकार पर दबाव डालने की नियत से दो राज्यों की सरकार गिरा दी और विधानसभा भंग हो गई. लेकिन जब केंद्र सरकार नहीं मानी तो वो सुप्रीम कोर्ट चले गए जहां अभी यह केस लंबित है.
इन मुक़दमों की वजह से न्यायपालिका भी बंट गई है. केंद्र सरकार ने कुछ जजों पर आरोप लगाया है कि वो इमरान ख़ान के समर्थक हैं. इस तरह के मतभेदों के कारण कुछ लोगों को डर है कि पाकिस्तान में गंभीर संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है.
पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ़ लेजिस्लेटिव डेवेलपमेंट एंड ट्रांस्पेरेंसी के संस्थापक अध्यक्ष और राजनीतिक समीक्षक अहमद बिलाल कहते हैं, "इमरान ख़ान सरकार को शांति से नहीं बैठने देंगे. इस सरकार (शहबाज़ शरीफ़) का सारा ध्यान इस बात पर है कि सरकार कैसे बची रहे."
अहमद बिलाल के अनुसार मौजूदा गतिरोध का एक कारण इमरान ख़ान का अपना व्यक्तित्व भी है.
वो कहते हैं, "इमरान ख़ान किसी भी तरह के समझौते के लिए तैयार नहीं हैं. यह रवैया उनके लिए नुक़सानदेह साबित हो सकता है और लंबे समय में इससे उनको राजनीतिक घाटा हो सकता है."
कुछ लोगों का मानना है कि मौजूदा राजनीतिक गतिरोध इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान की संस्थाएं नाकाम हो रहीं हैं.
महमल सरफ़राज़ कहती हैं, "इस समय ऐसा कोई गुट (संस्था) नहीं है जो मध्यस्थता कर सके. इस्टैबलिशमेंट की विश्वसनीयता नहीं है."
पाकिस्तान में सेना और ख़ुफ़िया सेवा को आम तौर पर इस्टैबलिशमेंट कहा जाता है.
पाकिस्तान की सेना ने वहां की राजनीति में अहम रोल अदा किया है और कई बार सेना ने तख़्तापलट ख़ुद सत्ता पर क़ब्ज़ा किया है.
कई बार सेना ने पर्दे के पीछे से सरकार को नियंत्रित किया है.
कई विश्लेषकों का मानना है कि साल 2018 के चुनाव में इमरान ख़ान सेना की मदद से ही जीतने में कामयाब हुए थे.
लेकिन विपक्ष में आने के बाद इमरान ख़ान सेना के सबसे मुखर आलोचकों में से एक हो गए हैं और जानकारों का मानना है कि सेना की लोकप्रियता गिर गई है.
कुगेलमैन कहते हैं, "साफ़ संकेत हैं कि सेना के भीतर ही इस बात को लेकर सहमति नहीं है कि आगे का सही रास्ता क्या होगा."
कुगेलमैन के अनुसार सेना का शीर्ष नेतृत्व राजनीति में ख़ुद को शामिल होता हुआ नहीं देखना चाहेगा लेकिन निचले और मध्य स्तर के कई सैन्य अधिकारी इमरान ख़ान के बड़े समर्थक बताए जाते हैं.
कुगेलमैन कहते हैं, "इमरान ख़ान ने राजनीति का पूरी तरह ध्रुवीकरण कर दिया है. उन्होंने आम जनता और सेना को भी बांट दिया है."
आगे क्या
इस साल आम चुनाव होने वाले हैं. लेकिन इस बात की पूरी आशंका है कि इन्हें टाल दिया जाए. उसी तरह जैसे राज्य विधानसभा के लिए चुनाव को टाल दिया गया था. सरकार ने पैसों की कमी और सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए चुनाव टाल दिया था.
अहमद बिलाल के अनुसार अगर ऐसा होता है तो यह बहुत ही नुक़सानदेह होगा.
अहमद बिलाल कहते हैं, "मेरा मानना है कि यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा और शायद यह पाकिस्तान में लोकतांत्रिक प्रक्रियो को भी नुक़सान पहुंचाएगा. शायद ऐसा कि जिसकी क्षति पूरी नहीं हो सके. हमने कभी भी चुनावों को टलते हुए नहीं देखा है."
सरकार और इमरान ख़ान की पार्टी के बीच चुनावों को लेकर कई राउंड की बातचीत हो चुकी है. इस बात को लेकर दोनों में सहमति है कि आम चुनाव और प्रांतीय चुनाव एक साथ होने चाहिए लेकिन इस पर बात नहीं बन पाई है कि चुनाव कब होंगे.
महमल सरफ़राज़ के अनुसार चुनाव की तारीख़ों को लेकर एकमत हो जाना भी काफ़ी नहीं है.
वो कहती हैं, "अगर दोनों पक्ष यह तय नहीं करते हैं कि चुनाव को निष्पक्ष कैसे माना जाएगा तो दोनों ही नतीजों को नहीं मानेंगे और देश में मतभेद बने रहेंगे."
राजनेताओं पर यह बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वो किसी समझौते तक पहुंचे, जो कि राजनीतिक रूप से विभाजित पाकिस्तान के लिए बहुत मुश्किल काम है.
महमल सरफ़राज़ कहती हैं, आप राजनीतिक विरोधी हैं, एक दूसरे के निजी दुश्मन नहीं हैं. इससे पहले कि पूरा तंत्र ही ध्वस्त हो जाए, यही समय है कि हमलोग एक दूसरे से बात करें और चीज़ों को सही दिशा में ले जाएं."
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